लेखक परिचय

डा. अरविन्द कुमार सिंह

डा. अरविन्द कुमार सिंह

उदय प्रताप कालेज, वाराणसी में , 1991 से भूगोल प्रवक्ता के पद पर अद्यतन कार्यरत। 1995 में नेशनल कैडेट कोर में कमीशन। मेजर रैंक से 2012 में अवकाशप्राप्त। 2002 एवं 2003 में एनसीसी के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित। 2006 में उत्तर प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ एनसीसी अधिकारी के रूप में पुरस्कृत। विभिन्न प्रत्रपत्रिकाओं में समसामयिक लेखन। आकाशवाणी वाराणसी में रेडियोवार्ताकार।

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विचारधारा का विरोध, राष्ट्रविरोध नही होता

डा. अरविन्द कुमार सिंह

 

सुख, शान्ति एवं समृद्धि

  •             जहाँ आज शहर, वहाँ कल खेती थी। आज जहाँ उद्योग, वहा कल खेती थी। जहाँ रोड, रेलवे लाईन वहाँ कल खेती होती थी।
  •             जमीन या तो किसी व्यक्ति विशेष की है फिर सरकार की।
  •             शहर के लोगो को चावल, गेहॅू और दाल गाॅव की खेती से प्राप्त होता है।
  •             खेती दो प्रकार की। सिर्फ अपना भरण पोषण हेतु। दूसरा अत्यधिक खाद्यान होने पर, उसे बेचकर अपनी आवश्यकताओं के लिये धन प्राप्त करना।
  •             जीवन यापन के मात्र तीन श्रोत। नौकरी, खेती या फिर व्यवसाय।
  •             जिन्दगी में सुख, शान्ति एवं समृद्धि की हर किसी को अभिलाषा।
  •             इसके मात्र दो रास्ते। सांसारिक एवं अध्यात्मीक।
  •             सांसारिक व्यवस्था के अन्र्तगत पैसे की महत्ता सर्वोपरी।

क्या आप नही चाहते ?

 

  •             किसान की जिन्दगी में सुख, शान्ति एवं समृद्धि का आगमन हो?
  •             क्या किसान भी अच्छे मकान, अच्छा वस्त्र तथा अच्छे भेाजन का हकदार हो?
  •             उसका पुत्र अच्छे स्कूल में पढे? अच्छी नौकरी करे? समाज में उसे मान, सम्मान की प्राप्ति हो?
  •             वह इन सबकी पूर्ति आखिरकार कैसे करेगा?
  •             नौकरी पेशा अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति अपने वेतन से करता है। और किसान के पास इस हेतु मात्र उसकी फसल और जमीन है।
  •             भूमि अधिग्रहण बिल उसके समृद्धि का दरवाजा खोलता है। आइए समझे यह क्या है।
  •             यहा मैं स्पष्ट कर दूं। भूमि का अधिग्रहण सरकार करती है कुछ निश्चित उद्देश्यो की पूर्ति हेतु। वह उद्ेश्य जनहित एवं राष्ट्रहित से जुडा होता है।

 

क्या  है भूमि अधिग्रहण 2013 ?

 

  •             निजी प्रोजेक्ट के लिये 80 प्रतिशत, पीपीपी के लिये 70 प्रतिशत लोगो की सहमति जरूरी।
  •             हर अधिग्रहण के पहले सामाजिक प्रभाव का आकलन जरूरी।
  •             बहु फसली और उपजाउ जमीन का विशेष परिस्थिति में ही अधिग्रहण।
  •             ग्रामीण भूमि का मुआवजा बाजार से चार गुना तथा शहरी जमीन का दो गुना।
  •             पांच साल में यदि प्रोजेक्ट नही शुरू हुआ तो जमीन किसानो को वापस।
  •             किसी नियम की अनदेखी करने वाले अधिकारियों पर कानूनी कार्यवाई।

क्या कहता है भूमि अधिग्रहण 2014 ?

 

  •             केवल रक्षा उत्पादन, ग्रामीण इन्फ्रा और औद्योगिक कारीडोर के लिये सहमति जरूरी नही।
  •             सामाजिक प्रभाव का आकलन राष्ट्रीय सुरक्षा, ग्रामीण इन्फ्रा और औद्योगिक कारीडोर के लिये आवश्यक नही। बाकी सबके लिये जरूरी।
  •             बहु फसली और उपजाउ जमीन का राष्ट्रीय सुरक्षा एवं ग्रामीण इन्फ्रा के लिये ही मात्र अधिग्रहण।
  •             ग्रामीण भूमि का मुआवजा बाजार से चार गुना तथा शहरी जमीन का दो गुना।
  •             पांच साल में यदि प्रोजेक्ट नही शुरू हुआ तो जमीन किसानो को वापस।
  •             नियम की अनदेखी करने वाले अधिकारियों पर बिना इजाजत केस नही।
  •             भूमि अधिग्रहण का पैसा सीधे किसान के खाते में।

क्या हुआ संशोधन भूमि अधिग्रहण 2014 में ?

 

  •             भू अधिग्रहण से प्रभावित परिवारों एवं श्रमिकों के एक परिजन को नौकरी मिलना अनिवार्य।
  •             औद्योगिक कारीडोर की परिभषा तय। इन कारीडोर के लिये सडक या रेल मार्ग के दोनो ओर एक किमी तक ही भूमि अधिग्रहण।
  •             सामाजिक ढांचागत परियोजनाओं के लिये सरकार जमीन अधिग्रहीत नही करेगी।
  •             निजी स्कूलों और निजी अस्पतालों के लिये भी भूमि अधिग्रहण नही होगा।
  •             सिर्फ सरकारी संस्थाओं के लिये जमीन का अधिग्रहण।
  •             मुआवजा एक निर्धारित खातें में ही जमा करना होगा।
  •             नये कानून के तहद् दोषी अफसरों पर अदालत में कार्यवाई हो सकेगी।
  •             किसानो को अपने जिले में शिकायत या अपील का अधिकार देना।
  •             परियोजना के लिये बंजर जमीनों का अधिग्रहण।

क्या कहते है, प्रधानमंत्री?

 

  •             इन संशोधनों के बावजूद यदि विपक्ष और कोई संशोधन चाहता है तो सरकार संशोधन करने को तैयार है।

क्या कहता है देश?

 

विचारधारा का विरोध राष्ट्रविरोध नही होता। देशहित में जो भी हो वह होना चाहिये। किसानो का विकास राष्ट का विकास है। पक्ष और विपक्ष मिल बैठकर जो बेहतर हो उसे करे। हम बिल बनने ही नही देगें यह विरोध समझ से परे है। याद रख्खे यदि राष्ट्र है तो हमारा वजूद है। हम रहे ना रहे देश जिन्दा रहना चाहिये। देश की कीमत पर राजनीति करने का अधिकार न तो सरकार के पास है और ना ही विपक्ष के पास। किसानो के हितो की रक्षा होनी चाहिये। उसके हित में ही देश का हित छिपा हुआ है।

 

 

 

One Response to “आइए जाने भूमि अधिग्रहण बिल”

  1. Praveen Srivastav

    अरविन्द जी
    भूमि अधिग्रहण बिल के सन्दर्भ में इतने संक्ष्पित एवं सुन्दर ढंग से जानकारी देने के लिये धन्यवाद। पक्ष एवं विपक्ष दोनो को मिल बैठकर इस बिल को किसानो के हित में संशोधित करके पास करना चाहिये। आपकी इस बात से मैं सहमत हूॅ।
    आपका
    प्रवीन

    Reply

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