लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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संजय सक्सेना
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस द्वारा समाजवादी पार्टी के हाथों अपनी ‘सियासी तकदीर’ सौंपने के साथ ही यह तय हो गया है कि कांग्रेस हिन्दी बैलेट से लगभग साफ हो चुकी है,जो कांग्रेस चंद महीनों पहले तक 27 साल बाद यूपी में सरकार बनाने का सपना देख रही थी,वह सपा से हाथ मिलाने के बाद उत्तर प्रदेश विधान सभा की मात्र करीब 25 प्रतिशत सीटों पर ही चुनाव लड़ने जा रही है। यूपी में किसी भी दल को सरकार बनाने के लिये कम से कम 202 विधायकों की जरूरत पड़ती है,जबकि कांगे्रस मात्र 105 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है। इस हिसाब से बसपा सुप्रीमों मायावती का बयान सटीक बैठता है कि यहां कांगे्रस आक्सीजन के सहारे चल रही है। काफी कुछ कहता है। कांगे्रस ने सपा के साथ गठबंधन का जो फैसला लिया है,उससे मरणासन कांग्रेस में कितनी उर्जा पैदा होगी, इस बात का अंदाजा 11 मार्च को वोटिंग मशीन खुलने के बाद लगेगा,लेकिन जो दिख रहा है उस पर गौर किया जाये तो राष्ट्रीय पार्टी का तमगा प्राप्त कांगे्रस जिसका एक समय पूरे देश में राज था,वह अब क्षेत्रीय दल समाजवादी पार्टी की बी टीम बनकर चुनाव लड़ेगी। तमाम वह दल जो कभी कांगे्रस की छत्र छाया में सियासत करते थे, आज कांगे्रस उन्हीं के सामने नतमस्तक है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, असम आदि कई राज्यों में अपना जनाधार खोने के बाद उत्तर प्रदेश में भी कांगे्रस हासिये पर चली गई है। 403 विधान सभा सीटों में से कांगे्रस मात्र 105 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इसमें से कितनी जीत कर आयेगी,यह देखने वाली बात होगी। कांगे्रस जितनी भी सीटों पर चुनाव जीतेगी,उसका सारा श्रेय कांगे्रस के खाते में नहीं जायेगा। सपा भी उसमें अपनी दावेदारी जतायेगी। क्योंकि गठबंधन से पहले ही समाजवादी पार्टी ने कांग्रेसियों को यह जता दिया था कि कांग्रेस यूपी में अपने बल पर चुनाव लड़ने की हैसियत नहीं रखती है। शायद यह गठबंधन काफी पहले साकार हो जाता,लेकिन कांगे्रस द्वारा ‘हैसियत’ से अधिक दावेदारी ठोकने की वजह से गठबंधन में देरी तो हुई ही इसके साथ-साथ जनता के बीच कांग्रेस की किरकिरी भी हुई।
ऐन चूनाव से पूर्व सपा-कांगे्रस के बीच गठबंधन के पेंच तो सुलझ गये,लेकिन गठबंधन की कोशिशों के दरमयान यह भी साफ हो गया कि गठबंधन को लेकर कांगे्रस को काफी झुकना पड़ा। गठबंधन अखिलेश की शर्ताे पर ही हुआ। सपा ने पहले ही तय कर लिया था कि कांगे्रस को सौ के करीब ही सीटें दी जायेंगी और उतने पर ही कांगे्रस को संतोष भी करना पड़ा। असल में कांग्रेस की मजबूरी को सपा नेतृत्व भली भांति समझता है। कांग्रेस का यूपी में कोई वजूद नहीं है। उसके मात्र 28 विधायक हैं इसके अलावा 2012 के विधान सभा चुनाव में उसके सिर्फ 26 प्रत्याशी ही नंबर दो पर ठहर पाये थे,जबकि कांगे्रस गठबंधन में सीटें सवा सौ से ऊपर मांग रही थी। रायबरेली और अमेठी को लेकर कांगे्रसी इतने भावुक थे कि वह चाहते थें कि यहां से 2012 में जीती हुई सीटांे पर भी सपा चुनाव न लड़े।
दरअसल,कांगे्रस की मजबूरी है कि वह अकेले चुनाव जीत ही नहीं सकती है और अन्य कोई दल उसे तवज्जो दे नहीं रहा है। ऐसे में एक निजी समाचार चैनल के कार्यक्रम के दौरान अखिलेश ने जैसे ही कांगे्रस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का शिगूफा छोड़ा, कांगे्रस की बांछें खिल गईं। 27 साल से बेहाल कांग्रेसी, सपा के सहारे सत्ता का स्वाद चखने का सपना देखने लगे। बड़ी-बड़ी बातें करने वाले कांगे्रसियो को जरा भी इस बात की चिंता नहीं रही कि इससे उसके भविष्य की देशव्यापी राजनीति पर कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा। कार्यकर्ताओं के हौसले पस्त पड़ गये हैं।
