लेखक परिचय

मिलन सिन्हा

मिलन सिन्हा

स्वतंत्र लेखन अब तक धर्मयुग, दिनमान, कादम्बिनी, नवनीत, कहानीकार, समग्रता, जीवन साहित्य, अवकाश, हिंदी एक्सप्रेस, राष्ट्रधर्म, सरिता, मुक्त, स्वतंत्र भारत सुमन, अक्षर पर्व, योजना, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, जागरण, आज, प्रदीप, राष्ट्रदूत, नंदन सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएँ प्रकाशित ।

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arharमिलन सिन्हा

दाल पर बवाल जारी है. राजनीतिक विरोधियों द्वारा केंद्र सरकार से सवाल पर सवाल पूछे जा रहे हैं. विपक्ष राज्य सरकारों से जवाब तलब नहीं कर रहा है जैसे कि दाल प्रकरण में सारा दोष केंद्र सरकार का हो. जमीनी हकीकत को देखें तो दाल की कीमतें बढ़ी हुई हैं. निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों के लिए ‘दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ’ वाली बात पर अमल करना भी मुश्किल हो रहा है. बिहार विधान सभा चुनाव में तो साम्प्रदायिकता, जंगलराज, आरक्षण, गौ मांस सेवन के साथ-साथ दाल भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है. कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के छोटे-बड़े नेता खुले आम बयान दे रहे हैं कि खुदरा बाजार में दालें अब 200 रूपये प्रति किलो बिक रही हैं. मीडिया में भी दाल एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है. आखिर देश के गरीबों एवं आम जनों के लिए दाल ही तो प्रोटीन का सबसे सुलभ प्राकृतिक स्रोत रहा है. ऐसे में, दाल पर लगातार इतनी चर्चा के बीच दाल पर थोड़ी गहराई से पड़ताल लाजिमी है.
पहले दालों की कीमत के 200 रूपये प्रति किलो के पार जाने की सच्चाई को जानने की कोशिश करें. झारखण्ड की राजधानी रांची के एक बड़े खुदरा दुकान में चार-पांच दिन पहले चना दाल 80 रूपये, मसूर 100 रुपये, मूंग 120 रुपये और अरहर दाल 190 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव बिक रहा था. जाहिर है कि केवल अरहर दाल 200 रूपये के आसपास थी, जब कि बाकी दालें 120 रूपये या उससे कम कीमत पर बिक रही थी. दालों की कीमतें अधिकतर प्रदेशों में कमोवेश इसी रेंज में थी. एक दर्जन से ज्यादा प्रदेशों में जमाखोरों तथा मुनाफाखोरों के खिलाफ हाल की करवाई के बाद तो खुदरा बाजार में दाल की कीमत में कमी आनी शुरू हो गई है. तो फिर नेतागण निरंतर चौथाई सच ही क्यों बोले जा रहे हैं ? क्या वाकई दाल में कुछ काला है ? दाल की कीमतें जल्द से जल्द नीचे आयें और बराबर नियन्त्रण में रहें, यह सबकी चाहत ही नहीं, मांग भी होनी चाहिए. लेकिन मात्र तथ्यहीन बयानबाजी से आम जन का कौन सा भला होने वाला है? आम जनता, खासकर बिहारी मतदाता के लिए यह विचारणीय सवाल है.
कहना न होगा, देश में दलहन के पैदावार और दाल के खपत में अमूमन 40 लाख टन का अंतर रहता है, जिसे मुख्यतः आयात से पूरा करने की कोशिश केन्द्र की हर सरकार करने का प्रयास करती है, बेशक उनके प्रयासों को लेकर सवाल किये जा सकते हैं. यह भी सच है कि देश में दलहन की पैदावार में लगातार कमी एक बड़ा मसला रहा ही है, लेकिन उससे कहीं बड़ा मुद्दा देश में दाल के उपलब्ध भण्डार को सही तरीके से वितरित करने का रहा है. मांग और आपूर्ति के सिद्धांत पर आधारित बाजार