लेखक परिचय

डॉ. सी. पी. राय

डॉ. सी. पी. राय

एम् ए [राजनीति शास्त्र], एल एल बी ,पी जी डिप [समूह संचार]। एम एड, पी एच डी [शिक्षा शास्त्र] पी एच डी [राजनीति शास्त्र]। संसदीय पुस्तक पुरस्कार से सम्मानित। पूर्व राज्य मंत्री उत्तर प्रदेश। अध्यापक ,गाँधी अध्ययन। डॉ बी आर आंबेडकर विश्व विधालय आगरा। १- "संसद और विपक्ष " नामक मेरी प्रकाशित शोध पुस्तक को संसदीय पुस्तक पुरस्कार मिल चुका है। २-यादो के आईने में डॉ. लोहिया भी एक प्रयास था। ३-अनुसन्धान परिचय में मेरा बहुत थोडा योगदान है। ४-कविताओ कि पहली पुस्तक प्रकाशित हो रही है। ५-छात्र जीवन से ही लगातार तमाम पत्र और पत्रिकाओ में लगातार लेख और कवितायेँ प्रकाशित होती रही है। कविता के मंचो पर भी एक समय तक दखल था, जो व्यस्तता के कारण फ़िलहाल छूटा है। मेरी बात - कविताएं लिखना और सुनना तथा सुनाना और तात्कालिक विषयों पर कलम चलाना, सामाजिक विसंगतियों पर कलम और कर्म से जूझते रहना ही मेरा काम है। किसी को पत्थर कि तरह लगे या फूल कि तरह पर मै तों कलम को हथियार बना कर लड़ता ही रहूँगा और जो देश और समाज के हित में लगेगा वो सब करता रहूँगा। किसी को खुश करना ?नही मुझे नही लगता है कि यह जरूरी है कि सब आप से खुश ही रहे। हां मै गन्दगी साफ करने निकला हूँ तों मुझे अपने हाथ तों गंदे करने ही होंगे और हाथ क्या कभी कभी सफाई के दौरान गन्दगी चेहरे पर भी आ जाती है और सर पर भी। पर इससे क्या डरना। रास्ता कंटकपूर्ण है लेकिन चलना तों पड़ेगा और मै चल रहा हूँ धीरे धीरे। लोग जुड़ते जायेंगे, काफिला बनता जायेगा और एक दिन जीत सफाई चाहने वालो कि ही होगी।

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 डॉ. सी. पी. राय

ना संसद ना संविधान से, अब देश चलेगा अन्ना के विधान से और देश में केवल नकारात्मक बात करने वाले और भोजपुरी में कहे तो गलचौरी करने वाले इस विधान के लागू होने से पहले तक ताली बजायेंगे, लेख लिखेंगे, फेसबुक सहित सभी ऐसे स्थानों पर नयी आजादी की कहानियां लिखेंगे| ऐसा लगेगा कि महात्मा गाँधी, सुभाष चन्द्र बोस, तिलक, भगत सिंह, आजाद सभी ये लोग ही है| सीमाओं पर कुर्बानियां इन्होंने या इनके परिवारों ने ही दिया है और अब जीत का जश्न मना रहे है| इनकी बातों से ऐसा भी लगता है कि भारत के लिए कुर्बानियां देने वाले आजादी कि लड़ाई लड़ने वाले निहायत नासमझ थे| ऐसा भी लगता है कि संविधान सभा में जो लोग बैठे थे वे देशद्रोही, बिना पढ़े लिखे, और गैर जिम्मेदार लोग थे| बाबा साहब आंबेडकर से लेकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद हो या एच एन कुंजरू तक सभी को इस सूरमाओं से राय लिए बिना संविधान की रचना नहीं करना चाहिए था|

