लोकतंत्र को कलंकित करता भीड़तंत्र

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dimapurपिछले दिनों नागालैंड के दीमापुर में घटित हुई लोमहर्षक घटना ने पूरे देश के न्यायप्रिय तथा भारतीय संविधान व लोकतंत्र पर अपना विश्वास रखने वाले लोगों को हिलाकर रख दिया। हमारा देश ऐसी ही सांप्रदायिकता से शराबोर भीड़ के कई बदनुमा कारनामों को पहले भी कई बार देख चुका है जोकि देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए राष्ट्र की भारी बदनामी का कारण बन चुके हैं। चाहे वह 1984 के सिख विरोधी हुए दंगे रहे हों जो चंद सिरफिरे लोगों की गलती के परिणामस्वरूप दिल्ली सहित देश के कई भागों में हज़ारों बेगुनाह सिखों को अपनी जान व माल का नुक़ सान उठाकर सहने पड़े हों। चाहे वह 1992 का विवादित मस्जिद ढांचा विध्वंस का मामला हो जोकि अदालत में विचाराधीन होने के बावजूद पूरे नियोजित ढंग से सांप्रदायिकता के माहौल में हिंदुत्ववादी भीड़ द्वारा गिरा दिया गया हो। नतीजतन 6 दिसंबर के बाद मुंबई व देश के और दर्जनों स्थानों पर सांप्रदायिक हिंसा भडक़ी हो। और एक बार फिर ऐसी ही घटना का समाचार दीमापुर से प्राप्त हुआ है। समाचारों के अनुसार असम राज्य के करीमनगर जि़ले का स्थायी निवासी सैय्यद शरीफुद्दीनख़ान  कबाड़ का व्यापारी था और पुरानी कारें व अन्य पुराने वाहन खरीदने हेतु नागालैंड आता-जाता रहता था। समाचारों के अनुसार उसका सगा भाई इमामुद्दीन ख़ान 1999 के कारगिल युद्ध में भारतीय सैनिक के रूप में अपनी शहादत भी पेश कर चुका है। उसका एक और भाई कमालख़ान अब भी सेना की असम रेजीमेंट  में एक सैनिक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहा है। यहां तक कि सैय्यद शरीफुद्दीन का पिता सैयद हुसैन ख़ान भी भारतीय वायुसेना से सेवानिवृत हुआ है। उसकी मां ने भी सरकारी सेवा से अवकाश प्राप्त किया है।     यह व्यक्ति दीमापुर में किसी नागा मूल की लडक़ी के साथ एक होटल के कमरे में ठहरा हुआ था। पुलिस ने उसे उस लडक़ी के साथ गिरफ़तार किया। सूत्रों के अनुसार लडक़ी व पुलिस ने मिलकर शरीफुद्दीन से 2 लाख रुपये की मांग की अन्यथा उसके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने की धमकी दी। शरीफुद्दीन दो लाख रुपये देने में असमर्थ रहा। परिणामस्वरूप उसके विरुद्ध फौरन बलात्कार का केस दर्ज कर उसे जेल भेज दिया गया। जैसे ही यह खबर दीमापुर नागा समुदाय के लोगों को पता चली तत्काल संप्रदायिक शक्तियां सक्रिय हो उठीं। शरीफुद्दीन को बंगलादेशी नागरिक प्रचारित किया गया और उसे बलात्कारी बताया जाने लगा। इसके पश्चात बड़े ही सुनियोजित तरीके से दीमापुर के एक पार्क में कथित रूप से दस हज़ार नागा युवक व युवतियोंं की भीड़ इक_ी हुई। इस भीड़ ने पहले तो अपनी सभा में जमकर सांप्रदायिकता का ज़हर उगला। उसके पश्चात यह भीड़ सेंट्रल जेल दीमापुर की ओर चल पड़ी। भीड़ ने जेल का ताला तोडक़र जेल परिसर