लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

अदालत को बिनायक सेन के बारे में जितनी बातें मालूम पड़ी हैं, वे सब ऊंट के मुंह में जीरे के समान हो सकती हैं। असली बातों तक वे बेचारे पुलिसवाले क्या पहुंचेंगे, जो इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट को आईएसआई समझ लेते हैं। वे गुस्से से लबालब हों तो हैरत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि माओवादी हिंसा में वे ही मारे जाते हैं। हमारे गालबजाऊ बुद्धिजीवी तो उन्हें मच्छर बराबर भी नहीं समझते।

डॉ बिनायक सेन को लेकर देश का अंग्रेजी मीडिया और हमारे कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी जिस तरह आपा खो रहे हैं, उसे देखकर देश के लोग दंग हैं। इतना हंगामा तो प्रज्ञा ठाकुर वगैरह को लेकर हमारे तथाकथित राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी तत्वों ने भी नहीं मचाया। वामपंथियों ने आरएसएस को भी मात कर दिया। आरएसएस ने जरा भी देर नहीं लगाई और ‘भगवा आतंकवाद’ की भत्र्सना कर दी। अपने आपको हिंसक गतिविधियों का घोर विरोधी घोषित कर दिया। ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द ही मीडिया से गायब हो गया। लेकिन बिनायक सेन का झंडा उठाने वाले एक भी संगठन या व्यक्ति ने अभी तक माओवादी हिंसा के खिलाफ अपना मुंह तक नहीं खोला। क्या यह माना जाए कि माओवादियों द्वारा मारे जा रहे सैकड़ों निहत्थे और बेकसूर लोगों से उनका कोई लेना-देना नहीं है? क्या वे भोले आदिवासी भारत के नागरिक नहीं हैं? उनकी हत्या क्या इसलिए उचित है कि उसे माओवादी कर रहे हैं? माओवादियों द्वारा की जा रही लूटपाट क्या इसीलिए उचित है कि आपकी नजर में वे किसी विचारधारा से प्रेरित होकर लड़ रहे हैं? मैं पूछता हूं कि क्या जिहादी आतंकवादी और साधु-संन्यासी आतंकवादी चोर-लुटेरे हैं? वे भी तो किसी न किसी ‘विचार’ से प्रेरित हैं। विचारधारा की ओट लेकर क्या किसी को भी देश के कानून-कायदों की धज्जियां उड़ाने का अधिकार दिया जा सकता है? क्या यही मानव अधिकार की रक्षा है?

यदि नहीं तो फिर प्रश्न उठता है कि छत्तीसगढ़ में जो लोग पकड़े गए हैं, उन्हें दंडित क्यों न किया जाए? जो भी दंड उन्हें दिया गया है, उसे वे खुशी-खुशी स्वीकार क्यों नहीं करते? यदि वे सचमुच माओवादी हैं या माओवाद के समर्थक हैं, तो उन्हें वैसी घोषणा खम ठोककर करनी चाहिए थी, देश के सामने और अदालत के सामने भी। जरा पढ़ें, 1921 में अहमदाबाद की अदालत में महात्मा गांधी ने अपनी सफाई में क्या कहा था। यदि वे लोग माओवादी नहीं हैं और उन्होंने छत्तीसगढ़ के खूनी माओवादियों की कोई मदद नहीं की है, तो वे वैसा साफ-साफ क्यों नहीं कहते? वे सरकारी हिंसा के साथ-साथ माओवादी हिंसा की निंदा क्यों नहीं करते? यदि वे ऐसा नहीं करते, तो जो अदालत कहती है, उस पर ही आम आदमी भरोसा करेगा। छत्तीसगढ़ की अदालत के फैसले पर जिस तरह का आक्रमण हमारे छद्म वामपंथी कॉमरेड लोग कर रहे हैं, वैसी न्यायालय की अवमानना भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुई।

