लेखक परिचय

संजीव कुमार सिन्‍हा

संजीव कुमार सिन्‍हा

2 जनवरी, 1978 को पुपरी, बिहार में जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक कला और गुरू जंभेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में स्नातकोत्तर की डिग्रियां हासिल कीं। दर्जन भर पुस्तकों का संपादन। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर नियमित लेखन। पेंटिंग का शौक। छात्र आंदोलन में एक दशक तक सक्रिय। जनांदोलनों में बराबर भागीदारी। मोबाइल न. 9868964804 संप्रति: संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम

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इन दिनों ‘मार्क्‍सवाद और धर्म के बीच संबंध’ पर बहस जोरों पर है। पिछले दिनों केरल से माकपा के पूर्व सासद डा. केएस मनोज ने अपनी आस्था व उपासना के अधिकार की रक्षा का प्रश्‍न उठाते हुए पार्टी से त्यागपत्र दे दिया। डा. केएस मनोज को 2004 में माकपा ने तब लोकसभा का टिकट दिया था, जब वे केरल लैटिन कैथोलिक एसोसिएशन के अध्यक्ष थे। लैटिन कैथोलिक के करीब बीस लाख अनुयायियों में डा. मनोज का अच्छा प्रभाव है। गौरतलब है कि माकपा की केंद्रीय कमेटी ने एक दस्तावेज में स्वीकार किया है कि पार्टी सदस्यों को धार्मिक आचारों को त्यागना चाहिए।

साम्यवाद के प्रवर्तक कार्ल मार्क्‍स ने बड़े जोर देकर कहा था, ‘धर्म लोगों के लिए अफीम के समान है (Religion as the opium of the people)। मा‌र्क्स ने यह भी कहा था, ‘मजहब को न केवल ठुकराना चाहिए, बल्कि इसका तिरस्कार भी होना चाहिए।’ लेकिन मार्क्‍स गलत साबित हो रहे है। एक-एक करके उनके सारे विचार ध्‍वस्‍त हो रहे है। दो वर्ष पहले चीनी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ने अपने संविधान में बदलाव करते हुए धर्म को मान्‍यता दी। अब माकपा के महासचिव प्रकाश कारत मार्क्‍स का हवाला देते हुए कह रहे हैं, ‘धर्म उत्पीडि़त प्राणी की आह है, हृदयहीन दुनिया का हृदय है, आत्माहीन स्थिति की आत्मा है।’ कारत बैकफुट पर आ रहे हैं, ‘कौन कहता है कि माकपा धर्म के खिलाफ है। इसके बजाय हम धर्म से जुडे पाखंड और सांप्रदायिकता के विरोधी हैं।’

भारत के कम्‍युनिस्‍ट तो प्रारंभ से ही धर्मविरोधी है। हिन्‍दू धर्म के ये पक्‍के दुश्‍मन हैं। कारण साफ है हिन्‍दुत्‍व के आगे इनकी विचारधारा की हालत पतली हो जाती है। खिसियाकर ये कभी राम-सीता को भाई-बहन बताते है तो कभी राम को काल्‍पनिक ही साबित करने लगते है। कभी गीता को मनुष्‍यता के विरोधी बताते है तो कभी वेदों को गडेरिए का गीत। लेकिन इस्‍लाम को परिवर्तनकामी बताते है। इस्‍लाम के सामने ये मिमियाने लगते है, तब मार्क्‍स का फलसफा ताक पर रख देते है कि धर्म अफीम है। कन्नूर (केरल) से माकपा सांसद रहे केपी अब्दुल्लाकुट्टी हज यात्रा पर गए। केरल विधानसभा में माकपा के दो विधायकों ने ईश्वर के नाम पर शपथ ली। कुछ दिनों पहले कोच्चि में माकपा की बैठक में अनोखा नजारा देखने को मिला। मौलवी ने नमाज की अजान दी तो धर्मविरोधी माकपा की बैठक में मध्यांतर की घोषणा कर दी गई। मुसलिम कार्यकर्ता बाहर निकले। उन्हें रोजा तोड़ने के लिए पार्टी की तरफ से नाश्ता परोसा गया। यह बैठक वहां के रिजेंट होटल हाल में हो रही थी।

वहीं, याद करिए जब सन् 2006 में वरिष्ठ माकपा नेता और पश्चिम बंगाल के खेल व परिवहन मंत्री सुभाष चक्रवर्ती ने बीरभूम जिले के मशहूर तारापीठ मंदिर में पूजा-अर्चना की और मंदिर से बाहर आकर कहा, ‘मैं पहले हिन्दू हूं, फिर ब्राह्मण और तब कम्युनिस्ट’ तब इस घटना के बाद, हिन्दू धर्म के विरुद्ध हमेशा षड्यंत्र रचने वाली भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) के अन्दर खलबली मच गई। सबसे तीव्र प्रतिक्रिया दी पार्टी के वरिष्ठ नेता व पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने। उन्होंने तो यहां तक कह दिया, ‘सुभाष चक्रवर्ती पागल हैं।’ इसके प्रत्युत्तर में सुभाष ने सटीक जवाब दिया और सबको निरुत्तर करते हुए उन्होंने वामपंथियों से अनेक सवालों के जवाब मांगे। उन्होंने कहा कि जब मुसलमानों के धार्मिक स्थल अजमेर शरीफ की दरगाह पर गया तब कोई आपत्ति क्यों नहीं की गई? उन्होंने यह भी पूछा कि जब पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु इस्राइल गए थे और वहां के धार्मिक स्थलों पर गए तब वामपंथियों ने क्यों आपत्ति प्रगट नहीं की।

कल (19 जनवरी, 2010) के समाचार-पत्रों में दो महत्‍वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुए हैं। अमर उजाला में माकपा के महासचिव श्री प्रकाश कारत ने ‘कौन कहता है माकपा धर्म के खिलाफ है’ इस विषय पर लेख लिखा है वहीं दैनिक जागरण में भाजपा के राष्‍ट्रीय सचिव व सुप्रसिद्ध स्‍तंभकार श्री बलबीर पुंज ने इसी विषय पर ‘साम्‍यवाद की असलियत’ बताने की कोशिश की है। हम यहां दोनों लेख प्रकाशित कर रहे हैं और ‘प्रवक्‍ता डॉट कॉम’ के सुधी पाठकों से निवेदन कर रहे हैं कि इस विषय पर अपने विचार रखें :

कौन कहता है माकपा धर्म के खिलाफ है/प्रकाश करात

डॉ. के एस मनोज केरल से माकपा सांसद रहे हैं। उन्होंने पिछले दिनों पार्टी छोडऩे का ऐलान किया। इसकी वजह बताते हुए उन्होंने लिखा है कि पार्टी ने अपने दुरुस्तीकरण संबंधी दस्तावेज में सदस्यों के लिए यह निर्देश दिया है कि उन्हें धार्मिक समारोहों में भाग नहीं लेना चाहिए। चूंकि वह पक्के धार्मिक हैं, ऐसे में, यह निर्देश उनकी आस्था के खिलाफ जाता है। इसलिए उन्होंने पार्टी छोडऩे का फैसला किया।

मीडिया के एक हिस्से ने डॉ. मनोज के इस कदम को इस तरह पेश करने की कोशिश की है, जैसे माकपा का सदस्य होना किसी भी व्यक्ति की धार्मिक आस्थाओं के खिलाफ जाता है! कुछ सदाशयी धार्मिक नेताओं ने हमसे पूछा भी कि क्या यह फैसला आस्तिकों को पार्टी से बाहर रखने के लिए लिया गया है? ऐसे में, धर्म के प्रति माकपा का बुनियादी रुख स्पष्ट करने की जरूरत है। माकपा एक ऐसी पार्टी है, जो मार्क्‍सवादी दृष्टिकोण पर आधारित है। मार्क्‍सवाद एक भौतिकवादी दर्शन है और धर्म के संबंध में उसके विचारों की जड़ें 18वीं सदी के दार्शनिकों से जुड़ी हैं। इसी के आधार पर मार्क्‍सवादी चाहते हैं कि शासन धर्म को व्यक्ति के निजी मामले की तरह ले। शासन और धर्म को अलग रखा जाना चाहिए।