में घुसकर शरीफुद्दीन को अपने कब्ज़े में ले लिया। उसे लगभग सात किलोमीटर तक निर्वस्त्र कर रस्सी से बांधकर ज़मीन पर घसीटा गया। उसके शरीर पर त्रिशूल,भाला,लोहे की छड़ें तथा और कई धारदार हथियारों से इस कद्र हमला किया गया कि उसका शरीर क्षत-विक्षत हो गया और उसने इस असहनीय पीड़ा में ही दम तोड़ दिया। भीड़ का ग़ुस्सा  यहीं क़ाबू  नहीं हुआ। बल्कि उन उपद्रवियों ने मृतक के उस क्षत-विक्षत नंगे शरीर को एक टॉवर पर फांसी पर लटका दिया। इस पूरे निर्दयी घटनाक्रम को वहां की जनता भी मूक दर्शक बनकर देखती रही।पुलिस अथवा अर्धसैनिक बल भी तमाशाई बने रहे। इस भीड़ को न तो जेल  की ओर मार्च करने से रोका गया और न ही जेल में घुसने से। न ही शरीफुद्दीन को भीड़ के चंगुल से छुड़ाने की कोशिश की गई और न ही उसे जि़ंदा बचाया जा सका। तमाशाई तथा इस उपद्रवी भीड़तंत्र का हिस्सा बने लोग अपने बर्बरतापूर्ण कृत्य के साथ-साथ इस पूरे घटनाक्रम का अपने-अपने मोबाईल में वीडियो बनाने में ज़रूर व्यस्त रहे। इस हादसे के बाद शरीफुदीन के साथ जाने वाली लडक़ी की जो मेडिकल रिपोर्ट सामने आई है उसमें बलातकार की कोई पुष्टि नहीं हुई है। एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर दिखाया जा रहा है जिसमें एक लडक़ी को शरीफुदीन के साथ होटल के रिसेप्शन काऊंटर पर पूरी रज़ामंदी के साथ व सौहाद्र्रपूर्ण वातावरण में खड़े देखा जा रहा है। लिहाज़ा जो दो आरोप शरीफुद्दीन पर लगाए गए हैं वे दोनों ही आरोप झूठे साबित हो रहे हैं। यानी कि न तो वह व्यक्ति बंगलादेश नागरिक था आ्रैर न ही उसने किसी लडक़ी के साथ बलात्कार किया। सवाल यह है कि आखिर फिर उसे किस जुर्म की ऐसी सज़ा दी गई,क्यों दी गई और किस साजि़श के तहत इतना बड़ा संाप्रदायिकतापूर्ण वातावरण उसके विरुद्ध तैयार किया गया? यह घटना केवल दीमापुर या असम तक ही सीमित नहीं रही बल्कि महाराष्ट्र में बैठे शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे तक ने भी इस हृदय विदारक घटना को अपना समर्थन दिया है। उन्होंने इस घटना को जायज़ ठहराया तथा इसे भीड़ का गुस्सा करार दिया। क्या अब शक्ति व बाहुबल के आधार पर इस देश में इसी प्रकार फैसले होते रहेंगे? क्या अदालतों के अस्तित्व का अब कोई मकसद नहीं रह गया है? सांप्रदायिकता में डूबे भीड़तंत्र की सोच इस देश को आखिर कहां ले जाकर छोड़ेगी? देश में पहले भी कई बार बलात्कार,बलात्कार के साथ हत्या किए जाने,छोटी-छोटी बच्चियों से बलात्कार व उनकी हत्या करने,लड़कियों के शरीर को क्षत-विक्षत करने जैसे सैकड़ों हादसे हो चुके हैं और अब भी होते रहते हैं। अभी कुछ ही समय पूर्व हरियाणा के रोहतक जि़ले में एक नेपाली मूल की नाबालिग लडक़ी के साथ सामूहिक बलात्कार भी किया गया तथा उसके गुप्तांग को भी क्षत-विक्षत कर दिया गया। परंतु उस समय भीड़ का आक्रोश कहीं नहीं दिखाई दिया। आखिर क्यों? क्या इसलिए कि बलात्कारियों में कोई