लेखक परिचय

प्रो. कुसुमलता केडिया

प्रो. कुसुमलता केडिया

प्रख्यात समाजवैज्ञानिक एवं गांधी विद्या संस्थान, राजघाट, वाराणसी की कार्यकारी निदेशक

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प्रो. कुसुमलता केडिया

क्रिश्चिएनिटी की जिन मान्यताओं के विरोध में यूरोपीय नारी मुक्ति आंदोलन वीरतापूर्वक खड़ा हुआ, वे मान्यताएं हिन्दू धर्म, बौध्द धर्म तथा विश्व के सभी धर्मों में कभी थी ही नहीं। यहां तक कि यहूदी धर्म और इस्लाम में भी ये मान्यताएं कभी भी नहीं थीं। भले ही स्त्रियों पर अनेक प्रतिबंध इस्लाम में हैं परन्तु ऐसी भयंकर मान्यताएं वहां भी नहीं हैं।

भारत में भी नारी मुक्ति का एक आंदोलन चल रहा है। इसके भी अधिकांश स्वर वैसे ही दिखते हैं, जैसे यूरोपीय स्त्री आंदोलन के दिखते हैं। परन्तु यह दिखाई पड़ना केवल ऊपरी है, आकारगत है। तत्व की दृष्टि से दोनों में बड़ा अंतर है। यूरोपीय स्त्री आंदोलन लगभग एक हजार वर्षों के यूरोपीय इतिहास से अभिन्नता से जुड़ा है। भारत यूरोपीय राजनीति से, जो आज एक तरह से वैश्विक राजनीति भी है, घनिष्ठता से जुड़ा है। भारत में राजनीति करने वाले लोगों के मन में यूरोपीय, अमेरिकी राजनैतिक विचारों तथा राजनैतिक संस्थाओं के प्रति श्रध्दा एवं प्रणाम की भावना है और इसी कारण से वहां की एकेडमिक्स के प्रति भी श्रध्दा और प्रणाम भावना है। अत: यहां राजनैतिक दृष्टि से सक्रिय लोगों में नारी मुक्ति के संदर्भ में भी यूरोपीय नारी मुक्ति आंदोलन के प्रत्ययों, नारों, मान्यताओं और भंगिमाओं का अनुसरण करने का भरपूर प्रयास दिखता है, क्योंकि वैसा करना ही ‘पोलिटिकल करेक्टनेस’ है। यह बात समझ में भी आती है।

वैश्विक मीडिया द्वारा ‘पोलिटिकली करेक्ट’ लोगों और बातों को ही तरजीह मिलेगी, प्रधानता मिलेगी, प्रचार मिलेगा, महत्व मिलेगा, विदेश घूमने और वहां पब्लिसिटी पाने का मौका मिलेगा, जिससे सुख-सुविधा और ‘पावर’ मिलेगी। परन्तु ‘पोलिटिकल करेक्टनेस’ और एकेडमिक स्पष्टता- ये दो अलग-अलग बातें हैं। इनके घालमेल से किसी का भी भला नहीं होगा। एकेडमिक स्पष्टता सम्भव होती है- तथ्यों के संकलन, उनके निष्पक्ष विश्लेषण और ब्यौरेवार प्रस्तुतियों से। इन तीनों से ही समस्याओं का यथातथ्य निरूपण सम्भव होता है। और तब उनके सम्भावित समाधान के रास्ते खुलते हैं। अत: बौध्दिक स्पष्टता के लिए आवश्यक है कि सर्वप्रथम हम यूरोपीय नारी मुक्ति आंदोलन के वास्तविक संदर्भों को जानें। ग्यारहवीं शदी ईस्वी के प्रारंभ तक यूरोप का बड़ा हिस्सा बहुदेवपूजक यानी सनातनधर्मी था। क्रिश्चिएनिटी वहां 7वीं शदी ईस्वी से धीरे-धीरे फैलनी शुरू हुई।

इंग्लैंड में क्रिश्चिएनिटी 7वीं से 11वीं शदी तक क्रमश: फैली। 1066 ई. में जब इंग्लैंड पर नार्मन लोगों ने आक्रमण किया तब पोप की मदद पाने के लिए वहां के शासक सैक्सन लोगों ने क्रिश्चिएनिटी को ‘राजकीय रिलिजन’ स्वीकार कर लिया। इसमें वहां तीन सौ वर्षों से लगातार सक्रिय मिशनरी पादरियों की भूमिका रही। उसके पूर्व 8वीं शताब्दी में प्रफांस के बर्बर प्रहारों से टूटे हुए तत्कालीन कतिपय अंग्रेज शासक समूहों ने भी कुछ समय के लिए क्रिश्चिएनिटी स्वीकार की थी। रोम में क्रिश्चिएनिटी चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी के बीच धीरे-धीरे फैली थी। प्रफांस में वह छठी शताब्दी में फैली। स्पेन तथा जर्मनी में छठी और सातवीं, जबकि पोलैंड, रूस, सर्बिया, बोहेमिया, हंगरी, बुल्गारिया, डेनमार्क आदि में 10वीं और 11वीं शताब्दी में, स्वीडन और नार्वे में 12वीं शताब्दी में। प्रशा, फिनलैंड, स्टोनिया, लीवोनिया और स्विट्जरलैंड में 13वीं शताब्दी में ही ईसाईयत फैल पायी। 15वीं शताब्दी ईस्वी से उसका प्रचंड विरोध भी यूरोप में शुरू हो गया। क्योंकि उसकी मूल मान्यताएं ही मानवता-विरोधी थीं। ईसाईयत की मूल मान्यताओं का प्रबल प्रभाव 12वीं से 16वीं शदी ईस्वी तक यूरोप में व्यापक हुआ। इन मान्यताओं और आस्थाओं को जाने बिना यूरोपीय स्त्री मुक्ति आंदोलन के संदर्भों को समझा नहीं जा सकता।

स्त्री-पुरुष सम्बन्धी मूल क्रिश्चियन मान्यताएं मूल क्रिश्चियन मान्यताओं में सबसे महत्वपूर्ण मान्यताएं हैं:-

(1) ‘गॉड’ ने पुरुष (मैन) को अपनी ही ‘इमेज’ में बनाया। अत: यह ‘मैन’ ही समस्त सृष्टि का ‘लॉर्ड’ है। ‘मैन’ को चाहिए कि वह धरती को दबाकर आज्ञाकारिणी और वशवर्ती बना कर रखे तथा उससे खूब आनंद प्राप्त करे।

(2) ‘गॉड’ ने प्रथम ‘मैन’ एडम की एक पसली से स्त्री (ईव) बनाई जो ‘मैन’ के मन-बहलाव के लिए बनाई गई। इस प्रकार स्त्री (ईव या वूमैन) बाद की रचना है। वह ‘मैन’ का केवल एक अंश है जो उसके मन-बहलाव के लिए बनी है।

(3) नर-नारी का परस्पर स्वेच्छा और उल्लास से मिलना ही ‘मूल पाप’ (ओरिजिनल सिन) है। इस ‘ओरिजिनल सिन’ के लिए ‘मैन’ को ‘शैतान’ के कहने पर ‘वूमैन’ ने फुसलाया। इसलिए ‘वूमैन’ ‘शैतान की बेटी’ है। वह पुरुष को सम्मोहित कर ‘मूल पाप’ यानी कामभाव यानी ‘शैतानियत’ के चंगुल में फंसाती है। अत: वह सम्मोहक (सेडयूसर) है। ‘मूल पाप’ में पुरुष को खींचने का जो उसने अनुचित आचरण किया है, उस कारण वह ‘एडल्टरेस’ है, ‘एडल्टरी’ की दोषी है। पुरुष को सम्मोहित करने के ही अर्थ में वह जादूगरनी है। पुरुष को सम्मोहित करना बुरा है, इसलिए वह बुरी जादूगरनी है। अत: डायन (विच) है। उसे यातना देना पुण्य कार्य है।

(4) शैतान ‘गॉड’ का प्रतिस्पर्ध्दी है। ‘गॉड’ और शैतान में निरन्तर युध्द चल रहा है। जीसस की ‘मिनिस्ट्री’ यानी पादरी मंडल लगातार शैतान के साम्राज्य के विरुध्द संघर्षरत है, ताकि अंतत: ‘गॉड’ की जीत हो। शैतान ‘गॉड’ का शत्रु है। शैतान के विरुध्द युध्द करना और युध्द में सब प्रकार के उपाय अपनाना हर आस्थावान क्रिश्चियन का कर्तव्य (रेलिजियस डयूटी) है।

(5) स्त्री को, गैर-क्रिश्चियन सभी पुरुषों को तथा इस धरती को अपने अधीन दबा कर रखना, आज्ञाकारी और वशवर्ती बनाकर रखना हर ‘फेथफुल क्रिश्चियन’ पुरुष का कर्तव्य है और यह कर्तव्य उसे बुध्दि और बल के हर संभव तथा अधिकतम उपयोग के द्वारा करना है।

