“Act Of God” नहीं है कोरोना वायरस : क्षतिपूर्ति तय करे न्यायालय

Act Of God” को समझें :

आप सभी में से बहुत से लोगों ने “O My God” (OMG) फ़िल्म देखी होगी । परेश रावल और अक्षय कुमार की यह फ़िल्म काल्पनिक जरूर है किंतु शिक्षाप्रद भी है। यह पूरी फिल्म “Act Of God” पर आधारित है। सरल भाषा में कहें तो “Act Of God” के अंतर्गत वह घटनायें आती हैं जिसपर मनुष्य का कोई नियन्त्र अथवा कोई अधिकार नहीं होता है जैसे बाढ़, सूनामी और भूकंप को रोक पाना मनुष्य के हाथ में नहीं है अथवा मनुष्य के बस से बाहर बाहर की बात है । आमतौर पर प्राकृतिक आपदाओं जैसे इस तरह की आपदाओं या घटनाओं को एक्ट ऑफ गॉड कहा जाता है। इसे फोर्स मैज्योर (Force Majeure) के नाम से भी जानते हैं। कानून की नजर में एक्ट ऑफ गॉड की स्थिति में इंसान को कुछ जिम्मेदारी, कर्तव्य और काम से छुटकारा मिल जाता है ।

इस कानून के अंतर्गत आने वाले विषयों पर सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। सरकार चाहे तो ऐसी किसी विपदा की स्थिति में भी चैन की बंसी बजा सकती है, सोने का मुकुट पहन कर राजगद्दी पर बैठ कर स्वयं को जन सेवक अथवा जनता का प्रतिनिधि होने के बावजूद भी निरंकुश राजा भोज की अनुभूति भी कर सकती है ।

दुनिया में घटनाओं का सिलसिला जारी रहता है। उनमें से कुछ घटनाओं पर इंसान काबू पा लेता है तो कुछ में स्थिति नियंत्रण के बाहर हो जाती है। अभी जिस तरह से कोरोनावायरस संक्रमण की स्थिति है । कानून की नजर में भी एक्ट ऑफ गॉड वह स्थिति है जो इंसान के बस से बाहर हो।

हम इस कानून को व्यक्तिगत आधार पर भी समझने का प्रयास करते हैं और किसी देश के लिये ऐसी स्थिति कब बन जाती है, उसे भी समझने का प्रयास करते हैं । इसके पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुँचने का प्रयास करेंगे कि “Corona Virus” असल में Act Of God के अंतर्गत आता है अथवा नहीं !

Act Of God को एक उदाहरण से समझ सकते हैं। कोई व्यक्ति किसी से किसी खास दिन मौजूद रहने और कुछ खास जिम्मेदारी निभाने का वादा करता है। लेकिन उस दिन तेज आंधी-तूफान आ जाता है जिस वजह से परिवहन का कोई साधन उपलब्ध नहीं होता है। ऐसे में वह अपने वादे को पूरा नहीं कर सकता है। चूंकि आंधी का आना और रोकना इंसान के बस से बाहर की बात है, इसलिए उसको एक्ट ऑफ गॉड माना जाएगा। इस स्थिति में वह इंसान वादा पूरा नहीं करने का दोषी नहीं कहा जा सकता है। भले ही उस काम को अंजाम देने के लिए कोई और समय तय किया जाए या रिफंड की व्यवस्था की जाए। अगर किसी प्रकार का दोनों के बीच करार हुआ है तो कानूनी तौर पर उस इंसान को काम नहीं होने के लिए जिम्मेदार बिल्कुल नहीं ठहराया जा सकता है। 

दूसरा उदाहरण एक कंपनी है जो सामानों की सप्लाई करती है। लेकिन हिमस्खलन की वजह से सारे रास्ते बंद हो गए जिससे वह क्लायंट को समय पर सप्लाई नहीं दे सकी। इस स्थिति में क्लायंट नुकसान की भरपाई के लिए मुकदमा नहीं कर सकता है। 

2015 की एक घटना

2015 में पश्चिमी अफ्रीका के देशों में इबोला फैल गया था। मोरक्को को दो साल पर आयोजित होने वाले फुटबॉल टूर्नामेंट की उस साल मेजबानी करनी थी। लेकिन मोरक्को की सरकार ने एक्ट ऑफ गॉड या फोर्स मैज्योर का हवाला देते हुए टूर्नामेंट रद्द कर दिया। लेकिन कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन फॉर स्पोर्ट ने मोरक्को के दावे को खारिज कर दिया और कहा कि इबोला फोर्स मैज्योर की श्रेणी में नहीं आता है क्योंकि उस खतरनाक वायरस ने मेजबानी को असंभव नहीं बनाया था। मोरक्को को टूर्नामेंट रद्द करने का दोषी ठहराया गया और 1 मिलियन डॉलर जुर्माना लगाया गया। अगर इबोला को फोर्स मैज्योर मान लिया जाता तो मोरक्को को अपनी जिम्मेदारी से बचने का दोषी नहीं माना जाता।