मार्क्‍सवादी नास्तिक होते हैं यानी वे किसी धर्म में विश्वास नहीं करते। बहरहाल, मार्क्‍सवादी धर्म के उत्स को और समाज में उसकी भूमिका को समझते हैं। जैसा कि मार्क्‍स ने कहा था, धर्म उत्पीडि़त प्राणी की आह है, हृदयहीन दुनिया का हृदय है, आत्माहीन स्थिति की आत्मा है। इसलिए मार्क्‍सवाद धर्म पर हमला नहीं करता, लेकिन उन सामाजिक परिस्थितियों पर जरूर हमला करता है, जो उसे उत्पीडि़त प्राणी की आह बनाती हैं। लेनिन ने कहा था कि धर्म के प्रति रुख वर्ग संघर्ष की ठोस परिस्थितियों से तय होता है। मजदूर वर्ग की पार्टी की प्राथमिकता उत्पीडऩकारी पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ वर्गीय संघर्ष में मजदूरों को एकजुट करना है, भले ही वे धर्म में विश्वास करते हों या नहीं।

इसलिए, माकपा जहां भौतिकवादी दृष्टिकोण को आधार बनाती है, वहीं धर्म में विश्वास करने वाले लोगों के पार्टी में शामिल होने पर रोक नहीं लगाती। सदस्य बनने की एक ही शर्त है कि संबंधित व्यक्ति पार्टी के कार्यक्रम व संविधान को स्वीकार करता हो और पार्टी की किसी इकाई के अंतर्गत पार्टीगत अनुशासन के तहत काम करने के लिए तैयार हो। मौजूदा परिस्थितियों में माकपा धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि धार्मिक पहचान पर आधारित सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ रही है।

बेशक माकपा में धर्म में विश्वास रखने वाले लोग भी हैं। ऐसे लोग मजदूर, किसान और मेहनतकश जनता के दूसरे तबकों के बीच से आए हैं। इनमें से कुछ प्रार्थना के लिए मंदिर, मसजिद या चर्च में भी जाते हैं। वे अपनी धार्मिक आस्था को गरीबों तथा मेहनतकशों के बीच काम से जोड़ते हैं। माकपा को ऐसे आस्तिकों के साथ हाथ मिलाने में कोई हिचक नहीं, जो गरीबों के हितों की वकालत करते हैं। खुद केरल में ऐसे सहयोग की लंबी परंपरा है। ईएमएस नंबूदिरीपाद ने मार्क्‍सवादियों और ईसाइयों के बीच सहयोग के क्षेत्रों के बारे में लिखा था और चर्च के कुछ नेताओं के साथ संवाद भी चलाया था।

जहां तक माकपा के ताजा अभियान की बात है, तो उसमें पार्टी अपने नेतृत्वकारी साथियों से अपेक्षा करती है कि वे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर आधारित मार्क्‍सवादी विश्व-दृष्टि को आत्मसात करेंगे। केंद्रीय कमेटी ने इस संदर्भ में जो दस्तावेज स्वीकार किया है, उसमें धार्मिक गतिविधियों से जुड़े दो दिशा-निर्देशों का जिक्र किया गया है। एक तो यही है कि पार्टी सदस्यों को ऐसे सभी सामाजिक, जातिगत तथा धार्मिक आचारों को त्यागना चाहिए, जो कम्युनिस्ट कायदे और मूल्यों से मेल नहीं खाते। यहां पार्टी सदस्यों से धार्मिक निष्ठा त्यागने की बात नहीं की जा रही, लेकिन उन आचारों को छोडऩा होगा, जो कम्युनिस्ट मूल्यों से टकराते हों, जैसे छुआछूत बरतना, महिलाओं को समान अधिकारों से वंचित करना या विधवा पुनर्विवाह का विरोध करना।

दूसरा दिशा-निर्देश पदाधिकारियों तथा निर्वाचित प्रतिनिधियों के आचरण से संबंधित है। उनसे कहा गया है कि वे अपने परिवार के सदस्यों की खर्चीली शादियां न करें और दहेज लेने से दूर रहें। उनसे यह भी कहा गया है कि धार्मिक समारोहों का आयोजन या धार्मिक कर्मकांड न करें। पार्टी के नेतृत्वकारी कार्यकर्ताओं को दूसरों द्वारा आयोजित ऐसे सामाजिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेना पड़ सकता है। यह विधायकों तथा पंचायत सदस्यों जैसे निर्वाचित लोगों के मामले में खास तौर पर सच है। कम्युनिस्ट नेता यह नहीं कर सकते कि सार्वजनिक रूप से कुछ कहें और निजी जीवन में कुछ और आचरण करें।

कुल मिलाकर यह कि कम्युनिस्ट पार्टी धर्म में आस्था रखने वाले लोगों को अपना सदस्य बनने से नहीं रोकती है।

बहरहाल, जहां वे अपने धर्म का पालन करते रह सकते हैं, वहीं उनसे यह उम्मीद भी की जाती है कि धर्मनिरपेक्षता पर कायम रहेंगे और शासन के मामलों में धर्म की घुसपैठ का विरोध करेंगे। पुनरुद्धार के दिशा-निर्देशों का यही मकसद है कि कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों को कम्युनिस्ट मूल्यों के अनुरूप आचरण करने में मदद की जाए। डॉ. मनोज का कहना गलत है कि धार्मिक आचार के संदर्भ में अपने नेतृत्वकारी कार्यकर्ताओं के लिए माकपा ने जो दिशा-निर्देश दिए हैं, वे भारतीय संविधान के खिलाफ जाते हैं। हमारा संविधान एक धर्मनिरपेक्ष राज्य का प्रावधान करता है, जो हर नागरिक को अपनी मर्जी के धर्म के पालन का अधिकार देता है। वही संविधान किसी नागरिक के इस अधिकार की भी गारंटी करता है कि वह चाहे, तो किसी धर्म का पालन न करे। माकपा एक ऐसा संगठन है, जिसमें उसके दर्शन से सहमति रखने वाले नागरिक स्वेच्छा से शामिल होते हैं।

पार्टी सदस्यों के लिए जिन दिशा-निर्देशों का जिक्र किया है, वे नए नहीं हैं। इन दिशा-निर्देशों को वर्ष 1996 में तब सूत्रबद्ध किया गया था, जब पुनरुद्धार अभियान का पहला दस्तावेज स्वीकार किया गया था। बहरहाल, चूंकि यह मुद्दा अब उठाया गया है, अत: हमारे लिए जरूरी हो गया कि धर्म तथा कम्युनिस्ट दृष्टिकोण पर पार्टी का रुख स्पष्ट किया जाए।

(लेखक माकपा के महासचिव हैं)

