प्रजातंत्र से प्रशस्त होता विकास का मार्ग

-कन्हैया झा-
democracy

हमारी बातचीत का विषय प्रजातंत्र है. प्रजातंत्र आज की डेमोक्रेसी नहीं है; यह उससे अलग है. पांच वर्ष में एक बार वोट देकर हम शासकों को चुनते हैं, जो संविधान द्वारा प्रतिपादित एक तंत्र अथवा शासनतंत्र के तहत काम करते हैं. प्रजातंत्र शासनतंत्र से अलग है. देखा जाय तो आज प्रजा में कोई तंत्र या व्यवस्था है ही नहीं. आज प्रजा और भीड़ में कोई अंतर नहीं है. सदियों पूर्व भारतीय ऋषियों ने इसकी जरूरत को समझा और शासनतंत्र के साथ-साथ वर्णाश्रम के रूप में प्रजा का भी एक तंत्र बनाया. ऐसे राष्ट्र को जिसमें शासनतंत्र एवं प्रजातंत्र दोनों हों, उसे विराट कहा. यह विराट क्या है? विराट एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है “एक ऐसा विशाल जिसमें सब चमकते हैं”. सीधी भाषा में कहें तो ऐसा देश जिसमें कोई गरीब नहीं है.

एक ऐसा राष्ट्र जिसमें शासनतंत्र एवं प्रजातंत्र दोनों हैं वह पूर्ण भी है. पूर्ण की यह भारतीय कल्पना भी बहुत क्रांतिकारी है. आप सबने ईशोपनिषद का यह श्लोक तो सुना ही होगा: ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम पूर्णात पूर्णमुदच्यते ! पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिश्य्ते! श्लोक का भावार्थ इस प्रकार है – पूर्ण से पैदा हुआ है इसलिए पूर्ण है. पूर्ण से पूर्ण निकालने से जो शेष बचेगा वह भी पूर्ण होगा. पूर्ण न घटता है न बढ़ता, एक रस रहता है. इस पूर्ण की कल्पना को पत्नि एवं पति से बने परिवार से समझा जा सकता है, क्योंकि वह भी पूर्ण है. एक परिवार अनेकों परिवारों को जन्म देकर भी पूर्ण ही रहता है. परिवारों की यह कड़ी पुरुष एवं स्त्री के संयोग से ही निरंतर चलती रहती है. परिवार में पुरुष कठोर है जबकि स्त्री सौम्य है. अग्नि स्वरुप पुरुष जीवनदाता है लेकिन उस जीवन को पालना-पोसना स्त्री का काम है.

आज शासनतंत्र देश की जीडीपी बढाने में तो सक्षम हो जाता है, पर गरीबी मिटाना एक मुश्किल काम होता है. भीड़ से किसी उपयोगी कार्य की अपेक्षा नहीं की जा सकती. गरीबी मिटाने के लिए प्रजा का एक तंत्र होना जरूरी है. जैसे की मैं पहले कह चुका हूं, वर्णाश्रम प्रजा का एक प्राचीन तंत्र है, जो इस देश में महाराजा मनु के समय से आजतक जाति-व्यवस्था के रूप में प्रचलित रहा है. हमें इसके मूलभूत सिद्धांतों को समझ आधुनिक परिवेश में एक नए रूप में प्रस्तुत करना होगा.

वर्णाश्रम दो शब्दों वर्ण एवं आश्रम से मिलकर बना है. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र चार वर्ण हैं, तथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास चार आश्रम हैं. आश्रम शब्द में श्रम अथवा पुरुषार्थ निहित है, और धर्म अर्थ, काम, एवं मोक्ष के रूप में ये भी चार हैं. वर्णाश्रम चूंकि एक शब्द है इसलिए वर्ण, आश्रम एवं पुरुषार्थ का आपस में सम्बन्ध होना चाहिए. जन्म के समय शिशु ज्ञान-शून्य है इसलिए उसे शूद्र या कुछ और भी कह सकते हैं. आज भूमंडलीकरण के युग में युवाओं को पूरे विश्व का ज्ञान लेना चाहिए. कौन जाने किसे राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर पहुंच राज-धर्म निभाना पड़े ? वर्णाश्रम के अनुसार युवाओं का वर्ण शूद्र, आश्रम ब्रह्मचर्य तथा पुरुषार्थ धर्म था.

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