इन्हीं मूलभूत मान्यताओं के कारण क्रिश्चिएनिटी में ‘क्रिश्चियन स्त्री’ को शताब्दियों तक ‘मैन’ की शत्रु और शैतान की बेटी तथा शैतान का उपकरण माना जाता रहा है। नर-नारी मिलन को ‘मूल पाप’ माना जाता रहा है। इस दृष्टि से विवाह भी वहां ‘पाप’ ही माना जाता रहा है परन्तु वह क्रिश्चियन विधि से होने पर तथा चर्च के नियंत्रण में वैवाहिक जीवन जीने पर अपेक्षाकृत ‘न्यूनतम पाप’ माना जाता रहा। तब भी विवाहित स्त्री को मूलत: ‘अपवित्र’ ही माना जाता है। पवित्र स्त्री तो वह है जो किसी क्रिश्चियन मठ में दीक्षित मठवासिनी अर्थात् ‘नन’ है जिसने गरीबी, ‘चेस्टिटी’ तथा क्रिश्चियन पादरियों और चर्च की आज्ञाकारिता की शपथ ली है।

ननों को हठयोगियों जैसा कठोर शारीरिक तप करना पड़ता है। पादरी ‘सेलिबेट’ यानी अविवाहित होते हैं, जिसका अर्थ गैर-जानकार लोगों ने हिन्दी में ‘ब्रह्मचारी’ कर रखा है जो पूर्णत: गलत है। ‘सेलिबेट’ पादरी ‘नन्स’ के साथ उनके सम्मोहन के कारण प्राय: काम सम्बन्ध बनाते रहे हैं और उसके लिए दोषी भी ‘सेडयूसर’ ‘नन’ को ही माना जाता है।

(6) क्रिश्चिएनिटी की उपर्युक्त पांचों मूल मान्यताओं से जुड़ी एक महत्वपूर्ण छठी मान्यता यह है कि स्त्री ने चूंकि पुरुष को बहला-फुसलाकर ‘मूल पाप’ में फंसाया, अत: ‘गॉड’ ने ‘ईव’ को शाप दिया। इस शाप में मासिक धर्म, प्रसव पीड़ा, गर्भ धारण तथा सदा पुरुष की अधीनता में रहने और दंडित किये जाने आदि का शाप है। कुल सात शापों से स्त्री शापित है। किसी भी भूल पर उसे एक स्वस्थ मर्द के अंगूठे की मोटाई वाले कोड़े से दस से पचास तक कोड़े मारना क्रिश्चियन पुरुष का सहज अधिकार और कर्तव्य है। अपराध गंभीर होने पर सौ या उससे ज्यादा कोड़े पड़ सकते हैं।

(7) क्रिश्चिएनिटी में मातृत्व भी एक अभिशाप है। किसी स्त्री का मां बनना ‘गॉड’ द्वारा उसे दंडित किए जाने का परिणाम है। संतान भी ‘मूल पाप’ का परिणाम होने के कारण वस्तुत: धरती पर पाप का प्रसार ही है। केवल चर्च को समर्पित होने पर व्यक्ति इस ‘पाप’ के भार से इसलिए मुक्त हो जाता है, क्योंकि वह ऐसा करके उस जीसस की शरण में जाता है जिसने ‘क्रास’ पर टंग कर (सूली पर चढ़ कर) एडम और ईव तथा उनकी समस्त संतानों के द्वारा किए गए ‘मूल पापों’ का प्रायश्चित पहले ही सबकी ओर से कर लिया है। जीसस ‘गॉड’ का ‘इकलौता बेटा’ है और केवल उसकी शरण में जाने पर ही मनुष्य ‘पाप’ से मुक्त होता है। ‘पाप’ का यहां मूल अर्थ है ‘ओरिजिनल सिन’ यानी रति सम्बन्ध रूपी पाप जिससे व्यक्ति गर्भ में आता और जन्म लेता है। अत: व्यक्ति जन्म से ही पापी है। क्रिश्चिएनिटी की ये सातों धारणाएं अभूतपूर्व हैं, अद्वितीय हैं। और संसार की कोई भी अन्य सभ्यता इनमें से एक भी मान्यता को नहीं मानती। ये केवल क्रिश्चिएनिटी में मान्य आस्थाएं हैं।

इन अद्वितीय मान्यताओं के कारण पांच सौ वर्षों तक करोड़ों सदाचारिणी क्रिश्चियन स्त्रियों को लगातार दबाया गया, मारा गया, जलाया गया, बलपूर्वक डुबोया गया, खौलते कड़ाह में उबाला गया, घोड़े की पूंछ से बांध कर घसीटा गया। ‘क्रिश्चियन स्त्री’ पर ये अत्याचार किन्हीं लुच्चे-लफंगों, लम्पटों अथवा अनपढ़ या पिछड़े लोगों ने नहीं किया था, किन्हीं अशिक्षित, अल्पशिक्षित या असामाजिक तत्वों ने नहीं किया था अपितु सर्वाधिक शिक्षित, संगठित और प्रभुताशाली क्रिश्चियन भद्रलोक ने किया।

क्रिश्चियन स्त्रियों में भी आत्मा होती है, यह 17वीं शताब्दी के आरंभ तक चर्च द्वारा मान्य नहीं था। स्त्री का स्वतंत्र व्यक्त्तिव तो 20वीं सदी में ही मान्य हुआ। 1929 ई. में इग्लैंड की अदालत ने माना कि स्त्री भी ‘परसन’ है। स्त्रियों में आत्मा होती है, यह यूरोप के विभिन्न देशों में 20वीं शताब्दी में ही मान्य हुआ। 20वीं शताब्दी में ही स्त्रियों को वयस्क मताधिकार वहां पहली बार प्राप्त हुआ। 18वीं शताब्दी तक स्त्रियों को बाइबिल पढ़ने का अधिकार तक मान्य नहीं था। स्त्री को डायन कहकर उनको लाखों की संख्या में 14वीं से 18वीं शताब्दी तक जिन्दा जलाया गया और यातना देकर मारा गया। स्पेन, इटली, पुर्तगाल, हालैंड, इंग्लैंड, प्रफांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड आदि सभी देशों में ये कुकृत्य हुए। इन सब भयंकर मान्यताओं के विरोध में यूरोप में नारी मुक्ति आंदोलन चला जिसमें उन्होंने स्वयं को पुरुषों के समतुल्य माना, अपने भीतर वैसी ही आत्मा और बुध्दि मानी और ‘नन’ बनने से ज्यादा महत्व पत्नी, प्रेमिका और मां बनने को तथा स्वाधीन स्त्री बनने को दिया। जहां मां बनना स्वाधीन व्यक्तित्व में बाधा प्रतीत हो, वहां मातृत्व से भी अधिक महत्व स्त्रीत्व को दिया। स्त्री को बाइबिल तक नहीं पढ़ने दिया जाता था तो उसके विरोध में जाग्रत स्त्रियां प्रमुख बौध्दिक और विदुषी बन कर उभरीं तथा विद्या के हर क्षेत्र में अग्रणी बनीं। क्रिश्चियन स्त्री को पुरुषों को लुभाने वाली कहा जाता था, इसीलिए नारी मुक्ति का एक महत्वपूर्ण अंग हो गया- श्रंगारहीनता या सज्जाहीनता। काम को ‘मूल पाप’ माना जाता था इसलिए उसकी प्रतिक्रिया में काम संबंध को स्वतंत्र व्यक्तित्व का लक्षण माना गया। स्त्रियां स्वयं यह सुख न ले सकें इसके लिए एक विशेष अंगच्छेदन का प्रावधान किया गया था। अत: उसके विरोध में जाग्रत स्त्रियों ने समलिंगी सम्बन्धों की स्वतंत्रता की मांग की। इन सब संदर्भों से अनजान भारतीय लोग, फिर वे प्रबुध्द स्त्रियां हों या पुरुष, यूरोपीय स्त्री मुक्ति आंदोलन के कतिपय ऊपरी रूपों की नकल करते हैं। यहां उसी क्रिश्चियनिटी का महिमामंडन किया जाता है जिसने यूरोप की स्त्रियों का उत्पीड़न सैकड़ों सालों तक किया तथा जिसने साथ ही भारत में हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज सहित दुनिया के सभी समाजों पर अत्याचार किया।

नृशंस क्रिश्चिएनिटी के अत्याचारों के प्रतिरोध में उपजे साहित्य की नकल जब ‘अपराधी’ और ‘पीड़ित’ के इन रिश्तों की समझ के बिना ही भारत में की जाती है, तब ऐसा करने वाले लोग एक तो उन वीर स्त्रियों की पीड़ा की गहराई का अपमान करते हुए उसे भोडी नकल के योग्य कोई वस्तु बना कर अमानवीय व्यवहार करते हैं, साथ ही इसी छिछोरी मानसिकता से वे अकारण ही उस श्रेष्ठ हिंदू धर्म की निंदा करते हैं जो क्रिश्चियन साम्राज्यवादी अत्याचारों के विरुध्द भारत की स्त्रियों और पुरुषों का त्रता और रक्षक धर्म रहा है। यह हिन्दू धर्म हिन्दू स्त्री की रक्षा का समर्थ कवच रहा है। परन्तु अनपढ़ (इल्लिटरेट) लोग जो आधुनिक अर्थ में शिक्षित कहलाते हैं, इन विषयों में सत्य का विचार किए बिना यूरोपीय स्त्रियों के बाहरी शब्दों की नकल करते हुए हिन्दू स्त्रियों के कष्ट के लिए हिन्दू धर्म को ही गाली देते हैं। केवल इसलिए क्योंकि यूरोपीय नारी मुक्ति आंदोलन अत्याचारी क्रिश्चियन रेलिजन को गाली देता है। क्रिश्चियन रेलिजन का अत्याचारी इतिहास सत्य है। लेकिन उसकी नकल में हिन्दू धर्म को भी वैसा चित्रित करना पाप है, झूठी रचना है।

