लेखक परिचय

सुरेश चिपलूनकर

सुरेश चिपलूनकर

लेखक चर्चित ब्‍लॉगर एवं सुप्रसिद्ध राष्‍ट्रवादी लेखक हैं।

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गत लोकसभा चुनावों के बाद से ही कांग्रेस को छोड़कर बाकी सभी राजनैतिक दलों के मन में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों को लेकर एक संशय है। इस विषय पर काफ़ी कुछ लिखा भी जा चुका है और विद्वानों और सॉफ़्टवेयर इंजीनियरों ने समय-समय पर विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के मॉडलों पर प्रयोग करके यह साबित किया है कि वोटिंग मशीनों को आसानी से “हैक” किया जा सकता है, अर्थात इनके परिणामों से छेड़छाड़ और इनमें बदलाव किया जा सकता है (अब चुनाव आयोग भी मान गया है कि छेड़छाड़ सम्भव है)। आम जनता को इन मशीनों के बारे में, इनके उपयोग के बारे में, इनमें निहित खतरों के बारे में अधिक जानकारी नहीं है, इसलिये हाल ही में प्रसिद्ध चुनाव विश्लेषक, शोधक और राजनैतिक लेखक श्री जीवीएल नरसिम्हाराव ने इस बारे में विस्तार से एक पुस्तक लिखी है… “डेमोक्रेसी एट रिस्क…”। इस पुस्तक की प्रस्तावना श्री लालकृष्ण आडवाणी और चन्द्रबाबू नायडू ने लिखी है, तथा दूसरी प्रस्तावना स्टेनफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर डेविड डिल द्वारा लिखी गई है।

इस पुस्तक में 16 छोटे-छोटे अध्याय हैं जिसमें भारतीय इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों के बारे में जानकारी दी गई है। शुरुआत में बताया गया है कि किस तरह इन मशीनों को अमेरिका और जर्मनी जैसे विकसित देशों में उपयोग में लाया गया, लेकिन लगातार आलोचनाओं और न्यूनतम सुरक्षा मानकों पर खरी न उतरने की वजह से उन्हें काबिल नहीं समझा गया। कई चुनावी विवादों में इन मशीनों की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठे, और अन्ततः लम्बी बहस के बाद अमेरिका, जर्मनी, हॉलैण्ड, आयरलैण्ड आदि देशों में यह तय किया गया कि प्रत्येक मतदाता द्वारा दिये गये वोट का भौतिक सत्यापन होना जरूरी है, इलेक्ट्रॉनिक सत्यापन भरोसेमन्द नहीं है। अमेरिका के 50 में से 32 राज्यों ने पुनः कागजी मतपत्र की व्यवस्था से ही चुनाव करवाना शुरु कर दिया।

इस विषय पर मैंने मई 2009 में ही दो विस्तृत पोस्ट लिखीं थी, जिन्हें यहाँ क्लिक करके… और यहाँ क्लिक करके… http://blog.sureshchiplunkar.com/2009/06/evm-rigging-elections-and-voting-fraud.html पढ़ा जा सकता है, जिसमें EVM से छेड़खानी के बारे में विस्तार से बताया था…।

जबकि इधर भारत में, चुनाव आयोग सतत इस बात का प्रचार करता रहा कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें पूर्णतः सुरक्षित और पारदर्शी हैं तथा इनमें कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। कई पाठकों को यह पता नहीं होगा कि वोटिंग मशीनों की निर्माता कम्पनियों BEL (भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड) और ECIL (इलेक्ट्रॉनिक्स कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड) ने EVM के माइक्रोचिप में किये जाने वाले सीक्रेट सोर्स कोड (Secret Source Code) का काम विदेशी कम्पनियों को आउटसोर्स किया। लेखक ने सवाल उठाया है कि जब हमारे देश में ही योग्य और प्रतिभावान सॉफ़्टवेयर इंजीनियर हैं तो यह महत्वपूर्ण काम आउटसोर्स क्यों किया गया?

सूचना के अधिकार के तहत श्री वीवी राव को सरकार द्वारा दी गई जानकारी के पृष्ठ क्रमांक 33 के अनुसार “देश की 13.78 लाख वोटिंग मशीनों में से 9.30 मशीनें पुरानी हैं, जबकि 4.48 लाख मशीनें नई हैं। पुरानी मशीनों में हेराफ़ेरी की अधिक सम्भावनाओं को देखते हुए याचिकाकर्ता ने जानना चाहा कि इन मशीनों को किन-किन राज्यों की कौन-कौन सी लोकसभा सीटों पर उपयोग किया गया, लेकिन आज तक उन्हें इसका जवाब नहीं मिला। यहाँ तक कि चुनाव आयोग ने उन्हीं के द्वारा गठित समिति की सिफ़ारिशों को दरकिनार करते हुए लोकसभा चुनावों में इन मशीनों को उपयोग करने का फ़ैसला कर लिया। जब 16 मई 2009 को लोकसभा के नतीजे आये तो सभी विपक्षी राजनैतिक दल स्तब्ध रह गये थे और उसी समय से इन मशीनों पर प्रश्न चिन्ह लगने शुरु हो गये थे।

