कोरोना महामारी और भारत

आज कोरोना के कहर से सम्पूर्ण विश्व त्राहि त्राहि कर रहा है| यह एक अभूतपूर्व संकट है क्योंकि इससे पहले किसी भी महामारी ने एक साथ दुनिया के इतने बड़े भूभाग को त्रस्त नहीं किया है जितना कोरोना ने| भारत भी इससे अछूता नहीं है| अब तक विश्व के लगभग 194 देश कोरोना वायरस की चपेट में आ चके है, करीब 47 लाख इससे संक्रमित हो चुके हैं और 3 लाख से अधिक काल का ग्रास बन चुके हैं| चार माह से अधिक चुके हैं परन्तु अभी तक यह पता नही है कि यह संकट कब समाप्त होगा और अभी कितने और लोगों की जान लेगा| अभी तक न तो इसका कोई सटीक उपचार है और न ही इससे बचने का टीका या वैक्सीन | विश्व के सर्वाधिक विकसित, समृद्ध और महाशक्ति संपन्न राष्ट्र भी आज इस संकट के सामने घुटने टेके दिखाई दे रहे हैं| एक बात तो स्पष्ट है कि उच्च जी.डी.पी. और आयुधों के अकूत भण्डार की शक्ति से कोई राष्ट्र बड़ा नहीं हो सकता| कोरोना की मार सब पर पड़ी है और आज के विकसित राष्ट्र कोरोना के प्रकोप को रोकने में नाकाम रहें हैं| विज्ञान और तकनीक की सयुक्त शक्ति भी एक सूक्ष्म वायरस के प्रकोप को रोकने में असमर्थ है |    

कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने का एक ही उपाय है- “शारीरिक दूरी” और इसीलिए सम्पूर्ण भारत में लाकडाउन लागू किया गया है| शहरों में समस्त व्यापारिक संस्थान और फैक्ट्रियां बन्द हैं और बड़ी संख्या में मजदूर बेरोजगार हो गए हैं | इनको न दिहाड़ी मिल रही है न वेतन | इनके पास अब ना खाने को है ना मकान का किराया देने को पैसे | अतः ये लाखों मजदूर अपने अपने गाँवों को लौट रहे हैं और लाकडाउन समाप्त होने के बाद भी काफी दिनों तक ये वापिस नहीं लौटेंगे | इस रिवर्स माइग्रेशन से अनेक समस्याएँ उत्पन्न होगी | पहली समस्या तो उन उद्योगों में आएगी जिनमें ये मजदूर कार्यरत थे क्योकि जब इन उद्योगों को पुनः चालू किया जायेगा तो उनको कामगार नहीं मिलेंगे | उधर अपने-अपने गावों में जब भारी संख्या में युवा मजदूर पहुंचेंगे तो वहाँ रोजगार की समस्या खड़ी होगी | यदि ग्रामीण संसाधनों का उचित प्रबंधन किया जाए तो ये युवा स्वावलंबी बन सकेंगे और कुछ तो उद्योगी बन कर अन्य को भी रोजगार दे सकेंगे | कोरोना ने देश को यह चनौती दी है तो महात्मा गाँधी के ग्रामीण स्वराज की कल्पना को साकार करने का एक अवसर भी दिया है | हमे विकास की अवधारणा को शहर के बजाय ग्राम केंदित और पूँजी बहुल के बजाय श्रमिक बहुल बनाना होगा | 

भारत में 1990 के दशक में जब आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण की शुरुआत हुई थी तभी से सरकारी संस्थानों और लोक उपक्रमों का पतन शुरू हो गया था | इस पतन का असर सबसे पहले सरकारी स्कूलों और सरकारी अस्पतालों में दिखाई दिया | लोक संस्थानों में व्याप्त भ्रष्टाचार और भाई भतीजा वाद के कारण जनता में इनकी छवि गिरती गई और ये जनता की आखरी पसंद बन गए| सरकारें भी इनके प्रति उदासीन होती गई और शिक्षा और स्वास्थ्य के निजी संस्थान सरकारी रियायतों से पनपते गए | “न्यूनतम सरकार – अधिकतम शासन” के सिद्धांत पर सरकारें आगे बढती गई | इस सिद्धांत में सरकार के कार्य कानून-व्यवस्था, न्याय, देश की सुरक्षा और विदेश नीति आदि कुछ विषयों तक सीमित हो जाते है और लोक उपक्रम धीरे-धीरे देसी और विदेशी निजी हाथों में चले जाते हैं जिनका उद्देश्य केवल लाभ अर्जित करना होता है | आज देश में 2.4 लाख करोड़ रूपये का निजी स्वास्थ सेवा क्षेत्र है, अस्पतालों के पलंगों में चार में से तीन और वेंटीलेटरों में दस में आठ निजी क्षेत्र में है, परन्तु निजी अस्पतालों में मात्र 10% से भी कम कोरोना संक्रमित मरीजों का इलाज हो रहा है | कोरोना संकट में निजी स्वास्थ्य सेवाओं की भूमिका नगण्य रही है| संकट से लड़ने में केवल सरकारी तन्त्र ही काम आ रहा है | इस त्रासदी में अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी और इटली आदि देशों में जनता की दुर्दशा का मुख्य कारण यही है कि वहाँ सरकारी तन्त्र न्यूनतम है और अधिकांश स्वास्थ्य सेवाएँ निजी क्षेत्र में हैं | कोरोना त्रासदी यह तय करने का अवसर है कि “न्यूनतम सरकार – अधिकतम शासन” में  न्यूनतम सरकार की लक्ष्मण रेखा क्या हो? हाँ, यह तो अब निश्चित ही है कि इस संकट से उबरने के पश्चात हमारे देश की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में अभूतपूर्व सुधार दिखाई देगा और चिकित्सीय उपकरणों व्  दवाइयों में भारत आत्म निर्भर बन जाएगा |

