चुनौतियों से भरा होगा जस्टिस बोबड़े का कार्यकाल

योगेश कुमार गोयल

स्टिस शरद अरविंद बोबड़े ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाल लिया है। वे भारत के 47वें मुख्य न्यायाधीश बन गए हैं। स्थापित परम्परा के अनुरूप न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने अपनी विदाई से कुछ दिनों पहले ही अपने उत्तराधिकारी के रूप में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जज न्यायमूर्ति बोबड़े की नियुक्ति की सिफारिश कर दी थी। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा 29 अक्टूबर को उनकी नियुक्ति को स्वीकृति दे दी गई थी। जस्टिस गोगोई का कार्यकाल करीब 13 महीने का था, जिसमें उन्होंने अयोध्या विवाद समेत कई महत्वपूर्ण मसलों पर फैसले सुनाकर न्याय जगत में इतिहास रचा। अब जस्टिस बोबड़े के करीब डेढ़ वर्षीय कार्यकाल पर सबकी नजरें रहेंगी, क्योंकि उनके समक्ष भी कई महत्वपूर्ण मुद्दे आएंगे, जिन पर उन्हें अपना निर्णय सुनाना है। जस्टिस बोबड़े का कार्यकाल 23 अप्रैल 2021 तक का होगा। जस्टिस बोबड़े ही वह न्यायाधीश हैं, जिन्होंने करीब छह साल पूर्व सबसे पहले स्वेच्छा से अपनी सम्पत्ति की घोषणा करते हुए दूसरों के लिए आदर्श प्रस्तुत किया था। उन्होंने बताया था कि उनके पास बचत के 21,58,032 रुपये, फिक्स्ड डिपोजिट में 12,30,541 रुपये, मुम्बई के एक फ्लैट में हिस्सा तथा नागपुर में दो इमारतों का मालिकाना हक है।न्यायमूर्ति बोबड़े इस साल उस वक्त ज्यादा चर्चा में आए थे, जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट की ही एक पूर्व महिला कर्मचारी द्वारा तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए जाने के बाद उस अति संवेदनशील मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित हाउस पैनल का अध्यक्ष बनाया गया था। पैनल में न्यायमूर्ति एन वी रमन तथा न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी भी शामिल थे। इस पैनल ने अपनी जांच के बाद जस्टिस गोगोई को क्लीनचिट दी थी। जनवरी 2018 में जब सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कान्फ्रेंस की थी, तब जस्टिस गोगोई, जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस मदन लोकुर तथा जस्टिस कुरियन जोसेफ के बीच मतभेदों को निपटाने में अहम भूमिका निभाने के चलते भी जस्टिस बोबड़े चर्चा में आए थे। उन्होंने कहा था कि कोलेजियम ठीक तरीके से काम कर रहा है और केन्द्र के साथ उसके कोई मतभेद नहीं हैं।24 अप्रैल 1956 को महाराष्ट्र के नागपुर में जन्मे न्यायमूर्ति शरद अरविंद बोबड़े को वकालत का पेशा विरासत में मिला था। उनके दादा एक वकील थे और पिता अरविंद बोबड़े महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल रहे हैं। बड़े भाई स्व. विनोद अरविंद बोबड़े भी सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील थे। उनकी बेटी रूक्मणि दिल्ली में वकालत कर रही हैं और बेटा श्रीनिवास मुम्बई में वकील है। शरद अरविंद बोबड़े ने नागपुर विश्वविद्यालय से एलएलबी करने के पश्चात् वर्ष 1978 में बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र की सदस्यता लेते हुए अपने कैरियर की शुरूआत की थी। उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ में वकालत की और 1998 में वरिष्ठ अधिवक्ता मनोनीत किए गए। 29 मार्च 2000 को उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में बतौर अतिरिक्त न्यायाधीश पदभार ग्रहण किया। 