क्रिश्चिएनिटी की जिन मान्यताओं के विरोध में यूरोपीय नारी मुक्ति आंदोलन वीरतापूर्वक खड़ा हुआ, वे मान्यताएं हिन्दू धर्म, बौध्द धर्म तथा विश्व के सभी धर्मों में कभी थी ही नहीं। यहां तक कि यहूदी धर्म और इस्लाम में भी ये मान्यताएं कभी भी नहीं थीं। भले ही स्त्रियों पर अनेक प्रतिबंध इस्लाम में हैं परन्तु ऐसी भयंकर मान्यताएं वहां भी नहीं हैं। भारत का इतिहास तो क्रिश्चिएनिटी से नितान्त विपरीत है। यहां तो अत्यंत प्राचीन काल से स्त्रियां ब्रह्मवादिनी, रणकुशल सेनानी तथा कलाओं, शिल्पों और व्यवसाय आदि में अग्रणी रही हैं।

हिन्दू धर्म में यशश्वी स्त्रियों की महान परंपरा रही है। यहां प्राचीन काल में महारानी कैकेई से लेकर 19वीं शताब्दी ईस्वी के मधय में हुए भारत के स्वाधीनता संग्राम में सर्वसम्मति से सेनापति की भूमिका निभाने वाली युवा वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई तक हुई हैं। लक्ष्मीबाई 26 वर्षीय विधवा युवती थीं, जिन्हें युध्द सम्बन्धी उनकी दक्षता, कौशल और वीरता के कारण तत्कालीन भारतीय नरेशों ने सहज ही अपना सेनापति स्वीकार किया था। भारत में जीवन के हर क्षेत्र में वैदिक काल से ही स्त्रियां पुरुषों के समान अग्रणी रही हैं। उपनिषद कहते हैं कि एक ही मूल तत्व द्विदल अन्न के दोनों दलों की तरह स्त्री और पुरुष में विभक्त हुआ है, इसीलिए दोनों को परस्पर अर्धांग माना जाता है। भारतीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दक्ष, प्रसिध्द तथा सफल स्त्रियों की अनन्त शृंखला है। यहां इस्लामी अत्याचारों और ब्रिटिश क्रिश्चियन अत्याचारों, दोनों का ही सामना स्त्रियों और पुरुषों ने समान वीरता से और सहभागिता से किया है। भारत की इस अक्षुण्ण परम्परा को अस्वीकार कर यूरोपीय नारी के इतिहास को ही भारतीय स्त्री का भी इतिहास मानने और बताने का अर्थ है स्वयं को उस ‘क्रिश्चियन’ छवि में समाहित करना जिसके अनुसार स्त्रियां सम्मोहक हैं। उनमें सेक्स की शक्ति से मोह लेने की क्षमता है। स्त्री विषयक इन ‘क्रिश्चियन’ मान्यताओं को अंगीकार करने पर उस मूल ‘क्रिश्चियन’ दृष्टि की भी सहज स्वीकृति हो जाएगी जिसके अनुसार स्त्री शैतान की बेटी और उपकरण है, ‘एडल्टरेस’ है तथा पतन का कारण है। इन सब मान्यताओं को भारतीय इतिहास का भी सत्य मानकर इनके विरुध्द विद्रोह करना भारत में नारी मुक्ति आंदोलन का लक्षण मान लिया जाता है। परन्तु क्या ऐसा झूठा, तथ्यविरुध्द और नकली इतिहास रचा जा सकता है? या मान्य हो सकता है? यूरोप की प्रबुध्द स्त्रियां ‘रेनेसां’ के बावजूद क्रिश्चिएनिटी की इन मान्यताओं के प्रभाव में हैं कि यूरोप के बाहर की दुनिया तो असभ्य लोगों और जाहिलों की दुनिया है। वे अब भी मानती हैं कि सम्पूर्ण आधुनिक विश्व के लिए एक ही सार्वभौम सभ्यता है और वह है क्रिश्चियन सभ्यता। वे इसी भाषा को समझती हैं और इसे ही बोलती हैं। यद्यपि क्रिश्चिएनिटी की सर्वश्रेष्ठता में विश्वास वो खो चुकी हैं। तथापि यूरोपीय सभ्यता की सार्वभौमिकता में उनका अभी भी विश्वास है। परन्तु भारत की प्रबुध्द स्त्री भारत के सम्पूर्ण इतिहास को झुठलाकर एक काल्पनिक इतिहास कैसे रच सकती है? और कैसे वह स्वयं को प्रमाणिक ठहरा सकेगी?

भारत में ‘नारी मुक्ति’ के मायने हैं (1)भारतीय इतिहास के विषय में तथ्यों का संकलन (2) क्रिश्चिएनिटी की भयावह मान्यताओं के रेलिजियस और दार्शनिक आधारों की सही समझ (3) उन मान्यताओं के कारण उन्मत्त ‘क्रिश्चियन’ साम्राज्यवाद द्वारा विश्वभर में किए गए बर्बर अत्याचारों और लूट की जानकारी (4) इस लूट और अपमान से हुई क्षति की पूर्ति की मांग ब्रिटेन तथा सम्पूर्ण क्रिश्चियन समाज से करना, (5) भारत से ‘एंग्लो-सेक्सन ला’ की विदाई की मांग करना। जब तक यह ‘एंग्लो-सेक्सन ला’ भारत में राज्य की विधिव्यवस्था का आधार है, तब तक भारत में हिन्दू धर्म को वैसा ही राजकीय संरक्षण दिए जाने का दबाव बनाना जैसा ‘क्रिश्चिएनिटी’ को ‘एंग्लो-सेक्सन ला’ के अंतर्गत सेक्युलर ब्रिटेन में प्राप्त है (6) भारतीय स्त्री की गौरवशाली परम्पराओं की पुनर्प्रतिष्ठा एवं (7) शासन, सेना, प्रशासन सहित विज्ञान प्रौद्योगिकी, कला, व्यवसाय आदि सभी क्षेत्रें में हिन्दू स्त्री की बुध्दि को फलवती होने देने की व्यवस्थाएं बनाने और प्रावधान किए जाने का दबाव बनाना तथा श्रेयस्कर राष्ट्र तथा श्रेयस्कर विश्व के निर्माण में हिन्दू स्त्रियों की भूमिका के लिए पथ प्रशस्त करना। यहां ‘हिन्दू स्त्री’ शब्द का प्रयोग बहुत सोच-विचार कर विवेकपूर्वक किया जा रहा है क्योंकि हिन्दू स्त्रियों का गौरवशाली इतिहास एक तथ्य है और इस सत्य के बल पर ही हिन्दू स्त्री अपनी प्रज्ञा और शील के प्रकाश तथा उत्कर्ष से स्वयं को और शिक्षित भारतीय समाज को भ्रांत धारणाओं से मुक्त रख सकती है। वह भारत की मुस्लिम और क्रिश्चियन स्त्रियों के दुख भी बांट सकती है। करुणा भाव तथा मैत्री भाव से उनकी सहायक भी बन सकती है। कम्युनिस्ट तथा अन्य यूरोख्रीस्त मत के प्रभावों वाली हिन्दू स्त्रियों की भ्रांति और विचलन को भी दूर करने में आत्मगौरव सम्पन्न हिन्दू स्त्री ही समर्थ हो सकती है। ऐसी हिन्दू स्त्री वीरता, कंटकशोधन, भारत के वैभव-विस्तार, सुसंस्कार, समृध्दि, विपुलता के प्रवाह की पोषक और संरक्षक के नाते वैविधयपूर्ण रूपों में पुन: प्रतिष्ठा पाएगी, यही भारत में नारी मुक्ति के सच्चे मायने हैं।

(लेखिका गांधी विद्या संस्थान वाराणसी की निदेशिका हैं)

25 Responses to “ईसाई धर्म और नारी मुक्ति / प्रो. कुसुमलता केडिया”

  1. डॉ. राजेश कपूर

    Dr.Rajesh Kapoor

    प्रो. कुसुम केडिया जी,
    आपका यह लेख भारत विकास परिषद्, हिमाचल प्रदेश की स्मारिका में प्रकाशित करने की अनुमति अपेक्षित है. आशा है कि निराश नहीं होना पडेगा.