साम्यवाद की असलियत/बलबीर पुंज

अभी हाल के दिनों में ‘मा‌र्क्सवादी दर्शन बनाम आस्था’ समाचार पत्रों में चर्चा का विषय रहा है। वास्तव में मजहब को लेकर वामपंथियों का रवैया विरोधाभासों से भरा है। उनका मानना है कि धर्म अफीम है। वे एक मजहबविहीन समाज बनाना चाहते हैं, क्योंकि मजहब अंधविश्वास फैलाता है। हालाकि निरीश्वरवादी साम्यवादियों की कथनी और करनी में कभी साम्य नहीं रहा। मुस्लिम लीग को छोड़कर मा‌र्क्सवादियों का ही वह अकेला राजनीतिक कुनबा था, जिसने मजहब आधारित पाकिस्तान के सृजन को न्यायोचित ठहराया। मोहम्मद अली जिन्ना को मा‌र्क्सवादियों ने ही वे सारे तर्क-कुतर्क उपलब्ध कराए, जो उसे अलग पाकिस्तान के निर्माण के लिए चाहिए थे। एक तरह से पाकिस्तान के जन्म में वामपंथियों ने ‘दाई’ की भूमिका निभाई है।

आजादी के बाद केरल में कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री ईएमएस नंबूदरीपाद ने मुस्लिम बहुल एक नए जिले-मल्लपुरम का सृजन किया। मुस्लिम कट्टरपंथ को कम्युनिस्टों का सहयोग व समर्थन हमेशा मिलता रहा है। वह चाहे सद्दाम हुसैन का मसला हो या फलस्तीन-ईरान का-मा‌र्क्सवादी कट्टरंथियों के मजहबी जुनून में हमेशा शरीक होते आए। सात समंदर पार एक डेनिश कार्टूनिस्ट ने पैगंबर साहब का अपमानजनक कार्टून बनाया तो उसका भारत के मुसलमानों ने हिंसक विरोध किया। उनके साथ कम्युनिस्टों का लाल झडा भी शहर दर शहर लहराता रहा। बाग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को कट्टरपंथियों की अनुचित माग के कारण ही रातोरात कोलकाता से बेघर कर दिया गया।

दुनिया के जिस भाग में साम्यवादियों की सरकार आई, कम्युनिस्टों का पाखंड ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रह सका। उन्होंने वर्ग विहीन, शोषण विहीन, और भयमुक्त समतावादी खुशहाल समाज देने का दावा किया। जिस तरह कोई पुजारी या मौलवी चढ़ावे के बदले में अपने भक्तों में स्वर्ग या जन्नत का अंधविश्वास पैदा करता है, कम्युनिस्टों ने खुशहाल समाजवाद के नाम पर ऐसा ही छलावा किया है। नब्बे के दशक तक समाजवाद का मुलम्मा उतर गया था। सोवियत संघ में तो समाजवादी ढाचे के कारण बदहाली और तंगहाली का आलम यह था कि लोगों को अपनी हर जरूरत के लिए लाइन पर लगना होता था। सोवियत-आर्थिक ढाचे से प्रेम के कारण ही अपने देश में भी यही स्थिति आई और 1991 में देश को अपनी अंतरराष्ट्रीय देनदारियों को पूरा करने के लिए अपना स्वर्ण भंडार गिरवी रखना पड़ा था। चीन का अस्तित्व बना हुआ है तो उसका कारण यह है कि वहा माओ के बाद के शासकों ने समय रहते खतरे की आहट भाप ली और वामपंथी अधिनायकवाद के नीचे एक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की स्थापना की।

हमारे यहा केरल और पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों का शासन रहा है और दोनों ही राज्यों में आम आदमी त्रस्त है। जिस सर्वहारा के कल्याण की मा‌र्म्सवादी कसमें खाते हैं, वही वहा हाशिए पर हैं। 575 जिलों में अध्ययन करने के बाद पहली बार प्रकाशित एक आधिकारिक आकलन के अनुसार देश के 1.47 प्रतिशत गरीब ग्रामीण भारतीय पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हैं। जिले की 56 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे है तो शहरी आबादी का 36.6 प्रतिशत गरीब है। ग्रामीण गरीबी के मापदंड पर पश्चिम बंगाल का स्थान चौथा है। 169 लाख आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। भारत के सौ गरीब ग्रामीण जिलों में पश्चिम बंगाल के कुल 18 जिलों में से 14 इस सूची में शामिल हैं। केरल की स्थिति भी ऐसी ही है।

व्यक्ति की निजी आस्था पर मा‌र्क्सवादियों का पहरा हास्यास्पद है। अपने यहा ही नहीं, पूरी दुनिया में आध्यात्मवाद की एक तरह से वापसी दिखाई दे रही है और संशयवादियों का वैज्ञानिक तर्क भी काम नहीं आ रहा। ‘धर्म अफीम है, इससे दूर रहो’, परवान चढ़ने वाली नहीं है। आस्था के प्रश्न पर स्वयं मा‌र्क्सवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं का मुखर विरोध इसे ही रेखाकित करता है। मा‌र्क्सवाद के प्रारंभिक मतप्रचारक जब भारत आए तो कुंभ के मेले में उमड़े जनसैलाब को देखकर उन्हें बड़ी मायूसी हुई थी और उन्होंने तब ही यह मान लिया था कि इस अध्यात्म प्रधान देश में साम्यवाद का पल्लवित होना मुश्किल काम है। जन्म के नब्बे साल बाद इस विशाल भारत देश के मात्र तीन राज्यों में ही पार्टी अपना असर बना पाई है। ऐसे में केरल के एक सदस्य और पूर्व सासद डा. केएस मनोज ने अपनी आस्था व उपासना के अधिकार की रक्षा के लिए त्यागपत्र दिया और उसके समर्थन में जब समर्थकों का एक बड़ा वर्ग उठ खड़ा हुआ है तो नास्तिक माकपाइयों का बैकफुट पर जाना स्वाभाविक है।

डा. केएस मनोज को 2004 में माकपा ने तब लोकसभा का टिकट दिया था, जब वे केरल लैटिन कैथोलिक एसोसिएशन के अध्यक्ष थे। लैटिन कैथोलिक के करीब बीस लाख अनुयायियों में डा. मनोज का अच्छा प्रभाव है। तब नास्तिक माकपा को आस्तिक डा. मनोज से कोई परहेज भी नहीं हुआ था। क्यों? व्यापक विरोध को देखते हुए पार्टी प्रमुख प्रकाश करात अब नास्तिक दर्शन से हटते हुए यह कह रहे हैं कि पार्टी मत/पंथ या ईश्वर में आस्था के खिलाफ न होकर साप्रदायिकता के खिलाफ है। यह मा‌र्क्सवादियों की बौद्धिक बाजीगरी मात्र है। वस्तुत: वे उसी लीक का अनुपालन कर रहे हैं, जो मा‌र्क्स और लेनिन खींच गए हैं। मा‌र्क्स ने कहा था, ”मजहब को न केवल ठुकराना चाहिए, बल्कि इसका तिरस्कार भी होना चाहिए।” उसका मा‌र्क्सवाद 19वीं सदी के यूरोप से प्रसूत था। तब बौद्धिक और आर्थिक कारणों से समाज पर मजहब की पकड़ एक अभिशाप बन गया था। 17वीं सदी तक दुनिया की राजनीति का केंद्र रहे यूरोप को एक नए पंथनिरपेक्ष छवि की आवश्यकता थी। उसके लिए जो आदोलन चला, मा‌र्क्सवाद उसी से प्रभावित है।

मा‌र्क्सवादियों ने मजहब को व्यक्तिगत विश्वास व मान्यता या सास्कृतिक विशिष्टता के दृष्टिकोण से नहीं देखा, उन्होंने इसे एक राजनीतिक चुनौती के रूप में लिया, परंतु भारत में हिंदू मत कभी संगठित नहीं रहा और न ही राज्य के शासन से इसका कोई सरोकार ही रहा। भारत में शासन और मत, दो अलग स्तरों पर काम करते हैं और उनके बीच सत्ता के नियंत्रण के लिए कोई संघर्ष ही नहीं है।