शरीफुद्दीन नहीं था? दिल्ली के निर्भया कांड में भी हत्यारे जेल में आराम से रह रहे हैं। नाबालिग अपराधी को नाबालिग होने का लाभ मिल रहा है। कई आरोपियों की फांसी की सज़ा आजीवन कारावास में बदल दी गई है। दिल्ली की इस घटना ने तो पूरी दुनिया में दिल्ली सहित पूरे देश को इतना बदनाम कर दिया था कि दिल्ली को ‘रेप कैपिटल’ का नाम दे दिया गया था। ऐसे अपराधियों के विरुद्ध दिल्ली की भीड़ अनियंत्रित होकर जेल के फाटक तोडऩे क्यों नहीं पहुंची? इन आरोपियों की झुग्गियां जलाने की साजि़श क्यों नहीं रची गई? क्या इसीलिए कि इनमें भी कोई शरीफुद्दीन नहीं था? दीमापुर की घटना ने देश के अल्पसंख्यक समाज को एक बार फिर यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि आखिर उनके साथ     इस प्रकार का सौतेला व अन्यायपूर्ण व्यवहार कब तक होता रहेगा?बड़े आश्चर्य का विषय है कि जिस परिवार में कारगिल का शहीद हो तथा पूरा परिवार देश की रक्षा व सेवा में लगा हो उसी परिवार के एक मामूली से अपराध करने वाले व्यक्ति को मारने हेतु उसे बलात्कारी भी बताया गया और उसपर बंगलादेशी नागरिक होने की तोहमत भी मढ़ दी गई? और सोने पर सुहागा यह कि इतना बड़ा अपराध व अन्याय करने वाले लोगों को देश में सांप्रदायिकता की राजनीति करने वाले नेताओं का समर्थन भी मिलता दिखाई दे रहा है? ऐसे हालात देश की एकता व अखंडता के लिए एक चेतावनी भरा संकेत है। देश में कानून व्यवस्था व न्याय का राज होना चाहिए? भारतीय लोकतंत्र को उस वास्तविक लोकतंत्र के रूप में संचालित होना चाहिए जिसके लिए वह पूरी दुनिया में जाना जाता है। लोकतंत्र को भीड़तंत्र बनाने से विशेषकर सांप्रदायिकतापूर्ण भीड़तंत्र बनाने से रोके जाने की ज़रूरत है। परंतु ठीक इसके विपरीत विभिन्न संप्रदायों की ज़हर उगलने वाली ताकतें अपने-अपने अनुयाईयों के बीच पूरे देश में घूम-घूम कर सांप्रदायिकता के बीज बो रही हैं। और शासन व प्रशसन तथा देश की खुिफया एजेंसियां इन सब की तरफ से आंखें मूंदकर बैठी हैं। वोट बैंक के खिसकने के डर से कहीं किसी ज़हरीले बोल बोलने वाले किसी नेता के विरुद्ध कार्रवाई नहीं की जा रही तो कहीं अपने पक्ष में वोट बैंक बनाने की गरज़ से जानबूझ कर ज़हरीले व आग उगलने वाले भाषण दिए जा रहे हैं। ऐसे भाषण सोशल मीडिया और यू टयूब पर आम लोगों को दिखाई दे जाते हैं परंतु क्या सरकार को यह चीज़ें दिखाई नहीं देती? 1984 के दंगे हों या 1992 की घटना या गुजरात के दंगे या फिर दीमापुर में हुई यह ताज़ी घटना अथवा कुछ समय पूर्व असम में फैली सांप्रदायिक हिंसा? या फिर कश्मीर में वहां के अल्पसंख्यकों के साथ होने वाला व्यवहार? यह सभी सांप्रदायिक शक्तियों के विचारों को बेरोक-टोक प्रचार व प्रसार की ही देन है। पिछले दिनों कश्मीर में एक आतंकवादी मसर्रत आलम की रिहाई पर लोकसभा में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि देश में उसकी रिहाई को लेकर आक्रोश है। प्रधानमंत्री को दीमापुर की घटना से देश के अल्पसंख्यकों में उत्पन्न आक्रोश को भी समझना चाहिए और इसकी निंदा करनी चाहिए।