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  2. अखिल कुमार (शोधार्थी)

    akhil

    फरक नहीं पड़ता………यदि आपके पास दम होगा तो मेरी कही बातों को गलत साबित करियेगा किन्तु प्रमाण के साथ………..अपनी आस्था को अपने पास ही रखियेगा जो दूकान पे २ रूपये किलो के कबाड़ से भी फ़ालतू चीज़ है………….असल चीज़ है तर्क,……हो सके तो करियेगा

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  3. अखिल कुमार (शोधार्थी)

    akhil

    कौशलेन्द्र जी मेरी टिप्पड़ियां दूषित नही हैं,सत्य का कटु चेहरा हैं……………इसे आप स्वीकार करें या अपने जबरदस्ती के गौरवगान में भूल जाँय

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  4. kaushalendra

    प्रोफ़ेसर कुसुम लता जी का यह आलेख यूरोप में क्रिश्चियनिटी के पदार्पण और विस्तार की विवश पृष्ठभूमि का लेखा जोखा प्रस्तुत करने के कारण महत्वपूर्ण है …उनके लिए भी जो भारत में रहकर क्रिश्चियनिटी के संवाहक बने हुए हैं.
    मीणा जी ! मैं बड़े ही धैर्य से आपको समझने की चेष्टा कर रहा हूँ. ब्राह्मणों के प्रति आपकी स्थाई कटुता, आर्यों के विदेशी होने का निरूपण ,….हिन्दुओं की निकृष्ट परम्पराएं ……आदि बिन्दुओं पर आप खुल कर लिखते रहे हैं. इस विद्रोह से आपकी एक पृथक ही छवि बनी है. पाखण्ड का मैं भी विरोधी हूँ . “जन्मना जायते शूद्र कर्मणा जायते द्विजः ” का समर्थक हूँ.
    तुलसी दास एक कवि थे. वे भारतीय संस्कृति के जन्मदाता नहीं हैं. इस्लामिक और क्रिश्चियन धर्म / संस्कृति के विपरीत भारतीय धर्म/ संस्कृति का जनक कोई एक व्यक्ति न होकर एक सुदीर्घ परम्परा को निरंतर परिष्कृत करने वाले लोग रहे हैं. यहाँ कट्टरता नहीं है..तरलता है …अपने विचारों और आस्था को बनाए रखते हुए दूसरों को भी सम्मान देने की स्वस्थ्य परम्परा रही है. वैचारिक जड़ता लोगों को कट्टर बनाती है जबकि वैचारिक प्रवाह लोगों को निरंतर परिमार्जन की स्वतंत्रता प्रदान करता है.
    एब्सोल्यूट समाज की कल्पना एक आदर्श है …एक पैमाना है जिसे सामने रखकर हमें अपना मार्ग तय करना होता है. कोई आवश्यक नहीं कि हम अपने लक्ष्य को उसके पूर्ण रूप में पा सकें …किन्तु प्रयास तो वही रहता है न ! इसलिए पैमानों को निरंतर स्मरण करना पड़ता है. सनातन धर्म इसी पैमाने का काम करता है. समाज की चालू मान्यताएं सदा स्थिर नहीं रहतीं…उनमें परिवर्तन होते रहते हैं…अच्छाइयां और बुराइयां आती और जाती रहती हैं . जब हम पश्चिमी देशों की तुलना भारत से करते हैं तो दोनों जगह अच्छी-बुरी बातें देखने को मिलती हैं. किन्तु समग्र दृष्टि से देखेंगे तो भारत का पलड़ा भारी दिखाई देता है. हमारे पैमाने अधिक समृद्ध प्रमाणित होते हैं. हमें अपने हिन्दू होने पर गर्व है, निस्संदेह, समाज में आये नैतिक पतन से हम शर्मिन्दा भी हैं पर आशा की किरण यह है कि हमारे पास हमारी संस्कृति का पर्याप्त प्रकाश है जिससे हम छाये हुए अँधेरे को दूर कर सकते हैं. भारतीय समाज ने कबीर को सर आँखों पर लिया है. आप कबीर हैं तो आपका स्वागत है ….पर कबीर जैसी ही सम दृष्टि होने पर ही. ऐसा नहीं कि आप खुद को अपमानित करते रहें और आयातित संस्कृति की प्रशंसा करते रहें …इससे विवाद होगा.
    देखिये, मीणा जी ! दुनिया की सारी स्त्रियाँ श्रेष्ठ नहीं होतीं उनमें भी मानवीय दुर्बलताएं हैं पर दुनिया की हर माँ श्रेष्ठ होती है. धर्म और संस्कृति की बात करते समय इस अंतर को समझना ही होगा.

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  5. -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    किराये के लेखकों और टिप्पणीकारों को अपने आसपास कुछ भी नहीं दीखता, लेकिन दूरदेश में सबकुछ साफ-साफ और प्रमाण सहित नज़र आता है! क्योंकि उनका लक्ष दूसरों की गंदगी में अपनी गंदगी को छुपाना जो है!

    भारतीय नारी के सम्मान में “ब्राह्मण देवता तुलसीदास” राम चरित मानस में लिखते हैं कि-

    “कत बिधि स्रजीर नारि जग माहीं|
    पराधीन सपनेहुँ सुख नहीं||”-बालकाण्ड

    “मैं नारि अपावन प्रभु जगपावन|
    रावनरिपु जन सुखदाई||”-बालकाण्ड-छंद

    यदि इनका अर्थ लिखूंगा तो महान धर्म रक्षकों की ओर से धर्मद्रोह का आरोप तय है! इसलिए पाठक कृपया खुद ही समझें! वैसे भाषा सरल है! नहीं समझ में आये तो रामचरित मानस में उपलब्ध है!

    आगे भी ऐसे प्रमाण मिलते रहेंगे!

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    • डॉ. राजेश कपूर

      Dr.Rajesh Kapoor

      ”गटर इन्स्पैक्टर ओफ इन्डिया” यह नाम दिया है गान्धि जी ने भारत की केवल गन्दगी को उजागर करने वालों को. क्या डा. मीणा जी भी उसी श्रेणी मे आते हैं? भाइसाहेब अगर नीयत ठीक है और पुर्वाग्रह की पट्टी बुधी पर नही बन्धी है तो जरा भारतीय संस्क्रिति व हिन्दु समाज के कोई गुण भी बतलायें .

      Reply
  6. डॉ. मधुसूदन

    मधुसूदन उवाच

    http://www.cdc.gov/nchs/fastats/mental.htm
    Mental Health (Data for 2007)
    (Data are for the U.S.)

    USA.gov: The U.S. Government’s Official Web पोर्टल Department of Health and Human Services
    Centers for Disease Control and Prevention 1600 Clifton Rd. Atlanta, GA 30333, USA
    800-CDC-INFO (800-232-4636) TTY: (888) 232-6348, 24 Hours/Every Day – cdcinfo@cdc.gov

    Health Care Use
    Ambulatory care

    * Number of ambulatory care visits (to physician offices, hospital outpatient and emergency departments) with mental disorders as primary diagnosis: 58.2 million (average annual 2006-2007)

    मैं आदरणीय डॉ. राजेश कपूर जी की टिप्पणी की पुष्टि में निम्न सांख्यिकी आंकडे जो यु. एस. शासन के जाल से लिये गये हैं, प्रस्तुत करता हूं।मुझे लगता है, जितना छीछरे, और ऊथले उसके विचार होते हैं, उतना ही मनुष्य पशुवत हो जाता है। मानव (आत्मा) वास्तव में प्रेम चाहता है, और जब प्रेम ही ऊथला हो, तो वह जीने की इच्छा भी खो बैठता है।पागल पन इसी का परिणाम है। ५८.२ मिलियन कोई कम नहीं ।

