राजनीति

झारखंड उच्च न्यायालय में स्थानीय मेधा की उपेक्षा एवं कॉलेजियम की अनुशंसा पर गहराता न्यायिक गतिरोध

-अशोक “प्रवृद्ध”

झारखंड उच्च न्यायालय के न्यायपीठ में नियुक्ति हेतु सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा नई दिल्ली के एक बाह्य अधिवक्ता के नाम की अनुशंसा ने राज्य के विधि क्षेत्र में एक अभूतपूर्व वैधानिक एवं प्रशासनिक विप्लव को जन्म दे दिया है। झारखंड हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन ने इस निर्णय को स्थानीय योग्य, वरिष्ठ एवं कर्मठ अधिवक्ताओं की मेधा पर कुठाराघात मानते हुए आज 2 जुलाई को एक आपातकालीन महाबैठक आहूत की गई। इस बैठक में कार्य-बहिष्कार (हड़ताल) सहित अत्यंत आक्रामक आंदोलनकारी रणनीतियों पर निर्णायक सहमति बनने की सूचना है, जो कि पूर्व की बैठक में ही निर्णित हो चुके थे, बस उस पर ठप्पे लगाने के लिए यह एक औपचारिकता बैठक थी। यह विवाद केवल एक पद की नियुक्ति का नहीं, अपितु प्रादेशिक प्रतिनिधित्व और न्यायिक स्वायत्तता के अंतर्संबंधों का एक गंभीर संवैधानिक प्रश्न बनकर उभरा है। इस न्यायिक असंतोष के केंद्र में यह शाश्वत तर्क निहित है कि किसी भी राज्य के उच्च न्यायालय में न्यायाधीश पद पर नियुक्ति हेतु उसी राज्य की बार (न्यायालय परिसर) में निरंतर अभ्यास कर रहे अधिवक्ताओं को वरीयता प्राप्त होनी चाहिए। झारखंड के स्थानीय अधिवक्ताओं का तर्क है कि बाह्य राज्यों या सर्वोच्च न्यायालय (नई दिल्ली) से आने वाले अधिवक्ताओं के पास झारखंड की विशिष्ट जनसांख्यिकी, जनजातीय प्रथाओं, जैसे छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम और संताल परगना काश्तकारी अधिनियम तथा स्थानीय भू राजस्व नियमों का व्यावहारिक अनुभव अत्यंत न्यून होता है। राज्य के उच्च न्यायालय में दशकों से जटिल दीवानी, फौजदारी और संवैधानिक वादों का निस्तारण कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ताओं की मेधा को दरकिनार करना, स्थानीय विधिक प्रतिभाओं के मनोबल को ध्वस्त करने के सदृश है। स्थानीय बार के अधिवक्ता राज्य की विशिष्ट विधिक आवश्यकताओं और वादियों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को बेहतर ढंग से समझते हैं, जिससे न्याय वितरण प्रणाली त्वरित और संवेदनशील बनती है।
 
यह संकट पुनः भारतीय न्यायपालिका की बहुविवादित कॉलेजियम प्रणाली की अंतर्निहित विसंगतियों को उजागर करता है। कॉलेजियम द्वारा नियुक्तियों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया सदैव गोपनीयता के आवरण में लिपटी रहती है। उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति में राष्ट्रीय चरित्र की रक्षा आवश्यक है, किंतु यह स्थानीय बार को पूर्णतः हाशिए पर धकेलने की कीमत पर नहीं होना चाहिए। यदि किसी राज्य की सर्वोच्च विधिक संस्था में ही स्थानीय मेधा को अयोग्य मान लिया जाएगा, तो प्रादेशिक विधिक संस्कृति का विकास अवरुद्ध हो जाएगा। एडवोकेट्स एसोसिएशन द्वारा वर्क एब्सटेंशन (कार्य से विरत रहने) का निर्णय न्यायपालिका के सुचारू संचालन को पंगु बना सकता है। पहले से ही लाखों लंबित वादों के बोझ तले दबी न्याय व्यवस्था के लिए वकीलों की हड़ताल आम वादियों के कष्टों को बहुगुणित कर देगी।

