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    Homeसाहित्‍यकवितावो उतना ही पढ़ना जानती थी?

    वो उतना ही पढ़ना जानती थी?

    वो उतना ही पढ़ना जानती थी?
    जितना अपना नाम लिख सके
    स्कूल उसको मजदूरो के काम
    करने की जगह लगती थी!
    जहां वे माचिस की डिब्बियों
    की तरह बनाते थे कमरे,
    तीलियों से उतनी ही बड़ी खिड़कियां
    जितनी जहां से कोई
    जरुरत से ज्यादा साँस न ले सके!
    पता नहीं क्यों?
    एक खाली जगह और छोड़ी गयी थी!
    जिसका कोई उद्देश्य नहीं,
    इसलिए उसका उपयोग
    हम अंदर बहार जाने
    के लिए कर लेते है,
    वो माचिस की डिब्बियों के
    ऊपर और डिब्बिया नहीं बनाते
    क्योंकि उन्हें लगता था
    कही वे सूरज तक न पहुँच जाये?
    इसी लिए नहीं बनाते उन डिब्बियो
    के सहारे सीढ़ियां,
    लेकिन नज़र से बचने के लिए
    छोटा टीका ही काफी होता है?
    फिर भी,
    दीवारों पर पोता जाता था
    काला आयत
    जिस पर अलग-अलग बौने
    लकड़ी को काटने की जगह
    समय को काटने के लिए
    सफेदी पोतते थे
    और उतना ही पढ़ाते रहे
    जितना वो अपना नाम लिख सके?

    मंजुल सिंह
    मंजुल सिंह
    शिक्षा- सिविल इंजीनियरिंग, एम.ए. (हिंदी), यू.जी.सी (नेट/जे.आर.एफ-हिंदी), वर्तमान में अध्यनरत

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