अब चूंकि कोरोना वायरस प्राकृत आपदा माना जा रहा है तो वहीं इस वायरस की बड़ी मार झेलने वाले विश्व के बहुत से देश इसके लिए चीन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । वह चीन जो वास्तव में किसी के प्रति जिम्मेदार नही है यहाँ तक कि चीन के लोगो लोगो अथवा नागरिकों के प्रति भी वह अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं स्वीकारता, वह एक तानाशाही के आधारभूत ढांचे पर खड़ा हुआ गैर जिम्मेदार और बर्बर देश है । चीनी सरकार किसी चीनी नागरिक को मौलिक अधिकार देने के पक्ष में भी नहीं है । चीन की बहुत सी घटनाये अथवा बातें या घटनायें हैं जिसे चीन के अंदर ही दबा देती है सरकार और वह बाहर नहीं आ पाती हैं न ही दुनियाँ को यह  मालूम चल पाता है कि वहाँ हो क्या रहा है ? पर अनुमान जरूर लगाया जा सकता था । क्योंकि ऐसा नही कि बीमारी या कोई अन्य घटना पहली बार घट रही और चीन पहली बार इसे छिपा रहा है जबकि इसके पूर्व सार्स वायरस को वैश्विक महामारी घोसित करने और सभी देशों को सावधान रहने, यात्राओं पर रोक लगाने के संदर्भ में WHO के तत्कालीन महानिदेशक ने कोई समय नही लिया था और जैसे ही चीन के बाहर सार्स का पहला मरीज मिला WHO ने 2002 में इसे गम्भीरता से लिया और समूचे विश्व में काफी हदतक तक रोका जा सका था, किन्तु 2002 के तत्कालीन महासचिव ने पूरे विश्व को चीन के प्रति आगाह करते हुए यह भी कह दिया था कि जिस प्रकार के खान पान का चलन चीन में चल रहा, दुनिया ज्यादे समय तक ऐसे किसी नये वायरस से अछूती नही रह पाएगी ।

उस समय की महासचिव ने अपने कर्तव्य का निर्वहन पूरी ईमानदारी से किया । पर यदि हम भारत की बात करें तो भारत में जब कोरोना वायरस आया तब तक वह अमेरिका, ईरान इटली, में मौत का तांडव कर चुका था औऱ भारत के पास इससे बचने के बहुत से उपाय लागू किये जा सकते थे, किन्त हमसे गलती तो हुई अन्यथा अन्य देशों के हालात देखने के पश्चात और अपने देश की सडी हुई चिकित्सा व्यवस्था के साथ इस वायरस से लड़ पाना लगभग नामुनकिन था यह बात भी सर्वविदित थी । फिर भी हमसे चूक तो हुई जिसका खामियाजा नीतिनिर्माताओं से लेकर देश का हर वर्ग झेल रहा किन्तु सबसे बड़ी मार तो उनपर पड़ी है जो परदेश (दूसरे प्रदेशों) में रह कर जैसे तैसे दो वख्त की रोटी कमा कर अपने बच्चों को पाल पास रहे थे, साथ में मध्यम वर्ग की भी कमर इस कोरोना ने तोड़ दी ।

यह सब कुछ जो आंखों के सामने घट रहा था क्या इसे रोक पाना असंभव था या लापरवाही अथवा भूल ?

चीन के पिछले रिकॉर्ड को ही देखते हुए सावधान हो जाने की जरूरत थी, ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती कि WHO जब कुछ बोलेगा अथवा बतायेगा तब ही हम कुछ कर पाएंगे ? एक सम्प्रभु राष्ट्र के नाते हम अपना निर्णय चीन, इटली, अमेरिका जैसे देशों की परिस्थिति को देखकर ले सकते थे कम से कम विदेशों से आ चुके लोगों तक पहुंच सकते थे, विदेशी हवाई यात्राओं को बंद कर सकते थे, विदेशों में फँसे हुए लोगो को सावधानी पूर्वक पूरी गाइडलाइन और प्रोटोकॉल को पूरा करने के पश्चात ही पूर्ण रूप से सन्तुष्ट होने के बाद ही घर जाने की इजाज़त देते ।