इस वक्त देश में जिस तरह कि बहसें चलाई जा रही है उससे दो बातें प्रचारित करने की पूरी कोशिश कुछ लोगो द्वारा की जा रही है १. – ६३ सालों में इस देश में कुछ हुआ ही नहीं, देश बर्बाद हो गया और बहुत पिछड़ गया| २. – भारत में केवल भ्रष्‍टाचार होता है, काला धन का कारोबार होता है और कुछ होता ही नहीं है| ये लोग ये बताना चाहते है कि भारत ना तो विज्ञान में आगे बढ़ा, ना शिक्षा में, ना चिकित्‍सा में, ना शक्ति में और किसी भी क्षेत्र में नहीं| इन्हें भारतीयों के मिलने वाले नोबल पुरस्‍कारों से नफरत है, इन्हें भारत की एकता से नफरत है, इन्हें ६५ ,७१, कारगिल की जीत से नफरत है, इन्हें असमान में छोड़े जा रहे केवल अपने नहीं दुनिया के दूसरे देशों के भी उपग्रहों की सफलता से नफ़रत है| इन्हें दुनिया के चंद प्रगतिशील देशों में भारत के शामिल हो जाने से नफरत है| इन्हें दुनिया की पहली या दूसरी ताकत बनते हुए भारत से नफरत है| तभी तो आत्मविश्वास से लबरेज होते भारत में विश्वास का बड़ा संकट खड़ा करने का प्रयास बड़े सोचे समझे तरीके से किया जा रहा है| किसी देश के जीवन में ६० साल ६० सेकण्ड के बराबर होता है और दुनिया के तथाकथित बड़े और विकसित देशों के मुकाबले हमारे महान भारत ने ज्यादा तेजी से तरक्की भी किया, अपनी कमियों पर विजय भी पाया और जहां जो कमजोरियां दिखी उनको दूर भी किया| जहां दूसरे एक बोली, एक भाषा, एक धर्म वाले देशों को भी एक साथ रखने में कामयाबी नहीं मिल पा रही है और गृहयुद्ध तथा आतंकवाद और विभिन्न समस्याओं के शिकार है और फ़ौज तथा तानाशाही से भी काबू में नहीं कर पा रहे है वहीं तमाम भाषाओं, बोलियों, संस्कृतियों, जातियों और धर्मों वाले इस देश की मजबूत एकता और दुनिया का सिद्ध हो चुका सबसे मजबूत लोकतंत्र कुछ लोगों को चुभ रहा है| कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी भी पता नहीं कैसे बिना इतिहास और वर्तमान की समीक्षा किये इस अभियान में शामिल हो जाते है तो जो अभी तक नासमझ है या देश और नागरिकता का अर्थ ही नहीं समझना चाहते है उनको क्या कहा जाये? जनसंख्या १२० करोड़ से ज्यादा है पर नागरिक कितने है? यह बहस का विषय है| जब जो धर्म अपने उपदेशो के द्वारा समाज को सही दिशा और त्याग की शिक्षा देता था वही अनाप शनाप धन दौलत और तमाम बुराइयों का शिकार दिखलाई पड़ रहा है तो उस चर्च और राजा के सौ साल से ज्यादा चले युद्ध कि याद आ ही जाती है| किसी ने लिखा था कि; बादशाहों से फकीरों का बड़ा था मर्तबा ,जब तक सियासत से उनका कोई मतलब ना था।

देश के चिंतनशील और जिम्मेदार लोग समझ ही नहीं पा रहे है कि ज्यों ही अमरीका के राष्ट्रपति ओबामा भारत आये और संसद को संबोधित कर भारत को महान स्वीकार किया तथा हर भारतीय सीना चौड़ा कर चलने लगा, दुनिया के लोग भारत में आकर पैसा लगाने को तैयार होने लगे ,देश के विरुद्ध सोचने वाले और षड्यंत्र करने वाले ठिठक कर खड़े हो गए, अचानक ऐसा क्या हुआ कि उस स्थित को भारत के लिए प्रयोग होने से पहले ही भारत को बुरा राष्‍ट्र घोषित करने की मुहीम देश के अंदर से ही शुरू हो गयी| इतिहास इसकी समीक्षा करेगा जरूर और वे ताकतें बेनकाब भी होगी| आजादी की लड़ाई में भी तो इस देश की बहुत सी ताकतें या तो फिरंगियों के साथ सीधे-सीधे खड़ी थी या स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ मुखबिरी कर रही थी| कुछ वैसी ही ताकतें आज भी देश के खिलाफ खड़ी है| इनकी संख्या हजारों या लाखों में होती है और ये १२० करोड़ से ज्यादा के देश को आदेशित करना और तानाशाही पूर्ण तरीके संचालित करना चाहते है|