पुस्तक के अध्याय 4 में लेखक ने EVM की कई असामान्य गतिविधियों के बारे में बताया है। अध्याय 5 में बताया गया है कि कुछ राजनैतिक पार्टियों से “इलेक्ट्रॉनिक फ़िक्सरों” ने उनके पक्ष में फ़िक्सिंग हेतु भारी राशि की माँग की। बाद में लेखक ने विभिन्न उदाहरण देकर बताया है कि किस तरह चुनाव आयोग ने भारतीय आईटी विशेषज्ञों द्वारा मशीनों में हेराफ़ेरी सिद्ध करने के लिये किये जाने वाले प्रयोगों में अडंगे लगाने की कोशिशें की। इन मशीनों की वैधता, पारदर्शिता और भारतीय परिवेश और “भारतीय चुनावी वातावरण” में उपयोग को लेकर मामला न्यायालय में चल रहा है। पाठकों की जानकारी के लिये उन्हें इस पुस्तक को अवश्य पढ़ना चाहिये, यह पुस्तक अपने-आप में इकलौती है, क्योंकि ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर सारी सामग्री एक साथ एक ही जगह पढ़ने को मिलती है। पुस्तक के प्रिण्ट फ़ॉर्मेट को मंगवाने के लिये निम्न पते पर सम्पर्क करें…

Veta Books,
B4/137,Safdarjung Enclave,
New Delhi 110 029
India
Email: veta@indianevm.com
Phone: +91 91 9873300800 (Sagar Baria)
Price: Rs. 295 -/-

जबकि इस पुस्तक को सीधे मुफ़्त में http://indianevm.com से डाउनलोड किया जा सकता है…(सिर्फ़ 1.38 MB)। इसी वेबसाइट पर आपको EVM से सम्बन्धित सभी आँकड़े, तथ्य और नेताओं और विशेषज्ञों के बयान आदि पढ़ने को मिल जायेंगे।

कांग्रेस समर्थकों, भाजपा विरोधियों और तटस्थों सभी से अपील है कि इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें, ताकि दिमाग के जाले साफ़ हो सकें, और साथ ही इन प्रश्नों के उत्तर अवश्य खोजकर रखियेगा –

1) इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में वोट देने के बाद क्या आप दावे से कह सकते हैं कि आपका वोट उसी पार्टी के खाते में गया जिसे आपने वोट दिया था? यदि आपको विश्वास है, तो इसका सबूत क्या है?

2) कागजी मतपत्र पर तो आप अपने हाथ से अपनी आँखों के सामने मतपत्र पर सील लगाते हैं, जबकि EVM में क्या सिर्फ़ पंजे या कमल पर बटन दबाने और “पीं” की आवाज़ से ही आपने कैसे मान लिया कि आपका वोट दिया जा चुका है? जबकि हैकर्स इस बात को सिद्ध कर चुके हैं कि मशीन को इस प्रकार प्रोग्राम किया जा सकता है, कि “हर तीसरा या चौथा वोट” “किसी एक खास पार्टी” के खाते में ही जाये, ताकि कोई गड़बड़ी का आरोप भी न लगा सके।

3) वोट देने के सिर्फ़ 1-2 माह बाद यदि किसी कारणवश यह पता करना हो कि किस मतदाता ने किस पार्टी को वोट दिया था, तो यह कैसे होगा? जबकि आपके वोट का कोई प्रिण्ट रिकॉर्ड ही मौजूद नहीं है।

4) अमेरिका, जर्मनी, हॉलैण्ड जैसे तकनीकी रुप से समृद्ध और विकसित देश इन मशीनों को चुनाव सिस्टम से बाहर क्यों कर चुके हैं?

अतः अब समय आ गया है कि इन मशीनों के उपयोग पर पुनर्विचार किया जाये तथा 2009 के लोकसभा चुनावों को तत्काल प्रभाव से दोबारा करवाया जाये…

