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तरुण तेजपाल प्रकरण में विधाता का अचूक न्याय दंड

-अशोक “प्रवृद्ध”

मनुष्य अपने कृत्य, बुद्धि, सत्ता और धन के मद में अंधा होकर भले ही यह मान बैठे कि वह लौकिक व्यवस्थाओं को अपने अनुकूल मोड़ सकता है, परंतु ब्रह्मांडीय न्याय का विधान अत्यंत सूक्ष्म और अकाट्य है। यह परम सत्य है कि समय कभी किसी का ऋण शेष नहीं रखता, वह ब्याज सहित कर्मों का हिसाब चुकता करता है। आधुनिक विधिक प्रणालियों के दांव-पेंच और तकनीकी विसंगतियों के परदे के पीछे चाहे जितने प्रपंच रचे जाएं, अंततः ऋत (सृष्टि का अटल नियम) अपना मार्ग खोज ही लेता है। हाल ही में 6 अगस्त 2026 को बॉम्बे उच्च न्यायालय की गोवा पीठ के जस्टिस डॉ. नीला गोखले एवं अमित जमसंदेकर द्वारा तहलका पत्रिका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाकर ट्रायल कोर्ट के संदेहास्पद फैसले को पलटना, इसी शाश्वत कर्मफल सिद्धांत का आधुनिक विधिक साक्ष्य है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2000 के दिसंबर से जनवरी 2001 के मध्य तरुण तेजपाल ने अपनी पत्रिका तहलका के माध्यम से भारतीय राजनीति के एक बेहद संवेदनशील और रक्षा सौदों से जुड़े स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम दिया था। इस कृत्य के ठीक 13 वर्ष बाद नवंबर 2013 को वह  स्वयं एक ऐसी विभीषिका के केंद्र में आया, जहां उसने अपनी कनिष्ठ सहयोगी के साथ गोवा के एक पांच सितारा होटल की लिफ्ट में जघन्य कृत्य किया। 2013 में दर्ज हुए इस मुकदमे की कछुआ चाल, ट्रायल कोर्ट की अनगिनत विसंगतियों और व्यवस्था के संरक्षण के बावजूद, ठीक 13 वर्ष बाद 6  अगस्त 2026 को उच्च न्यायालय ने उसे दोषी करार देते हुए जेल की सलाखों के पीछे भेजने का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

सनातन ग्रंथों में कर्म की गति को गहन और अपरिवर्तनीय माना गया है-
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।

-श्रीमद्भगवद्गीता 4/17
अर्थात- कर्म की गति अत्यंत गहन और रहस्यमयी है। जो व्यक्ति दूसरों के चरित्र हनन और राजनीतिक जीवन को मटियामेट करने के लिए षड्यंत्रों का जाल बुनता है, समय का चक्र उसे उसी के बुने जाल में इस प्रकार जकड़ देता है कि विधिक रसूख भी उसे बचा नहीं पाते।