इस बात से किसे एतराज है कि देश से बुराइयाँ मिटनी चाहिए, भ्रष्‍टाचार ख़त्म होना चाहिए, काला धन का कारोबार बंद होना चाहिए इत्यादि| बहुत सी बातें है जिनपर देश में चिंता भी है और चिन्तन भी| यदि चिंतन नहीं होता तो सूचना का अधिकार बना ही नहीं होता| जो भी हजारों करोड़ कला धन वापस आया है वो आया ही नहीं होता| सत्ता में भागीदार लोग जेल में गए ही नहीं होते और जेल जाने वाले यदि कोई �¤ �र भी उनके कामों में शामिल है तो अब तक मुंह खोल चुके होते| कम से कम पूर्व की सरकारों की तरह ये सरकार जिन पर भ्रष्‍टाचार प्रमाणित हो जा रहा है उन्हें बचा नहीं रही है बल्कि कानून को मजबूती से काम करने को प्रोत्साहित कर रही है| किसी का पैसा खो जाता है या चोरी हो जाता है तो हमारी अपनी व्यवस्था हमें तुरंत नहीं दिलवा पाती है बल्कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने पर वो काफी दिन में मिल पाता है| यहाँ à ��ो काला धन उन देशो में है जिनकी अर्थव्यवस्था ही उसी पर निर्भर है| अंतर्राष्‍ट्रीय कानूनों के अंतर्गत प्रावधानों से ही वह वापस आयेगा और उसमे लगने वाला समय लगेगा या फिर इतनी हिम्मत हो कि हमारी सेनाएं उन देशों पर हमला कर धन वापस ले आये| अगर मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी इमानदार नहीं है तो किसी के इमानदार होने की कल्पना ही नहीं की जा सकती है|

देश को भ्रमित करने वालो का कहना है की ८०% लोग चोर है इन्हें छोड़ कर, चुनाव में जनता पैसे और शराब लेकर वोट देती है इन्हें छोड़ कर ,सारे लोग काला धन रखते है इन्हें छोड़ कर, संसद और विधान सभाओ में अयोग्य लोग है और कोई भी कानून बनाना नहीं जनता है इन्हें छोड़ कर| देश में कोई भी देश के बारे ने नहीं सोचता और न देशभक्त है इन्हें छोड़ कर| ये देश चलने का जो तरीका चाहते है उसमे देश की राजधानी हो या प्रदेश की, जिला मुख्यालय हो या कोई और इनका कहना है की जहा भी कुछ लोग इकट्ठे हो जाये और ये ऐलान कर दे की वही देश के मालिक या प्रतिनिधि है तो उस वक्त वे जो भी आदेश देते जाये वही संविधान और कानून मान लिया जाये तथा उनके आदेशो का पालन तुरंत हो वर्ना वे जो चाहेंगे करेंगे|इस अन्ना विधान में फ़ौज के दफ्तर में इकट्ठे लोग फ़ौज की नीति और युद्ध की योजना तैयार करेंगे ,जो साईकिल नहीं चलाना जानते वे एयर फ़ोर्स को कौन सा जहाज खरीदना चाहिए या कौन सी मिसाइल लेनी चाहिए ये बताएँगे| जिन्होंने तालाब नहीं देखा वे नेवी की नीति तैयार करंगे| १० डकैत या चोर मिल कर पुलिस को कानून बताएँगे| जब भी कुछ लोग किसी अदालत में इकट्ठे हो जायेंगे वो निचली अदालत हो या सर्वोच्च न्यायलय उनसे पूछ कर ही फैसले होंगे| जब भी कोई भीड़ अखबार के या टी वी के दफ्तर को घेर लेगी वह तय करेगी की अख़बार में‚ क्या छपे या टी वी में क्या दिखाया जाये| इसी तरह भीड़ या यूँ कहे कि कुछ लोगों की भीड़ देश की नयी व्यवस्था चलाएगी| यदि लाखों लोगों की क़ुरबानी से आजाद हुए और बड़ी कुरबानियों से कायम रहते हुए तरक्की करते देश को ऐसे ही चलना है तो इन मुट्ठी भर लोगों तथा इन के चंद समर्थकों को ये व्यवस्था मुबारक| पर ऐसा लगता नहीं है कि महान हिंदुस्तान इतना कमजोर हो गया है कि कुछ लोगों की साजिश कामयाब हो पायेगी, वह उसी गति को प्राप्त होंगे जिसको आजादी की लड़ाई में गद्दारी कर प्राप्त हुए थे| ये देश १२० करोड़ कि इच्छा और उनके द्वारा बनाये संविधान से चलेगा न कि किसी और विधान से|