    Reply
  7. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    आदरणीय प्रो.मधुसुदन जी ने अत्यंत संक्षेप में अमेरिकी समाज और वहाँ की ईसाई प्रकृति (संस्कृति तो इसे कह नहीं सकते) की वास्तविकता को उजागर कर दिया है. आर्थिक परिस्थितियों और अर्थ से पैदा सुविधाओं की बात छोड़ दें तो सचमुच ही वहां दानवी प्रवृत्ती का साम्राज्य है. जिसके कारण संसार के सर्वाधिक पागल, अपराधी, रोगी अमेरिका में ही हैं. शायद सर्वाधिक एड्स रोगी भी वहीँ होंगे. पर इन सब बातों पर जबरन पर्दा डाला हुआ है. पाठक मेरा विश्वास तो शायद न करें. अमेरिका की संसद के चेयरमैन रहे ” डा. निमोट गिमिश” का कथन सुन कर तो आप लोग विश्वास कर ही लेंगे. वे बड़े दुःख के साथ अमेरिका के हालात के बारे में लिखते हैं : ………………….” १२ साल की बच्चियां बच्चे पैदा कर रही रही हैं, १४ साल के लड़के एक दिसरे को गोली से उड़ा रहे हैं, १६ साल के एड्स के रोगी बन रहे हैं. आखिर किस प्रकार की सभ्यता हम संसार को दे रहे हैं.” बहन रेखा सिंह यूरोप में अनेक वर्ष रहने के बाद और भारत से उसकी तुलना करने के बाद कह रही हैं कि भारत देव संस्कृति का है और यूरोप, अमेरिका दानवी जीवन जी रहे हैं. अमेरिका में रह रहे प्रो. मधुसुदन ने भी दोनों की भलीभांति तुलना और अध्ययन किया है. ….. फिर भी किसी को भारत की कमियों के साथ साथ श्रेष्ठता को भी स्वीकार नहीं करना है तो न सही. मैं एक बार पहले भी इस सत्य को उधृत कर चुका हूँ , एक बार पुनः करता हूँ कि ” दुर्योधन तो भगवान् कृष्ण के समझाये नहीं समझता, हम, आप की तो बिसात ही क्या ” अतः आज के कलयुगी दुर्योधनों को समझाने में अपना समय बर्बाद करने की क्या आवश्यकता है, मस्ती से अपना काम करते चलेंगे, अपने मार्ग पर बढ़ाते चलेंगे.और अपने जीवन को सार्थक करते चलेंगे. ……….वैसे भी यदि दुर्योधन न होते तो भगवान् कृष्ण को, अर्जुन को कौन जनता ; उनके जीवन का उद्देश्य कहाँ पूरा होता. आज के इन दुर्योधनों के कारण हम, आप सब का जीवन सोद्देश्य बन रहा है, सार्थक हो रहा है. ये सब खेल उसी नियंता का है जो राम और रावन दोनों की रचना कर रहा है. अतः अपने चुने कर्तव्य का पालन करते हुए उस लीलाधारी की लीला का आनंद लेते चलें. पाप और असत्य की पराजय का समय पूर्व निश्चित है, उसे कोई रोक नहीं पयेगा. मत सोचें कि आपके किये कुछ होगा या आपके न करने से कुछ रुक जाएगा. बस अपनी भूमिका का आनंद लेना है और जीवन सार्थक बनाने का प्रयास. और फिर अगली यात्रा की तैयारी, अभी मुझे तो मुक्ति चाहिए नहीं, भारत में धर्म स्थापना, अधर्म की पराजय इसी जन्म में देखनी है. फिर उसका आनंद लेने के लिए लिए एक जन्म और हो तो हो, सहर्ष स्वीकार है. …………………
    मेरा एक निवेदन अपने सम विचारक मित्रों से है कि जोश और उत्साह तो बहुत हो, सफलता का अटल-अडिग विश्वास भरपूर हो पर अपने मन में अविश्वास, घृणा, शत्रुता, निराशा को कभी स्थान नहीं देना है. निश्चित विजय और सदा सफलता का यही राज़ है. युद्ध में जब शत्रु सेनाओं को मारो तो भी उनके प्रति घृणा और शत्रु भाव न आने पाए, फ़र्ज़ समझ कर युद्ध हम लड़ें ; जीवन के हर पग पर यही दृष्टी चाहिए. ……. राम ने रावण से कभी घृणा नहीं की, कृष्ण ने कभी भी कंस से घृणा नहीं की. इसे समझने और व्यवहार में लाना थोड़ा कठिन तो लगता है पर फिर भी यही सही है, यही आचरणीय है. ज़रा सोच कर देखें कि सभी में वही ईश्वरीय अंश विद्यमान है. प्रकृती और माया के जाल में फंस कर भूल सब से हो जाती है. अतः किसी भी भूल के लिए क्षमा पाने का अधिकार सबका है. जब तक जीवन के अस्तित्व पर आक्रमण न हो, हमारी स्र्तियों, हमारी संपत्ति या आजीविका पर आक्रमण न हो, हमारे राष्ट्र या संस्कृति पर आक्रमण न हो ; तबतक किसी पर आक्रमण की अनुमति हमारे शास्त्र नहीं देते. देश की शासन व्यवस्था और न्याय व्यवस्था जब तक रक्षा करने में समर्थ हो ; तब तक स्वयं कोई पग उठाने की आवश्यकता पड़ती ही नहीं. इति!!

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  8. डॉ. मधुसूदन

    मधुसूदन उवाच

    यहां, इसाई बहुल अमरिका में यदि महिलाएं Beauty saloon में जाकर, रंग लेपन नहीं करवाएगी, और wig पहन कर, Make up नहीं करेगी, तो महाराज उसका तो विवाह-विच्छेद (Divorce ) हो जाएगा। यह महिला की स्वतंत्रता का नहीं, दास्यता का प्रमाण है। आंकडों के अनुसार यहां सुंदर दिखने-दिखाने के व्यवसाय में पर्याप्त चांदी है। कैसे लिखूं? — कुछ अंगों को कृत्रिमता से, शल्य क्रिया से, ऊभार कर बडा बनाने का भी व्यवसाय है। जब अपने पतिको यह महिलाएं रीझा नहीं सकती, तो विच्छेद हो जाता है। वज़न घटाने वाले, डाएट करवाने वाले, और व्यायाम शालाएं, और अपना योग (जिसे योगा कहते हैं ) भी इसीसे चलता है|
    धन्य है हमारी महिलाएं जो एक बार विवाह होने पर सामान्यत: आजीवन आश्वस्त होती है, स्वतंत्र होती है|

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  9. Rekha Singh

    आदरणीय मीड़ा जी ,
    मै अपने को भारतीय संस्कृति का प्रवर्तक या समर्थक तो नहीं कह सकती क्योकी यह मै दूसरो पड़ छोडती हूँ |मै २ पुत्रियों एवं १ पुत्र की माता हूँ और मैने अपने बच्चो को वीरांगना लक्ष्मी बाई ,रानी दुर्गावती ,प्रहलाद ,ध्रुव ,गणेश ,की कहानियाँ सुनाकर पाला है |मैने अपनी पुत्रियों को Marie Curie के जीवन के बारे में भी बताया था की उनके जीवन से भी प्रेड़ना लेने को कहा और आज के समय मे Hillary Clinton से सीखो ये भी कहा है |
    हमारी भारतीय संस्कृति (माता -पिता के रूप में )ने हमे यह सिखाया की ज्ञान कही से भी मिले सीखना चाहिए |मै अपनी भाषा मे सीधे यह कहू तो अतिशयोक्ती नहीं होगी की पाश्चत्य सभ्यता दिती के राक्षस संतानों की संस्कृति है और भारत की संस्कृति अदिती संतानों की संस्कृति है |दोनों एक ही पिता की संतान है लेकिन दोनों की माता एवं जनम की परिस्थिया अलग अलग है |संस्कृति संस्कार से आती है और उन माताओं के दैहिक ,दैविक एवं भौतिक संस्कार अलग अलग थे |
    देव संस्कृति सनातन संस्कृति है, वह सबके कल्याण की बात करती है एवं समस्त विश्व को एक परिवार मानती है और इसीलिए बसुधेव कुटुम्बकम की बात करती है | बाबा रामदेव जी ने भी यही बात कह कर सारी दुनिया को मुफ्त मे योग सिखाया है और सिखा रहे है एवं उनके सहयोगी बालकृष्ण जी भी आयुर्वेद की जानकारी मुफ्त में दे रहे है|स्वर्गीय भाई राजीव दीक्षित जी ने राक्षस संस्कृति के कपट , बेईमानी और भारतीयों पर किये गए अत्याचारों की पोल खोलकर रख दी |
    मीड़ा जी आप और आपकी भ्रष्टाचार विरोधी संस्था ४ जून २०११ जलियावाला बाग़ काण्ड # २ को तो ब्लैक डे जरूर मानती होगी और अन्ना हजारे का समर्थन भी आप कर रहे होगे |गांधी जी के सत्याग्रह से ही प्रेरित होकर Martin Luther king को प्रेरणा मिली थी अमरीका मे|
    भारत का इतिहास भरा पड़ा है की कितने आध्यात्मिक गुरु भारत से अमरीका आदि देशो मे आये और आ रहे है और यहाँ उनको कितना लोगो ने सराहा है और उनके बत्ताए गए रास्तो पर चल रहे है |ईसाई मिसनरी तो भारत मे गरीब और भोली भली जनता एवं संस्कार विहीन educated मुर्ख indian को कपट से धर्म परिवर्तन करा रहे है |हमारी संस्कृति अतिथी देवो भव: की संस्कृति है और इस कारण गरीब भोली भली जनता एवं educated लोग भी आधुनिकता के चक्कर मे बदलते चले जा रहे है |
    भारत मे भ्रुड हत्या , दहेज़ आदि कुरीतिया है जिनके जिम्मेदार गलत लोग है उनका सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए और सभ्य लोगो को सतत समाज के उद्धार के लिए काम करते रहना चाहिए |
    मैने अपने जीवन का लगभग आधा हिस्सा USA मे जिया है और अपने अनुभव से कह रही हूँ की कुसुमलता जी ने बहुत सटीक लिखा है | भारत की संस्कृति आदि सनातन संस्कृति है | गीता मे कृष्ण ने आत्मा की बात की है सरीर की नहीं |