16 अक्टूबर 2012 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। पदोन्नति मिलने के बाद 12 अप्रैल 2013 को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में बतौर जज कमान संभाली। सुप्रीम कोर्ट में जज बनने के बाद वे सर्वोच्च अदालत की कई महत्वपूर्ण खण्डपीठों का हिस्सा रहे। वे अदालत की उस बेंच का भी हिस्सा थे, जिसने आदेश दिया था कि आधार कार्ड न रखने वाले किसी भी भारतीय नागरिक को सरकारी फायदों से वंचित नहीं किया जा सकता। बहुतप्रतीक्षित और राजनीतिक दृष्टि से सर्वाधिक संवेदनशील माने जाते रहे रामजन्मभूमि विवाद की सुनवाई कर रही मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ का भी वे अहम हिस्सा थे। जस्टिस बोबड़े ने देश के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अति महत्वपूर्ण कार्यभार तो संभाल लिया है लेकिन यह भी तय है कि उनका कार्यकाल चुनौतियों से भरा रहेगा। सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट तथा निचली अदालतों में लंबित मामलों के निपटारे, अदालतों में न्यायाधीशों की कमी, विचाराधीन कैदियों की सुनवाई में विलम्ब, न्यायपालिका तथा कार्यपालिका के बीच टकराव जैसी स्थितियां उनके समक्ष चुनौतियां होंगी, जिनसे निपटते हुए उन्हें इनके समाधान के प्रयास भी करने होंगे। न्यायमूर्ति बोबड़े इन चुनौतियों से कैसे निपटेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।फिलहाल देशभर की अदालतों में 3.53 करोड़ से भी ज्यादा मामले लंबित हैं। यदि निचली अदालतों या उच्च न्यायालयों की बात छोड़ भी दें तो सर्वोच्च न्यायालय में ही करीब 58,669 मामले लंबित हैं। इनमें से 40,409 मामले ऐसे हैं, जो करीब तीस सालों से लंबित हैं। ‘नेशनल ज्यूडिशयरी डेटा ग्रिड’ के अनुसार उच्च न्यायालयों में 43,63,260 मामले लंबित हैं। देश में प्रतिवर्ष मुकदमों की संख्या जिस गति से बढ़ रही है, उससे भी तेज गति से लंबित मामलों की संख्या बढ़ रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2012 में ‘नेशनल कोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम’ आरंभ किया था, जिसका आकलन है कि भारतीय अदालतों में वर्ष 2040 तक मुकद्दमों की संख्या बढ़कर 15 करोड़ हो जाएगी। इसके लिए 75 हजार और अदालतें बनाने की जरूरत है। यह न्यायमूर्ति बोबड़े की चिंता का प्रमुख विषय रहेगा।विधि आयोग ने वर्ष 1987 में सुझाव दिया था कि प्रत्येक दस लाख भारतीयों पर 10.5 न्यायाधीशों की नियुक्ति का अनुपात बढ़ाकर 107 किया जाना चाहिए। इन सिफारिशों के 32 साल भी यह अनुपात मात्र 15.4 ही है। सर्वोच्च न्यायालय में फिलहाल 31 न्यायाधीश हैं। वहां आठ और न्यायाधीशों की आवश्यकता है। इसी प्रकार उच्च न्यायालय और निचली अदालतों में भी 5,535 न्यायाधीशों की कमी है। मुख्य न्यायाधीश बोबड़े के लिए चिंता का एक बड़ा विषय यह भी रहेगा कि अदालतों में न्यायाधीशों की कमी के चलते जेलों में बंद करीब चार लाख विचाराधीन कैदी अपनी सुनवाई का नंबर आने के लिए लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे कैदियों की है, जिन्हें जमानत मिल भी जाए तो उनके पास इतनी राशि नहीं होती कि वे अपने लिए जमानत राशि का इंतजाम कर सकें। न्यायमूर्ति बोबड़े के लिए इस दिशा में सक्रिय पहल करते हुए ऐसे कैदियों को शीघ्र सुनवाई का अवसर मिलने की व्यवस्था करना बहुत बड़ी चुनौती रहेगी।

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