वास्तव में देखा जाए तो मा‌र्क्सवादी चिंतन ही अफीम है, क्योंकि यह लोगों के सामने एक ऐसी व्यवस्था का सपना परोसता है जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। साम्यवाद मौजूदा दौर में अप्रासंगिक हो चुका है। आने वाला समय वर्ग संघर्ष का नहीं होकर सभ्यताओं के संघात का काल होगा। एक समय ऐसा था, जब लगता था कि यूरोप से लेकर एशिया और अमेरिका से लेकर अफ्रीका के हर कोने लाल झडे से पट जाएंगे, किंतु अब इस्लामी कट्टरवाद का जहर बेसलान से लेकर जकार्ता और न्यूयार्क से लेकर ढाका तक फैल चुका है। कट्टरपंथियों के जुनूनी आदोलन को कम्युनिस्टों का बिन मागा सहयोग प्राप्त होता है। क्या इस्लाम के साथ आस्था का प्रश्न खड़ा नहीं होता? अनीश्वरवाद की पताका लहराने वालों को केसरिया रंग में साप्रदायिकता और हरे झडे में सद्भावना झलकती है। इस कलुषित विचारधारा से सामाजिक समरसता कैसे संभव है, जिसके सृजन का भार कथित तौर पर साम्यवादियों ने अपने कंधे पर उठा रखा है?

[लेखक भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं]

36 Responses to “परिचर्चा : मार्क्‍सवाद और धर्म”

  1. dr. b.p.singh

    Marxwad bhartiya paristhitiyon me bilkul lagoo nahi ho sakta. ye marxwadi chhadma dharm nirpeksh hai. hhindutwa ke naam par inke chhati par saano lotata hai lekin huz karne me, aatankwadi muslimo ko inka purn samarthan hai

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  2. dr dhanakar thakur

    बहुत पुराने लेखों को मैंने आज देखा है
    यदि भारतीय साम्यवाद अपने में अछा परिवर्तन करता है और पाखंडों के विरोध तक सीमित रखता है तो अच्छी बात है
    स्म्यावादी दर्शन अपूर्ण है क्योंकि उसे भारतीय या हिन्दू धर्म के वांग्मय का अभाश था ही नहीं

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  3. vikas

    कौन कहता है की वामपंथी धर्म के विरोद्धी है, ये तो केवल हिन्दू धर्म के विरोधी है. इस्लाम तो इनके लिए परोपकारी है. इनका कोई सदस्य हज्ज करने चला जाये तो ठीक है, किन्तु दुर्गा पूजा में चला जाये तो सम्पर्दायिक है. वामपंथ भारतीय मानस अवन दर्शन के लिए नहीं है.

    भारतीय वामपंथी कहते है की धर्म एक अफीम है, जिसका सबसे ज्यादा सेवन वे स्वयं करते है.

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  4. himawant

    “धर्म को पूँजीवाद ने मार्क्सवाद के खिलाफ एक कारगर हथियार के रूप में पकड़ रखा” गुड @दृष्टिकोण. संघ को चाहिए की इस आरोप के सत्य को समझे और अमेरिकापरस्ती की अपनी नीति मे बदलाव लाए.

    वामपंथी पार्टीयो को भी चाहिए की चर्च के अतिक्रमण के विरोध के सवाल पर वह संघ का साथ दे. माओ स्वयं विदेशी चर्च द्वारा धर्मांतरण के बहुत बडे विरोधी थे.

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  5. himawant

    यह जो हिन्दुत्व और वामपंथ के बीच झगडा या यु कहे रगडा है उसका जिम्मेवार कौन है? कुछ हिन्दु और कुछ वामपंथी खेमे के चंद लोग्. क्योकी हिन्दु और वामपंथीयो के संयुक्त दुश्मन नही चाहते की उनके दुश्मनो मे मिलाप हो. जबकी मै यह मानता हु की जब हिन्दुत्व और वामपंथ मिल कर क्रांती करेगें तो वह अवश्य सफल होगी.

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  6. shishir chandra

    sanjeev kumar sinha ji intna sunder vishay chunne ke liye punah aapko badhai. bjp aur communist apne root se katte ja rahe hain aur iska khamiyaja donon ko bhugatana padega. donon ko apni vichardhara me wapis laut jana chahie. main kuldeep nair ke is baat se sahmat hoon ki ek desh me dakshin panthi, wampanthi aur madhyamargi party ka hona bahut jaruri hai. communist party ka bane rahna desh hit me hoga.

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  7. Bikash

    Mujhe lagta hai ki hum ab dharam jaat paat ke bandhan se mukt hokar loktantra ki soche to desh ko shayad jyada fayda ho……..
    long live democracy

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  8. bhoopen

    yah ek jabardasti ki bahas hai jisme pakch wale vipakch walo ka saath de rahe hai aur vipakch wale pakcha ka.kyonki bharat me dharm ka matlab hai dharn karna (acchaiyo ko dharan karna). jiska markswad kabhi virodh nahi karta.aur reliogen ka arth hota hai aloukik shakti me vishaws jo samany dharm ki paribhasa hai .to aap hi sochiye bahas kis par honi chahiye……………..?

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  9. satish mudgal

    Dharma aur kuchh nahin ek common agenda hai jis per adhiktar log sahamat ho saktein hain samaj ki bhalai karne ke liye. Arthat Dharma samaj hit mein logon ko jodta hai. Jab wampanthiyon ko laga ki Dharma ka virodh karne per log unse door ho jayenge to unhone sweekar kar liya. China mein isliye sweekar kar liya kar liya ki dharmik logon ka virodh satta ke liye asahniya hoga aur vishwastar per swikrit dharmnirpekshta ka virodhi batakar unhein antarrashtriya star per unhein galat na karar diya ja sake. Magar Asal kaaran hai ki janta ko rajdroh se sirf dharma hi rokta hai. Yedi Wampanthi sarkaar hai aur vidroh ko panapne se rokna hai to unhein dharma ko sweekarna hoga, badhana hoga. Dharma vo shakti hai jo vyakti ko vikhandan nahin balki jodna sikhati hai. sanyam sikhati hai, Santosh sikhati hai.

    Wampanthiyon ke dwaara dharma ka virodh sirf satta prapti ke saadhan ke roop mein tha ab vah aavashyak Nahin kyonki satta mil chuki hai.

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  10. sadhak ummed singh baid

    दोनों तरफ़ चल रहा, बस भ्रम का व्यापार.
    धर्म कोई समझा नहीं, लङते हैं बेकार.
    लङते हैं बेकार, दूकान चलाने अपनी.
    मूर्ख बने जनता, वे रोटी सेंके अपनी.
    कह साधक देखें कौन आता समझ की तरफ़.
    बस भ्रम का व्यापार चल रहा दोनों तरफ़.

