मध्यप्रदेश में बदलाव के 11, 44 और 64 वर्ष का संयोग

1 नवम्बर स्थापना दिवस पर विशेष

मनोज कुमार

शीर्षक आपको चौंका सकता है या कुछ देर के लिए सोचने के विवश कर सकता है लेकिन 11, 44 और 64 मध्यप्रदेश में बदलाव के महत्वपूर्ण वर्ष के रूप में रेखांकित है। 1956 में मध्यप्रदेश का पुर्नगठन होता है और 11 वर्ष बाद 1967 में पहला बदलाव देखने को मिलता है जब संविद शासन की स्थापना होती है। इसके 33 साल बाद यानि मध्यप्रदेश की स्थापना के 44 साल बाद वर्ष 2000 में मध्यप्रदेश का विभाजन होता है और स्वतंत्र राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ प्रदेश का उदय होता है। अब इसके बीस साल बाद एक और बदलाव मध्यप्रदेश में देखने को मिलता है जो मध्यप्रदेश की स्थापना के 64वें वर्ष के कुछ महीने पहले होता है यानि 2020 में कांग्रेस से टूटकर 22 विधायक दल-बदल कर भाजपा में शामिल हो जाते हैं। इस दल-बदल का परिणाम यह होता है कि मध्यप्रदेश में 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद सत्ता में लौटी कांग्रेस की सरकार गिर जाती है और महज 18 महीने का वनवास भोग कर भाजपा की सत्ता में वापसी हो जाती है। इस 64 वर्ष के सफर में मध्यप्रदेश के खाते में 1 दिन, 12 दिन, 28 दिन, 10 साल और लगातार तीन बार निर्वाचित होकर 13 साल, 17 दिन के बाद वापस चौथी बार सत्ता सम्हालने वाले मुख्यमंत्री का नाम दर्ज है। 1956 से लेकर कांग्रेस सर्वाधिक सत्ता में रही लेकिन लगातार 10 वर्ष का शासन कांग्रेस के नाम है तो लगातार 15 वर्ष की सत्ता भाजपा के हाथों में रही। कांग्रेस के तीन मुख्यमंत्री अलग-अलग समय में तीन-तीन बार मुख्यमंत्री बने तो जनता पार्टी शासनकाल के तीन मुख्यमंत्री में से कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। डॉ. काटजू एवं अर्जुनसिंह पांच-पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले एवं लगातार 10 साल का कार्यकाल पूरा करने वाले दिग्विजयसिंह कांग्रेस के रहे हैं। भाजपा से शिवराजसिंह चौहान लगातार 13 साल, 17 दिन के बाद चौथी बार मुख्यमंत्री बने हुए हैं। प्रत्येक दस साल में प्रदेश की राजनीति में बदलाव देखने को मिलता है।  उल्लेखनीय है कि एक नवम्बर 1956 को नए मध्यप्रदेश का गठन होता है। इसके पहले पुराने मध्यप्रदेश सीपी एंड बरार में छत्तीसगढ़ एवं महाकोशल शामिल था जिसके मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल थे। रियासतों को मिलाकर विंध्य प्रदेश, मध्य भारत एवं भोपाल राज्य हुआ करता था जिसमें क्रमश: पंडित शंभूनाथ शुक्ल, तख्तमल जैन एवं डॉ. शंकरदयाल शर्मा मुख्यमंत्री थे। नए मध्यप्रदेश के गठन के बाद पंडित रविशंकर शुक्ल को एकमत से मुख्यमंत्री के रूप में चयन किया गया। मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल का अल्प-कार्यकाल 1 नवम्बर, 1956 से 31 दिसम्बर, 1956 तक रहा। पंडित शुक्ल का ह्दयघात से देहावसान हो गया था। उनके उत्तराधिकारी के रूप में भगवंतराव मंडलोई को पहले एक माह के लिए 1 जनवरी, 1957 से 30 जनवरी, 1957 तक के लिए मुख्यमंत्री का पदभार सम्हालने का अवसर मिला। मंडलोई जी के बाद कैलाशनाथ काटजू नए मध्यप्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री के रूप में पदभार सम्हाला। श्री काटजू को मुख्यमंत्री के रूप में दो कार्यकाल मिला। पहला 31 जनवरी, 1957 से 14 मार्च, 1957 तथा दूसरा कार्यकाल 14 मार्च, 1957 से 11 मार्च, 1962 तक का रहा। श्री काटजू के बाद भगवंतराव मंडलोई को एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाया गया और उनका कार्यकाल 12 मार्च, 1962 से 29 सितम्बर, 1963 तक का रहा। 