डॉ. नीरज भारद्वाज
हमें भारतीय ज्ञान परंपरा की बात करते समय अपने साधु, संत, महात्माओं, ऋषियों, मुनियों, ज्ञानियों आदि को नहीं भूलना चाहिए। इन ऋषि-मुनियों आदि के ज्ञान, ध्यान, तप, योग, साधना आदि से ही ज्ञान परंपरा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुँच पाई। हमारी गुरूकुल व्यवस्था, तीर्थ स्थानों, पवित्र नदियों आदि के किनारे बैठे योगी साधकों ने अपने आशीर्वाद आदि से सामान्य जीव को ज्ञान दिया। विचार करें तो इसी ज्ञान परंपरा के चलते पशु-पक्षियों को भी बहुत सारा ज्ञान प्राप्त हुआ और वह आवागमन के चक्कर से मुक्त हो गए। हमारे ऋषि-मुनि ज्ञान का अथाह सागर हैं। वह मौन से भी जीव को बहुत कुछ दे देते हैं। इन ऋषि-मुनियों का दर्शन ही जीवन को बदल देता है। एक विचार के अनुसार भगवान और देवताओं का धरा धाम पर अवतार लेकर आना भी ऋषि-मुनियों के यज्ञ, तप का ही फल है। मानस में गोस्वामी जी लिखते हैं कि श्रृंगी रिषिहि बहोरि बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा।। अर्थात भगवान श्रीराम के जन्म के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ महर्षि श्रृंगी (ऋष्यशृंग) ने किया। राजा दशरथ के अनुरोध पर उन्होंने सरयू के तट पर यह यज्ञ संपन्न किया, जिसके बाद अग्निदेव ने खीर का प्रसाद दिया था। जिससे भगवान श्रीराम का प्रकाट्य धरा धाम पर हुआ।
भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र को जब हम रामचरितमानस के आधार पर जानते, समझते, पढ़ते और विचार करते हैं तो पाते हैं कि भगवान श्रीराम ने अपनी शिक्षा ऋषियों, मुनियों, संतों के पास पूरी की है। ‘गुरु गृह गए पढ़न रघुराई, अल्प काल विद्या सब पाई’ अर्थात जब भगवान श्रीराम गुरु वशिष्ठ के आश्रम (गुरु गृह) शिक्षा ग्रहण करने गए, तो उन्होंने बहुत कम समय (अल्प काल) में ही सभी तरह की विद्या और ज्ञान प्राप्त कर लिया। यह सच्चे मन से गुरु की शरण में जाने के महत्व को दर्शाता है। शिक्षा प्राप्त करते हुए ही भगवान श्रीराम को बहुत सारे ऋषि-मुनियों का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। भगवान श्रीराम को धनुष यज्ञ के समय अर्थात अपने विवाह में भगवान परशुराम का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
भगवान श्रीराम ने चौदह वर्षों के वनवास के समय बहुत से महान ऋषियों-मुनियों के आश्रमों की यात्रा की और उनसे आध्यात्मिक ज्ञान तथा दिव्यास्त्र प्राप्त किए। वनवास के प्रारंभ में प्रयागराज पहुंचने पर श्रीराम सबसे पहले महर्षि भरद्वाज के आश्रम गए। गोस्वामी जी लिखते हैं कि भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा॥ तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना।। भरद्वाज ऋषि ने ही श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को चित्रकूट में निवास करने का सुझाव दिया था। चित्रकूट प्रवास के समय श्रीराम महर्षि वाल्मीकि के आश्रम गए। गोस्वामी जी लिखते हैं कि मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा॥ देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने॥ वाल्मीकि जी ने ही उन्हें वह स्थान दिखाया जहाँ उन्हें अपनी कुटिया बनानी चाहिए। चित्रकूट से प्रस्थान करने के बाद श्रीराम महर्षि अत्रि के आश्रम पहुँचे। यहाँ माता सीता ने ऋषि अत्रि की पत्नी, माता अनसूया से भेंट की जिन्होंने उन्हें पातिव्रत्य धर्म का उपदेश दिया और दिव्य वस्त्र व आभूषण भेंट किए। मानस में गोस्वामी जी लिखते हैं कि अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं।। चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू। अर्थात अत्रि आदि बहुत से श्रेष्ठ मुनि (ऋषि) वहाँ (चित्रकूट में) निवास करते हैं, जो योग, जप और तप करते हुए शरीर को कष्ट देकर साधना करते हैं। हे रामजी चलिए, सबके परिश्रम को सफल कीजिए और इस श्रेष्ठ पर्वत (चित्रकूट) को अपने चरणों से गौरव प्रदान कीजिए।
दंडकारण्य में प्रवेश करते समय राम जी ऋषि शरभंग के आश्रम गए। ऋषि शरभंग श्रीराम के दर्शनों की प्रतीक्षा कर रहे थे और उनके दर्शन के पश्चात उन्होंने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर का त्याग कर दिया। महर्षि शरभंग के निर्देश पर श्रीराम ऋषि सुतीक्ष्ण के आश्रम पहुँचे, जो महर्षि अगस्त्य के शिष्य थे। गोस्वामी जी लिखते हैं कि मुनि अगस्त्य कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना॥ मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक॥ श्रीराम ने पंचवटी जाने से पहले महर्षि अगस्त्य से भेंट की। ऋषि अगस्त्य ने ही श्रीराम को रावण और राक्षसों के संहार के लिए अमोघ वैष्णव धनुष, अक्षय तरकश और एक दिव्य खड्ग (तलवार) प्रदान किए।
शबरी के प्रसंग में ऋषि मतंग का उल्लेख आता है। यद्यपि श्री राम की भेंट साक्षात मतंग ऋषि से नहीं हुई थी (क्योंकि वे तब तक देह त्याग चुके थे), लेकिन उनके आश्रम में ही श्रीराम की भेंट उनकी शिष्या शबरी से हुई। इन ऋषियों के अलावा, वनवास के दौरान श्रीराम ने दंडकारण्य के अनेक तपस्वियों की रक्षा की और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। भगवान श्रीराम को पग-पग पर ऋषियों-मुनियों का आशीर्वाद और दर्शन प्राप्त होता रहा है। इन्हीं के तपोबल, ज्ञान, साधना आदि के चलते भगवान ने वनवास का समय पूरा किया, रावण का वध किया और आगे चलकर अपने राजकाज को भी सुव्यवस्थित तरीके से चलाया। ऋषियों, मुनियों, संतों आदि का आशीर्वाद ही हमें संकटों से पार लगा सकता है।