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  11. abhishek anand

    ये बड़ा ही रोचक है की अगर हम कुछ पेपर पढने में चुक भी गए तो आप के इस वेब द्वारा हम इसे पढ़ पते है ,धन्यवाद

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  12. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    भाजपा और माकपा: एक न्य़ूडीस्ट संस्थाने एक विद्वान प्रोफेसरको व्याख्यानके लिए बुलाया। व्याख्याता यह सोचकर कि वहां सरलतासे स्वीकृति हो, वहां न्य़ूड रुपसे प्रस्तुत हुआ। पर, वहां पहुंचकर देखता है, कि, उसे सुननेके लिए, सारे श्रोता उसका आदर करनेके उद्देशसे कपडे पहनकर आए हुए थे।बस यही विश्लेषण है, कि, भाजपा अपनी पहचान, वोटोंके चक्करमे छोड रही है। और वोटोंके चक्करमें माकपा भी अपनी पहचान छोडने की बात कर रही है। लेकिन कुछ समय पहले, बाबुलाल मरांडीने कहा था,कि मुसलमान भाजपाको कभी भी वोट देगा नहीं। यही मुझे सच प्रतीत होता है।माकपा भी इसी आधारपर, अपना(अलिखित) पाठ ढूंढ सकती है।

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  13. Umesh Agnihotri

    Well, your discussion should focus on Religion and God. There are religions, like Buddhism and Jainism, that don’t have any concept of God. In Hinduism too, there were many thinkers who didn’t believe in God.
    I have my god whom I worship, which simply means I have no or less faith in gods of other believers. For them I would be a non-believer. And if I believe in their god too, it leads me to think that there are not one but many gods. Will anyone of you throw some light on why did Veer Savarkar called himself a Hindu Atheist ?
    After what has happened in Haiti my faith in God is shaken. Why is he penalizing the poor of the earth ? Is he on an ego trip like a Greco-Roman pantheon who interfered in human events only, when their considerable egos were at stake.
    An American writer Barbara Ehreinrich once wrote:
    If we are responsible for our actions, as most religions insist, then God should be too, and I would propose post tsunami, an immediate withdrawal of prayer and other forms of flattery at supposedly moral diety until an apology is issued like for example: “ I was so busy with Cindy in Omaha’s weight loss program that I was not paying attention to earth crust.”
    It is not just Chrisitianity. Any religion centered on God , who is all powerful and all good including Islam and the monotheistically inclined version of Hinduism, should be subjected to a thorough post-tsunami evaluation. As many have noted before me: if God cares about our puny species, then disasters prove that He is not all powerful: and if he is all powerful he doesn’t care a damn.
    In 1755, a sunami hit Lisbon on All Saints Day. God of love should be vulnerable to post-jsunami doubts. What kind of love inspired him to wrest babies from their parents arms, the better to drown them in a hurry ?
    Few lines from Hindi poet Nagaarjun
    घोर अपराधी – सदृश नत बदन निर्वाक
    बाप-दादों की तरह रगड़ूं न अपनी नाक
    मंदिरों की देहरी पर पकड़ दोनो कान
    ओ कल्पना के पुत्र, हे भगवान,
    युगों की आराधना, आ गये अब तंग
    झांल और मृदंग
    तुम न पिघले
    पड़ गये वह मंद

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  14. sujata

    हाँ सही ही तो कह रहे हैं करात जी…मार्क्सवादियों का कोई धर्मं नहीं होता….ये जिश देश में रहते उसी के दुश्मन होते है, उसी को बर्बाद करते है, दुनिया में जहाँ भी ये रहे हैं उस देश को बर्बाद करके ही छोड़ा हैं, भला कौन सा धर्म ये सिखाता है…करात जी ने खुद ही अपनी सच्चाई स्वीकार ली है…कि मार्क्सवादियों का कोई धर्म नहीं होता……क्योंकि दुनिया का कोई धर्म ये नहीं सिखाता की जिस थाली में खाओ उसमे ही छेद करो ……………….संजीव जी आप आगे भी ऐसे ही अच्छे लेख लिखते रहिये..

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  15. रवि शंकर

    मर्क्सिस्म एक कठोर, घोर आदर्शवादी और नितांत अव्यवहारिक एवं असफल दर्शन है. मार्क्सवादी हर जगह असफल रहे हैं और सभ्यता एवं संस्कृति को नस्ट करने वाले रहे हैं. और चूँकि ये धर्म को अफीम मानते हैं इसलिए इस दर्शन से एक नेतिक आधार खिसक जाता है जिसका परिणाम होता है अधिनायक वादी और आततायी शाषन व्यवस्था जो खुद को जिन्दा रखने के लिए अपनी ही जनता और लोगों को खाती है. पूर्व सोविएत संघ, कूबा एवं उत्तर कोरिया इसका उधाहरण है और नको देख के कोई भी समझ सकता है के समाज क्या इस व्यवस्था के अंतर्गत क्या हश्र होता है. भारत के कोममुनिस्ट देशद्रोही, शत्रु राष्टों के प्रति झुकाव रखने वाले, देश की संस्कृति के विरोधी और पाखंडी रहें हैं. मार्क्स भी इनकी हरकतों को देख के खूब रोते…इस देश को मार्क्सवाद की कोई आव्यसक्ता नहीं है.

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  16. Samar

    भाई हरामजादे अब रामजादे बनाने की राह पर हैं तो विरोध काहे का??

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  17. Jeet Bhargava

    भारतीय राजनीति का सबसे खतरनाक और राष्ट्रविरोधी खेमा है भारतीय वामपंथ और उनकी पार्टियां. यह लोग धर्म का विरोध करते हैं. लेकिन किस धर्म का? सिर्फ हिन्दू और हिंदुत्व का. बाकी तो आए दिन वह इस्लाम और ईसाइयत की सेवा में लगे रहते हैं. वामपंथ एक दोगला चरित्र है. जिस पर कदापि भरोसा नहीं किया जा सकता. कम से कम राष्ट्रप्रेमी और हिन्दू जनता को तो उन पर भरोसा करना ही नहीं चाहिए. इन्ही लोगो ने पाकिस्तान के निर्माण और भारत के बंटवारे को हवा दी. आजादी की लड़ाई में जयचंदों की भूमिका निभाई, सुभाष चन्द्र बोस जैसे देशभक्त नेता को जापान का कुत्ता कहा. गांधी का विरोध किया. और अब यही वामपंथी हर राष्ट्रहित की बात का विरोध करते हैं. तालिबानों के लिए मातम मनाते हैं. वोट के लिए तस्लीमाओं जैसी आधुनिक विचारको पर हमले करवाते हैं और समय-समय पर पाकिस्तान प्रेम दर्शाते हैं. चीन की वकालात करते हैं और मां भारती और भारत की प्रजा के लिए मुसीबते खडी करते हैं. आज वामपंथी नेताओं का ना तो सर्वहारा से से कोइ मतलब है और ना ही गरीब व किसान से. दिन-रात वह हिन्दुओं को ही गरियाते रहते हैं और सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम-ईसाई तुष्टीकरण के जारी सत्ता की खेती करते हैं.

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  18. विकास आनन्द

    vikash Anand

    Lack of religion is one of the cause of disintegration of Soviet Sangh. In soviet army practice of religion is prohibited. Soviet policies frustrated people of USSR. Repressive policy of Soviet –Russia towards religion constrained freedom of practicing religion. On religion, Soviet-Russia guided by Marxist idea did not know religion gives ultimate peace. When human being after getting dissatisfaction from life takes shelter of spirituality for peace. If his labour or efforts doest not help in making ends, then he leaves result on god and carry on his effort continuously. Soviet – Russia was passing through crisis on every front. People was dissatisfied with government. Absence of religion left people helpless. These all factors led disintegration of USSR.

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  19. RAJ SINH

    सार्थक चर्चा हुयी .वामपंथ सिर्फ दिग्भ्रमित स्वार्थियों का गिरोह है. देश द्रोह और मानव द्रोह की भूमिका में. विदेशी भारत शत्रुओं का , भारत के आस्तीन में छुप जहर फ़ैलाने वाले और भारत तोड़ने का प्रयास कर रहे घाती शत्रुओं के दलाल की भूमिका रही है इनकी . हाँ सभी धर्म अपने वर्तमान रूप में अफीम ही नहीं जहर भी हैं सम्पूर्ण मानवता के लिए . दार्शनिक व्याख्या उनकी कुछ भी हो.