30 सितम्बर, 1963 को नए मध्यप्रदेश के छठवें मुख्यमंत्री के रूप में पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र पदारूढ़ होते हैं। पहला कार्यकाल 8 मार्च, 1967 को पूर्ण कर दुबारा 9 मार्च, 1967 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हैं और यह कार्यकाल 29 जुलाई, 1967 तक रहता है।  संविद सरकार के कारण उनकी सरकार गिर जाती है और नए मध्यप्रदेश में दल-बदल का यह पहला मामला था। संविद सरकार में 30 जुलाई, 1967 को गोविंदनारायण सिंह मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेते हैं। मुख्यमंत्री के रूप में गोविंदनारायण सिंह का कार्यकाल 12 मार्च, 1969 तक रहता है। इनके बाद राजा नरेशचंद्रसिंह नए मध्यप्रदेश के नौंवे मुख्यमंत्री के रूप में  13 मार्च, 1969 को शपथ लेते हैं और उनका कार्यकाल 25 मार्च, 1969 तक रहता है। राजा नरेशचंद्र सिंह का कार्यकाल महज 12 दिनों का होता है।  दसवें मुख्यमंत्री पंडित श्यामाचरण शुक्ल 26 मार्च, 1969 को शपथ ग्रहण करते हैं और 28 जनवरी, 1972 तक मुख्यमंत्री रहते हैं। ग्यारहवें मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी को दो कार्यकाल मिलता है जिसमें 29 जनवरी, 1972 से 22 मार्च,1972 एवं दूसरा कार्यकाल 23 मार्च,1972 से 22 दिसम्बर, 1975 तक रहता है। पीसी सेठी को मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने के बाद एक बार फिर पंडित श्यामाचरण शुक्ल को मुख्यमंत्री बनाया जाता है और इस बार उनका कार्यकाल 23 दिसम्बर, 1975 से 29 अप्रेल, 1977 तक का था।  आपातकाल के बाद पहला विधानसभा चुनाव होने के पूर्व नए मध्यप्रदेश में 29 अप्रेल, 1977 से 25 जून, 1977 तक राष्ट्रपति शासन लागू हो जाता है। आपातकाल के बाद हुए विधानसभा चुनाव में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार सत्ता में आती है। हालांकि पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनती जरूर है लेकिन स्थायी सरकार के रूप में अपना छाप नहीं छोड़ पाती है। सन् 1977 से 1980 के इन तीन सालों में तीन मुख्यमंत्री बनते हैं। जनता पार्टी को शासन करने का अवसर मिलता है और पहली बार सत्ता की कमान कैलाशचंद्र जोशी के हाथों में आती है। श्री जोशी 26 जून, 1977 से 17 जनवरी, 1978 तक उनका कार्यकाल होता है। श्री जोशी के बाद वीरेन्द्र कुमार सकलेचा मुख्यमंत्री पदारूढ़ होते हैं और 18 जनवरी, 1978 से 19 जनवरी, 1980 तक मुख्यमंत्री रहते हैं। 20 जनवरी, 1980 को राज्य की कमान सुंदरलाल पटवा के हाथों में आती है लेकिन उनका कार्यकाल महज 28 दिनों का होता है। 17 फरवरी, 1980 को उनका कार्यकाल समाप्त हो जाता है। महज तीन वर्षों बाद भी मध्यप्रदेश को राष्ट्रपति शासन का सामना करना पड़ता है। मध्यप्रदेश में दूसरी बार राष्ट्रपति शासन 18 फरवरी, 1980 से 8 जून, 1980 तक लागू रहता है। राष्ट्रपति शासन के साये में हुए चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस की जोरदार वापसी होती है और अर्जुनसिंह की मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी होती है। अर्जुनसिंह 9 जून, 1980 को पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हैं और उनका कार्यकाल 10 मार्च, 1985 तक रहता है। राज्य विधानसभा चुनाव में फिर कांग्रेस अर्जुनसिंह के नेतृत्व में प्रचंड बहुमत से चुनाव में विजयी होती है और अर्जुनसिंह 11 मार्च, 1985 को मुख्यमंत्री की शपथ लेते हैं। एक दिन बाद ही अर्जुनसिंह को मुख्यमंत्री पद छोडऩा पड़ता है क्योंकि उन्हें पंजाब का राज्यपाल बना दिया जाता है। 12 मार्च, 1985 को उनके पद त्यागने के बाद 13 मार्च, 1985 को 19वें मुख्यमंत्री के रूप में मोतीलाल वोरा 13 मार्च, 1985 से  13 फरवरी, 1988 तक राज्य की सत्ता सम्हालते हैं। 14 फरवरी, 1988 को पुन: अर्जुनसिंह राज्य के 20वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेते हैं और 24 जनवरी, 1989 तक बने रहते हैं। एक बार फिर मोतीलाल वोरा को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया जाता है और इस बार वे 21वें मुख्यमंत्री के रूप में 25 जनवरी, 1989 शपथ लेते हैं। श्री वोरा का कार्यकाल 8 दिसम्बर, 1989 तक होता है। इसके बाद राज्य के 13वें मुख्यमंत्री रहे पंडित श्यामाचरण शुक्ल की 22वें मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी होती है। 12 साल कांग्रेस से बाहर रहने के बाद जब उनकी कांग्रेस में वापसी होती है। बाद में मुख्यमंत्री बनाये जाते हैं। पंडित शुक्ल 9 दिसम्बर, 1989 से 4 मार्च, 1990 तक मुख्यमंत्री के रूप में पदारूढ़ रहे।  राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में इस बार जनता पार्टी के स्थान पर भारतीय जनता पार्टी विजयश्री हासिल करती है। भारतीय जनता पार्टी का उदय 1980 में होता है किन्तु सत्तासीन होने का अवसर 10 वर्ष बाद 1990 के चुनाव में मिलता है। 5 मार्च, 1990 को 23वें मुख्यमंत्री के रूप में सुंदरलाल पटवा शपथ लेते हैं और 15 दिसम्बर, 1992 तक उनका कार्यकाल होता है। श्री पटवा जनता पार्टी की सरकार में भी 28 दिनों के मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश की कमान सम्हाल चुके हैं। नए मध्यप्रदेश को एक बार फिर राष्ट्रपति शासन का सामना करना पड़ता है। मध्यप्रदेश में राष्ट्रपति शासन तीसरी दफा लगाया गया था। सबसे पहले वर्ष 1977 में, दूसरी बार 1980 में तथा तीसरी बार 16 दिसम्बर, 1992 से 6 दिसम्बर, 1993 तक राष्ट्रपति शासन कायम रहा। पहली बार राष्ट्रपति शासन का कार्यकाल तीन माह का था जबकि दूसरी बार राष्ट्रपति शासन पांच महीनों का रहा और तीसरी बार राष्ट्रपति शासन करीब एक वर्ष का था। इस चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस की जोर-शोर से वापसी होती है और राज्य के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में दिग्विजयसिंह 7 दिसम्बर, 1993 को शपथ लेते हैं। निर्वाध रूप से पहला पांच का कार्यकाल पूर्ण करने का श्रेय दिग्विजयसिंह को है। एक दिसम्बर, 1998 को उनका पहला कार्यकाल पूर्ण होता है और वे 25वें मुख्यमंत्री के रूप में एक दिसम्बर, 1998 को शपथ लेते हैं और लगातार दो कार्यकाल, 10 वर्ष तक मुख्यमंत्री रहने का उनका रिकार्ड बन जाता है। उनका दूसरा कार्यकाल 8 दिसम्बर, 2003 तक होता है।  