संविधान का अनुच्छेद 217 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की पात्रता निर्धारित करता है, जिसमें कम से कम 10 वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में अभ्यास की योग्यता अनिवार्य है। तकनीकी रूप से देश का कोई भी अर्हताप्राप्त अधिवक्ता किसी भी उच्च न्यायालय में नियुक्त हो सकता है। परंतु, न्यायशास्त्र का यह भी सिद्धांत है कि न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि वह होता हुआ दिखना भी चाहिए। जब स्थानीय विधिक समुदाय में व्यापक स्तर पर यह भावना घर कर जाए कि उनके अधिकारों का अतिक्रमण हो रहा है, तो यह संपूर्ण विधिक तंत्र की साख को प्रभावित करता है। बार और बेंच (अधिवक्ता और न्यायाधीश) न्याय के रथ के दो पहिए हैं। यदि इन दोनों में पारस्परिक विश्वास और सम्मान का अभाव हो जाए, तो न्याय की निष्पक्षता और प्रभावशीलता संदिग्ध हो जाती है।
 
आज की आपात बैठक के निर्णय झारखंड की भावी न्यायिक दिशा को तय करेंगे। इस गतिरोध के समाधान हेतु कई बिंदुओं पर विचार अपरिहार्य हो जाता है। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा कॉलेजियम के वरिष्ठ सदस्यों को एडवोकेट्स एसोसिएशन के प्रतिनिधियों के साथ सौहार्दपूर्ण संवाद स्थापित करना चाहिए, ताकि स्थानीय अधिवक्ताओं की आशंकाओं का निवारण हो सके। कॉलेजियम को बाह्य अधिवक्ताओं की अनुशंसा करते समय उनके उन विशिष्ट अवदानों और योग्यताओं को स्पष्ट करना चाहिए, जो उन्हें स्थानीय वरिष्ठ अधिवक्ताओं की तुलना में अधिक उपयुक्त बनाती हैं। भविष्य के विधिक संकटों से बचने के लिए एक ऐसी अनौपचारिक या नीतिगत व्यवस्था का निर्माण आवश्यक है, जिसके अंतर्गत उच्च न्यायालयों में बार कोटे से होने वाली नियुक्तियों में एक निश्चित और बहुसंख्यक प्रतिशत केवल स्थानीय बार के वकीलों के लिए ही सुरक्षित रहे।  झारखंड हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन का यह तीव्र विरोध केवल एक पद की प्राप्ति का संघर्ष नहीं है, अपितु यह स्थानीय अस्मिता, विधिक संप्रभुता और प्रादेशिक मेधा के सम्मान की रक्षा हेतु एक वैधानिक उद्घोष है। न्यायपालिका की सर्वोच्चता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि कॉलेजियम व्यवस्था अपनी चयन प्रक्रिया में क्षेत्रीय आकांक्षाओं और स्थानीय विधिक प्रतिभाओं को यथोचित स्थान प्रदान करे, अन्यथा बार और बेंच के मध्य का यह वैचारिक विग्रह लोकतांत्रिक मूल्यों को ही क्षीण करेगा।
 

उल्लेखनीय है कि झारखंड उच्च न्यायालय एडवोकेट्स एसोसिएशन द्वारा कॉलेजियम की अनुशंसा के विरुद्ध लिया गया निर्णय भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक अत्यंत संवेदनशील मोड़ है। यह संघर्ष केवल एक वैधानिक प्रक्रिया का विरोध नहीं है, अपितु यह न्यायशास्त्र के उन मौलिक सिद्धांतों पर चोट करता है जिन पर हमारी संपूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था टिकी हुई है। इस अनुसंधानात्मक विश्लेषण के अंतिम चरण में, हम बार और बेंच के मध्य बढ़ते अविश्वास तथा इसके दूरगामी संवैधानिक परिणामों का तार्किक समापन प्रस्तुत कर रहे हैं। न्याय की अवधारणा में बार (अधिवक्ता) और बेंच (न्यायाधीश) को एक ही रथ के दो समानांतर चक्र माना गया है। इन दोनों के मध्य पारस्परिक समन्वय, विश्वास और सम्मान ही न्याय प्रणाली की रीढ़ है। जब स्थानीय बार को यह भान होने लगे कि उनके बीच से योग्य नेतृत्व को न्यायपीठ (बेंच) तक पहुंचने से जानबूझकर रोका जा रहा है, तो बेंच के प्रति बार का सहज सम्मान समाप्त होने लगता है। अधिवक्ताओं का आक्रोश अंततः न्यायालय कक्ष के भीतर उनके तर्कों और व्यवहार में परिलक्षित होता है। यदि न्यायाधीश और अधिवक्ता के बीच का संबंध सहयोगात्मक न रहकर प्रतिरोधात्मक हो जाए, तो वादों की निष्पक्ष सुनवाई असंभव हो जाती है। वकीलों द्वारा कार्य-बहिष्कार (हड़ताल) का सीधा अर्थ है न्याय के पहिए को रोक देना। इससे न्यायालयों की प्रशासनिक व्यवस्था पंगु हो जाती है और अंततः न्यायपालिका की छवि आम जनता की दृष्टि में धूमिल होती है।
 