में हर बढ़ती मांग और हर घटती आपूर्ति के साथ मुनाफाखोरी और जमाखोरी का सीधा सम्बन्ध देखा गया है, जिसे प्रभावी प्रशासनिक सक्रियता से निबटा जा सकता है. दीगर बात है कि दालों की जमाखोरी एवं उससे संबंधित मुनाफाखोरी से निबटने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है जिसे सभी सरकारों को आवश्यक वस्तु अधिनियम की धरा सात के तहत अंजाम तक पहुंचाना होता है. ऐसे में सवाल उठना स्वभाविक है कि जब दाल की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही थी जिससे गरीबों की मुसीबतें बढ़ रही थी, तब भी राज्य सरकारें, जिसमें भाजपा शाषित राज्य सरकारें भी शुमार हैं, ऐसी छापेमारी से क्यों बचती रही? केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली का तो कहना है कि केन्द्र सरकार के बारबार दबाव दिए जाने के बाद ही छापामारी का सिलसिला प्रारंभ हुआ. ज्ञातव्य है कि पिछले चार-पांच दिनों में महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार सहित कई राज्यों में मारे गए करीब 8400 छापों में जमाखोरों-मुनाफाखोरों के पास से 82000 टन से ज्यादा दाल जब्त किये गए हैं. ऐसी छापामारी आगे भी जारी रहने की संभावना है. यहाँ आम जनता का यह सवाल मुनासिब है कि ऐसे छापे पहले क्यों नहीं मारे गए ; क्या राज्य सरकारें केन्द्र के पहल का इन्तजार कर रही थीं ?
आइये, अब जरा तीन प्रमुख दालों, अरहर, चना और मूंग में मौजूद गुणकारी तत्वों मसलन प्रोटीन, खनिज आदि के बारे में जान लें : प्रति 100 ग्राम दाल की बात करें तो प्रोटीन का प्रतिशत अरहर में 22.3, चना में 20.8 तथा मूंग में 24.5% होता है, जब कि कैल्शियम की मात्र अरहर में 73 मिलीग्राम, चना में 56 मि.ग्रा और मूंग में 75 मिलीग्राम होता है. प्रति 100 ग्राम अरहर दाल में फास्फोरस के यह मात्रा 304, चना में 331 एवं मूंग में 405 मिलीग्राम होता है. कहा जाता है कि अरहर दाल की उत्पत्ति अफ्रीका से है और इस दाल की प्रकृति गर्म होती है, जबकि मूंग की उत्पत्ति भारत और चने की पश्चिम एशिया से मानी जाती है. तुलनात्मक रूप से मूंग की दाल में प्रोटीन सहित अन्य पोषक तत्व ज्यादा मात्रा में विद्दमान है. मूंग की दाल आसानी से पचने वाली होती है, जिसके कारण भी यह अक्सर बच्चों, वृद्धों और रोगियों को खिलाई जाती है. दाल के अलावे चने के सत्तू और वेसन के अनेकानेक लाभकारी उपयोग से तो हम सभी परिचित हैं ही.

One Response to “दाल पर बवाल की पड़ताल”

  1. mahendra gupta

    दाल का गणित राज्य सरकारों की लापरवाही व निहित स्वार्थों की वजह से बिगड़ा है , सभी का एक जुट लक्ष्य केंद्र सरकार को बदनाम करना व विफल करना है , विदेशों से आयतित दाल को न उठाना उनकी नियत को स्पष्ट करता है पर इस समय कांग्रेस का एक मात्र काम हर काम के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार बताने का अभियान सब को बरगला रहा है लेकिन कांग्रेस यह भूल रही है कि भा ज पा सदेव सरकार में नहीं रहनी है जब उसकी सरकार बनेगी तब उसे भी इसी प्रकार के विरोध का सामना करना पड़ेगा , लेकिन इन सांडों की लड़ाई में अंतिम नुक्सान सदा जनता का ही हुआ व होगा , वह ही सदा पिसती रहेगी ये तो जमाखोरों से रिश्वत व चंदा खा कर दूर से देखते रहेंगे

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