भारत की 46 नर्सों की जान बचाले वाले जाँबाज़ जनरल सुलेमानी की मौत।

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इतिहास के पन्नों में काला अध्याय के रूप में अंकित एक ऐसी खौफनाक घटना के बारे बात करते हैं जिससे पूरा देश काँप उठा था। ऐसी दर्दनाक घटना 2014 में कारित हुई थी जिसने समूचे भारत को हिलाकर रख दिया था। एक ऐसी सूचना भारत के विदेश मंत्रालय को मिली जिससे पूरे देश की सांसे थम गईं थीं। यह घटना दुनिया के सबसे क्रूर आतंकी संगठन आईएसआईएस और भारत की 46 नर्सों के बीच थी। ऐसी खबर आई की इराक के तिकरित में भारतीय नर्से एक बड़ी मुसीबत में हैं। क्योंकि आईएसआईएस के आतंकियों ने सभी 46 नर्सों को अपने कब्जे में ले लिया और उन्हें एक बस में बंदूक के बल पर बैठाकर कहीं अपने ठिकाने पर ले गए हैं। जिससे कि पूरे भारत में मातम फैल गया था। पूरा देश दिल को दहला देनी वाली घटना को सुनकर हिल गया था। बेगुनाह एवं बेकसूर सभी 46 भारतीय नर्सों को दुर्दाँत आतंकी संगठन आईएसआईएस अपना निशाना बनाना चाह रहा था। यह सभी भारतीय नर्सें तिकरित के टीचर्स ट्रेनिंग हॉस्पिटल में काम कर रहीं थीं। भारत की मोदी सरकार बड़ी सांसत में थी। इराक के एक बड़े हिस्से में खूनी गृह युद्ध छिड़ा हुआ है। यह एक ऐसा खूनी युद्ध था जिसमें राह पर चलना तो दूर घर में भी कोई भी व्यक्ति सुरक्षित नहीं था। गोली और बम की गड़गड़ाहट मनुष्य को निशाना बना रही थीं। ऐसी भीषण परिस्थिति में घर से निकलना ही मौत को दावत देने जैसा था। जिसको अगर कल्पना किया जाए तो रोगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में अगर आतंकियों के हाथ 46 हिंदुस्तानी फंस जाएं तो क्या हो सकता था। भला उस कठिन और विक्राल परिस्थिति में कौन दूत बनकर आ सकता था। जोकि जीवन रक्षक बनकर इन सभी भारतीय नर्सों को दुर्दांत आतंकियों से बचा सकता था। बड़ी गम्भीर परिस्थिति थी। पूरी दुनिया आतंकी प्रकोप से भयभीत थी। पूरा विश्व थरथरा रहा था। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जोकि आतंकियों से लोहा लेकर अपने प्राणों को हथेली पर लेते हुए नर्सों के प्राणों की रक्षा के लिए आगे आता। क्योंकि आतंकियों की क्रूरता जगजाहिर है। यह वह परिस्थिति थी जिसको याद करके आज भी सभी भारतीय नर्सें काँप उठती हैं और सभी की आँखो से आज भी आँसू बहने लगते हैं। इराक के तिकरित अस्पताल में फंसी सभी 46 भारतीय नर्सें दुर्दांत आतंकियों के कब्जे में थीं। जिनको आतंकियों ने अपहरण करके जबरन बसों में भरकर अपने एक गुमनाम ठिकाने पर ले गए थे। नर्सों पर आतंकियों की क्रूरता आरम्भ हो चुकी थी। आतंकियों ने नर्सों को गम्भीर रूप से ज़ख्मी करना आरंभ कर दिय़ा था। यह जून का महीना था। आतंकी संगठन आईएसआईएस ने इराक के तिकरित इलाके पर पूर्ण रूप से कब्जा जमाते हुए अपना स्रामाज्य स्थापित कर लिया था।

