-अशोक “प्रवृद्ध”
कैसा अजब जमाना आया, कैसी मची है रील,
सारे जग की लाज-शर्म को, लोग गए हैं लील।
घर के अंदर, बेड के ऊपर, खींच रहे हैं फोटो,
व्यूज बटोरें, नोट कमाएं, यही बन गया मोटो।
सुबह से लेकर आधी रात तक, कैमरा ऑन रहता है,
भीतर का जो कुछ भी कचरा, सब बाहर बहता है।
खाते-पीते, रोते-धोते, सबकी बनती रील है,
संस्कार और लोक-लाज की, अब तो गायब सील है।
बस दो काम बचे हैं बाकी, सुन लो दुनिया वालों,
शौच-मूत्र की बची है रीलें, धीरज थोड़ा पालो।
मल त्यागने और धोने का, बस आना अब शेष रहा,
बाकी तो सब परोस दिया है, क्या कोई परिवेश रहा?
कमाने की अंधी चाहत में, लोग बने हैं बौने,
अपनी मर्यादा की गठरी, बेच रहे पौने-पौने।
अशोक “प्रवृद्ध” कहे सुन भाई, कैसा यह उत्थान है,
चमड़ी देकर दमड़ी लेना, क्या यही विज्ञान है?
स्मार्टफोन के इस दलदल में, सुध-बुध सब खोई है,
लाइक और कमेंट्स के पीछे, जनता पागल होई है।
थूक बिलोकर घी निकालने, का यह गंदा धंधा है,
दिखता सबको सब कुछ है पर, समाज आज अंधा है।