लेखक : सुरेश चिपलूनकर

7 Responses to “लोकतन्त्र खतरे में??? वोटिंग मशीनों, उनकी वैधता और हैकिंग पर एक शानदार पुस्तक…”

  1. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    अत्यंत गंभीर मसला है जिसे अदूरदर्शिता के और या फिर भारत में चल रहे प्रायोजित प्रयासों के अंतर्गत उपेक्षित किया जा रहा है, हमें सदा के सामान भटकाने का प्रयास होता नज़र आ रहा है. कितनी अजीब बात नहीं है कि गुजरात में एक दश्द्रोही के एनकाउन्टर जैसे बेमतलब के मुद्दे को राष्ट्रीय महत्व का बना दिया, दूसरी और जहाँ करोड़ों मतदाताओं के साथ धोखे की प्रबल संभावना सामने है, उसे अत्यधिक हलकेपन से लिया जा रहा है.
    * ई.वी.एम्.की मदद से लोकतंत्र के साथ विश्व के इतिहास की सबसे बड़ी ठगी हुई होने की संभावनाओं पर जितने लिंक व सन्दर्भ विद्वान् एवं खोजी लेखक सुरेश चिपलूनकर जी ने दिये हैं, लोकतंत्र के लिए संभावित ख़तरा मानकर उसपर चर्चा करने के लिए वे पर्याप्त नज़र आते हैं. फिर भी उसकी उपेक्षा का क्या यह अर्थ है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि क्योंकि यह कांग्रेस के विरुद्ध जासकता है, अतः इस विषय को दबा जा रहा है? कल्पना करके देखें कि अगर यही आरोप भाजपा के विरुद्ध जा रहा होता तो मीडिया और स्वनाम धन्य लेखकों, साहित्यकारों व टिप्पणीकारों तलहका न मचा दिया होता, है कि नहीं ?
    * विश्व के अन्य अनेक देशों में अगर ई.वी एम्. को विश्वस्त नहीं माना जा रहा तो भारत सरकार, निर्वाचन आयोग इसपर कोई समाधानकारी पग दूसरे देशों के सामान उठाने से कतरा क्यों रहे हैं, इसे दबाने की कोशिश क्यों कर रहे हैं ?
    * क्या ऐसा नहीं लगता कि सरकार, निर्वाचन आयोग और कुछ समाज के स्वयंभू ठेकेदार ई.वी.एम्. के मुद्दे को दबाने, भटकाने के लिए अधिक ही सक्रीय, संवेदनशील तथा उग्र हैं? क्या ये व्यवहार संदेहों को बढ़ाने वाला नहीं है.?
    * आवश्यक है कि देश व लोकतंत्र के हित में विषय पर खुल कर चर्चा हो. इस विषय को आगे बढाने के लिए काफी सामग्री उपरोक्त लेख में उपलब्ध है.
    !!सुरेश जी को इस राष्ट्रीय महत्व के, सन्दर्भों व प्रमाणों से भरपूर लेखन हेतु मेरी बधाई एवं शुभकामनाएं!!.

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  2. sunil patel

    A very good news. It is fact that E-voting machines are not reliable, results can be managed by programming in it. We are not supporting the congress. But Congress was not able to get the lead in 2009 election at any cost. This debate can be closed only when the voting can be checked, but it is not possible by the e-machine.

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  3. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन उवाच

    चिपळूणकर:==>” अमेरिका, जर्मनी, हॉलैण्ड, आयरलैण्ड आदि देशों में यह तय किया गया कि प्रत्येक मतदाता द्वारा दिये गये वोट का भौतिक सत्यापन होना जरूरी है, इलेक्ट्रॉनिक सत्यापन भरोसेमन्द नहीं है।”========अमरिका में (१)एक वही के पन्ने के आकारका कार्ड वोट का निशान लगा कर, (२)सत्यापनको ध्यानमें रखते हुए, एक बंद पेटी में, बनी हुयी (slot) दरार में, डाला जाता है।(३) जिससे, सत्यापन करने में, सहायता होती है, या, दुबारा सबके सामने जाँच भी की जा सकती है।=== भारतमें भी इसी प्रकारसे मतदान करानेसे, गिनती करने में E V M की सुविधा तो होगीही, पर गडबडी होने की संभावना निश्चित घट जाएगी।

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    • दीपा शर्मा

      Deepa sharma

      Aadarniy madhusudan ji.
      Aapki baat ekdum sahi hai. Humko vote dene ke baad dastavezi sakshay milna chaiye ki hamra vote us jagah gaya he ki nahe jahan hum chahte thay. Mere vichar se is par janmat karaya jana chaiye. Aur ye article 19 ke tehat hamara constitutionl right bhi he ki ham jane hamara vote kahan gaya he. Electronic device par bharosa nahi kiya ja sakta he.
      Shubhkamnao sahit. Kirpiya jari rakhen.

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  4. रंजन

    2009 के लोकसभा चुनावों को तत्काल प्रभाव से दोबारा करवाया जाये…

    हा हा… मजा आ गया.. क्या recommendation है….. सिक्का तब तक उछालों जब तक हेड न आये… केवल लोकसभा क्यों.. सारे विधान सभा… कर्णाटक, मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, उत्तरप्रदेश… छतिसगढ़ .. सारे फिर से हो जाए… और २००९ की बात क्यों करते हो २००४ वाले चुनावों का क्या.. तब क्या हुआ था? वो भी चुनाव फिर से करवाने की मांग करते हैं…

    गडबडी हो सकती है… और गडबडी हुई… ये दो अलग अलग बाते है..

    जय हो..

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    • KKC

      ha ha ha, Azadi ke baad se aaj tak ghotale to sirf BJP ne hi kiye hain jabki shasan keval 10-12 percent period hi kiya hai. Garbari hui nahin, iski kya guarantee hai,………………

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      • दीपा शर्मा

        Deepa sharma

        Mahoday.
        2004 me to bjp satta me thi, kya tab bhi congress ne gadbadi ki thi? party system par behas kar kuch hasil nahi hoga. Agar problem he to ye election commission ka kaam he. Wahi isko solf karne ki power rakhta he.

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