कोख से क्रब तक कहाँ सुरक्षित है बेटियाँ ?

अभी कुछ दिन पहले की बात है एक वीडियो वायरल हुआ था। शायद आपके मन-मस्तिष्क से वह वीडियो ओझल हो गया हो। और हो भी क्यो नही हम हिन्दवासियो को भूलने कि जो सबसे अच्छी आदत है। खैर… वह वायरल वीडियो एक बार फिर हम आपके मस्तिष्क पटल पर लाना चाहते है। वायल वीडियो मे एक बेटी सडक पर रो-रोकर न्याय की गुहार लगा रही थी। हुआ यह है कि उसके पिता ने अपनी उस बेटी के साथ हुई छेडखानी का विरोध करते हुए पुलिस से उस गुण्डे की शिकायत की थी जिसके बाद उन गुण्डो ने खेत मे काम कर रहे उस पिता को दिन-दहाड़े गोलियों से भून कर मौत की दिन सुला दिया। घटना उ0प्र0 के हाथरस जिले का है। इस घटना ने उ0प्र0 के कानून-व्यवस्था को मुंह चिढ़ाते हुए लखनऊ के प्रशासनिक भवनो मे बैठे जिम्मेदारो को हिलाकर रख दिया। शायद यही वजह है कि उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उन गुण्डो के खिलाफ एनएसए लगाने का निर्देश दिए। हालांकि प्रदेश मे अगर विधानसभा चुनाव होता तो निश्चित ही यह वीडियो राजनैतिक मुद्दा बन चुका होता और चुनावी कुरुक्षेत्र मे न जाने कितने दिव्यास्त्र विरोधी दल के तरकस छोडे जा चुके होते। दुख इस बात का नही है कि यूपी मे इस समय चुनाव क्यो नही है, दुख इस बात का है कि इस घटना पर जमकर बहस क्यो नही हुआ। बेशक ! दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्कृति वाले राष्ट्र मे बेटियाँ कोख से लेकर क्रब तक सुरक्षित नही है। विचारणीय है कि हर व्यक्ति को माँ चाहिए, बहन चाहिए, पत्नी चाहिए। लेकिन बहुतेरे ऐसे भी लोग है जो नही चाहते है कि उनके घर बेटी का जन्म हो। ऐसी इच्छा रखने वाले हमारे समाज मे दो तरह के लोग है। पहला- वह लोग जो लडका-लडकी मे भेद करते है और बेटी को बोझ समझते है, और दुसरा वह लोग है जो समाज मे बेटियों के साथ हो रही अमर्यादित घटना को लेकर दहशतगर्द है यह वर्ग इस बात को लेकर भयभीत है कि समाज मे बेखौफ घूम रहे दो पैरो वाले भेडियो की वासनाई आखो और खूनी पंजो से उनकी बेटी सडक पर कब सुरक्षित है। बेटियों को घर से निकलने के बाद उस माँ-बाप के दिल मे दहशत और मस्तिष्क मे तरह-तरह की डरावनी तस्वीर तब तक तैरती रहती है जब तक उनकी बेटी सही-सलामत घर वापस नही लौट आती है। यह वह खौफ है कि जिसके वजह से समाज का दुसरा वर्ग भगवान से यह प्रार्थना करने के लिए मजबूर है कि उनके घर मे बेटी का जन्म न हो। और जब उनके इच्छा के विपरीत उनके आगंन मे लक्ष्मी रुपी बेटी के आगमन की सुगबुगाहट होती है तो वह भी समाज के उन पहली जमात मे खडे लोगो की तरह कोख मे ही बेटी को मारने की तैयारी मे जुट जाते है। और अंतोगत्वा अपने घिनौने कृत्य को अंजाम तक पहुचाते हुए अजंन्मी बेटी को कोख से ही क्रब मे पहुचा देते है। लेकिन इसके लिए उस कातिल बाप से ज्यादा दोषी समाज है। अब सवाल यह उठता है कि क्या लडकी होना गुनाह है। क्या चंद भेडियो के खौफ से देश मे यह माहौल बनाया जा रहा कि कि बेटियों को माँ की कोख मे मार दो ताकि न वह इस दुनिया मे आए और न उसे किसी तरह की जिल्लत सहनी पडे और न उसके परिजनों को कोई तकलीफ हो। क्या हम मध्ययुग की बर्बरता की ओर लौट रहे है यह सभी सवाल मौजूदा दौर मे देश की सडको पर हिलोरें मार रही है।

कहना न होगा कि इन सवालो का जिन्हे जबाब देना है वह खुद असमंजस के स्थिति मे है। बेटी बचाओ बेटी पढाओ जैसे मनभावन जुमले गढने वाली भाजपा के राज मे कठुआ से लेकर उन्नाव और हाथरस तक बेटियों की जलालत देशवासियों की आखो से भले ही ओझल हो गयी हो लेकिन देश उन घटना को भूला नही है। यकीनन हाथरस की घटना झकझोरने वाली है। वजह यह कि एक किसान को उस समय गोलियों से भून कर हत्या कर दी गई जब वह अपने खेत में काम कर रहे था। मृतक किसान अमरीश शर्मा ने ढाई साल पहले वर्ष 2018 मे मुख्य आरोपी गौरव शर्मा नामक एक खुंखार भेडिये के खिलाफ अपनी बेटी के साथ हुए छेड़छाड़ की शिकायत पुलिस थाने में दर्ज कराई थी। जिस पर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपी को जेल भेज दिया था। आरोपी को एक महीने के भीतर ही जमानत मिल गई थी। उसके बाद आरोपी गौरव ने लडकी के पिता अमरीश शर्मा को गोलियों से भूनकर मौत के घाट दिया। हालांकि काफी हो-हल्ला के बाद सीएम योगी आदित्यनाथ ने खुद पूरे मामले की जानकारी ली और आरोपियों के खिलाफ एनएसए लगाने का निर्देश दिया। यहां सवाल उत्तरप्रदेश या किसी अन्य राज्य या फिर भाजपा या किसी अन्य दल की सरकार से नही है। सवाल उस मानसिकता का है, जिसमें लड़कियों को उनके रूप-रंग, शील से आगे बढ़कर परखा ही नहीं जाता। सवाल यह भी उठता है कि महिलाओं की स्वतंत्र हैसियत पुरुष प्रधान मानसिकता वाले लोगों के आखो को क्यो चुभने लगती है। सोशल मीडिया पर मुखर होकर मजबूती से अपनी बात रखने वाली कई महिलाओं के साथ जिस अभद्र भाषा में उनके विरोधी बात करते हैं। वह दृश्य देशवासियों को टीवी चैनलों पर डिबेट के दौरान अक्सर देखने को मिलता है। वे एक तरह से मानसिक तौर पर उनका शोषण कर, उन्हें चोट पहुंचाने की कोशिश कर खुद को सुखद अनुभूति का एहसास करते हैं। यकीनन यह कहने मे तनिक भी गुरेज नही है कि महिलाओं के साथ दुराचार के मामलों में न कोई कानून काम करता दिख रहा है और न किसी सजा का किसी पर कोई असर हो रहा है। दुष्कर्म के मामले मे देश मे पहली बार धनंजय चटर्जी को फासी हुई थी। धनंजय के फांसी के बाद भी निर्भया कांड हुआ और निर्भया के दोषियों को सूली पर चढ़ने के बाद भी बिटिया कांड हुआ। मतलब साफ है कि फांसी की सजा बलात्कार की रोकथाम के लिए कारगर नहीं दिख रहा है। छेड़खानी, बलात्कार या घरेलू हिंसा की घटनाएं तब तक नहीं रुकेंगी, जब तक समाज की मानसिकता मे विशेष परिवर्तन नहीं आएगा। इसके लिए हम मानवाधिकार से इतर हटकर कहे कि जब भी कोई बेटी इन बहशी दरिन्दो के शिकार होती है उसी समय उन दरिन्दो को पकडकर एक पेड मे बाधकर तब तक पत्थर मारते रहे जब तक वह निर्जीव अवस्था मे तब्दील न हो जाए तो गलत नही होगा। या फिर समाज को लैंगिक समानता के लिए जागरुक औऱ संवेदनशील बनाने की योजनाबद्ध तरीके से शुरुआत करे। विडंबना यह है कि ऐसे मसले राजनैतिक दलों और सरकारों की प्राथमिकताओं में शुमार नहीं हैं। देश की न्यायपालिका फांसी जैसी कड़ी सजा सुना तो सकती है। लेकिन व्यवस्था मे इतना लोचा है कि दोष सिद्ध होने के बाद भी आरोपी लंबे समय तक जिंदा रहता है या फिर हमेशा के लिए बडी आसानी से बच निकलता है।और अंत मे अन्तर्मन से यह वेदना निकलती है…. ” आग फिर उठी है अंगारे दहके है आज चारो तरफ। काट दो उंगलियाँ, जो उठे इज्जत तार करने को।। “

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