लेखक परिचय

निरंजन परिहार

निरंजन परिहार

लेखक राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं

Posted On by &filed under राजनीति.


निरंजन परिहार-

 

शंकरसिंह वाघेला धुरंधर किस्म के राजनेता हैं। वे असल में संघ परिवार के स्वयंसेवक रहे हैं, इसीलिए डाल का पंछी फिर डाल पर लौटने को बेताब है। कांग्रेस के पास उनको देने के लिए कुछ भी नहीं है और बीजेपी बांटने को बेताब है ही। ऐसे में वाघेला के लिए अपनी पुरानी मंजिल पर पहुंचने के रास्ते खुले हुए हैं। कभी भी कोई बड़ी खबर आ सकती है।

 

कांग्रेस चाहे लाख कोशिश कर ले तो भी, गुजरात में कांग्रेस का भला नहीं हो सकता। गुजरात में कांग्रेस की स्थिति को इसी से बहुत सहजता से समझा जा सकता है कि उसके तो वहां के सबसे बड़े नेता शंकरसिंह वाघेला भी बीजेपी से आये हुए संघ परिवार का स्वयंसेवक हैं। वाघेला विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं और उनकी कूटनीतिक रणनीति से भरी राजनीति कामयाब रही, तो गुजरात में कांग्रेस का बंटाधार तय है। हालत तो पहले से ही खराब थी। लेकिन कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शंकरसिंह वाघेला की नाराजगी कांग्रेस को बहुत भारी पड़ेगी। वे अपनी नाराजगी के माहौल को मजबूत कर रहे हैं और इसे रोष में तब्दील करके कभी भी अपने रास्ते पर निकल जाएंगे।

अपनी खबर है कि गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद शंकर सिंह वाघेला देश के किसी राजभवन में बैठकर राज्यपाल के रूप में सुख भोगेंगे और उनका बेटा गांधीनगर स्थित लहराते तिरंगा ध्वज वाले राज्य सचिवालय में बैठकर गुजरात सरकार के किसी प्रमुख मंत्रालय की कामन संभालेगा। एक भारी भरकम जनाधारवाले बूढ़े होते राजनेता के लिए राजनीति के अपने अंतिम दिनों में राज्यपाल होना वैसे भी बहुत सम्मान की बात होती है। निस्तेज होकर रसातल में जा रही कांग्रेस में उन्हें यह सम्मान मिलना लगभग असंभव सा है। सो, शंकरसिंह वाघेला अगर अपनी राजनीति के अंतिम दिनों में कांग्रेस को अंगूठा दिखा दे, तो किसी को कोई बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके दिल के बहुत करीब के दोस्त हैं और अमित शाह से उनके निजी स्नेह के किस्से देश भले ही जाने न जाने, गुजरात तो जानता ही है।

अपनी खबर पक्की है कि वाघेला विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को झटका देकर फिर अपनी पैतृक पार्टी बीजेपी में आ सकते हैं। वाघेला के बारे में यह बात कोई और तो नहीं कह रहा है। लेकिन खुद वे ही उनके अपने लोगों के बीच इस बात पर चर्चा कर रहे हैं और इन चर्चाओं को बहुत ज्यादा आधार खुद वाघेला की ताजा कोशिशों से भी मिल रहा है। गुजरात में वाघेला को सम्मान से बापू कहा जाता है और किसी भी अन्य कांग्रेस नेता के मुकाबले गुजरात के लोग उनका तहेदिल से सम्मान करते है।

वाघेला की राजनीति का इतिहास रहा है कि वे अपने हर राजनीतिक कदम को बहुत नाप तोलकर रखते रहे हैं। सो, वापू के समर्थकों की तरफ से भले ही यह कहलवाया जा रहा हो कि कांग्रेस की ओर से वाघेला को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बनाया जाए। लेकिन वाघेला खुद भी जानते हैं कि कांग्रेस ऐसा नहीं करेगी। फिर हाल ही में गुजरात कांग्रेस के प्रभारी महासचिव अशोक गहलोत ने भी मुख्यमंत्री के उम्मीदवार का नाम घोषित करने से साफ इनकार भी कर ही दिया है। मतलब साफ है कि कांग्रेस से किनारा करने की पहली सीढ़ी को वाघेला ने पार कर लिया है।

यह ब्रह्मसत्य है कि राजनीतिक जरूरतों और रणनीतिक साजिशों के तहत वाघेला को कांग्रेस में भले ही बड़े नेता का सम्मान मिलता रहा, लेकिन गुजरात में वाघेला को कांग्रेस ने कभी दिल से स्वीकार नहीं किया। कांग्रेस को गच्चा देने की इस खबर को आधार भी खुद वाघेला की तरफ से ही मिल रहा है। उनकी ताजा राजनीतिक कार्रवाईयों पर नजर डालें, तो उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल सहित गुजरात के दिग्गज नेता अहमद पटेल और गुजरात प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी को अपने ट्वीटर हैंडल पर से हटा दिया है। इनके साथ ही करीब30 और लोगों को भी ट्विटर पर अनफॉलो किया है। वाघेला सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहे हैं। एक लंबे समय से वे बहुत सक्रियता के साथ मीडिया के जरिए सार्वजनिक की जानेवाली बातें भी अकसर अपने अधिकृत ट्विटर हैंडल @ShankersinhBapu के जरिए ही सार्वजनिक करते रहे हैं। लेकिन ट्वीटर के जरिए दिखाए जा रहे इस ताजा तकनीकी तेवर को वाघेला की तरफ से बड़े और स्पष्ट राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए। राहुल गांधी के नेतृत्व में अस्ताचल की ओर लगातार बढ़ती ही जा रही कांग्रेस में देखनेवाले बहुत कम बचे हैं, सो कांग्रेस पता नहीं देख भी पा रही है या नहीं, लेकिन गुजरात में तो हर किसी को दिख रहा है कि बापू क्या खेल करनेवाले हैं।

वैसे, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के साथ 31 मार्च को हुई बापू की मुलाकात के बाद यह लगभग तय सा हो गया था कि गुजरात में कांग्रेस के दिन और खराब आनेवाले हैं। यही कारण है कि वाघेला बापू को अब अचानक, सालों पहले संघ परिवार के उन्हीं नरेंद्र मोदी के साथ एक ही चटाई पर सोने के दिन याद आ रहे हैं। बीजेपी की स्थापना से लेकर अब तक उनको मिले सम्मान के मुकाबले कांग्रेसियों द्वारा किए गए उनके अपमान के अवसर भी उन्हें याद आ रहे हैं। वैसे भी सब कुछ तय मानदंडों के हिसाब से चलनेवाली राजनीति में अनायास कुछ भी नहीं होता। जो कुछ होता है, सब कुछ सायास होता है। सो, सोनिया और राहुल को वाघेला ने ट्वीटर पर कोई यूं ही अनफॉलो नहीं किया है। सालों पहले से संघ परिवार के समर्पित स्वयंसेवक रहे वाघेला वैसे भी एक जमाने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुत नजदीकी व्यक्ति रहे हैं। सो, रास्ता तैयार है और मंजिल भी। मंजिल पर स्वागत करनेवाले भी तैयार हैं और मंजिल से आगे का ताना बाना भी। इसलिए, कांग्रेस को गुजरात से कभी भी किसी बहुत बड़ी बुरी खबर के लिए तैयार रहना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *