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    Homeसाहित्‍यकविताआज मुर्दे भी बोल रहे हैं

    आज मुर्दे भी बोल रहे हैं


    आज मुर्दे भी मुख खोल रहे हैं,
    अपने मन की पीड़ा खोल रहे हैं।
    हुआ है उनके साथ बहुत अन्याय,
    सबकी वे अब पोल खोल रहे हैं।।

    मिली नहीं अस्तपतालो में जगह,
    आक्सीजन के लिए भटक रहे थे।
    हो रही थी दवाओं की काला बाजारी,
    दवाओ के लिए हम तड़फ रहे थे।।

    मिला नहीं चार कंधो का सहारा,
    एम्बुलेंस की राह हम देख रहे थे।
    श्मशान में भी जगह न मिली थी,
    संस्कार के लिए जगह देख रहे थे।।

    मिले थे हमको कफ़न चोर भी,
    वो हमारा कफ़न भी लूट रहें थे।
    बेचारे घर वाले भी क्या करते,
    वे सबके वहां हाथ जोड़ रहे थे।।

    मिली नहीं लकड़ी भी हमको,
    गंगा में ही हमें वहां बहा रहे थे।
    कहते किससे ये सब बातें हम,
    अपने आपको हम कोस रहे थे।।

    नंगे खुले थे सब अंग वहां हमारे,
    पशु पक्षी हमको सब नोच रहे थे।
    ऐसी कभी नहीं देखी थी दुर्दशा,
    अपने आप में ही हम रो रहे थे।।

    हुआ ये सब कोरोना के कारण,
    किसी को हम दोष नहीं दे रहे हैं।
    कभी न हो ऐसी दुर्दशा किसी की,
    ये कटु सत्य हम सबको बता रहे हैं।।

    आर के रस्तोगी
    आर के रस्तोगी
    जन्म हिंडन नदी के किनारे बसे ग्राम सुराना जो कि गाज़ियाबाद जिले में है एक वैश्य परिवार में हुआ | इनकी शुरू की शिक्षा तीसरी कक्षा तक गोंव में हुई | बाद में डैकेती पड़ने के कारण इनका सारा परिवार मेरठ में आ गया वही पर इनकी शिक्षा पूरी हुई |प्रारम्भ से ही श्री रस्तोगी जी पढने लिखने में काफी होशियार ओर होनहार छात्र रहे और काव्य रचना करते रहे |आप डबल पोस्ट ग्रेजुएट (अर्थशास्त्र व कामर्स) में है तथा सी ए आई आई बी भी है जो बैंकिंग क्षेत्र में सबसे उच्चतम डिग्री है | हिंदी में विशेष रूचि रखते है ओर पिछले तीस वर्षो से लिख रहे है | ये व्यंगात्मक शैली में देश की परीस्थितियो पर कभी भी लिखने से नहीं चूकते | ये लन्दन भी रहे और वहाँ पर भी बैंको से सम्बंधित लेख लिखते रहे थे| आप भारतीय स्टेट बैंक से मुख्य प्रबन्धक पद से रिटायर हुए है | बैंक में भी हाउस मैगजीन के सम्पादक रहे और बैंक की बुक ऑफ़ इंस्ट्रक्शन का हिंदी में अनुवाद किया जो एक कठिन कार्य था| संपर्क : 9971006425

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