चिंता का विषय है कुवारों की बढ़ती संख्या

 

 

 

कहते है जब सृष्टि की संरचना हुई थी तो एक ही अदृश्य शक्ति पुंज से शिव व शक्ति के दो रूप प्रकट हुए जिससे एक मर्द और दूसरा औरत का रूप सृजित हुआ ताकि वे मनुष्यजाति में वंश वृद्धि कर सके | सृष्टि रचना में दोनों की समान भागीदारी मानी गई तथा दोनों ने इसी के अनुरूप मानव संख्या वृद्धि में अपना-अपना दायित्व निभाया और इसी कारण सृष्टि में मर्दों व औरतों की संख्या का अनुपात लगभग बराबर चलता रहा | मानव विकास के इतिहास में महिलाएं पुरुषों जितना ही आवश्यक रही है | प्रकृति का नियम है कि 1000 लड़कों के पीछे 940 से 950 तक लड़कियां पैदा होती हैं | लेकिन हाल के वर्षों में ज्यों-ज्यों भौतिकवाद बढ़ता गया व औरतों के खिलाफ दहेज-प्रथा जैसी कुरीतियों ने जन्म लिया त्यों-त्यों लिंगानुपात औरतों के विपरीत होता गया | आज ऐसा वक्त आ गया है कि भारत के प्रधानमंत्री को “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसी योजनाओं का श्री गणेश करके मानवजाति को औरतों की घटती संख्या के खतरे से अगाह करना पड़ा |

समय बीतता गया, पुरुष की स्थिति मजबूत व औरतों की स्थिति कमजोर होती गई व ऐसा समय आ गया जब औरत को ‘अबला’ के नाम से पुकारा जाने लगा | जबकि समाज में इनके सब्लायन के अनेक उदाहरण मौजूद रहे है | राधेश्याम, सीताराम, उमाशंकर, गौरीनंदन जैसे अनेकानेक नाम महिला श्रेष्ठ समाज की तस्वीर दर्शाते है | फिर आज यह विकृति सोच पैदा कैसे हुई ? समाज में अन्य लोग अपनी सुविधानुसार उन्हें पीछे धकेलते गये और आधी आबादी का दायरा सिमटता गया | आज समाज गाड़ी के एक पुरुष पहिये से चल पाने में असमर्थ हो रहा है परन्तु जैसे-जैसे सामाजिक चेतना बढ़ती गयी व औरतों की दयनीय स्थिति के बारे में सरकारें चिंतित हुई त्यों-त्यों औरतों के पक्ष में विभिन्न कानून व योजनाएं बनती चली गयी | दहेज़ उत्पीड़ना के विरुद्ध व घरेलू हिंसा निरोधक जैसे अधिनियम संसद द्वारा पारित किये गये तथा बलात्कार सम्बंधी कानून में बदलाव करके उसे अधिक कारगर बनाया गया | भ्रूण-हत्या के खिलाफ कड़ा कानून ला कर सरकार ने समाज को चेताया कि यदि लड़कियों की संख्या इसी प्रकार घटती गयी व कुंवारों की संख्या बढ़ती गयी तो सामाजिक असंतुलन पैदा हो जायेगा जिससे कई सामाजिक बुराईयाँ पनपेगी | इसी कड़ी में “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” अभियान भारत के प्रधानमंत्री के हाथों हरियाणा राज्य के पानीपत से शुरू किया गया |

“बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” कार्यक्रम के अंतर्गत सरकार ने ऐलान किया कि लड़कों के बराबर लड़कियों की जन्म दर हासिल करने वाले गाँव को एक करोड़ रुपये का ईनाम दिया जायेगा | हरियाणा सरकार ने राज्य में किसी लड़की के जन्म पर 21000 रुपये देने की योजना की शुरुआत की | हिमाचल सरकार ने भी अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर ऐलान किया है कि शीघ्र ही “बेटी बचाओ” अभियान हिमाचल प्रदेश में भी शुरू किया जायेगा | गौरतलब है कि ऊना जिले की कुछ पंचायतों में लड़कियों की संख्या इतनी तीव्रता से घटी है कि इसका संज्ञान मानवाधिकार आयोग ने लेते हुए हिमाचल सरकार से रिपोर्ट तलब की है | प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में महिला लिंग अनुपात में गिरावट एक चिंता का विषय है, जो यह दर्शाता है कि यहाँ कन्या भ्रूण हत्या के लिए प्रसव पूर्व जाँच तकनीक का दुरूपयोग किया जा रहा है |

हरियाणा में गिरते लिंग अनुपात ने पूरे भारतवर्ष की आँखें खोल दी तथा सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर समाज किस ओर जा रहा हैं | आज हरियाणा में यह स्थिति आ गयी है कि लड़के कुंवारे रहने पर मजबूर हो गये हैं क्योंकि उन्हें शादी के लिए लड़कियां नही मिल पा रही है | भारत के प्रधानमंत्री का भी यह कहना है कि “बेटी नही बचाओगे तो बहू कहाँ से लाओगे” | इसी संतुलन को बनाये रखने के लिए देश के चुनिंदा 100 जिलों में “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” कार्यक्रम शुरू किया गया जिन में से 12 जिले हरियाणा राज्य के ही शामिल है | इस कार्यक्रम के लिए केंद्रीय सरकार ने शुरू में 100 करोड़ रुपये का प्रारंभिक बजट रखा है |

हरियाणा के अलावा पूर्वोत्तर राज्यों में लड़कियों की संख्या तेज़ी से कम हो रही है | इसी प्रकार यू.पी., बिहार, झारखंड में भी लड़कियों की संख्या तेज़ी से कम होती जा रही है | जबकि जनजाति के लोगों के ऊपर जनसंख्या निति लागू नही होती | फिर भी विभाग अपने आंकड़े पूरे करने के उद्देश्य से जनजाति की औरतों को परिवार नियोजन के अंतर्गत ला रहा है | जिसका ज्वलंत उदाहरण झारखंड में परिवार नियोजन के कैंप में हुई जनजाति की महिलाओं की मृत्यु है | हरियाणा के जझर जिले में 1000 पर 774 तथा महेंद्रगढ़ में 1000 पर 778 लड़कियां रह गयी है अर्थात 1000 में से 225 कुंवारों की शादी के लिए लड़कियां उपलब्ध नही है | देश में 2000 लडकियां रोजाना मार दी जाती है जोकि देश के लिए शर्म का विषय है | भारत का प्रधानमंत्री भिक्षु की तरह लड़कियों की भीख मांग रहा है | कल्पना चावला की इस धरती पर लड़कियों को अपनी माँ का मुंह देखना नसीब नही हो रहा है | यह कैसी विडंबना है कि जिस बेटी की हम दुर्गा का रूप मान कर पूजा करते हैं उसी का गला घोंट कर हत्या कर रहे हैं | हिमाचल प्रदेश के लाहुल-स्पीति व भारत के केरल राज्य को सलाम है जहाँ पर लड़कियों का अनुपात लड़कों की निसबत ज्यादा है | भारत के अन्य राज्यों को भी इनका अनुसरण करना होगा |

2001 की जनगणना के दौरान भारतवर्ष में 1000 पुरुषों के पीछे 927 औरतें थी जोकि घट कर 2011 में 919 औरतें रह गयी | इसी प्रकार देश में महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है | देश में महिलाओं की साक्षरता दर 65.46% है जबकि पुरुषों की 82.14% है अर्थात पुरुषों के मुकाबले 17% महिलाएं अभी भी अनपढ़ है | यदि केवल ग्रामीण क्षेत्रों की ही स्थिति देखें तो 90% औरतें आज भी अनपढ़ता की श्रेणी में आती हैं |

हरियाणा में आज भी महिलाओ को खाप पंचायतों जैसे पुरुष प्रधान समाज का दंश झेलना पड़ रहा है | यदि गाहे-ग्वाहे आरती व पूजा जैसी कोई लड़की सिर उठा कर चलती है तो पूरे का पूरा पुरुष समाज उन्हें कुचलने के लिए एकजुट हो जाता है | हरियाणा व राजस्थान जैसे राज्यों में आज भी महिलाओं को मर्दों की वस्तु के रूप में माना जाता है | दोनों राज्यों में उन्हें घुंघट में मुंह छुपाये रखने पर मजबूर किया जाता है तथा घर का काम व बच्चे पैदा करने से पालने तक का काम औरतों के हवाले होता है फिर भी महिलाओं को परिवार के निर्णयों में शामिल होने का हक़ नही है और यदि कोई लड़की अपनी पसंद की शादी करना चाहती है तो पूरा समाज भेड़िये की तरह उसे खा जाने के लिए खड़ा हो जाता है | एक समय था जब हरियाणा में लड़कियों को दूध की हांडी में डाल कर मार दिया जाता था तथा राजस्थान में गला घोंट कर उसकी इहलीला मिटा दी जाती थी और आज भी आधुनिक तकनीकी का सहारा लेकर भ्रूण हत्या जैसे निंदनीय कृत्यों को अंजाम दिया जा रहा है | यही कारण है कि लड़कियों का अनुपात लड़कों के मुकाबले लगातार गिरता जा रहा है | हम माँ, नानी-दादी व बहु तो बनाना चाहते हैं परन्तु लड़की को जन्म देना नही चाहते | बहू कहाँ से आएगी जब लड़कियां शादी के लिए उपलब्ध नही होंगी |

अत: पूरे सभ्य समाज को यह सोचना होगा कि हम मानवता की इस कड़ी को किस ओर ले जा रहे हैं | क्या शक्ति के बिना शिव जिंदा रह पायेगा, यह एक बड़ा प्रश्न है

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