पलायन बनी सबसे बड़ी भूल

यह बात गौर करने वाली है कि आखिर लॉकडाउन के बीच अपने बीबी बच्चों को लेकर, अथवा कंधे पर बिठाये मुंबई से उत्तर प्रदेश तक पैदल नाप देने की साहश रखने वाला मजदूर कितना मजबूर रहा होगा कि तपती धूप में अपने मासूम बच्चों को कंधे पर बिठाये घर की ओर निकल निकल पडा, उस स्थिति को महसूस करके देखिये जब ट्रेनों से घर को आने के लिए निकला मजदूर अथवा कामगार घर तक तो पहुँचा पर वह नहीं यह उसका मृत शरीर था और डॉक्टर पोस्मार्टम में लिखते हैं कि मजदूर के पेट में अन्न का एक दाना भी नहीं था, वह दुर्दशा कि इस विपदा की घड़ी में उसे खाना और पानी के लिये लूट मचानी पड़ी, क्या यह सब “Act Of God” था ?

अगर इस मजदूर को सर छुपाने की जगह मिलती दो वक्त की रोटी तो वह भी जानता था कि महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश पैदल चलने की क्या कीमत चुकानी पड़ सकती है अथवा श्रमिक एक्सप्रेस में सफर के दौरान वह बाहर से कुछ नहीं खरीद पायेगा पानी भी नहीं, संक्रमण के डर से लोग उससे दूर भागेंगे, कोई पूछने वाला नहीं मिलेगा, वह जानता था साहेब कि वह घर पहुँच भी गया तो उसके साथ बीमारी भी उसके घर पहुच जायेगी और फिर मुहल्ले तक से गाँव तक सब बीमार हो सकते हैं किंतु आप से इतना न हो सका कि आप उसे दो महीने का भोजन अथवा राशन दे सकें ! अगर सख्त कानून बनाते कि कम से कम दो माह तक किसी भी व्यक्ति से किराया नहीं लिया जायेगा यदि मकान मालिक ऐसा करेगा तो यह गम्भीर अपराध होगा और आप के पास यह कानून बनाने का अधिकार भी था और जन हित में उठाये गए कदम का संवैधानिक संरक्षण भी क्योंकि इसी उद्देश्य से सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से निकाल दिया गया था ।

क्षेत्रीय प्रशासन के पास, जिलाधिकारी स्तर पर, उनके जिले में विदेश/परदेश से लौटे लोगो की सूची भेज कर उन्हें शख्ती से आइसोलेट रहने की हिदायत दे सकते थे, उनकी निगरानी कर सकते थे ।

यह सभी कार्य लाकडाउन के बीच ही संम्पन्न किया जा सकता था। हम स्थानीय प्रशासन,ग्राम पंचायत तक के दायित्व तय कर सकते थे कि वह सभी पूरी तरह सक्रिय हो कर यह सुनिश्चित करें कि विदेश/परदेश से आये लोग आइसोलेट रहें अन्यथा जिला पंचायत, ग्राम पंचायत के प्रमुखों पर कार्यवाही होगी ।

पर तुम ऐसा न कर पाने के 1000 कारण बताओगे, मुझे मालूम है और यह भी मालूम है कि जब एक आदमी ठान लेता है तो पर्वत का सीना चीर कर रास्ता बना देता है और तब वह दशरथ मांझी कहलाता है ।

किसान की जमीन पर सरकारी कब्जा 24 घण्टे के भीतर हो सकता है भले ही मुवाबजा 24 साल बाद मिले उसे और मिले भी तो आप की कृपा से क्योंकि खून चूस कर जिंदा रहने और बड़ी गाड़ियों में नेता बनते ही घूमना शुरू करने वाले आप जैसे भृष्ट पिस्सू ही तो हैं न ! जो सबसे नीचे से ऊपर तक मौक्का मिलते ही खून चूसने को तैयार बैठे हैं । अब आप ही जैसे चंद लोग इसे “ऐक्ट ऑफ गॉड” बताने में जुटे हैं, वह अपनी नपुंशकता कायरता की घोषड़ा क्यों करेंगे भला आखिर गाड़ी कितनी भी बड़ी हो वास्तव में हो तो तुम एक परजीवी ही न वही परजीवी जो जहाँ रहता है उसी का खून चूसता है ।

पर यह बात बिल्कुल मत कहियेगा कि कुछ किया हैं नहीं सरकार जी ने भला क्या नहीं किया भला ? लाकडाउन कर के घर बैठ गए और लठ्ठबाज ठुल्लो को लठ्ठ भांजने की खुली छूट दे दी, यह अलग बात है कि यह भैंस चराने और भेड़-बकरी चराने वाले लोगों का कार्य है न  न पेटेंट नही है उनका और न ही कॉपीराइट भले ही आशा थी कि भांजते तुम लठ्ठ पर साथ में उपरोक्त कार्य भी करके दिखाते,आम आदमी ने तो इसी अपेक्षा से सरकार चुना था, पर ऐसा लग रहा था कि कितना बड़ा एहसान करने जन्नत से फरिस्ते आएं हैं 1-1 करोड़ का लाइफ इंसोरेश करा के, जो लठ्ठ भांज कर देशभक्ति दिखा रहे । पर दो कौड़ी लायक भी नहीं ।