4 Responses to “संविधान या अन्‍ना का विधान”

  1. Ram narayan suthar

    “अगर मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी इमानदार नहीं है तो किसी के इमानदार होने की कल्पना ही नहीं की जा सकती है”|
    वाह अच्छा मजाक कर लेते हो जो आंतकियो को दामाद बनाकर रखते है भरष्ट लोगो के साथ खड़े है लोकतंत्र में तानासाह की तरह राज करते है देश की संस्क्रती संस्कार के नामो निशान मिटाने के लिए संकल्प बद्ध है उनसे इमानदार भला कोन हो सकता है वाह आपकी स्वामिभक्ति सराहनीय है लिखते रहिये क्योंकि राजा को विद्रोह के द्वारा नहीं बल्कि चारण गान के द्वारा ही प्रसन्न किया जा सकता है
    ” ये देश १२० करोड़ कि इच्छा और उनके द्वारा बनाये संविधान से चलेगा न कि किसी और विधान से|”
    क्या पुरे १२० करोड़ लोग वोट देते है नहीं ये विधान १२० करोड़ लोगो के इच्छा से नहीं चलता बल्कि कुछ सताधारी चापलूसों की इच्छा से चलता है जो देश के लिए नहीं बल्कि अपने लिए जीते है

    “जहां दूसरे एक बोली, एक भाषा, एक धर्म वाले देशों को भी एक साथ रखने में कामयाबी नहीं मिल पा रही है और गृहयुद्ध तथा आतंकवाद और विभिन्न समस्याओं के शिकार है और फ़ौज तथा तानाशाही से भी काबू में नहीं कर पा रहे है वहीं तमाम भाषाओं, बोलियों, संस्कृतियों, जातियों और धर्मों वाले इस देश की मजबूत एकता और दुनिया का सिद्ध हो चुका सबसे मजबूत लोकतंत्र कुछ लोगों को चुभ रहा है| ”
    क्या ये एकता स्वतंत्रता के बाद बने कानून के कारन है तो ये आपकी इस जीवन की सबसे बड़ी भूल होगी इस एकता के पीछे यहाँ की संस्क्रती है जिसे आज की सरकार नष्ट भ्रष्ट करने पर तुली हुई है
    जरा गौर कीजियेगा जितनी एकता पहले थी उतनी एकता अभी नहीं है
    क्या कानून के आधार कोई संस्क्रती स्थापित हो सकती है

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  2. vimlesh

    बधाई हो डॉ सी पि रॉय साहब

    क्या लेख लिखा है मासा अल्ला लाजवाब
    इस प्रकार के १-२ लेख लिखोगे तो यकीन मनो सदी के सबसे बड़े साहित्यकार, पत्रकार समाज सुधारक इनमे से कई पुरुस्कार आपको फ्री में मिल जायेगे ज्यादा हाथ पाव मरने की जरूरत नही पड़ेगी

    लोकसभा का टिकट बोनस में मिलेगा .

    मै भी मानता हूँ देश में कोई भ्रस्ताचार है ही नहीं जो है वह शिस्ताचार है .
    अब क्या बोलू इन कलम घिसुओ को जो आप सरीखे तेज तर्रार महान नेता को लानत मलानत भेज रहे है .

    देश ने बहुत विकास किया ओबामा बोले भारत महान .
    बन गये चूतिया आप जैसे सरे नेता
    दे दिया १०सियो हजार नौकरिया दान में .आखिर कहावत गलत कैसे होसकती है

    घर के लरिका भूखे मरे
    बहार बाटो पंजीरी .
    अरे बे ….. रॉय मोती अक्कल के इन्सान

    इस देश के विकास में इन कमीने नेताओ और सरकारों का क्या योगदान है .= 00

    आज देश की जो स्थित है उसे वहा तक पहुचने वाले सब सच्चे भारतीय है जो ३६५ दिन १२-१४ घंटे कड़ी मेहनत करते है
    जबकि विदेशो में नेताओ के आदर्श ओबामा के यह भी सप्ताह में केवल ६ दिन कम होता है वो भी ६ घंटे प्रतिदिन
    साबित हो गया की ये डिगरिया कैसे प्राप्त की ये पुरष्कार कैसे मिले आपको बताने की जरूरत ही नहीं आप जैसे २-४ और हो जाये तो फिर और अच्छे से होगा भारत निर्माण