     भारत का विदेश मंत्रालय पूरी तरह से सक्रिय था। भारतीय सरकार पर पूरी तरह से दबाव था कि वह किसी तरह से सुरक्षित सभी अपने भारतीय नर्सों को सकुशल वापस भारत ला सके। लेकिन यह कार्य बहुत ही जोखिम भरा था। क्योंकि, इराक में गृह युद्ध छिड़ जाने के कारण और आतंकवादियों के हाथों में तिकरिक पूरी तरह कब्जे में हो जाने के कारण। इराक की सरकार भारत का समर्थन कर पाने में पूरी तरह से विफल थी। इराकी सरकार की विफलता का कारण यह था कि इराक के अंदर छिड़ा हुआ गृह युद्ध था। इराक की सेना उस गृह युद्ध से बुरी तरह से जूझ रही थी। इराक के सैनिक और दुर्दांत आतंकी संगठन आईएसआईएस के बीच जोरदार संघर्ष छिड़ा हुआ था। जिसमें पूरा इराक आग की लपटों में जल रहा था। चारों तरफ चीख-पुकार मची हुई थी। आतंकियों की क्रूरता के कारण समूचे इराक की सड़कों पर खून बह रहा था। इराक में चारों ओर आतंकियों की क्रूरता ही क्रूरता दिखाई दे रही थी। हर ओर मानव शरीर के चीथड़े उड़ रहे थे। आतंकी अपनी क्रूरता के चरम सीमा पर थे। आतंकियों की आँखों में खून सवार था। पूरे इराक में धरती काँप रही थी। इस सभी के बीच सबसे बड़ी समस्या यह थी की इस संघर्ष के बीच कम्नीकेशन का कोई विकल्प ही नहीं था। जिसके माध्यम से आतंकियों से चर्चा की जा सके। क्योंकि, आतंकियों ने इराक की सरकार के सभी संसाधनों एवं उपकरणों को तबाह और बर्बाद कर दिया था। ऐसा दुर्दांत माहौल भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ था। खतरनाक आतंकियों के चंगुल से सभी 46 नर्सों को सकुशल बचाना बेहद कठिन था। भारत सरकार बेहद दबाव में थी। क्योंकि, सभी भारतीय नर्सों का परिवार भारत सरकार पर लगातार दबाव बना रहा था। सरकार के लिए यह सबसे जटिल स्थिति थी। भारत की सरकार ने इस दुखद समय में अपने पड़ोसी देश ईरान से सहयोग की अपेक्षा जाहिर की। ईरान ने तत्काल अपनी बहादुर सेना के जनरल कासिम सुलेमानी को बुलाया और पूरी समस्या से अवगत कराया कि भारत की 46 नर्सें दुर्दांत आतंकियों के चंगुल में फंस चुकी हैं। उनको कैसे बचाया जाए। तभी ईरान के बहादुर जनरल ने यह अत्यंत कठिन कार्य अपने हाथ में लिय़ा। और भारत सरकार की मदद के लिए आगे आए। उसके बाद ईरान की सरकार ने भारत की सरकार को भरोसा दिलाया कि हम आपकी पूरी मदद करेगें। ईरान ने भारत से कहा कि हर संभव हम प्रयास करेंगे और भारतीय सभी नर्सों को सकुशल आतंकियों के चंगुल से निकालकर सुरक्षित भारत तक पहुँचाएंगे। पलभर तो यह विश्वास नहीं हुआ। कि इतने क्रूर एवं दुर्दाँत आतंकियों के चंगुल से भला कैसे किसी को सुरक्षित निकाला जा सकता है। लेकिन विश्वास करने से इतर सरकार एवं सभी भारतीयों के पास और कोई विकल्प भी नहीं था। सरकार को उस अंधेरी काल की कोठरी में एक उम्मीद की किरण दिखाई दी। जिस पर भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व की टकटकी भरी नज़रें गड़ी हुईं थीं। क्योंकि, यह एक ऐसा करिश्मा होने जैसा था जोकि किसी सपने से कम नहीं था। जिसको खुली हुई आँखों से देखा जा रहा था। इसका मुख्य कारण था दुर्दांत आतंकियों की क्रूरता जिससे वह पूरे इराक पर विध्वंसकारी रूप से प्रयोग कर रहे थे। इधर भारत में सभी नर्सों के परिवार और रिश्तेदार तथा शुभचिंतकों की सांसे थमी हुई थीं। जोकि एक-एक पल बहुत ही भारी पड़ रहा था। क्योंकि, आतंकियों की बरबरता के आगे यह विश्वास नहीं हो पा रहा था। क्योंकि, एक-एक कदम जोखिम से भरा हुआ था।

     भारत के इस दुखद घड़ी में देव दूत की भाँति प्रकट होकर सामने आने वाले वह व्यक्ति कौन थे…? उनका नाम क्या था…? वह ईरान के महान वीर जनरल कासिम सुलेमानी ही थे। जोकि अपनी सेना का नेतृत्व कर रहे थे। जनरल कासिम सुलेमानी ने इस कठिन कार्य को अपने हाथों में लिया और अपनी सेना के बहादुर जवानों के साथ मिशन पर बहुत ही तेजी के साथ निकल पड़े। क्योंकि एक-एक पल बहुत ही कीमती था। अपने जाँबाज जवानों के साथ आतंकियों से लोहा लेना आरंभ कर दिया। और बड़ी रणनीति के साथ आंतकियों के ऊपर आक्रमण बहुत ही तीव्र गति से आरम्भ कर दिया। जनरल सुलेमानी ने बड़ी रणनीति के साथ आतंकियों पर आक्रमण आरम्भ किया था। सभी आतंकी बहादुर जनरल की रणनीति के जाल में फंस गए। जनरल की फौज से लोहा लेने के लिए सभी आतंकी जनरल की फौज से मुकाबला करने में लग गए और उधर नर्सों पर से आतंकियों की पकड़ ढ़ीली हो गई और सभी आतंकी जनरल की फौज से लोहा लेने में जुट गए। बस क्या था जनरल कासिम सुलेमानी की दूसरी टुकड़ी रणनीति के अन्तर्गत नर्सों तक पहुँचने में सफल हो गई। यह जनरल सुलेमानी ही थे जिन्होंने अपनी सेना के बल बूते दुर्दाँत आतंकी संगठन आईएसआईएस के पसीने छुड़ा दिए। और भारत की सभी नर्सों को उन क्रूर आतंकियों से छुड़ा लिया। और सभी भारतीय नर्सें सकुशल भारत वापस आ सकीं। इस विषम परिस्थिति में भारत का खुलकर साथ देने वाले संकटमोचक जनरल को सुलेमानी को अमेरिकी फौज ने इराक में शहीद कर दिया। जोकि एक राजनैतिक रूप से इराक में एक विदेश रणनीतिकार के रूप में इराक की सरकार के बुलावे पर गए हुए थे।  

सज्जाद हैदर

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