इस प्रकरण का सबसे चिंताजनक और विचारणीय पहलू वर्ष 2021 में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश क्षमा जोशी की अदालत का आचरण रहा है। त्वरित न्याय का स्वांग रचने वाली हमारी न्याय प्रणाली में जहां देश की सर्वोच्च अदालत का स्पष्ट निर्देश था कि ऐसे यौन उत्पीड़न के संवेदनशील मामलों की सुनवाई 8 सप्ताह में पूर्ण होनी चाहिए, वहीं यह मुकदमा 8 वर्षों तक घिसटता रहा। इसके पश्चात, अप्रैल से मई 2021 के मध्य ट्रायल कोर्ट द्वारा फैसले की तिथियों को बार-बार बदलना किसी बड़े विधिक प्रपंच की ओर स्पष्ट संकेत कर रहा था, जिसकी सुगबुगाहट प्रबुद्ध विश्लेषकों ने पहले ही ताड़ ली थी। मुकदमे की अंतिम बहस 8 मार्च 2021 को ही पूर्ण हो चुकी थी, जिसके बाद निर्णय की तिथि 27 अप्रैल तय की गई। परंतु बिना किसी ठोस विधिक कारण के इसे बढ़ाकर 12 मई कर दिया गया। 12 मई को पुनः स्टाफ की कमी और कोविड का हवाला देकर तारीख 19 मई की गई। 19 मई 2021 को अदालत ने जो कारण दिया, वह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक अजीबोगरीब मिसाल बन गया- अदालत परिसर में बिजली की समस्या का बहाना बनाकर फैसले को 21 मई के लिए टाल दिया गया। अंततः 21 मई 2021 को जज महोदया ने 527 पन्नों का वह विवादास्पद निर्णय सुनाया जिसने तरुण तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया। निर्णय सुरक्षित होने के बाद इस प्रकार तिथियों का बार-बार स्थगन होना विधिक शुचिता और पारदर्शिता पर गहरे प्रश्नचिह्न खड़े करता है, जो परदे के पीछे होने वाली संभावित साठगांठ या सौदेबाजी की ओर जनमानस का ध्यान आकर्षित करता है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम के डिजिटल साक्ष्य संबंधी प्रावधानों, विशेषकर धारा 65B के अंतर्गत इलेक्ट्रॉनिक संदेशों को अत्यंत सुदृढ़ और प्राथमिक साक्ष्य की श्रेणी में रखा गया है। इस मामले में तरुण तेजपाल ने घटना के ठीक अगले दिन 19 नवंबर 2013 को पीड़िता तथा संस्थान की तत्कालीन प्रबंध संपादक को एक विस्तृत ईमेल भेजकर अपने कृत्य के लिए बिना शर्त माफी मांगी थी, जिसे विधिक भाषा में एक्स्ट्राजुडिशियल कन्फेशन कहा जाता है। एक प्रखर, शब्दों के जादूगर और कानून की समझ रखने वाले वरिष्ठ संपादक द्वारा लिखित रूप में अपनी गलती स्वीकार करना अपने आप में केस को समाप्त करने के लिए पर्याप्त था। परंतु ट्रायल कोर्ट ने इस अकाट्य सबूत को यह कहकर कूड़ेदान में डाल दिया कि यह ईमेल संस्थान की साख बचाने के लिए किसी दबाव में लिखा गया हो सकता है। उच्च न्यायालय ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए स्पष्ट किया कि न्याय की आंखें इतनी अंधी नहीं हो सकतीं कि वे आरोपी के अपने हाथों से लिखे कबूलनामे को ही नकार दें। उच्च न्यायालय के शब्दों में, ट्रायल कोर्ट का यह दृष्टिकोण पूरी तरह से विकृत और साक्ष्यों के विपरीत था। निचली अदालत के 2021 के फैसले ने बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों में देश के न्यायशास्त्र को दशकों पीछे धकेल दिया था। जज क्षमा जोशी ने अपने निर्णय में आरोपी के कृत्य की विवेचना करने के बजाय पीड़िता के आचरण का ही ट्रायल शुरू कर दिया था। फैसले में लिखा गया कि घटना के बाद सीसीटीवी फुटेज में पीड़िता हंसती-मुस्कुराती और सामान्य दिख रही थी, इसलिए उसके साथ कोई जबरदस्ती नहीं हुई होगी। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस पुरातनपंथी और रूढ़िवादी धारणा पर अत्यंत कड़ा प्रहार किया है। माननीय न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि आघात से गुजरने के बाद प्रत्येक महिला का व्यवहार एक जैसा नहीं होता। कोई अवसाद में चली जाती है, तो कोई समाज के डर से खुद को सामान्य दिखाने का प्रयास करती है। सीसीटीवी फुटेज किसी व्यक्ति के चेहरे की ऊपरी मुस्कान तो दिखा सकता है, परंतु उसके भीतर चल रहे मानसिक द्वंद्व और आत्मसम्मान के छिन्न-भिन्न होने की वेदना को नहीं माप सकता। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए कोर्ट में जो बात कही, उसे उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में सर्वोपरि माना, जब कोई महिला या कनिष्ठ सहयोगी ना कहती है, तो उसका अर्थ केवल ना ही होता है, चाहे उसका सामाजिक परिवेश या पूर्व आचरण कितना ही आधुनिक क्यों न हो।