यदि बिनायक सेन और उनके साथी सचमुच बहादुर होते या सचमुच आदर्शवादी होते तो सच बोलने का नतीजा यही होता न कि उन्हें फांसी पर लटका दिया जाता। जिसने अपने सिर पर कफन बांध रखा है, वह एक क्या, हजार फांसियों से भी नहीं डरेगा। आदर्श के आगे प्राण क्या चीज है? अपने प्राणों की रक्षा के लिए बहादुर लोग क्या झूठ बोलते हैं? क्या कायरों की तरह अपनी पहचान छुपाते हैं? भारत जैसे लोकतांत्रिक और खुले देश में जो ऐसा करते हैं, वे अपने प्रशंसकों को मूर्ख और मसखरा बनने के लिए मजबूर करते हैं। माओवादियों की दलाली कर रहे लोगों को कहीं उनके प्रशंसक भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद और बिस्मिल के उच्चासन पर बिठाने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं?

डॉ बिनायक सेन और उनकी पत्नी यदि सचमुच आदिवासियों की सेवा के लिए अपनी मलाईदार नौकरियां छोड़कर छत्तीसगढ़ के जंगलों में भटक रहे हैं तो वे निश्चय ही वंदनीय हैं, लेकिन उनके बारे में आग उगल रहे अंग्रेजी अखबार यह क्यों नहीं बताते कि उन्होंने किन-किन क्षेत्रों के कितने आदिवासियों की किन-किन बीमारियों को ठीक किया? यदि सचमुच उन्होंने शुद्ध सेवा का कार्य किया होता तो अब तक काफी तथ्य सामने आ जाते। लोग मदर टेरेसा को भूल जाते हैं। पहला प्रश्न तो यही है कि कोलकाता या दिल्ली छोड़कर वे छत्तीसगढ़ ही क्यों गए? कोई दूसरा इलाका उन्होंने क्यों नहीं चुना? क्या यह किसी माओवादी पूर्व योजना का हिस्सा था या कोई स्वत:स्फूर्त माओवादी प्रेरणा थी? जेल में फंसे माओवादियों से मिलने वे क्यों जाते थे? क्या वे उनका इलाज करने जाते थे? क्या वे सरकारी डॉक्टर थे? जाहिर है कि ऐसा नहीं था।

इसीलिए चिट्ठियां आर-पार करने का आरोप निराधार नहीं मालूम पड़ता। मैंने खुद कई बार आंदोलन चलाए और जेल काटी है। जो लोग जेल में रहे हैं, उन्हें पता है कि गुप्त संदेश आदि कैसे भेजे और मंगाए जाते हैं। पीयूसीएल के अधिकारी के नाते बिनायक का कैदियों से मिलना डॉक्टरी कम, वकालत ज्यादा थी। यदि कॉमरेड पीयूष गुहा के थैले से वे तीन चिट्ठियां पकड़ी गईं, जो कॉमरेड नारायण सान्याल ने बिनायक सेन को जेल में दी थीं, तो गुहा की कही हुई इस बात को झुठलाने के लिए वकीलों को खड़ा करने की जरूरत क्या थी? भारत को शोषकों से मुक्त करवाने वाला क्रांतिकारी इतना छोटा-सा ‘गुनाह’ करने से भी क्यों डरता है? पकड़े गए कॉमरेडों को किराए पर मकान दिलवाने और बैंक खाता खुलवाने की बात खुद बिनायक ने स्वीकार की है। अदालत को बिनायक की सांठ-गांठ के बारे में अब तक जितनी बातें मालूम पड़ी हैं, वे सब ऊंट के मुंह में जीरे के समान हो सकती हैं। असली बातों तक वे बेचारे पुलिसवाले क्या पहुंच पाएंगे, जो इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट को आईएसआई (पाकिस्तानी जासूसी संगठन) समझ लेते हैं। पुलिसवालों का दिल गुस्से से लबालब हो तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि माओवादी हिंसा में वे ही थोक में मारे जाते हैं। वे नेता हैं, न धन्ना सेठ। उनके लिए कौन रोएगा? हमारे गालबजाऊ और आरामफरमाऊ बुद्धिजीवी तो उन्हें मच्छर के बराबर भी नहीं समझते। एक माओवादी के लिए जो आसमान सिर पर उठाने को तैयार है, वे सैकड़ों पुलिसवालों की हत्या पर मौनी बाबा का बाना धारण कर लेते हैं।