कांग्रेसी कार्यकर्ताआंें और चुनाव लड़ने के लिये पांच साल से सियासी जमीन तैयार करने में जुटे नेताओं के लिये गठबंधन का फैसला किसी ‘भूकंप’ से कम नहीं रहा। चुनाव लड़ने की चाहत में कई कांग्रेसी लाखों रूपये खर्च कर चुके थे और गठबंधन के बाद उनकी दावेदारी वाली सीट सपा के लिये छोड़ दी गई। किसी तरह से गठबंधन हो गया है। परंतु इसमें अभी भी तमाम किन्तु-परंतु लगे हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि राहुल और अखिलेश कितनी जगह संयुक्त रैलियां करेंगे और जब राहुल-अखिलेश चुनाव प्रचार में एक साथ जायेंगे तो तो दोंनो में से कौन बड़ा नजर आयेगा। राहुल को शायद ही बर्दाश्त हो कि अखिलेश उनके सामने ‘लम्बी लाइन’ खींचे।
लब्बोलुआब यह है कि इस गठबंधन से फायदा तो दोंनो ही दलों को होगा,मगर कांगे्रस को यूपी में सपा की बी टीम बनकर ही रहना पड़ेगा। संभावना इस बात की भी है कि 2019 तक तो यह गठबंधन किसी तरह से खिंचता रहेगा,लेकिन लोकसभा चुनाव के समय अखिलेश और राहुल की महत्वाकांक्षा में टकराव पैदा हो सकता है। इतिहास में भी ऐसे कई संकेत मिलते हैं जिसके अनुसार इस तरह के गठबंधन हमेशा कलह से भरे रहे हैं। आज भले ही कांगे्रस और सपा करीब हों,लेकिन सोनिया गांधी यह नहीं भूल सकती हैं कि मुलायम की वजह से वह पीएम की कुर्सी पर नहीं बैठ सकीं थी तो मुलायम को भी हमेशा इस बात का मलाल रहा कि लालू के कहने पर सोनिया गांधी ने उनके पीएम बनने की राह में अवरोध पैदा किया था। यूपी के पुराने कांग्रेसी नेता जानते-मानते हैं कि आज जो उत्तर प्रदे्रश मं कांग्रेस की दुर्दशा है, उसका कारण सपा ही है। फिर भी कांग्रेस ने ये गठबंधन करके बड़ा रिस्क लिया है। उधर,चर्चा यह भी है कि यूपी विधान सभा चुनाव प्रियंका गांधी के राजनीतिक सफर का रुख भी तय कर सकते हैं। राहुल की लगातार नाकामयाबी और राजनीति में उनकी अरूचि के चलते अक्सर प्रियंका को आगे किये जाने की बात होती है। जिस तरह अहमद पटेल ने गठबंधन के मामले में प्रियंका का नाम लेकर ट्वीट किया उससे भी साफ जाहिर है कि प्रियंका विधिवत रूप से सक्रिय राजनीति में आ चुकी हैं। वैसे, एक बात पर और ध्यान दिया जाना जरूरी है। सपा-कांग्रेस के इस गठबंधन में साल 2004 के लोकसभा चुनावों की झलक भी देखने को मिल रही है। उस समय तत्कालीन एनडीए सरकार को हटाने के लिये सोनिया गांधी ने तमाम क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर खड़ा करने में कामयाबी हासिल की थी और अब उसी फार्मूले का राहुल आगे बढ़ा रहे हैं,लेकिन इस खेल के पीछे असली किरदार प्रियंका गांधी ही निभा रही है। प्रियंका की बदौलत ही ये गठबंधन पूरा हो सका। प्रियंका की कोशिश हैकि सपा-कांग्रेस के गठजोड़ को महागठबंधन के तौर पर पेश किया जाए और देश भर की गैर बीजेपी विरोधी पार्टियों को इस बहाने एक साथ ला कर 2019 की तैयारी की जा सके। इस गठबंधन में सोनिया-मुलायम वाली तल्खी नहीं, प्रियंका और डिंपल की जुगलबंदी है। अगर इस गठबंधन का हिस्सा राष्ट्रीय लोकदल भी बन जाता तो यह ‘सोने पर सुहागा’ हो सकता था। कुछ राजनैतिक पंडित तो यह भी कहते हैं कि 2019 लोकसभा की लड़ाई शुरू हो गई है। बीतते समय के साथ आने वाले दिनों में और भी राजनीतिक गठबंधन नजर आएंगे।

यूपी में गठबंधन का इतिहास

यूपी चुनाव में गठबंधन का इतिहास काफी पुराना है। कभी कांग्रेस -सपा जैसा गठबंधन सपा-बसपा के बीच भी हुआ था। 1993 में सपा-बसपा के गठबंधन में दोनों के बीच 6-6 महीने सीएम रहने का फार्मूला तय हुआ था। इसी फॉर्मूले के तहत पहले बसपा सुप्रीमों मायावती सीएम बनीं, लेकिन छहः महीने बाद जब मुलायम सिंह की बारी आई तो मायावती ने समर्थन वापस ले लिया।
1989 में जब मुलायम सिंह पहली बार यूपी के सीएम बने थे तब बीजेपी ने उन्हें समर्थन दिया था,लेकिन राम मंदिर आंदोलन में लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद बीजेपी ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस ले लिया था।
2001 में कांग्रेस ने बीएसपी के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन किया था,परंतु चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी को सरकार बनाने का समर्थन दे दिया था।

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