पंजाब की दलित राजनीति…और जला दिल यूपी का ?

                  प्रभुनाथ शुक्ल

कांग्रेस ने पंजाब में चरणजीत चन्नी को मुख्यमंत्री बना दिया गया लेकिन इसकी आग में उत्तर प्रदेश झुलसता दिखा। कांग्रेस पंजाब चुनाव को देखते हुए एक बड़ा दांव चला है। जिसकी वजह से अकाली दल, आप, बसपा और भाजपा का दांव चित हो चला है। कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद राजनीतिक कयास लगाए जा रहे थे कि सिद्दू या दूसरे किसी को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। लेकिन एक दलित राजनेता को पंजाब का मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा इसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।

पंजाब की राजनीति में पहला मौका है जब किसी दलित को मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी के इस निर्णय से सबसे अधिक तकलीफ दलित राजनेता मायावती को हुईं है। क्योंकि उत्तर प्रदेश के साथ पंजाब में चुनाव होने हैं। इसका सीधा असर उनकी दलित राजनीति पर पड़ सकता है। पंजाब में सबसे अधिक 32फीसदी दलितों का वोट है। राजनीतिक लिहाज से अकाली दल बसपा के लिए बात मायने रखती है। लेकिन कांग्रेस ने दलित राजनीति का ऐसा पांसा फेंका जिसमें सभी विरोधी उलझ गए।

पंजाब की राजनीति से उत्तर प्रदेश की सेहत पर क्या असर पड़ेगा। क्या वजह है कि पंजाब में चरणजीत चन्नी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद मायावती और योगी आदित्यनाथ अधिक हमलावर हुए। क्योंकि उत्तर प्रदेश में भी चुनाव होने हैं। मायावती पंजाब में अकाली दल से गठबंधन करना चाहती हैं। दलित वोट अगर कांग्रेस की झोली में चला गया तो बेहद मुश्किल होगी। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में भी रावण जैसे दलित नेता के करीब होना चाहती है। भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर रावण जब बीमार थे तो प्रियंका गांधी खुद उन्हें अस्पताल में देखने गई थी। कांग्रेस की इस चाल से दलितों का दिल अगर पसीजा तो मायावती के साथ ही भाजपा का भी जनाधार प्रभावित हो सकता है।

राजनीतिक दलों को सबसे अधिक पंजाब में नुकसान होने की आशंका है। क्योंकि कांग्रेस के इस फैसले के बाद दलित राजनीति पर नया विमर्श शुरू हो गया है। पंजाब के वर्तमान राजनीति में सबसे मजबूत स्थिति में फिलहाल कांग्रेस दिख रहीं है। क्योंकि किसान आंदोलन की वजह से भाजपा ने अपना जनाधार खो दिया है। अकाली दल वक्त रहते भले संभल गया, लेकिन इसका खामियाजा उसे भी भुगतना पड़ेगा। कांग्रेस ने दलितों के साथ-साथ सिख और हिंदू वोटरों को भी साधने का काम किया है। चरणजीत चन्नी के साथ हिंदू और सिख बिरादरी से दो व्यक्तियों को उपमुख्यमंत्री बनाया गया है।

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने चरणजीत चन्नी को मुख्यमंत्री बनाए जाने का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने कहा दलितों को लुभाने की यह कांग्रेस की पुरानी चाल और चुनावी हथकंडा है। दलित कांग्रेस के बहकावे में ना आएं। जबकि भाजपा ने कहा कि दलित कांग्रेस के लिए राजनीतिक मोहरा है। मायावती ने अपनी खींच निकालते हुए कहा कि आखिर पांच साल पूर्व कांग्रेस ने दलित को मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया। इस दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक साथ कई ट्वीट कर दलित हिमायती होने की बात कहीं और भीमराव अम्बेडकर की प्रशंसा भी किया।