प्रधानमंत्री को उद्धव ठाकरे जैसे अपने सहयोगी के उस बयान पर भी संज्ञान लेना चाहिए जिसमें ठाकरे ने दीमापुर की घटना को जायज़ ठहराया है। नागालंैड सरकार को चाहिए कि इस दर्दनाक हत्याकांड से ज़ड़े सभी अपराधियों को विशेषकर इस हादसे की साजि़श रचने वालों को यथाशीघ्र गिरफ्तार कर उनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करे जिसमें कि एक बेगुनाह तथा देशभक्त परिवार के व्यक्ति को केवल इसलिए मार डाला कि वह संप्रदाय विशेष से संबंध रखता था? भविष्य में ऐसी घटनओं को रोके जाने का भी समस्त राज्य सरकारों द्वारा प्रयास किया जाना चाहिए। निर्मल रानी

 

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  1. निर्मल रानी बहन आपका कहना एकदम १००% सही है की भीड़तंत्र प्रजातंत्र के लिए खतरा है. किन्तु आप जो अल्पसंख्यक के प्रति भीड़ त्तन्त्र ज्यादती करता है इस कथन से मैं सहमत नहीं हुँ. जब किसी भीड़ का सामूहिक सोच बन जाता है और वह सोच कार्य में परिणित होता है तो अल्प और बहु का प्रश्न नहीं होता. . कुछ उदाहरणों को रख रहा हूँ, रतलाम (मप्र.)में सरकारी अस्पताल में ,अपने परिचित रुग्ण को मिलने गया ,वहां एक अल्पसंख्यक समुदाय के बीमार व्यक्ति को दो आदमी उठाकर लाये. इनके पीछे कम से कम ५०=६० आदमी थे ,और यह अक्सर होता है.की अस्पताल प्रशासन पर दवाब बनाने के लिए ऐसी भीड़ आती हैऽन्य समुदाय भी ऐसा करते हैं, ऽइक बार थने पर एक अपराधी को जो शराबी था ,पुलिस पकड़कर लाई। तत्काल उस समुदाय के व्यक्ति बड़ी संख्या में आ गये. जिस स्थान पर जो लोग अधिक संख्या में हैं वे एक दवाब बनाते हैं। जैसे आपने दिल्ली में सिक्ख समुदाय पर हुए हमलों के बारे में कहा. काशमीर में एक बार सामूहिक रूप से सिक्खों की हत्याएं हुई. काश्मीर के विस्थापित पंडित अभी तक दिल्ली की सड़कों पर हैं. क्या देश के अन्य भागों में ऐसा कभी किया गया?रतलाम और प्रदेश के कई अस्पतालों में आये दिन यदि कोई प्रसूता या अन्य बीमार आदमी मर जाता है ,तो संबधित बीमार के परिजन ,हंगामा ,तोड़फोड़ ,डाकटरों से बदसलूकी करते हैं ,प्रशासन भी डाकटरों की कोई सुरक्षा सम्मान नहीं करता, फलस्वरूप ४ विशेषज्ञ डाक्टर इस्तीफा दे चुके हैं. जब पुलिस किसी अपराधी को पकड़ने जाती है. तो उस पर आक्रमण किया जाता है. जुआरियों ,शराब माफियाओं ,को पुलिस आसानी से पकड़ ही नहीं सकती। अतः यह कहना की भीड़ केवल अल्पसंख्यक समाज के लिए ही खतरनाक है सही नही. जहां जो अधिक सख्या में है वह समाज कभी कभी ऐसा कर ता है. हर समाज बार बार ऐसा करता है ऐसा भी नहीं है. लेकिन अच्छे काम के लिए भीड़ कम जुटी है. यह भीड़ तंत्र या सामूहिक सोच का कार्यपालन प्रजातंत्र के लिए खतरनाक है.

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