मनोरंजन विधि-कानून

हाथ में मोबाइल, जेब में माइक लेकर घूमने वाले स्वयंभू पत्रकारों पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त

-अशोक “प्रवृद्ध”
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को घुन लग चुका है, और इस बार दीमक किसी बाहरी दुश्मन ने नहीं, बल्कि गलियों में माइक और मोबाइल थामे फिरने वाले स्वयंभू उगाहीबाजों ने लगाया है। इस सड़ती हुई व्यवस्था के सीने पर प्रहार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस गिरीश कठपालिया की एकल पीठ ने देश के न्यायिक इतिहास की सबसे सनसनाती और कड़वी टिप्पणी दर्ज की है। अदालत ने बिना किसी लाग-लपेट के साफ कह दिया है- “आज के इस अनियंत्रित डिजिटल दौर में, हाथ में मोबाइल और ₹500 का माइक्रोफोन लेकर कोई भी खुद को रिपोर्टर घोषित कर देता है, जबकि उनके पास न तो पत्रकारिता की कोई ट्रेनिंग होती है, न नैतिक समझ और न ही कोई जवाबदेही।” अदालत ने केंद्र सरकार और विधायिका को मुस्तैदी से निर्देशित किया है कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है, सरकार तुरंत एक ऐसा अभेद्य नियामक ढांचा तैयार करे जो निष्पक्ष प्रेस की आजादी की रक्षा भी करे और फर्जी, डराने-धमकाने वाले गिरोहों को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाए। जब अदालत ने जुलाई 2025 के दिल्ली के सीमापुरी इलाके के उस मुकदमे की केस फाइल खंगाली, तो आंखें फटी की फटी रह गईं। मामला यह था कि यूट्यूब चैनल के लिए काम करने वाले दो तथाकथित फ्रीलांस रिपोर्टर सीमापुरी की एक अवैध कॉलोनी में घुस गए। वहां वे एक धार्मिक स्थल के कथित अवैध निर्माण का वीडियो बिना किसी पूर्व अनुमति के आक्रामक तरीके से शूट करने लगे। उनके इस आक्रामक और उकसावे वाले बर्ताव ने वहां के स्थानीय लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़का दिया, जिसके बाद एक भयानक मास फ्यूरी (भीड़ का गुस्सा) फूटी। भीड़ ने उन दोनों यूट्यूबर्स को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, उनके कैमरे की बैटरी और मोबाइल छीन लिए। पुलिस ने इस मामले में आबिद अली और फुरकान नामक दो स्थानीय लोगों को भारतीय न्याय संहिता की संगीन धाराओं के तहत जेल भेज दिया था। इसी मामले में जब आरोपी जमानत के लिए हाईकोर्ट पहुंचे, तो अभियोजन पक्ष ने छाती पीटते हुए दलील दी कि यह हमला प्रेस की आज़ादी पर हमला है। इसी ढोंग पर जस्टिस गिरीश कठपालिया का गुस्सा भड़क उठा। कोर्ट ने साफ कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता का इस्तेमाल गैर जिम्मेदार पत्रकारिता, रंगदारी या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे में डालने के लिए शील्ड (ढाल) के रूप में नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने दोनों आरोपियों को ₹10,000 के निजी मुचलके पर जमानत तो दे दी, लेकिन डिजिटल मीडिया के नाम पर चल रहे इस धंधे के परखच्चे उड़ा दिए।

उल्लेखनीय है कि देश की हर गली, हर चौराहे, हर सरकारी दफ्तर, अस्पताल और छोटे दुकानदारों के लिए ये मोबाइल पत्रकार एक खौफ का पर्याय बन चुके हैं। इनका काम खबर दिखाना नहीं, बल्कि कैमरे का डर दिखाकर उगाही करना है। इनके काम करने का तरीका बेहद शातिर और खौफनाक होता है। इन दास प्रमोद टाईप स्वयंभू पत्रकारों के हथियार हैं- आक्रामक एंबुश, चयनात्मक रिपोर्टिंग, चुप रहने पर मुजरिम घोषित करना, सोशल मीडिया का ट्रायल आदि। ऐसे स्वयंभू पत्रकारों के पत्रकारिता का असली और कड़वा सच है- किसी भी छोटे कर्मचारी या डॉक्टर के मुंह के सामने जबरन माइक ठूंस देना, सिर्फ उतनी ही क्लिप दिखाना जिससे सामने वाला दोषी नजर आए, अगर पीड़ित कैमरे के सामने झिझक कर चुप हो जाए, तो चिल्लाना- देखो! यह भाग रहा है, यह चोर है और बिना किसी फैक्ट चेक के वीडियो को आधे-अधूरे थंबनेल के साथ यूट्यूब और फेसबुक पर अपलोड कर देना।