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  20. Ravindra Nath

    Dear friends,
    This post had raised really a nice topic & it’s now crossed boundary from where it started. I also want to add few points from my side on this issue.
    It’s no hidden fact that Communist party of India supported Pakistan’s creation, day dreaming that they will be able to bring new state in their influence, even though it was it was known to even a 5 year old boy then that basis of origin of Pakistan is religion. If Indian communist were real communist they should had opposed any move based on religious lines. At that time this move cost India & humanity more then 2 lakhs human life leave apart the financial losses.
    If this was not sufficient then at time of china attack in 1962 they supported china. I couldn’t had believed it, had not I read book “escape from Taliban” written by Mrs. Susmita Banerjee where she described her early (younger) days too. They spoiled youth mind with poison by feeding “Mao is our chairman”. That phenomenon only we are facing in form of naxal problem today.
    Unfortunately few of us started believing that religion can never be used for good, they forget that humanity had developed so much it was only because at one stage or other it got support from religious gurus in favor of development. I will like to remind Mr. Ansuman rastogi that kingdom of SHIVAJI in Maharastra was largely due to swami Samarth guru ramdas guidance. Also many reforms had been guided by religious gurus (Sikh gurus are known for this, then kabir, ravidas, namdev & many more). Even Christ also sacrificed himself for betterment of the common people who were suffering because of bad governance & religious heads then, but he (Christ) was also a religious leader & was doing every bit of his action as per his religious belief. Mr. Satyam is feeling guilty calling himself hindu, but can he reply why communism ks getting defeated everywhere, it’s because with time every philosophy starts getting polluted a little before cleaning itself, the same is with communism. Today communist are also suffering with class discrimination. Political class is most powerful there & like priest in religious groups, they are also don’t sweat & gaining weight in their middle, sucking blood of working class (whose supporter they project every time).
    Pankaj Jha is it’s correct if communist want to correct themselves then it should be welcomed, but actually it is only a eyewash, if Mr. manoj would not had such a mass support, this clearification wouldn’t had come from Marxists. And you rightly pointed out their form of untouchability in case of Mr. Uday prakash.

    Mr. Manoj had commented that Dharma, closes eyes first. Here I will just like to remind him that we have a long tradition of “SHASTRATHA” (debate) in our culture / religion. The debate of shankaracharya is famous one & swami dayanand had also did many. Kashi was center of it earlier. So we discussed everything then only accepted. Unlike in today’s scenario where one leader of a political party tries to run daily life & guide his believes through his orders.

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  21. नवीन कुमार "रणवीर"

    प्रकाश करात को मार्क्सवादियों के धार्मिक दृष्टिकोण को बतानें की कोशिश क्यों कर रहे हैं, ये अपनें आप में बड़ा सवाल है?
    माकपा के सदस्यों के लिए पार्टी का संविधान बड़ा है या विचारधारा बड़ी है या काडर या मज़दूर-किसान या आम आदमी?
    समझ से परे है कि पार्टी क्या चाहती है? ये स्थिति बिल्कुल भाजपा जैसी है। उसे भी नहीं पता की क्या करना है औऱ क्या
    विचारधारा है? इनके लिए केवल राजनीति ही विचार है और कुछ नहीं। दोनों एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। माकपा पश्चिम बंगाल में ३३
    सालों से सत्ता में है। इनके नेतागण वहां हर साल होनें वाले दुर्गा पूजा पंडालों में जाते है, और उनकी पत्नियां रोज पूजा-पाठ करती है।
    जितना अंधविश्वास बंगाल में है उतना शायद ही किसी अन्य राज्य में हो। औऱ यही हाल त्रिपुरा का भी है। लेकिन पार्टी का धर्म से अलग रहकर इतनें साल तक बंगाल औऱ त्रिपुरा जैसे राज्यों में राज करना संभव नहीं हो सकता। रही बात खुले तौर पर विरोध करनें की तो आपकी पार्टी के नेतागण सामनें कहते हैं कि धार्मिक प्रयोजनों से बचना चाहिए या शादी में ज्यादा खर्चा नहीं करना चाहिए। लेकिन क्या आपको याद है कि दिवंगत का.सुरजीत के पौत्र का विवाह कैसा हुआ था। अब आपकी छद्म धर्मनिरपेक्षता पर आते हैं। आपकी पार्टी इफ्तार पार्टियां देती है, पार्टी मीटिंग के दौरन नमाज़ अता करनें लिए अलग से समय देती है। आप एक बार पता करवाईयें कि आपकी पार्टी में कितनें लोग और उनके परिवार के सदस्य हज़ पर जानें के लिए अर्जी दिए हुए हैं। बात केरल की आपकी पार्टी का वहां सत्ता में होनें का सीधा मतलब देशभर में अल्पसंख्य में होनें वाले समुदाय का वहां पर बहुसंख्य में होना भी है। क्यों वहां भी आप अपनी छद्म धर्मनिरपेक्षता का ढिंढोरा पीट देते हैं। औऱ आपके भाई भाजपाई या संघी आपके तिरपाल के नीचे आनें के लिए लोगों को मजबूर कर देते हैं। औऱ रही बात
    आपकी पार्टी से बाहर जानें वाले ये जो नेतागण हैं ना, ये सब भी फर्जी भोकाली दिखाते हैं कि मुझे पार्टी से इसलिए निकाल दिया क्योंकि मैं पार्टी में रहकर अपनें आडंबरों को निभा रहा था। जब आपकी पार्टी का संविधान आपके काडरों का पहले से ही पता होता है, तो सालों अपनी
    राजनीतिक महत्वकांक्षा को पूरा करनें के बाद अचानक धर्म की याद आती है? इसीलिए आपको पार्टी से निकाल दिया जाता है कि आप
    अपनें धार्मिक प्रयोजनों में हिस्सा ले रहे थे? बात सालों बाद कैसे निकल कर आती है? और इस पर नेता जी भी ठोक कह देते हैं कि मैं बहले हिंदू हूं, फिर ब्राह्मण औऱ फिर मार्क्सवादी। शुक्र है कि बंगाली नहीं कहा? नहीं तो एक औऱ कलई खुल जाती। सब फ़र्जी भोकाली है।
    “मार्क्स नाम की लूट है, लूट सके तो लूट”…।

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  22. Dr. Surendra Pathak

    मैं पंकज झा से सहमत हूँ कि ‘प्रकाश जी को अपने पूर्वजों की ग़लती का अहसास हो रहा है तो इसका स्वागत ही किया जाना चाहिए ना कि उनकी वैचारिक हार के रूप में इसको प्रचारित-प्रसारित किया जाना चाहिए.’

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  23. kamlesh kumar diwan (writer)

    धर्म और राजनीति दूध और पानी है, कैसे अलग रखा जा सकेगा. हमे विकास के लिए, शिक्षा के लिए, लोकतंत्र के प्रवाह को बनाये रखने के लिए भी सोचना चाहिए. लोकतंत्र में हमारी प्राथमिकता चुनाव सुधार हो. गरीबी का उन्मूलन होना चाहिये. रोजगार के अवसर बढे ऐसा नियोजन जरूरी है.
    मेरे सुझाव फेसबुक पर है कृपाकर देखे.

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  24. Laxmi Narain Sharma

    Majhab ko le chale matalab ke raste . Dharma means selfisness its obsolutely wrong. Really religion means to serve the humanity our ancient literature is full and we proud for sleflesnes they have written in Jainism,Buddhism,Sanatan, etc. Religion means – Ahinsa, Satya, Asteya, Brahamcharya,Aprigraha,Souch,santosh,tap,swadhyaya,ishwar pranidhan. In yog they called Yam and niyam.Please see Patanjali Yog darshan in detail which is necessary today in your bahas to define the actual religion without any recomendation.With thanks for your quarry.