यह वही समय है जब छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य का दर्जा देकर मध्यप्रदेश का विभाजन हो जाता है। एक नवम्बर, 2000 को जिस दिन मध्यप्रदेश का भी स्थापना दिवस है, मध्यप्रदेश का एक बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़ स्वतंत्र राज्य के रूप में उभरता है। छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के बाद तत्काल चुनाव कराने के स्थान पर विधानसभा सीटों के मान से सरकार का गठन कर दिया जाता है। 90 विधानसभा वाली छत्तीसगढ़ राज्य में कांग्रेस को पहली सरकार गठन का अवसर मिलता है और अजीत प्रमोद कुमार जोगी छत्तीसगढ़ राज्य के पहले मुख्यमंत्री बनते हैं।  छत्तीसगढ़ राज्य गठन के तीन वर्ष बाद 2003 में पहला विधानसभा चुनाव होता है तब कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाता है और भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्तासीन होती है। डॉ. रमनसिंह राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री बनाये जाते हैं। लगातार तीन कार्यकाल छत्तीसगढ़ राज्य में भाजपा का होता है और मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. रमनसिंह निरंतर बने रहते हैं। वर्ष 2018 के चुनाव में भाजपा का सूपड़ा साफ हो जाता है और कांग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ राज्य की सत्ता में वापिसी करती है। 15 वर्षों से जूझ रहे भूपेश सिंह बघेल को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया जाता है। छत्तीसगढ़ के पृथक हो जाने के बाद मध्यप्रदेश में पहला विधानसभा चुनाव वर्ष 2003 में होता है। 10 वर्षों से निरंतर सत्ता में काबिज कांग्रेस की दिग्विजसिंह सरकार को परास्त कर भाजपा सत्तासीन होती है। इस चुनाव में भाजपा के साथ उमा भारती की आक्रामक भूमिका होती है और चमत्कारिक ढंग से भाजपा को पूर्ण बहुमत प्राप्त होता है। पूर्व का अनुभव बताता है कि तब की जनता पार्टी के शासनकाल में आयाराम-गयाराम की तर्ज पर 1977-1980 के दरम्यान तीन मुख्यमंत्री बदल गए थे। सो इस बार भी यही कयास लगाया जा रहा था। आरंभ भी कुछ इसी तरह हुआ था। लगभग एक वर्ष के कार्यकाल के बाद उमा भारती को हटाकर बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाया गया और इसके एक वर्ष बाद शिवराजसिंह चौहान मुख्यमंत्री बनें। यह अंदाजा किसी को नहीं था कि शिवराजसिंह की अगुवाई में भाजपा मध्यप्रदेश में निर्बाध राज करेगी। 2005 में शिवराजसिंह मुख्यमंत्री बनते हैं और लगातार 13 वर्ष 17 दिन मुख्यमंत्री रह कर ना केवल नया राजनीतिक इतिहास रचते हैं बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह का रिकार्ड ब्रेक कर देते हैं। 2018 में राज्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सरकार बनाने लायक सीटें जीत जाती है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाया जाता है। कमलनाथ सरकार पूर्ण बहुमत नहीं होने के कारण सरकार गिर जाने का भय बना रहता है। कांग्रेस के भीतर की अंदरूनी कलह और भाजपा की तोडफ़ोड़ कर सरकार बनाने की नीति का परिणाम यह निकला कि मात्र 18 महीने में कमलनाथ सरकार गिर जाती है। शिवराजसिंह चौहान को भाजपा एक बार फिर अपना मुख्यमंत्री बनाती है। मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार का रिकार्ड तो बनता ही है। चार बार मुख्यमंत्री बनने का ऐतिहासिक रिकार्ड शिवराजसिंह चौहान के खाते में दर्ज हो जाता है।  