अदालत ने भी इस घिनौने जाल पर गहरी चिंता जताते हुए साफ कहा कि आक्रामक तरीके से माइक लगाना और सामने वाले के चुप रहने पर उसे जनता की नजरों में अपराधी बना देना, किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है। प्रश्न उत्पन्न होता है कि आखिर देश में एकाएक लाखों यूट्यूब पत्रकार कैसे पैदा हो गए? रिसर्च में सामने आया है कि दिल्ली के चोर बाज़ारों और ऑनलाइन साइट्स पर धड़ल्ले से यूट्यूब जर्नलिज्म किट बिक रही है। ₹300 का एक प्लास्टिक का माइक, जिस पर न्यूज अथवा समाचार का नकली स्टीकर लगा होता है, और एक मोबाइल ट्राइपॉड, बस, इतना सामान लेते ही कल तक सट्टा खेलने वाला या आवारा घूमने वाला लड़का अगले ही दिन इलाके का ब्यूरो चीफ बनकर सरकारी दफ्तरों में धौंस जमाने पहुंच जाता है। इनके पास न तो इंडियन प्रेस काउंसिल के नियमों की समझ है, न इन्हें डिफेमेशन (मानहानि) के कानून का पता है, और न ही इन्हें संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिलने वाली अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाओं का ज्ञान है। इनका एकमात्र मकसद होता है- कमज़ोर नस पकड़ना, वीडियो डिलीट करने के बदले पैसे ऐंठना और मना करने पर पीड़ित के चरित्र का सरेआम चीरहरण करना। दिल्ली हाईकोर्ट ने बिल्कुल सही नब्ज पकड़ी है कि अब समय आ गया है जब विधायिका को एक सख्त और संतुलित डिजिटल मीडिया रेगुलेशन एक्ट लाना ही होगा। जैसे वकालत करने के लिए बार काउंसिल की डिग्री और रजिस्ट्रेशन जरूरी है, डॉक्टरी के लिए मेडिकल काउंसिल का लाइसेंस अनिवार्य है, तो फिर देश की दिशा और दशा तय करने वाली पत्रकारिता के लिए कोई मापदंड क्यों नहीं? इस रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के तहत कई बुनियादी और कड़े सुधारों की आवश्यकता है, जैसे- न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता और प्रमाणीकरण, पंजीकरण और जवाबदेही और कड़े जुर्माने और बैन। डिजिटल या यूट्यूब पत्रकारिता शुरू करने के लिए कम से कम एक बुनियादी आचार संहिता की परीक्षा या मान्यता अनिवार्य हो। हर यूट्यूब न्यूज़ चैनल या फेसबुक पेज को सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के तहत खुद को रजिस्टर्ड करना होगा, ताकि किसी भी भ्रामक खबर पर सीधे क्रिमिनल लायबिलिटी तय हो सके।
यदि कोई स्वयंभू रिपोर्टर ब्लैकमेलिंग, जबरन वसूली या सांप्रदायिक नफरत फैलाता पाया जाए, तो केवल उसका वीडियो नहीं, बल्कि उसका पूरा चैनल और सोशल मीडिया अकाउंट हमेशा के लिए ब्लॉक किया जाए।
यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि जब देश के डॉक्टरों, इंजीनियरों और वकीलों की जवाबदेही तय करने के लिए सख्त कानून मौजूद हैं, तो लोकतंत्र की आड़ में इन स्वयंभू डिजिटल डकैतों को समाज को लूटने की खुली छूट क्यों दी गई है? क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं, जहां निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता का गला घोंट दिया जाएगा और केवल वही बचेगा जिसके पास सबसे ज्यादा चिल्लाने वाला माइक और सबसे गंदा थंबनेल होगा? अगर आज सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट की इस ऐतिहासिक चेतावनी को अनसुना किया, तो याद रखिए कि आने वाले समय में आपके घर के बाहर भी कोई ब्लैकमेलर माइक लेकर खड़ा होगा और आपकी निजता की धज्जियां सरेबाज़ार उड़ रही होंगी।