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  10. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    डा. मीना जी आपकी नीयत पर पाठकों को बार-बार संदेह होता रहा है. आज आपने एक बार फिर से साबित कर दिया कि सचमुच आपकी नीयत ही सही नहीं है. मेरे और इंजी.दिवस गौड़ जी के उकसावे में ( सम्पादक महोदय के अनुसार मेरे उकसावे में ) आकर उत्तर देने कि कृपा कि पर उत्तर के नाम पर मैदान छोड़ कर भागते नज़र आये. ऐसा लचर उत्तर दिया जिसकी आशा आपसे तो बिलकुल न थी. प्रो. कुसुम लता केडिया जी जैसी विदुषी के तथ्यों का उत्तर तो आपने दिया ही नहीं, वह क्शामता भी आपकी नहीं.
    – आप किसी समाचार पात्र के सम्पादक है, किसी संस्था के प्रमुख हैं जिसके ५००० सदस्य हैं और वह संस्था १८ प्रदेशों में काम करती है : यह आत्म श्लाघा आप पहले भी कई बार कर चुके हैं. मनु विज्ञान के ज्ञाताओं के अनुसार हीन ग्रंथी का शिकार लोग ऐसा करते रहते हैं. पाठकों ने और किसी को ‘प्रवक्ता’ ऐसा करते पहले कभी नहीं देखा.
    – इतना लंबा लेख अपनी प्रशंसा में और मेरी आलोचना में लिखने की कृपा की, थोड़ा सा प्रयास केडिया जी के लेख में दिए तथ्यों को समझने में भी कर लेते. पर इतने उच्च स्तरीय लेख पर इतनी निम्न स्तर की टिपण्णी कर के आपने अपने स्तर को ही तो प्रकट किया है. …
    – जरा स्पष्ट कर दें कि किसने आपको जान से मारने की धमकी दी है ? यह परम्परा तो आपके प्यारे जिहादियों और चर्च संचालित संगठनों की है जिस पर आप मौनसाधे रहते हैं. आपको तो हिन्दू, भगवा आतंकवाद ही नज़र आता है . उत्तर-पूर्वांचल में वर्षों से जो हत्याकांड अनेक दशकों से चर्च और बंगलादेशियो द्वारा चल रहे हैं, मूल निवासियों-हिन्दुओं की जो हत्याएं हो रही हैं, उसके पीछे कौन है ? हिन्दू आतंक का राग गाने वाले आप लोग इस पर चुप क्यूँ हैं ?
    – जिस काल्पनिक मनुवाद का अविष्कार विदेशी चर्च ने अंग्रजी शासन काल में किया, जो आजतक भारत के किसी राज्य व समाज में कभी भी प्रचलित नहीं रहा ; आप उसी का ढिंढोरा पीट-पीट कर समाज में विद्वेष के बीज बोने की नीतियों पर बड़ी कुटिलता से चले जा रहे है. ये तो हिन्दू समाज है जो ऐसे लोगों को अनेक दशकों से सहन कर रहा है. फिर भी आप कहते हैं कि आपको जीवन का भय है….
    – जीवन का भय तो हिन्दू समाज को है जिसे समाप्त करने के लिए एक नए कानून का प्रारूप ( लक्षित हिसा कानून ) सोनिया कांग्रेस (एन.ए.सी) ने बनाया है. आतंकवादियों को जेलों में जवाईयों की तरह पालने वाली कांग्रेस आपको धर्म निरपेक्ष नज़र आती है ? आप की वास्तविकता इन बातों से स्पष्ट हो ही जाती है.
    – तभी तो देशभक्त राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ आपको शत्रु नज़र अता है. जिस संगठन के कार्यकर्ताओं ने सैकड़ों बार देश के लिए जीवन दाव पर लगाया, कांग्रेस की नेता इंदिरा जी द्वारा देश पर तानाशाही लादने के बाद यह संघ ही था जिसके लाखों कार्यकर्ता जेलों में गए थे.. भूकंप, सुनामी, पाक आक्रमण के समय ये संघी हैं जो तन-मन-धन से राष्ट्र \ सेवा में जुट जाते हैं. – आपकी कांग्रेस ने कब ऐसा कोई काम किया ? या आपके ५००० सदस्यों ने ऐसा कुछ किया हो ?
    – आप कहते हैं कि आपको हिन्दू होने पर गर्व है. यदि आप असत्य नहीं बोल रहे ( जो कि आप पहले भी बोल चुके हैं ) तो ज़रा बतलाने की कृपा करें कि आपकी नज़र में हिन्दू धर्म की क्या विशेषताएं हैं? कौन से हिन्दू धर्म ग्रंथों की किन बातों से आप प्रभावित है ?
    – महोदय आप पहले भी अनेक बार बड़ी असभ्यता का साथ कह चुके हैं कि सभी हिन्दू धर्म ग्रंथों में विष भरा हुआ है. श्रीमान आप स्वयं अपने फैलाए जाल में फंसते जा रहे हैं. टालने से अब काम नहीं चलेगा कि कभी इस पर लिखूंगा. आगे आपकी मर्ज़ी.
    – आप हिन्दू धर्म व समाज के विरुद्ध लेखन व प्रचार के लिए पूर्णकालिक हैं कि नहीं यह तो पता नहीं पर ये जो इतने पाठक आपकी पोस्ट/लेख पढ़ कर उसपर इतनी कठोर टिप्पणिया करते हैं, उनका भी ये व्यवसाय नहीं, देश व समाज के प्रति लगाव, प्रेम है.
    – तर्कसंगत कटु विरोध भी बुरा नहीं लगता. पर जो लोग निरंतर, पूर्वाग्रह से भरा भारत को हानि पहुचाने वाला लेखन अत्यधिक पूर्वाग्रह से करते हैं, उनके प्रति न चाहते हुए भी स्वाभाविक रूप से कुछ तो रोष पैदा हो ही जाता है.
    – पर यदि दुराग्र न हो और नीयत सही हो तो संवाद स्वस्थ रहता है. पर क्या आप इमानदारी से संवाद कर रहे है ?
    – आपने गांधी जी के बारे में काफी असभ्य भाषा का प्रयोग अनेक बार किया है. गांधी जी के बारे में आप अनेक बार एकांगी लेख व टिप्पणियाँ लिखते हैं. क्या यह इमानदारी है ? क्या आप नैतिकता और सभ्यता का पालन कर रहे हैं ? विश्व में गांधी जी का जो इतना सम्मान है, उनकी जो इतनी स्तुति होती है, क्या वह अकारण है ? क्या आपने उनकी छोटी सी पुस्तक ” हिंद स्वराज ” पढ़ी है ? यदि नहीं तो आपको उन पर टिपण्णी करने का नैतिक अधिकार नहीं है. यदि पढ़ी है तो भी आप इमानदार नहीं, आपकी नीयत में खोट है. अन्यथा उसकी सामग्री के प्रभाव से आप कैसे अछूते रहते ? श्रधेय दलाईलामा और रिम्पोछे के इलावा विश्व के अनेक विद्वानों ने इस पुस्तक की बड़ी प्रशंसा की है. कहें तो आपको भेंट में भेज दूँ ?
    – आप कहते है कि आप किसी पत्र के सम्पादक है, किसी संस्था के प्रमुख हैं . फिर तो बहुत गैर ज़िम्मेदार हैं. आप गांधी जी के कमसे कम सत्य पर किये प्रयोगों व उक्त पुस्तक को तो पढ़ना चाहिए था, तब संतुलित लेख लिखते. गांधी जी जैसे महान व्यक्तित्व की एकांगी आलोचना तो केवल वे ही करेंगे जो विदेशी चर्च या उन जैसे किसी गुप्त अजेंडे को लेकर चल रहे हों. या वे जो किसी कारण से भ्रमित हों. आप किस वर्ग में हैं ?
    – आप सचमुच स्वस्थ संवाद में विश्वास रखते हैं या केवल दिखावा है ? विरुद्ध विचार होने पर भी विरोधी विचार वाले को भारतीय संस्कृति में मित्र ही माना जता है. मेरे द्वारा आपको मित्र कहना आपको गलत क्यूँ लगा ? मैं तो सचमुच आपको आज भी मित्र ही मानता हूँ. सत्य ह्रदय से कहता हूँ कि यह दिखावा नहीं. इतने दिन से आपसे संवाद करते-करते अनेकों बार आप पर रोष तो हुआ पर शत्रु भाव तो बिलकुल नहीं है. मुझे तो आप मित्र ही लगते है.
    – हर मानव से गलती हो रही है, हो जाती है. तो क्या उन्हें अपना शत्रु मानें ? दिल की बात कहता हूँ कि जिहादी या किसी आतंकवादी द्वारा आक्रमण किये जाने पर उसका पूरी शक्ती से प्रतिकार करूंगा. उससे रक्षा के भी सब उपाय करूंगा. पर शान्ति काल में उसके प्रति प्रेम व क्षमा भाव रखते हुए, उसे एक भटका मानव मान कर उसके परिवर्तन व कल्याण के लिए जो भी संभव हो वह करूंगा. मुझ अल्पग्य की दृष्टी में यही सही है और यही भारतीय संस्कृति है.
    – आशा है कि स्वस्थ संवाद करते हुए मित्र भाव बनाए रखेगे. आपका शुभाकांक्षी.

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  11. अखिल कुमार (शोधार्थी)

    akhil

    आपने बड़े एकतरफा तरीके से इसाइयत में स्त्रियों का काला पक्ष सामने रखा जिसके समर्थन में आपने किसी स्त्री का नाम लिखे बगैर ढेरों बुराइयां गिनाईं…….फिर आपने गौरव गान में कैकेई और रानी लक्ष्मीबाई का नाम गिनाया.