योगी आदित्यनाथ वाराणसी में आयोजित पार्टी की अनुसूचित जाति मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की मीटिंग में भी शरीक हुए। इस बार उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी ब्राह्मणों को साथ लेकर सत्ता में वापसी चाहती है। बसपा 2007 में सोशल इंजीनियरिंग की वजह से ब्राह्मणों को लुभा कर सत्ता में आयी थीं। लेकिन पंजाब में दलित राजनीति को लेकर वह मुखर हैं। दलित राजनीति के मसीहा कांशीराम पंजाब से आते हैं। जबकि उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती उनको दलित राजनीति का मसीहा मानती हैं। वह कांशीराम की असली राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं। इसलिए पंजाब के 32 सीसी दलितों पर अपना अधिकार मानती हैं। कांग्रेस की चाल का सीधा असर अकाली दल और बसपा की राजनीति पर पड़ सकता है। कांग्रेस के हाथ में सत्ता है वह दलितों के लिए कई घोषणाएं भी कर सकती है।

पंजाब कांग्रेस में आंतरिक गुटबाजी चरम पर है। नाराज कैप्टन और उनका खेमा सिद्धू को कभी पचा नहीं पाएगा। पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह सिद्दू और उनके पाकिस्तान परस्ती को लेकर हमलावर हैँ और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के खिलाफ बताया है। कैप्टन को हटाने के लिए इस पूरे खेल में सिद्धू की अहम भूमिका रही है। हरीश रावत के जरिए कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी ने उनका भरपूर उपयोग किया है। सोनिया गांधी तत्काल सिद्धू को अगर पंजाब का मुख्यमंत्री बना देती कैप्टन अमरिंदर सिंह की दूसरे खेमे में जाने की आशंका थी। जिसकी वजह से कांग्रेस कमजोर हो सकती थी। हालांकि हरीश रावत का एक बयान कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर दिया। बयान के बाद विपक्ष कांग्रेस पर हमलावर हो गया दलित राजनीति पर ढोंग करने का आरोप भी लगाया।

देश में मोदी लहर के बाद भाजपा दलितों को अपने पक्ष में करने में बेहतर कामयाब रही है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार 2009 में भाजपा के पास 10 से 12 फ़ीसदी दलित वोट बैंक थे। जबकि 2014 में 24 और 2019 में 34 फ़ीसदी पर पहुंच गए। इस हालात में भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश के 2022 के आम चुनाव में 2017 के मुकाबले अधिक सीट जीतने का दावा कर रही है उस लिहाज से दलित अगर कांग्रेस के खाते में जाता है तो उसके लिए भारी नुकसान होगा। प्रदेश में बीजेपी की नजर जहां दलितों पर है वही समाजवादी पार्टी और बसपा सीधे ब्राह्मणों को लुभाना चाहती है।

पंजाब में जातिय आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाय तो स्थिति साफ होगी। राज्य में 58 फ़ीसदी सिख आबादी है। 38 फ़ीसदी से अधिक हिंदू हैं। 32 फ़ीसदी के करीब दलित। पंजाब की नई राजनीति का जो फ्रेम आया है उसमें दलित और हिन्दू ख़ास हो जाते हैं। अकाली दल, आप और बहुजन समाजपार्टी को तोड़ने के लिए कांग्रेस ने अच्छी चाल चली है। हिंदू और दलित आबादी को मिला दिया जाय तो यह संख्या करीब 70 फ़ीसदी पहुंचती है। कांग्रेस अब हिंदू और दलित राजनीति को ज्यादा प्रभावी बनाना चाहती है। यही वजह है कि उसने कैप्टन अमरिंदर सिंह को किनारे किया है।

दलित राजनेता चरणजीत चन्नी को आगे कर कांग्रेस दलित राजनीति के भरोसे पंजाब में दोबारा लौटना चाहती है। फिलहाल दूसरे दलों की अपेक्षा कांग्रेस की स्थित वहां मजबूत दिखाई देती है। क्योंकि पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में अनुसूचित जाति के लिए 30 आरक्षित हैं। कांग्रेस की निगाह उन्हीं पर है।दलित को सामने लाकर कांग्रेस दलित, सिख हिंदू के साथ सभी वर्गों को साधने की कोशिश है। पंजाब में 50 सीटें ऐसी हैं जहां दलित आबादी अधिकांश है और वह चुनाव पर बेहद असर डाल सकती है।

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