भारतीय लोकतंत्र का आधारस्तंभ शक्ति पृथक्करण और चेक एंड बैलेंस की नीति है। किंतु न्यायपालिका के भीतर आंतरिक लोकतंत्र का अभाव अब एक गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। लोकतंत्र का मूल मंत्र है कि समाज के हर वर्ग और क्षेत्र को शासन तथा न्याय के शीर्ष पदों पर यथोचित प्रतिनिधित्व मिले। झारखंड जैसे जनजातीय बहुल और नवगठित राज्य की विधिक प्रतिभाओं को दरकिनार कर बाह्य व्यक्तियों को थोपना, प्रादेशिक लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है। इस गतिरोध का सबसे क्रूर प्रभाव उन निर्धन और शोषित वादियों पर पड़ता है जो न्याय की आस में सुदूर क्षेत्रों से रांची आते हैं। वकीलों की हड़ताल से उनकी तारीखें बढ़ती हैं, आर्थिक बोझ बढ़ता है और त्वरित न्याय का संवैधानिक अधिकार केवल एक कागजी नारा बनकर रह जाता है। यदि स्थानीय स्तर पर वरिष्ठ अधिवक्ताओं को यह लगने लगे कि उनकी प्रामाणिकता और दशकों की साधना का कोई मूल्य नहीं है, तो नई पीढ़ी के मेधावी छात्र विधिक क्षेत्र में आने से कतराएंगे या राज्य छोड़कर पलायन कर जाएंगे। यह झारखंड की विधिक संस्कृति को दीर्घकाल में बौद्धिक रूप से दरिद्र बना देगा।
 
झारखंड उच्च न्यायालय में उत्पन्न यह अभूतपूर्व संकट कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि यह कॉलेजियम प्रणाली की उस अपारदर्शी कार्यशैली का अपरिहार्य परिणाम है जो समय-समय पर देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में असंतोष की ज्वाला भड़काती रही है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता अत्यंत पूजनीय है, किंतु इस स्वतंत्रता का उपयोग प्रादेशिक आकांक्षाओं और स्थानीय मेधा के दमन के लिए नहीं किया जा सकता। न्यायशास्त्र का सर्वमान्य सिद्धांत है कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि वह होते हुए स्पष्ट रूप से दिखाई भी देना चाहिए। जब किसी राज्य की सर्वोच्च बार एसोसिएशन सर्वसम्मति से किसी नियुक्ति का विरोध करती है, तो कॉलेजियम को अपनी रूढ़िवादिता को छोड़कर आत्ममंथन करना चाहिए। झारखंड के अधिवक्ताओं का यह आंदोलन केवल एक पद विशेष की गरिमा के लिए नहीं, अपितु राज्य के आत्मसम्मान और स्थानीय विधिक स्वायत्तता की रक्षा के लिए एक वैधानिक धर्मयुद्ध है। इस गतिरोध का एकमात्र तार्किक और लोकतांत्रिक समाधान यही है कि राष्ट्रीय स्तर पर कॉलेजियम व्यवस्था में आमूलचूल सुधार किए जाएं, नियुक्तियों में क्षेत्रीय संतुलन को वैधानिक अधिमान्यता दी जाए और स्थानीय बार के वरिष्ठ एवं निष्कलंक अधिवक्ताओं को प्राथमिकता प्रदान की जाए। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो बार और बेंच का यह विग्रह भारतीय न्यायपालिका की विश्वसनीयता को समूल नष्ट कर देगा, जिसकी भरपाई भविष्य में असंभव होगी।