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  25. amitabh

    अच्छा चिंतन है. अभी पिछले दिनों मै कही पढ़ रहा था कि ज्योति बासु का अंतिम संस्कार हिन्दू रीती से होगा.अब आप विचार कर ले परिवर्तन का.

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  26. manoj

    क्यों न पहले यही तय कर लें कि धर्म है क्या? लेनिन या माक्र्स की सुनें या बलबीर पुंज की. माक्र्सवाद कमजोर हो रहा है या मजबूत इससे बड़ा सवाल है माक्र्स की अवधारणा क्या है धर्म के बारे में. प्रकाश करात का कहा सही है या गलत ये निर्णय लेने से पहले यह भी तो सोचें कि हम आखिर उनसे सुनना क्या चाहते हैं. क्या हम पहले से ही तय नहीं कर बैठे हैं कि वो कुछ भी बोलेंगे करना विरोध ही है. अगर वो धर्म को सिरे से नकार दें तो आप फरमान जारी करने को बैठे ही हैं और जब वे लोगों की आस्थाओं का सम्मान कर रहे हैं तो कह रहे हैं कि धर्म की अफीम चखना चाह रहा है नव माक्र्सवाद. माक्र्स ने जब ये कहा था कि धर्म एक अफीम है तो गलत नहीं कहा था. जरा इस बात को खुली न$जर से देखिये और समझिये तो…यूं धर्म विचार की आंखें सबसे पहले मूंदता है तो कैसे समझेंगे. बहरहाल, ये बहस और बड़े पैमाने पर होनी चाहिए.

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  27. alok nandan

    काउत्सकी के एक पंपलेट का जवाब देते हुये लेनिन ने उसे गद्दार घोषित किया था…अपने जवाब में लेनिन ने विस्तार से उन लक्षणो की पहचान की थी जो उस वक्त मार्क्सवाद के खिलाफ जाते थे…लेनिन ने संसदीय प्रणाली से बिल्कुल दूर रहने की बात की थी…मार्क्स वैचारिक स्तर पर धर्म और संसद दोनों की भूमिका को समाज में नकारात्मक रूप से देखता था…यदि लेनिन की माने तो भारत में तमाम मार्क्सवादी गद्दार काउत्सकी के ही नक्से कदम पर अभी तक बढ़ रहे हैं…मार्क्सवाद की इतने तरीके से व्याख्या कर डाली है कि मार्क्सवाद का मूल ही यहां पर चौपट हो गया है। व्यवहारवादी राजनीति के तरह इन्हें स्वीकार भी कर लिया गया है। करात समेत तमाम मार्क्सवादी काउत्सकी के ही बदले हुये रूप हैं…मार्कसवाद की मूलधारा से इतर बह रहे हैं। पुंज जी मार्क्वादी चिंतन को ही अफीम करार दे रहे हैं…यह तो चार कदम और आगे बढ़ गये है। मार्क्स अपन चिंतन को विज्ञान के साथ जोड़ता था…और अपने चिंतन को वैज्ञानिक कहता था….चाहे मार्क्स और उसकी विचारधारा के बारे में कुछ भी कहा जाये इतना तो तय है मार्क्स दुनिया को समझने का एक मजबूत नजरिया देता है…मार्क्सवाद पर आधारित व्यवस्था सोवियत संध ध्वस्त हुआ है, और इसके साथ ही दुनिया में मजदूर संगठन भी ध्वस्त हुये हैं…धर्म के मैकेनिज्म को गहराई से समझने की कोशिश पहली बार मार्क्स ने ही की थी..

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  28. vikas

    जबसे दुनियामे धर्मो का जन्म हुवा तब से इन्सान इन्सान का दुश्मन बना हुवा है ! एक धर्म में भी अनेक गुट होते है और
    उनमे भी मर काट होती रहती है ! पाकिस्तान तो धर्मके नामपर जल रहा है ! अमेरिका में २६-११ सिर्फ धर्मके अंधेपन और
    बेबुनियादी बाते उजागर होती है ! धर्म नहीं होते तो इन्सान इन्सान का भाई होता था , न कोई किसी का घर जलाता था !
    सिर्फ धर्म के अंधेपन से गलीलियो जैसे वैद्न्यानिक को जला कर मार डाला उसने साबित किया था की पृथ्वी सूरज का चक्कर
    लगाती है ,सूरज पृथ्वी का नहीं ! और पृथ्वी भ्रमांड के मध्य नहीं है ! धर्मके नामपर ही लाखो करोडो प्राणियों की बलि दी जाती
    है ,और उसका कारन भी ऐसा देते है जैसे बचपना हो ! बेबुनियादी बातो से सभी धर्म ग्रन्थ भरे पड़े है ! वास्तविक धरातल पर
    देखे तो सभी बातें सिर्फ झूठी लगती है ,लेकिन कोई अपना दिमाग इस्तेमाल नहीं करता ! इसलिए दुनियामे धर्म के पाखंड के ढोल
    जरुरतसे ज्यादा बजते है !

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  29. MANAV

    लोग अब भी अन्धविश्वास से भरे पड़े है ! पहले इन्सान और सारे जिंवोंका निर्माता भगवान को माना जाता था लेकिन एक पेशी
    के द्वारा जिव -जंतु के निर्माण के बारेमे हमें सबसे पहले डार्विन जैसे महान वैद्न्यानिक ने बताया सभी जिव उत्क्रांत वाद सिंधांत
    के अनुसार जन्मे है ! अभी विश्व का निर्माण कैसे हुवा इसके लिए प्रयोग हो रहा है अगर प्रयोग सफल होता है तो मालूम पड़ेगा
    की विश्व का निर्माण कुदरती है तो फिर भगवान का अस्तित्व मिट जायेगा ! भगवान के वजह से इंसान पंगु बन गया है !
    अगर भगवान का अस्तित्व होता तो दुनियामे इतने बुरे काम नहीं होते इन्सान -इन्सान को सिर्फ धर्मके नामपर क़त्ल नहीं करता !
    धर्म युद्ध में करोडो लोग नहीं मरते ! इसलिए भगवान का कोई अस्तित्व नहीं है यह साबित होता है !!

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  30. राजेश अग्रवाल

    लानत है कारत को भी और इस्तीफा देने वाले महोदय मनोज को भी. कारत घुमा-फिरा कर बातें कर रहे हैं. उन्हें ठीक ठीक कहना चाहिए कि धर्म किन परिभाषाओं में सचमुच एक धर्म होता है- तुलसीदास की सुनें तो परहित सरिस धरम नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई. धर्म पर आस्था रखने वाले लोग अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए किसी धार्मिक स्थल पर क्यों जाते हैं, किसी गरीब दुखियारे की मदद कर शांति की तलाश करने की कोशिश नहीं करते. वे प्रार्थना करते हैं ईश्वर से, मांगने जाते हैं, स्वार्थ होता है उनका. इसमें आस्था की कौन सी बात है. ईश्वर को कुछ देने जाएं तो समझ में आए कि वे एक पवित्र आत्मा बनने की दिशा में कुछ करने जा रहे हैं. ईश्वर कई रूपों में इसी दुनिया में, अपने पास पड़ोस में दिख जाएंगे. आपने एक शायर की पंक्ति सुनी होगी- मंदिर के भीतर चढ़े घी पूरी मिष्ठान, मंदिर के बाहर खड़ा ईश्वर मांगे दान. धार्मिक ही अगर हैं तो तो आप मंदिर के बाहर खड़े भिखारियों, पीड़ितों की तरफ ध्यान दें. ईश्वर के प्रति आपका कर्तव्य अपने आप पूरा हो जाएगा और पुण्य कमा लेंगे.
    करात जी जैसे लोग दिग्भ्रमित हैं भयभीत हैं. वे अपने उसूलों पर टिके रहना तो चाहते हैं पर धर्म के मौजूदा स्वरूप को नापसंद करने के बाद भी उससे टकराने का साहस नहीं जुटा सकते हैं.मनोज जी ने क्या कम्युनिस्टों की पार्टी पकड़ते समय मार्क्स के धर्म सम्बन्धी विचारों का अध्ययन नहीं किया था? किसी व्यक्ति की निजी आस्था कुछ और, सामाजिक जवाबदेही कुछ अलग कैसे हो सकती है. बलवीर जी, एक पक्ष की ओर झुके रहते हैं- उनसे सहमति हो न हो लेकिन उन्होंने अपना बचाव करते हुए कोई बात नहीं की. अपनी धारा पर वे कायम हैं.