उच्च न्यायालय द्वारा तरुण तेजपाल को आई पी सी की धारा 376(2)(f) और 376(2)(k) (पदों या रसूख का दुरुपयोग कर किया गया बलात्कार) के तहत दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के सश्रम कारावास और 10.21 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाए जाने के बाद भी विधिक प्रणालियों का एक और विरोधाभास हमारे सामने आता है। अदालत ने तेजपाल को उच्चतर अदालत, सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करने और आत्मसमर्पण करने के लिए चार सप्ताह का समय दे दिया है। भारतीय कानून के तहत, यदि किसी आरोपी को सीधे उच्च न्यायालय द्वारा दोषमुक्त से दोषी में परिवर्तित किया जाता है, तो देश की शीर्ष अदालत अपील को विचारार्थ स्वीकार करते हुए आमतौर पर उसकी सजा के निष्पादन पर तब तक के लिए रोक लगा देती है, जब तक कि अपील पर अंतिम निर्णय न हो जाए। चूंकि तेजपाल पिछले 13 वर्षों से जमानत पर बाहर है, इसलिए बहुत अधिक संभावना है कि वह जेल जाने से बच जाएगा और जमानत पर ही बाहर रहेगा। यह स्थिति आम नागरिक के मन में एक गहरी टीस पैदा करती है। जहां देश के आम और गरीब विचाराधीन कैदी छोटे-छोटे अपराधों में वर्षों जेलों में सड़ जाते हैं, वहीं रसूखदार अपराधी जघन्य अपराधों में सजायाफ्ता होने के बाद भी दशकों तक अपीलों के सहारे खुले आसमान के नीचे आलीशान जीवन व्यतीत करते हैं। कड़वा और अत्यंत संवेदनशील सत्य है कि एक ओर जहां वयस्क महिलाओं के मामलों में रसूखदार अपराधी लंबी कानूनी लड़ाइयों का लाभ उठाते हैं, वहीं दूसरी ओर देश में ऐसी भी घटनाएं देखने को मिलती हैं जहां 4-5  वर्ष की अबोध बच्चियों के साथ होने वाले पाशविक दुष्कर्म के मामलों में भी हमारी न्याय प्रणाली कई बार तकनीकी खामियों या गवाहों के अभाव में नरम या ढुलमुल रुख अपना लेती है। यद्यपि संसद ने पोक्सो कानून और आपराधिक कानून संशोधन के माध्यम से बच्चों के बलात्कारियों के लिए मृत्युदंड तक के कठोरतम विधिक प्रावधान किए हैं, परंतु धरातल पर जांच एजेंसियों की शिथिलता, साक्ष्यों का संकलन ठीक से न होना और निचली अदालतों में मुकदमों का वर्षों तक लटकना इन कड़े कानूनों के प्रभाव को शून्य कर देता है। न्यायपालिका का अपराधियों के प्रति अत्यधिक प्रक्रियात्मक उदारता दिखाना कई बार समाज में प्रतिशोध और अविश्वास की भावना को जन्म देता है। अंतिम सत्य है कि मनुष्य भले ही कुछ समय के लिए न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी और कानून की फाइलों के पीछे छिप जाए, परंतु इतिहास के पन्नों पर उसके कर्मों की स्याही कभी नहीं सूखती। तरुण तेजपाल, जिसने कभी तहलका के मंच से नैतिकता, शुचिता और ईमानदारी के बड़े-बड़े उपदेश दिए थे और बंगारू लक्ष्मण जैसे नेताओं के राजनीतिक जीवन पर कलंक का स्टिंग किया था, आज स्वयं इतिहास के चौराहे पर एक बड़े कलंक के साथ खड़ा है।
2026 का यह उच्च न्यायालय का निर्णय भले ही सुप्रीम कोर्ट की अपीलों और विधिक स्थगनों के चक्रव्यूह में कुछ समय के लिए उलझ जाए, परंतु इसने समाज के सामने यह सच पूरी तरह उजागर कर दिया है कि सत्ता और पद का मद कभी भी स्थायी सुरक्षा कवच नहीं बन सकता। विधाता की लाठी बेआवाज़ होती है, पर उसका प्रहार अचूक और अंतिम होता है। देर से ही सही, कर्मों का हिसाब हर किसी को यहीं इसी धरती पर पूरा करना पड़ता है, यही सनातन सत्य है और यही इस कालचक्र का अंतिम संदेश भी है।

अशोक “प्रवृद्ध”