कौन हैं ये लोग? असल में ये ही ‘बाबा लोग’ हैं। अंग्रेजीवाले बाबा! इनकी पहचान क्या है? शहरी हैं, ऊंची जात हैं, मालदार हैं और अंग्रेजीदां हैं। आम लोगों से कटे हुए, लेकिन देश और विदेश के अंग्रेजी अखबारों और चैनलों से जुड़े हुए। इन्हें महान बौद्धिक और देश का ठेकेदार कहकर प्रचारित किया जाता है। ये देखने में भारतीय लगते हैं, लेकिन इनके दिलो-दिमाग विदेशों में ढले हुए होते हैं। इनकी बानी भी विदेशी ही होती है। भारतीय रोगों के लिए ये विदेशी नुस्खे खोज लाने में बड़े प्रवीण होते हैं। इसीलिए शोषण और अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए गांधी, लोहिया और जयप्रकाश इन्हें बेकार लगते हैं। ये अपना समाधान लेनिन, माओ, चे ग्वारा और हो ची मिन्ह में देखते हैं। अहिंसा को ये नपुंसकता समझते हैं, लेकिन इनकी हिंसा जब प्रतिहिंसा के जबड़े में फंसती है तो वह कायरता में बदल जाती है। इसी मृग-मरीचिका में बिनायक, सान्याल, गुहा, चारु मजूमदार, कोबाद गांधी – जैसे समझदार लोग भी फंस जाते हैं। ऐसे लोगों के प्रति मूल रूप से सहानुभूति रखने के बावजूद मैं उनसे बहादुरी और सत्यनिष्ठा की आशा करता हूं। ऐसे लोगों को अगर अदालतें छोड़ भी दें तो यह छूटना उनके जीवन-भर के करे-कराए पर पानी फेरना ही है। क्या वामपंथी बुद्धिजीवी यही करने पर उतारू हैं?

6 Responses to “कॉमरेडों का फिजूल रोदन”

  1. प्रभात कुमार रॉय

    प्रभात कुमार रॉय

    Dr Vadik Ved Pratap has written the article with most prejudiced mind set. He now speaking the language of BJP Govt of Chhattisgarh, who made conspiracy to trap Dr. Sen as axle leader. Though Dr. Sen had been an close associate of shankar guha niyogi , who renounced his naxal path long back and joined main stream democratic politics in Chhattisgarh BJP supported liquor mafia killed NIYOGI.
    Tribal people since British times suffered a lot. In independent India their sufferings aggravated, because the areas where they resided is full of minerals. Corporate sector have always fix its greedy eyes on tribal areas. With the active help of govt. corporate sector dislodged tribal from their respective areas. Most of the uprooted tribal people have not been rehabilitated. Naxal elements exploited their discontent to strengthen their base. Naxals have been able to recruit tribal youths in their ranks in large number.
    It is most necessary to isolate Naxals from tribal, if govt. really aspires to emerge victorious over them. Since the British period tribal had been a subject of sever exploitation and even during freedom period of last 63 years economic justice has not been done with them. Even more severe exploitation continued, so great discontent has been seething among them. More than twenty corers tribal resides in India. Ninety nine percent of them are any how surviving below the so called line of poverty.
    Peasants of India are also been ignored in new economic policies. So that economic condition of Indian peasants gradually deteriorated. After the tribes, the peasants discontent at large might be exploited by the Naxals. More than two laces peasants have already committed suicide. That is the more than sufficient evidence of mental condition of peasants. Wretched Tribal and peasants are the most potential targets of the Naxals.
    Naxal problem will not be solved just only by the deployment of security forces. But the two tactical lines would have to be evolved. On one hand problems, grievance of tribal and peasants should be resolved seriously. On the other hand Land reforms must be implemented most strictly. Corporate sector should be developed in way that it may not act against the interest of tribal and peasants. Before the deployment of CRPF battalions, it should be properly trained for the gorilla warfare.

    Actually it is a war on extremism and it will be fought for years ahead. Maoist Naxals are operating in 231 districts out of total 626 districts of India. Naxal have at least twenty thousand armed guerrillas in their ranks. The long standing conflict between the Indian state and Naxals has entered in crucial and perhaps in decisive phase in near future. Corruption in course of development has been a phenomenon in India. There is loot of public money and political leaders, bureaucrats ,government contractors all are being involved in massive corruption. Most rapid development in tribal areas is primary necessity to isolate Naxal. Public money should go to the poor people, otherwise on the basis of gun nothing can be attained in Naxal infested areas.

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    ” बिनायक सेन का झंडा उठाने वाले एक भी संगठन या व्यक्ति ने अभी तक माओवादी हिंसा के खिलाफ अपना मुंह तक नहीं खोला। क्या यह माना जाए कि माओवादियों द्वारा मारे जा रहे सैकड़ों निहत्थे और बेकसूर लोगों से उनका कोई लेना-देना नहीं है?”
    ———- इसका उत्तर कोई दे सकता है?

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  3. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    जेटामलानी को तो इंदिरा के ह्ताय्रे भी बेकसूर लगे थे,शायद??

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  4. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    कोई रुदन नहीं हो रहा है ,जिसे भारत में बमुश्किल रायपुर के २-५ हज़ार ओर शेष भारत में दो दर्जन लोग जानते थे
    उसकी ख्याति-समस्त भूमंडल पर धूमकेतु की तरह चमक रही है .वो सर्वहारा का ही नहीं बल्कि उन तमाम धर्मनिरपेक्ष-शांतिकामी
    जनगनों का हीरो वन चुका है ,प्रोफ़ेसर अमर्त्य सेन ,प्रभात पटनायक या अग्निवेश तो उनके हितेशी हैं ही किंतु भारत के सबसे
    बड़े वकील ओर आपकी ही जॅमाट के सांसद श्रीराम जेठमलानी जी सुप्रीम कोर्ट में ड्र विनायक की मुफ़्त में पैरवी करने जा रहे हैं .आपको यह जानकार दुख होगा की उन्होने यहान ट्के कहा की विनायक सेन निर्दोष हैं ओर उन्हे उनकी पैरवी करने में गर्व महसूस हो रहा है ,अब वेदिक जी आप कोई अच्छसा वकील ढूड़कर जल्दी से विनायक सेन को फाँसी पर लटकवा ही दीजिए ताकि आप इतिहास के स्वर्णिम पन्नों पर …..की हैसियत से स्डा के लिए अमर हो जाएँ .आपने प्रगया ओर भगवा आतंक पर देश के वांमपंथि उद्धिजीवीओन को नाहक ही कोसा .ये तो आपकी ज़िम्मेदारी थी थी

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  5. RAJ SINH

    वैदिक जी की लेखनी को नमन !
    वैसे वे यह जानते ही होंगे की इन तथाकथित बुद्धजीवियों और देश द्रोहियों का कायराना अंदाज़ उनका ‘ वर्ग चरित्र ‘ ही है .

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  6. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    सेन साहब —
    किं करोति एव पाण्डित्यम्, अस्थाने विनियोजितम्‌ ?
    अन्धकार प्रतिच्छन्ने घटे दीप इवाहितः॥
    ॥पंच तन्त्र॥
    क्या करेगी, पण्डिताई भी ?
    (अस्थाने) अनुचित स्थान लगी हुई? ॥
    (जैसे) अंधेरे भरे, घडे पर, दीपक,
    अंधेरा कैसे दूर करें?॥

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