कांग्रेस से एक साथ 22 विधायक पूर्व लोकसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थन में भाजपा में शामिल हो जाते हैं। दल-बदल कानून प्रभावी होने के कारण इन 22 विधायकी समाप्त हो जाती है। इधर ज्योतिरादित्य सिंधिया को भाजपा अपने कोटे से राज्यसभा के लिए भेजती है। 22 विधायकों के बाद 4 और विधायक भाजपा में शामिल हो जाते हैं तथा दो विधायकों के निधन के कारण राज्य में 28 सीटों के लिए उप-चुनाव की स्थिति बनती है। 2020 में मध्यप्रदेश की राजनीतिक परिस्थिति 1967 की संविद सरकार का स्मरण कराती है। पहली बार राज्य में 28 सीटों के लिए उप-चुनाव की स्थिति बन रही है। हालांकि मध्यप्रदेश में दो दलीय चुनाव व्यवस्था होने के कारण तीसरे दल का कोई बहुत प्रभावी उपस्थिति नहीं है। कांग्रेस की सरकार को गिराकर भाजपा सत्तासीन तो हो गई लेकिन बड़ी संख्या में कांग्रेसियों के भाजपा में आने से भाजपा के भीतर अंतर्कलह की स्थिति निर्मित हो चुकी है।  सिंधिया के दबाव के चलते उनके समर्थकों को मंत्री बनाना शिवराजसिंह चौहान की मजबूरी थी। लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा रही है कि भाजपा स्वयं नहीं चाहती कि चंबल में सिंधिया के समर्थकों की बड़ी जीत हो। ऐसा होता है तो भाजपा को अपने समर्थकों को मंत्री बनाने के लिए स्थान मिल सकेगा और दबाव की राजनीति से मुक्त हो सकेगी। स्वयं शिवराजसिंह चौहान दबाव की राजनीति से परहेज करते हैं। यदि उप-चुनाव परिणाम सिंधिया के पक्ष में नहीं रहा तो उनका प्रभाव कम हो जाएगा।मार्च माह का प्रभाव : मध्यप्रदेश में सत्ता परिवर्तन में मार्च महीने की भूमिका अहम रही है। 1956 में नए मध्यप्रदेश के गठन के बाद 10 बार सत्ता परिवर्तन का योग मार्च माह में बना है तो 9 बार दिसम्बर में ऐसा हुआ है। 5 बार जनवरी में भी यह योग आया था। 31 दिसम्बर को प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल के निधन के बाद 1 जनवरी को मंडलोई जी मुख्यमंत्री बनते हैं तो 14 मार्च को मुख्यमंत्री काटजू का इस्तीफा हो जाता है।दिग्विजयसिंह का संकल्प : नए मध्यप्रदेश में 10 वर्षों तक मुख्यमंत्री की कुर्सी सम्हालने वाले दिग्विजयसिंह सरकार को जब वर्ष 2003 के चुनाव में परास्त होना पड़ा। इसके बाद उन्होंने 10 वर्ष तक चुनाव नहीं लडऩे और किसी भी पद से दूर रहने का ऐलान किया और वे अपने संकल्प पर अडिग रहे। उमा भारती पहली महिला मुख्यमंत्री : नए मध्यप्रदेश में उमा भारती को पहली महिला मुख्यमंत्री होने का श्रेय जाता है। हालांकि उनका कार्यकाल 8 दिसम्बर, 2003 से 23 अगस्त, 2004 तक रहा। हुबली में तिरंगा फहराने के एक मामले को लेकर उन्हें पद त्यागना पड़ा था। मुख्यमंत्री के बाद मंत्री बनने वाले गौर : नए मध्यप्रदेश में बुलडोजर मंत्री के नाम से विख्यात बाबूलाल गौर को उमा भारती ने अपने उत्तराधिकारी के तौर पर चुना था। मुख्यमंत्री के रूप में बाबूलाल गौर का कार्यकाल 23 अगस्त, 2004 से 29 नवम्बर, 2005 तक रहा। इसके बाद शिवराजसिंह मंत्रिमंडल में उन्होंने मंत्री का पद धारण कर लिया। यह अपवाद ही था कि कोई पूर्व मुख्यमंत्री, मंत्री बनकर दायित्वों का निर्वहन करे। मध्यप्रदेश की राजनीति में बाबूलाल गौर अपवाद माने जाएंगे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका  ‘समागम’, भोपाल के संपादक हैं। 

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