लेखक परिचय

मिलन सिन्हा

मिलन सिन्हा

स्वतंत्र लेखन अब तक धर्मयुग, दिनमान, कादम्बिनी, नवनीत, कहानीकार, समग्रता, जीवन साहित्य, अवकाश, हिंदी एक्सप्रेस, राष्ट्रधर्म, सरिता, मुक्त, स्वतंत्र भारत सुमन, अक्षर पर्व, योजना, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, जागरण, आज, प्रदीप, राष्ट्रदूत, नंदन सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएँ प्रकाशित ।

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-मिलन सिन्हा-

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दो दिन बाद बिहार विधान सभा के 10 सीटों के लिए उपचुनाव होंगे। राजद-जदयू -कांग्रेस महागठबंधन के दो शीर्ष नेताओं, लालू प्रसाद यादव एवं नीतीश कुमार ने एक मंच से चुनाव प्रचार प्रारंभ करके चुनावी तापमान बढ़ाने का काम तो किया ही है, साथ-साथ महागठबंधन में शामिल तीनों दलों के कार्यकर्ताओं को एकजुट होकर चुनाव में कार्य करने का सन्देश देने की कोशिश भी की है। जाहिर है, अपने तरीके से ऐसा ही  प्रयास एनडीए गठबंधन के दल भी कर रहे हैं। बहरहाल, सोचने वाली बात यह है कि आम जनता से जुड़े अहम मुद्दे – भ्रष्टाचार, महंगाई , गरीबी आदि इस उपचुनाव में राजनीतिक बहस का विषय क्यों नहीं हैं ? क्या इन्हें जान बूझ कर चर्चा से अलग रखने की कोशिश हो रही है ? चलिए, भ्रष्टाचार जैसे एक बड़े मुद्दे पर आगे थोड़ी चर्चा करते हैं।

ज्ञातव्य है कि इंदिरा गांधी के पुत्र व राहुल गांधी के पिता स्व. राजीव गांधी  ने प्रधानमंत्री रहते हुए यह कहा था कि विकास के नाम पर खर्च होने वाले सरकारी पैसे का  85 % भ्रष्टाचार की  भेंट चढ़ जाता है। विडम्बना देखिये, आगे उसी राजीव गांधी की सरकार को बोफोर्स तोप रिश्वत मामले के कारण सत्ता से बाहर जाना पड़ा । कहना न होगा, आजादी के 67 साल बाद भी  मेधा व प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न बिहार के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण राजनीतिक भ्रष्टाचार रहा है । बिहार के चारा घोटाला, अलकतरा घोटाला सहित अन्यान्य अनेक छोटे -बड़े घोटालों की चर्चा प्रदेश-देश से लेकर विदेश की मीडिया में होती रही है । क्या राजनीतिक संकल्प से इस शर्मनाक स्थिति को नहीं बदला जा सकता है ?

गौरतलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने महंगाई के साथ-साथ भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाकर चुनाव प्रचार किया और अभूतपूर्व सफलता पाकर दस साल से केन्द्र में काबिज यूपीए सरकार के स्थान पर सत्तारूढ़ हुई। स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इस बात को सकारात्मक रूप से उठाया है और इस मुद्दे पर गंभीरता से आगे बढ़ने का स्पष्ट संकेत दिया है। फिर सवाल है कि इतना सब कुछ जानने समझने के बाद भी बिहार के वोटरों, खासकर युवाओं  के लिये भ्रष्टाचार क्या कोई चुनावी मुद्दा नहीं है ? क्या बिहार की आम जनता रोजमर्रा जिन्दगी में भ्रष्टाचार की इतनी आदी हो चुकी  है कि उनके लिए अब यह चर्चा का विषय नहीं रह गया है ? या कि वे इस राजनीतिक माहौल से ऊब चुके हैं, निराश हो चुके हैं ?

ऐसा मानना सही नहीं होगा। उम्मीद है बिहार के वोटर आगे होनेवाले सभी चुनावों में सबको इसका माकूल जबाव देंगे।

One Response to “बिहार के उपचुनाव से अहम मुद्दे नदारत क्यों ?”

  1. mahendra gupta

    बिहार की जनता अब अच्छी तरह समझ गयी है कि इनके स्वार्थ इन्हें नजदीक लाएं हैं , बाकि जनता से इन्हें कुछ लेना देना नहीं है यह बात पिछले दिनों तब साफ़ जाहिर हो गयी थी जब ये एक साथ पहली बार मंच पर आये थे और जनता वहां से नदारद थी दोनों ने ही बिहार को जंगल बनाया है सिवाय नीतीश के पहले कार्यकाल के कुछ समय को छोड़ कर। वैसे तब भी भा ज पा उनके साथ थी अब इसलिए जनता की कोई रूचि दिखाई नहीं दे रही है दूसरे दोनों ही अपनी पुरानी मानसिकता को अंदर लिए हुए हैं , और एक दूजे से कुछ शंकित भी हैं

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