आज डिजिटल तकनीक का युग है | कोरोना संकट के कारण सेवा क्षेत्र के अनेक उपक्रम जैसे सूचना- प्रौद्योगिकी कम्पनियां, बड़े-बड़े मीडिया संस्थान और कंसल्टेंसी फर्में “वर्क फ्रॉम होम” की कार्य पद्धति अपना रही हैं | विडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से वेबिनर (सेमीनार) और मीटिंगें आयोजित हो रही है | आपसी लेन-देन में डिजिटल पेमेंट का चलन बढा है | इनसे ईंधन, समय, श्रम आदि संसाधनों की बचत होने के कारण डिजिटल तकनीक का प्रचलन और अधिक बढ़ेगा | शिक्षा संस्थानो में ई-लर्निग और ई-क्लासेज का सहारा लिया जा रहा है | भारत में अभी केवल शुरुआत है लेकिन यदि डिजिटल लर्निग को ठीक तरह से अपनाया गया तो भविष्य में शिक्षा की सुलभता भी बढ़ेगी और सीमित संसाधनों के बजाय शिक्षा की गुणवता पर ध्यान केन्द्रित हो सकेगा | भविष्य में कोरोना जैसी किसी अन्य आपदा की अनिश्चितता से निबटने के लिए विनिर्माण कम्पनियाँ पहले से भी अधिक ऑटोमेशन का सहारा लेंगी | जाहिर है कि ऑटोमेशन अब व्यापक पैठ बनाएगा, हालांकि दीर्घ काल में इसके बेरोजगारी जैसे दुष्प्रभाव भी दिखेंगे |

करीब 2 करोड़ भारतीय विश्व के अनेक देशों में कार्यरत हैं| कोरोना संकट विश्वव्यापी है | इसके प्रकोप से सभी देशों में आर्थिक गतिविधियाँ शिथिल हुई हैं और बड़ी सख्यां में नौकरियों में छटनी हो रही है | नौकरियों की छटनी में सबसे पहले विदेशियों को निकाला जाता है अतः विदेशों में कार्यरत भारतीय लोग वापिस लौटने लगे हैं| अकेले अमेरिका में भारतीय दूतावास में 25000 लोग भारत लौटने के लिए नाम लिखा चुके हैं| अभी कुछ दिन पूर्व ओमान सरकार ने आदेश निकाला है कि सरकारी उपक्रमों जैसे सरकारी कंपनियों और अस्पतालों आदि में विदेशी कर्मियों को स्थायी रूप से वापिस भेज दिया जाए | इसी प्रकार अन्य देशों में बड़ी संख्या में अपनी नौकरी गवाँ चुके लोग भारत लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं| भारत सरकार ने उनको वापिस लाने का अभियान शुरू किया है, काम कठिन है, संख्या बहुत बड़ी है, परन्तु सरकार की दृढ इच्छा से असंभव भी संभव हो सकता है| याद करें कि 1990 में ईराक युद्ध के समय 1.70 करोड़ भारतीय नागरिकों को खाड़ी देशों से भारत वापिस लाया गया था | विदेशों से लौटने वाले प्रवासी भारतीयों में अधिकाँश उच्च शिक्षित व् कौशल युक्त है | उनके वापिस आने से जहाँ उनसे भारत को प्राप्त होने वाली विदेशी मुद्रा की आय बन्द होगी वहीँ उनके लिए बड़ी संख्या में रोजगारों का संकट खड़ा होगा | परन्तु इन्हीं में से कुछ उद्यमी होंगे जो स्वरोजगार के साथ कई अन्य को भी रोजगार देकर भारत को आत्मनिर्भर बनाने में मददगार बनेंगे |

आपदाएँ संकट के साथ अवसर भी लाती हैं | लाकडाउन ने समाज और राष्ट्र के प्रति एक नवीन चेतना का सृजन किया है | कम खर्च में आनंदपूर्वक जीने अनुभव हुआ है | हमारी आवश्यकताएं कितनी कम हो सकती है इसका आभास हुआ है | सामाजिक शिष्टाचार में परिवर्तन हुआ है, लोग दूर से अभिवादन कर रहे हैं | स्वच्छता आदत बन गयी है | आधुनिकतावादी लोग तुलसी-कालीमिर्च का काढा पी रहें हैं | पृथ्वी वायु और आकाश सब स्वच्छ हो गए हैं, नदियों का जल निर्मल हो गया है | भारत के सामान्य नागरिक ने धैर्य और अनुशासन का जो परिचय दिया है वह अविस्मर्णीय है | ये उपलब्धियां भविष्य के भव्य भारत की आधार शिला बनेंगी |

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