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  3. आर. सिंह

    आर.सिंह

    मुझे तो डा.सी.पी.राय , मुझे तो इस आलेख को पढ़ कर जोरों से ताली बजाने का मन कर रहा है ,पर अफ़सोस यहाँ कोई देखने वाला भी नहीं है.बीबी भी उधर कहीं अपने पोते की सेवा में लगी हुई है.डा.राय,आपको तो पहले ही डाक्टरेट मिल चुका है नहीं तो इस लेख पर तो मिल ही जाता.ऐसे भी यह लेख लगता है पोस्ट डाक्टोरल शोध का परिणाम है.डाक्टर साहब आपकिस दूनियाँ में हैं.आपके महान विभूतियों द्वारा बनाये संविधान में १०० से ज्यादा संशोधन होचुके हैं.मैं नहीं कहता की सब संशोधन जायज हीं हैं,पर इससे एक बात तो साफ़ हो जाती है की बदलते समय के साथ संविधान में संशोधन की आवश्यकता पड़ी..दूसरी बात जिस पर आपका ध्यान क्यों नहीं गया ,वह यह है की भारतीय संविधान की संरचना जिस माहौल में हुई थी वह माहौल बदल चुका है.वह राष्ट्रीय भावना या वे लोग जो उस समय इस कार्य को कर रहे थे,उनका इस दुनिया से विदाई हो चुका है.आपने शायद ध्यान नहीं दिया की यह नैतिक पतन यकायक नहीं हुआ है.यह तो समय के साथ क्रमश: होता गया है.आज जब बातें करते हैं १९७१ या कारगिल के यद्ध की तो आप भूल जातें की १९७१ के विजय के बाद हीं भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई छिड़ गयी थी.जेपी आखिर क्यों कूड़े थे इस लड़ाई में ,जब उनका कद किसी भी मामले में उससे छोटा नहीं था जिन्होंने भारतीय संविधान की संरचना की थी.डाक्टर राय, ,जेपी ने भी सोचा था की सत्ता परिवर्तन से संविधान के अनुरूप चलने वाले लोग भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त कर देंगे,पर ऐसा हुआ नहीं.आपको शायद लगता है की भारत बहुत उन्नति कर रहा है,पर ऐसा नहीं है.आंकड़े चाहे कुछ भी कहें पर हामारी दिनों दिन अवनति हो रही है.जब गरीबों की संख्या बढती जा रही है और लोग महंगाई और दिनोदिन बढ़ते हुए भ्रष्टाचार के बोझ तले कराह रहे है तो कैसी तरक्की और कैसा उत्थान ?.यह पतन किसी ओबामा को नहीं दिखेगा,इसे अगर देखना है तो उन आखों में झांकिए जो वेवश हो गये हैं.और कुछ भी न कर पाने की विवशता में आंसू भी नही बहा पा रहें .किसी अन्ना हजारे या बावा रामदेव का मंच पर आगमन और उनको तत्काल सहयोग अकारण नहीं होता.मुझे पता नहीं आप इस भ्रष्ट तन्त्र के पूर्जे हैं की नहीं ,पर आज अगर किसी को भारत के दिनोदिन बढ़ते हुए भ्रष्टाचारी कदम दृष्टिगोचर नहीं हो रहें हैं तो मुझे मजबूरन सोचना पड़ता है की कहीं वह भी तो उसी का हिस्सा नहीं है.मैंने फेश बुक पर इसके बारे में अंग्रेजी और हिंदी में इतना कुछ लिखा है की अब सबकुछ केवल पुनरावृति लगता है. आप के पास वह सब पढने का समय तो नहीं ही होगा ,पर अगर आप समय निकाल सकें तो मेरा एक लेख नाली के कीड़े (प्रवक्ता १मई ) पढने की कोशिश अवश्य कीजिएगा.
    एक बात और. किसी भी परिवर्तन का आधार छोटा ही होता है.वह तो बाद में लोग जुड़ते जाते है और कारवाँ बनता जाता है.

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