    १-आपको बता दूँ की आप इतिहास की बात कर रही हैं तो कैकेई कोई ऐतिहासिक व्यक्तित्व nahi ….ये अगर हिन्दू मत और काल-गड़ना को स्वीकार किया जाय जो मानव की उत्पत्ति की समयसीमा को लाँघ जाती हैं……विकिपीडिया पे हिन्दू म्य्थोलोग्य ऑफ़ टाइम पढ़ लीजिएगा….
    २- रानी लक्ष्मीबाई के महिमामंडन में एक खोट उस समय नज़र आती है जब हम देखतें हैं की वो तभी अंग्रेजों के खिलाफ समर-क्षेत्र में कूदती हैं जब उनके राज्य को अधिग्रहित करने का अँगरेज़ कुचक्र रचते हैं….इसके पूर्व तक वो महलों में निश्चिन्त सुख लेती रहती हैं…..

    फिर आपको एक राज और बताऊ..
    संसार के हर धर्म में पुरुष-वर्चस्वशाली मानसिकता हमेशा हावी रही है……मनु-स्मृति और पराशर स्मृति बनारस में संकटमोचन के पास गीता प्रेस की दूकान पे उपलब्ध है…पढियेगा फिर हिन्दुइस्म का गौरवगान भूल जायेंगी.

    हर बड़ा धर्म, दर्शन और समाज-व्यवस्था का प्रडेता कौन है? इसके एक bhi उदाहरण में आप महिलाओं को नहीं पा सकती….अगर आप चाहेंगी तो मैं सप्रमाण tark भी प्रस्तुत कर दूंगा ( सन्दर्भ के साथ)

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    • kaushalendra

      अखिल जी ! आपकी टिप्पणी तो प्रति टिप्पणी योग्य भी नहीं है पर रानी लक्ष्मीबाई के प्रति आपके दूषित विचारों से आघात लगा. आपके ज्ञान के बारे में पता नहीं पर आपकी जानकारियाँ अत्यंत बचकानी और सतही हैं. भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में कुछ कहने से पूर्व विवेक और शालीनता का प्रयोग भी आवश्यक नहीं लगा आपको. निश्चित ही आप भारतद्वेषी हैं.

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  12. -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    इस लेख के समर्थन में पाठक बढचढकर टिप्पणी लिख रहे हैं, वे कितने सच्चे हैं? इस बात का आकलन इस बात से ही हो जाता है कि वे स्वयं को भारतीय संस्कृति का प्रवर्तक और संरक्षक बतलाते हैं| भारत की संस्कृति को संसार की सर्वश्रेृष्ठ संस्कृति बताते/दर्शाते हैं| भारत की संस्कृति पर हमला करने वालों को देख लेने या जान से मारने की धमकी देने वालों का खुला या मूक समर्थन करते हैं| इसके उपरान्त भी भारतीय संस्कृति में मित्र की जो परिभाषा दी गयी है, उसकी धज्जियॉं उड़ाते हुए भी मुझ जैसे लोगों के जान के दुश्मन बनकर भी, अगले ही पल मुझे मित्र लिखते हैं और अगली ही पंक्ति में अपने मित्र का सार्वजनिक रूप से अपमान भी करते हैं|

    ऐसे तथाकथित भारतीय संस्कृति के संरक्षक मित्र इस लेख को पढकर फूले नहीं समा रहे हैं| एक भी व्यक्ति श्री अनुपम जी द्वारा प्रस्तुत तथ्यों पर गौर करने या समर्थन करने के लिये एक शब्द नहीं लिख रहा है|

    मेरे ऐसे तथाकथित मित्रों को मेरे बारे में अनेक प्रकार की भ्रान्तियॉं हैं| जिन्हें समय-समय पर मैं तोड़ता भी आ रहा हूँ और आगे भी तोड़ता रहूँगा, लेकिन सच्चाई को लिखने में कभी भी इनसे भय नहीं खाने वाला हूँ|

    इसलिये यहॉं पर कुछ बातें स्पष्ट करना जरूरी है कि-

    १. मेरे तथाकथित मित्रो यदि आप प्रवक्ता पर या अन्य किसी भी साईट पर ईमानदारी से देखेंगे तो पायेंगे कि गत दो माह से मेरी उपस्थिति सांकेतिक ही रही है| जिसका कारण मेरी अस्वस्थता रही| जिसके चलते मेरे सभी कार्य प्रभावित रहे, लेकिन अब मैं फिर से स्वस्थ हो रहा हूँ और मेरी दिनचर्या नियमित होने जा रही है| इसके अलावा किसी भी आलेख से भागने का कोई कारण नहीं है|

    २. दूसरे मेरे इन तथाकथित मित्रों को यह भी ज्ञात होना चाहिये कि मुझे नैट-मीनिया नहीं है| मैं हर लेख पर अपनी टिप्पणी नहीं लिखता हूँ, क्योंकि यह कार्य मेरा पूर्ण कालिक कार्य नहीं है| मैं अपना शौक पूरा करने या अपनी बात को कहने के लिये वैब मीडिया का उपयोग करता हूँ| पत्रकारिता मेरा व्यवसाय नहीं है|

    ३. मैं भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान का मुख्य संस्थापक और वर्तमान में राष्ट्रीय अध्यक्ष हूँ, जिसके करीब पॉंच हजार आजीवन सदस्य देश के १८ राज्यों में यथाशक्ति सेवा कर रहे हैं| इस संगठन की नीति के अनुसार हम किसी गैर-सदस्य, किसी उद्योगपति या किसी भी देशी या विदेशी सरकार या किसी भी ऐजेंसी से अनुदान स्वीकार नहीं करते हैं|

    ४. मैं एक समाचार-पत्र का सम्पादक हूँ, जिसकी प्रकाशक मेरी पत्नी है| इस समाचार-पत्र में हम सरकारी विज्ञापन स्वीकार नहीं करते हैं|

    ५. मैं सम्पूर्ण रूप से धार्मिक व्यक्ति हूँ और मेरी ईश्‍वर में अटूट श्रृद्धा एवं आस्था है| मैं हिन्दू होने पर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करता हूँ| संसार के जितने भी धर्मों के बारे में, मैं अभी तक जान पाया हूँ, उन सभी में, मैं हिन्दू धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ| यह अलग बात है कि हिन्दू धर्म में अत्यधिक अच्छा हो सकने की सर्वाधिक सम्भावना है, लेकिन उसे मनुवादियों ने दबा रखा है| इसके उपरान्त भी हिन्दू धर्म सर्वश्रेृष्ठ है| यदि समय मिला तो इस बारे में विस्तार से लिखूँगा|

    ६. मुझे अनेक राज्यों में सरकारी एवं सामाजिक सेवा करने का अवसर मिला है| इस दौरान मेरा वास्ता सभी धर्मों के लोगों से पड़ा है| यदि सार रूप में कहा जाये तो मुझे जितने भी क्रिश्‍चनों से वास्ता पड़ा उनमें से एक भी वफादार नहीं मिला| जबकि मेरे सर्वाधिक विश्‍वासपात्र मित्रों/शुभचिन्तकों में ब्राह्मणों की संख्या सर्वाधिक है| और ये सभी मेरे ब्राह्मन मित्र प्रवक्ता पर या कहीं पर भी प्रस्तुत मेरे सभी विचारों को जानते हैं और फिर भी से मुझसे असहमत नहीं हैं| क्योंकि ये सब मुझे समग्रता से जानते हैं| भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान के सचिव एवं कोषाध्यक्ष ब्राह्मण हैं| मैंने आज तक कभी भी ब्राह्मणों से नफरत नहीं की है, बल्कि मनुवादी, जिसे ब्राह्मणवादी विचारधारा भी कहते हैं, को और इसके पोषकों को मैं मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन (भारतीय सन्दर्भ में) मानता हूँ| इस अन्तर को नहीं समझ सकने वाले लोग मुझे हिन्दुत्व का और ब्राह्मणों का दुश्मन मान बैठे हैं| इसमें कम से कम मेरा दोष नहीं है|

    ७. यद्यपि मैं मानवअधिकारों और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों का बड़ा समर्थक हूँ और मुझे इस क्षेत्र में कार्य करने में खुशी होती है, लेकिन भारतीय हालातों के बारे में और विशेषकर भारत के दबे-कुचले बहसंख्यक लोगों के बारे में लिखते या कार्य करते समय, विदेशों में क्या हो रहा है, इस बारे में, मैं अधिक चिन्तन नहीं करता, क्योंकि मेरा वास्ता भारत से है, इण्डिया से नहीं| मुझ जैसे सामान्य व्यक्ति को भारत में ही रहना है और भारत में मेरे जैसे लोगों के नम्बर एक दुश्मन क्रिश्‍चन नहीं, बल्कि मनुवादी हैं| इसलिये मैं विदेशी ताकतों के कृत्यों को बहाना बनाकर मुनवादियों के अत्याचारों को नजरअन्दाज नहीं कर सकता! अभी भी भारत की बहुसंख्यक हिन्दू और गैर-हिन्दू आबादी के दु:खों का बड़ा कारण मनुवाद है| जिसे आसानी से प्रमाणित किया जा सकता है|