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  31. पंकज झा

    पंकज झा.

    सबसे पहली बात यही कि अगर सुबह का भूला शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहते. आज यदि प्रकाश जी को अपने पूर्वजों की ग़लती का अहसास हो रहा है तो इसका स्वागत ही किया जाना चाहिए ना कि उनकी वैचारिक हार के रूप में इसको प्रचारित-प्रसारित किया जाना चाहिए. मैं कई बार एक स्थिति की कल्पना कर आनंद विभोर हो उठता हूँ जब वामपंथ की ऊर्जा और दक्षिण पंथ की आस्था का समन्वय हो जाये. बात चाहे धर्म को मानने की हो या उसका विरोध करने की तथ्य और तर्क के बदले सुविधा और अवसरवादिता हावी हो जाता है. वास्तविक सरोकार काफी पीछे छूट जाता है. इससे सबको बचने की ज़रुरत है. आप सत्य को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़ नहीं सकते. यदि सवाल धर्म के नाम पर फ़ैली कुरीतियों से है तो भला प्रकाश जी बताएँगे की कौन ऐसे मध्ययुगीन छुआछूत और जातिवाद को प्रोत्साहित कर रहा है. एक समरस समाज बनाने से इनकार कौन कर रहा है सिवा वामपंथ के.लेकिन आप अगर वैचारिकता के नाम पर छुआछोत को प्रश्रय देंगे जैसा उदय प्रकाश के मामले में किया की एक प्रतिष्ठित धर्माचार्य के साथ मंच पर भी बैठना उदय जी के लिए आपके भर्त्सना का सबब हो गया. आप इससे बचिए सत्य का निरंतर संधान करते रहना और विचारों में विमर्श की गुंजाइश एक जीवित समाज की निशानी है. आप बिना किसी दोहरे मानदंड के अपनी प्रतिभा और उर्जा का इस्तेमाल कीजिये फिर भला कौन नहीं चाहेगा की समाज के दबे-कुचले लोगों के उन्नति हेतु प्रयास किया जाए. अंत में धर्म के बारे में जैसा की वाल्टेयर ने कहा था की अगर इश्वर न है तो लोगों को चाहिए की वो उसका आविष्कार कर ले. अगर आप आज उसकी खोज करने निकले है हैं तो साधुवाद वामपंथ.

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  32. satyam

    बलबीर जी, और प्रवक्ता के सुधी पाठको इतना जान लो कि मार्क्सवाद, पूंजीवाद के हृदयहीन समाज मनुष्य को बाहर निकालने और उसकी मुक्ति का मार्ग दिखाने वाला दर्शन है और रहेगा. आप किस आध्यात्मिकता की वकालात कर रहे हैं ? उन परजीवियों की जो खुद तो कभी पसीने की एक बूंद नहीं बहाते और अपनी तोंद फुलाते हैं? या उस समाज कि जहां अपने ही धर्म के लोगों के साथ जानवरों से बदतर सलूक किया जाता है. ज़रा अपने धर्म की गलीच गलियों में घूमकर आयें तो? मैं एक उच्चा जाती का हिन्दू हम मगर जब मुझमे अक्ल आई तब से खुद को हिन्दू कहते हुए लगता है खुद के प्रति कुछ गुनाह कर रहा हूँ .

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  33. rajeevkumar905

    rajeev kumar

    यह सत्य है की परमात्मा है आखिर मार्क्सवाद कब तक धर्म को ठुकराएगा एक न एक दिन असत्य धरासाई होगा ही. वो चाहे आज हो या कल हो. जब रुस्सिया जैसा देश dharasaai ho gaye tab dam todte partiyon ki kya bisaat.

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  34. अंशुमाली रस्तोगी

    प्रकाश करात बेशक इस सच को प्रत्यक्ष रूप से न स्वीकारें मगर लेख में उनका कहना यही है कि अब मार्क्सवाद को जिंदा रखने के लिए धर्म की सत्ता जरूरी हो गई है।
    मार्क्स ने धर्म को अफीम कहा जरूर था मगर नवमार्क्सवादी उस अफीम का स्वाद अब चखना चाहते हैं। मार्क्सवाद अपने किताबी नियमों-सिद्धांतों में कितना ही धर्म के खिलाफ हो लेकिन व्यवहार में उसने हमारे दिलो-दिमाग से धर्म की कूपमंडूकता को हटाने के लिए कुछ नहीं किया। बिडंवना देखिए जैसे-जैसे समाज आधुनिक हो रहा है वैसे-वैसे धर्म आधुनिकता का मुल्लमा पहनकर मजबूत-दर-मजबूत होता चला जा रहा है। धर्म ने कभी किसी का हित किया हो ऐसा न मैंने आज तक कहीं सुना है न पढ़ा। फिर भी अंधआस्थाओं में डूबने-उतरने को हम आदत बनाए हुए हैं।

    यह भी जरा समझें। पश्चिमी बंगाल में मार्क्सवादियों ने दशकों शासन किया मगर धर्म की सत्ता को वे वहां भी डिगा नहीं पाए। धर्म निरंतर मजबूत हो रहा है क्योंकि हम धर्म से लड़ने की ताकत हम खोते जा हैं।

    धर्म को बाजार से भी काफी मजबूती मिली है।

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  35. सुमित कर्ण

    सुमित कुमार कर्ण

    विदेशी माटी पर उपजी साम्‍यवाद विचारधारा के प्रवर्तक कार्ल मार्क्‍स ने पाश्‍चात्‍य धर्मों के व्‍यवहार के आधार पर धर्मविरोधी मत प्रकट किया था। इसलिए मार्क्‍स के अनुयायियों ने इस विचार को सनातन मान लिया जबकि भारतीय धर्म पाश्‍चात्‍य धर्मों से नितांत अलग और अनूठा है। अपने धर्मविरोधी चरित्र के कारण ही भारतीय जनता ने माकपा को बंगाल, केरल और त्रिपुरा जैसे तीन राज्‍यों में सिमटा दिया। समग्रता से देखें तो भारत की माटी पर वैचारिक रूप से साम्‍यवाद पराजित हो रहा है और अपनी विचारधारा में परिवर्तन के लिए विवश हो गया है।

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  36. दृष्टिकोण

    धर्म को पूँजीवाद ने मार्क्सवाद के खिलाफ एक कारगर हथियार के रूप में पकड़ रखा। इसी पूँजीवाद ने आम जनता को पहले अशिक्षित रखा फिर धर्म की अफीम चटाकर अपना मकसद हल कर लिया। ऐसी स्थिति में एक गलत बुनियाद पर खड़ी तथाकथित मार्क्सवादी पार्टी एस सक्रमण से कैसे बच सकती थी। दरअसल मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के खात्मे की बेला आ गई है । देखा जाएगा कि जो धार्मिक हैं वे संघ में चले जाएंगे और जो नास्तिक हैं वे कांग्रेस में।

    दृष्टिकोण

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