लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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-बीनू भटनागर-

poem

प्रत्यूष काल,

किरणों का जाल,

सूर्योदय हो गया,

क्षितिज भाल।

तारे डूबे तो,

सूर्य उगा,

चंदा भी थक कर,

विदा हुआ।

पक्षियों का गान

कहे हुआ विहान।

नींद से उठकर,

मिट गई थकान।

उषा काल के ,

रवि को प्रणाम!

 

मध्याह्न काल मे,

सूर्य चढ़ा,

ठीक गगन के बीच खड़ा,

धरती का तापमान बढ़ा,

फिर वो पश्चिम की ओरचला,

पश्चिमी क्षितिज मे,

जाकर अस्त हुआ,

किसी और देश मे,

व्यस्त हुआ।

 

घूमता नहीं है,

भानु  कभी,

पृथ्वी का धुरी,

पर चक्र हुआ।

One Response to “चक्र       ”

  1. vijay nikore

    एक अति सुन्दर रचना। हार्दिक बधाई। ऐसे ही लिखती रहें, आनन्द आता रहे ।

    Reply

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