    ८. आएसएस से मेरी कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है, लेकिन चूँकि संघ मनुवाद का समर्थक तथा बहुसंख्यक वंचित भारतीयों को समान हक प्रदान करने का विरोध करता है, इसलिये मेरी नजर में संघ देश का दुश्मन है| भाजपा संघ का राजनैतिक चेहरा है|

    ९. मुझे कॉंग्रेस से कोई व्यक्तिगत लगाव नहीं है, सिवाय कॉंग्रेस की धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय की नीति के, जबकि मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी में ये दोनों गुण नहीं थे, इस कारण से मैं उसे इस देश का राष्ट्रपिता बनाये जाने तक के खिलाफ हूँ| गॉंधी देश के बहुसंख्यक वंचित भारतीयों को समान हक प्रदान करने के विरुद्ध था, क्योंकि वह कट्टर मुनवादी हिन्दू था| गॉंधी को धर्मनिरपेक्षता या सामाजिक न्याय की विचारधारा में नाटकीय आस्था थी| आजादी से पूर्व के कॉंग्रेसियों में,गॉंधी सबसे बड़ा कट्टर हिन्दू था और देश का विभाजन गॉंधी की ही इसी मनुवादी सोच का नतीजा है|

    जहॉं तक इस लेख का सवाल है, एक भारतीय स्त्री द्वारा, भारतीय स्त्री के हालतों के बारे में असत्य, मंगदंथ और काल्पनिक तथ्य प्रस्तुत करने वाला इससे घटिया लेख मैंने मेरे जीवन में नहीं पढ़ा!

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  13. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    इंजी. दिवस दिनेश गौड़ जी आपने सही कहा, हमारे मित्र डा. पुरुषोत्तम मीना जी का साहस इस स्थान पर प्रकट होने का न तो अभीतक हुआ और न होने की कोई आशा है. यहाँ उनकी देश व समाज तोड़क चालों के लिए स्थान निकलना असंभव जो है. सचमुच बड़ा सशक्त, तथ्य पूर्ण व आँखें खोलने वाला लेख है. काश मीना जी की बंद आँखे भी खुल जातीं !

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  14. Shikha Varshney

    बिलकुल सच कहा है आपने.भारतीय या हिंदू संस्कृति में नारी हमेशा पूजनीय रही है. उसका निरादर अंग्रेजों के भारत आने बाद और उनके ईसाई धर्म के प्रचार के बाद ही शुरू हुआ.और फिर अनपढ़ भारतीयों ने भेडचाल की तरह ..अंग्रेजी भाषा की ही तर्ज़ पर नारी मुक्ति आन्दोलन को भी फेशन बना डाला.जबकि यूरोपीय नारी की समस्या भारतीय नारी से आज भी सर्वथा भिन्न हैं.
    एक आँख खोलने वाला आलेख.बहुत ही बढ़िया.

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  15. अनुपम दीक्षित

    कुसुमलता जी आपका लेख अच्छा है और एक परंपरागत निबंध कैसे लिखा जाए इसका उदाहरण भी है। आपने ईसाई धर्म में स्त्री के स्थान और यूरोप में स्त्री की स्थिती को लेकर जिस विषद ज्ञान का परिचय दिया है वह कबीले तारीफ है। पर भारतीय स्त्री की स्थिती पर आपकी लेखनी न जाने क्यूँ ऐसा लगा जैसे कुछ छुपा रही हो अब जैसे कि कन्या को देवी तो हम मानते हैं और नवरात्र मे साक्षात कन्या देवी कि पूजा भी करते हैं पर जब कन्या का पिता बनने का पल आता है तो महान हिन्दू उसे गर्भ में ही मार देते हैं और इसका समर्थन शास्त्रों के द्वारा भी किया जाता है। आप तो वाराणसी में है फिर भी ना जाने क्यूँ आपको वहाँ विधवाओं की स्थिती नहीं दिखाई देती? दहेज प्रथा और दहेज हत्याओं से आप वाकिफ ना हो यह मै नहीं मान सकता। कोई भी समाज दूसरे समाज को घटिया कहने से महान नहीं बनता बल्कि जब उस सामाज के जिम्मेदार लोग अपने समाज की बुराइयों को नष्ट करने में अपना योगदान देते हैं तब वह समाज महान बनता है। आप जैसे जिम्मेदार और सक्षम लोग ही अगर शुतुरमुर्ग की भांति अपने आसपास की गंदगी को अनदेखा कर दूसरों पर कीचड़ उछालेंगे तो हाथ तो हमारे भी गंदे होंगे ना?

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  16. Rekha Singh

    आपका लेख बहुत ही जानकारी पूर्ण है | इन मुद्दों पर भ्रमित लोगो को आपका लेख समय समय पर प्रेषित करती रहूगी |धन्यबाद

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  17. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    आदरणीय कुसुमलता जी, आपका यह लेख पढ़कर दिल को बहुत ख़ुशी हुई| इसकी जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है| अपने आपमें सम्पूर्ण| गागर में सागर कह सकते हैं| मैं भी इसे अपने मित्रों को प्रेषित कर रहा हूँ| इसे अपनी फेसबुक वॉल पर लगा रहा हूँ|

    आदरणीय डॉ. कपूर साहब…बहुत दिनों बाद आपको यहाँ देखा| आपको देखकर बेहद ख़ुशी हुई| डॉ. मीणा जी यहाँ नहीं आएँगे| यहाँ उनकी बोलती बंद हो जाएगी| आप उन्हें कितने भी प्रमाण क्यों न दिखा दें, उन्हें समझ नहीं आएगा|

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  18. J P Sharma

    कुसुमलताजी व प्रवक्ता को ऐसे लेख के लिए बहुत बहुत आभार, पूरा आलेख पढा तथ्यपरक बातें बतायी है आपने, आप इसी प्रकार के आलेख लिखें और प्रवक्ता जैसे साईट को भेजें।

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  19. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    प्रो. कुसुम लता केडिया जी ,
    आपका यह लेख भारत के सदियों से ठहरे विचार प्रवाह में एक ज्वार सिद्ध हो सकता है. आवश्यकता है कि इसे अधिकतम प्रचार मिले. अद्भुत, अतुलनीय लेख है. प्रवक्ता पर ए सर्वोत्तम लेखों में इसकी गिनती सबसे ऊपर की जा सकती है. इस उच्च कोटि के, राष्ट्रीय विचार प्रवाह को बदल देने वाले लेख के लिए मेरा अभिनन्दन स्वीकार करें. अकाट्य तथ्य, सही व सटीक विश्लेषण, सारगर्भित निष्कर्ष इस लेख को अनुली बना देता है………मै इस लेख को अपने अनेक मित्रों को प्रेषित कर रहा हूँ…………….कहाँ हैं हमारे मित्र डा. मीना जी ? अच्छा होता कि वे भी इसे पढ़ लेते तो शायद उनके बंद दिमाग की कुछ गांठें खुल जाती, कुछ तो पूर्वाग्रह कम हो जाते !

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  20. gautam chaudhary

    बहुत बढियां लिखा आपने मैडम। ईसाइयत पर इसी प्रकार के आक्रमण की जरूरत है। आज इस देष में ईसाइयत के प्रति एक भ्रम फैलाया जा रहा है। हमारे समाज में ईसाई को आदर्ष बताया जा रहा है। ईसाइयत की मान्यताओं पर इसी प्रकार की मिमांषा प्रस्तुत की जानी चाहिए जिससे लोगों को ईसाई संप्रदाय की वास्तविकता समझ में आये। हालांकि इस्लाम में भी कुछ इसी प्रकार की बाते हैं लेकिन सर्वप्रथम ईसाइयत पर प्रहार की जयरत है क्योंकि आज दुनिया में जो भी विकृति देखने को मिल रही है उसके पीछे ईसाई जिम्मेबार है। पूरा आलेख पढा तथ्यपरक बातें बतायी है आपने, आप इसी प्रकार के आलेख लिखें और प्रवक्ता जैसे साईट को भेजें। हमारे जैसे लोग लाभान्वित होंगे।

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  21. Ram narayan suthar

    कुसुमलताजी बहुत बहुत आभार
    सच ही है की “अनपढ़ (इल्लिटरेट) लोग जो आधुनिक अर्थ में शिक्षित कहलाते हैं, इन विषयों में सत्य का विचार किए बिना यूरोपीय स्त्रियों के बाहरी शब्दों की नकल करते हुए हिन्दू स्त्रियों के कष्ट के लिए हिन्दू धर्म को ही गाली देते हैं”
    बहुत ही तथ्य पूर्ण व् तार्किक विवेचना इसी विचारधारा की आज शिक्षित समाज में बेहद आवश्यकता है
    आधुनिक अर्थो का शिक्षित समाज यदि पश्चात्यिक सभ्यता की और आकर्षित है तो उसका कारन सही अर्थ में अनपढ़ होना ही है

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