कविता

मुखर हुआ विश्वास

मौन अधर पर था कभी, नयनों में थी पीर।
अब स्वर बने बोलती, बदली खुद तक़दीर॥

बंधन जितने बाँधते, उतनी बढ़ती शान।
अंतर की ज्वाला बनी, साहस की पहचान॥
आँसू अब दुर्बल नहीं, बनते हैं शमशीर—
अब स्वर बने बोलती, बदली खुद तक़दीर॥

आँसू से इतिहास ने, लिखे अनेक बयान।
अब संघर्षों की कलम, रचती नव अभियान॥
हर बाधा को जीतकर, हुई स्वयं जागीर—
अब स्वर बने बोलती, बदली खुद तक़दीर॥

घर-आँगन की धूप भी, वह जीवन की छाँव।
उसके श्रम से महकता, हर मौसम, हर गाँव॥
ममता उसकी शक्ति है, साहस बना लकीर—
अब स्वर बने बोलती, बदली खुद तक़दीर॥

शिक्षा ने दी रोशनी, खोले नूतन द्वार।
ज्ञान बना अब साथ में, सपनों का आधार॥
चूल्हे से संसद तलक, गूँजा उसका नीर—
अब स्वर बने बोलती, बदली खुद तक़दीर॥

अन्यायों के सम्मुख वह, बन जाती तूफ़ान।
सत्य, साहस, स्वाभिमान, उसकी नई पहचान॥
अब ना रोकेगी उसे, कोई भी ज़ंजीर—
अब स्वर बने बोलती, बदली खुद तक़दीर॥

मौन नहीं अब नियति है, मुखर हुआ विश्वास।
स्त्री स्वर से गूँजता, नवयुग का आकाश॥
नर-नारी जब सँग चले, लेकर सम-अधिकार।
तब ही सच्चे अर्थ में, होगा जग साकार॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