अंजाम सभी भुगत रहे आप को यह एहसास भी देरी से हुआ ।

रामदीन काका : के प्राण त्याग चुके कुछ सवाल

रामदीन काका अपने खेतों की देख रेख कर रहे थे, गेहूँ की कटाई का समय निकट आ रहा था और गेंहूँ की फसल भी धीरे-धीरे पक रही थी । पैदावार बहुत अच्छी थी यह गेहूं के पौधे पर लगी “गेहूँ की बाली” खुद ही बता रही थी । काका की खुशी का ठिकाना नहीं था बेटी रचना का व्याह था और अच्छी फसल इस उम्मीद को और बढ़ा रही थी कि बेटी रचना की शादी वह इसबार धूम-धाम से करेंगे, अब चूंकि उनका बेटा “रवि” परदेश में अच्छा खासा कमा रहा था तो काका को यह उम्मीद भी थी कि बेटा भी अपनी बहन की शादी में घर जरूर लौटेगा और उनके बुढापे में वह अपनी बहन की शादी के सभी कामों में उनका हाथ भी बटायेगा सभी जिम्मेदारियों में बराबर सहयोग करेगा । बहन के प्रति बहुत भावुक है वह,क्योंकि उसकी माँ के गुजर जाने के बाद यह बड़ी बहन ही तो थी जो उसे सहारा देती थी । रामदीन काका का एक ही तो बेटा था पर बेटा तो नहीं आया बेटे (रवि) की मौत की खबर जरूर आ गई, हाल ही में परदेश से जैसे तैसे भाग कर तौटे लड़को ने ही तो बताया कि रामदीन काका तुम्हारे बेटे को “कोरोना” नाम की बीमारी ने ही निगल लिया और हम जैसे-तैसे घर आये हैं,शहर में यह बीमारी बहुत तेज फैली है बहुत लोग मर रहे हैं ।  रामदीन काका की मानो दुनिया ही उजड़ गई और उसकी बहन, उसका तो वह हाल था कि “काटो तो खून नहीं ।” इससे पहले गांव के लोग यह समझ पाते कि आखिर हुआ क्या है गाँव में पुलिस आई और परदेश से आये कई लड़कों को उठा कर ले गई, किसी ने न कुछ बताया न कोई कुछ जान सका । 14 दिन के बाद पुलिस ने जिन लड़को को पकड़ा था उन्हें छोड़ दिया पर अबतक गाँव में बहुत से परदेशी लोग आ चुके थे और कई लोग मर भी चुके थे, सबसे बड़ी बात यह कि अब तो रामदीन काका में भी इसी बीमारी के लक्षण दिख रहे थे और उनके बचने की उम्मीद भी बहुत कम थी और हुआ भी वही अब रामदीन काका अपनी जवान लड़की के साथ यह दुनिया भी छोड़ चुके थे किंतु उनकी आत्मा आज भी यह प्रश्न

पूछ रही ……

1- रामदीन काका की अकाल मृत्यु का दोषी कौन है ?
2- जिस परिवार में जवान बेटी भर रह गई हो उसका भविष्य क्या होगा ? 
3- कोरोना शहर से गांव क्यों आया ?
4- 30% शहरी आबादी में बीमार लोगों को ठीक करना सरल था अथवा इस शहर की बीमारी को 70% ग्रामीणों को बीमार करना उचित था ?
5- इस बीमारी के हाथ पांव तो थे नहीं जो यह खुद चल कर विदेश से शहर और शहर से गाँव तक पहुँच जाता, फिर कैसे आया कौन लाया ?
6- क्या पलायन को रोकना असम्भव था ?
7- विदेश से आने वाले लोगों को इस्क्रीनिंग कर (बुखार नाप कर ) उन्हें अपने घर भेजना उचित था ?
8- जब 30 जनवरी 2020 को भारत के केरल राज्य में पहले मरीज की पुष्टि हो चुकी थी,जो कि चीन से आया था उसी समय हवाई यात्राओं पर प्रतिबंध लगाना असम्भव था ?
9- क्या सच में कोरोना को रोकना अशम्भव था ?
10- क्या रामदीन काका के परिवार को छति पूर्ति नहीं मिलनी चाहिए ? 

Leave a Reply

%d bloggers like this: