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    Homeसाहित्‍यव्यंग्य'गधे' हड़ताल पर हैं

    ‘गधे’ हड़ताल पर हैं

    प्रभुनाथ शुक्ल 

    सुबह अचानक नज़र टी- टेबल पर पड़े अख़बार के ताजे अंक पर जा टिकी। जिस पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था ‘गधे हड़ताल पर हैं’ अख़बार के सम्पादक जी कि कृपा से यह खबर फ्रंट पेज की लीड स्टोरी बनी थी। स्वर्णाक्षरों में कई उप शीर्षक और बॉक्स लगाए गए थे। मैं सोच रहा था कि इन अखबार और टीवी वालों को, टीआरपी रोग से मुक्ति कब मिलेंगी। रामजी, इनकी सोच कब दुरुस्त करेंगे। इन्हें गधे की दुलत्ति मारते शीर्षक हमेशा से इतने प्रिय क्यों हैं। अब भला बताइए गधे क्यों हड़ताल करेंगे, उन्हें क्या तकलीफ है। मीडिया वाले भी अजीब प्राणी हैं। पता नहीँ किस लोक से पधारे हैं हमेशा बाल की खाल निकालने में जुटे रहते हैं। नीरा खुरपेंची हैं यह परालोचक ।

    अखबार का शीर्षक देख मेरे दिमाग में यह गूँजी कि कहीँ आज़ पहली अप्रैल तो नहीँ है। मुझ जैसे पाठक को गधा तो नहीँ बनाया गया है। लेकिन जब ख़बर पर आगे बढ़ा तो पता चला कि गधों की मांग जायज हैं। यह बात ‘आलइंडिया गधा असोसिएशन’ की तरफ़ से उठाई गई है। गधों का कहना है कि हम लोग इंसानों के सबसे वफादार हैं। मुझमें जितनी स्वामी भक्ति किसी में नहीँ है, लेकिन इंसान हमें गधा समझता है। वह हर वक्त अपनी जाति के लोगों को हमारे ‘शब्दनाम’ का मुहावरा प्रयोग करता रहता है ‘अबे तुम गधे हो’ आखिर इंसान हमें इतना मूर्ख क्यों समझता है। हम गधों को अशपृश्य क्यों समझता है। यह अपमान गधे कब तक बर्दास्त करेंगे। गधों ने इंसान के इस व्यवहार से क्षुब्ध होकर हड़ताल पर जाने की घोषणा कर दिया। गधों की यह मांग मीडिया की सुर्ख़ियां बनी तो पशु अधिकारवादी भी गधों की हड़ताल के समर्थन में उतार आए।

    वक्त गुजरने के साथ गधों का यह आंदोलन राष्ट्रव्यापी बन गया। आंदोलन की गम्भीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मीडिया बगैर ब्रेक के गधों की हड़ताल को कवर करने लगा। गधों की तरफ़ से नीत नई मांग सामने आने लगी। गधों ने चुनाव आयोग से मांग रखी कि उनके लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों को ध्यान रखते हुए उन्हें राजनैतिक दल गठित करने के साथ वोट का अधिकार भी दिया जाय। इंसानों में जब सभी जेंडरों को यह अधिकार मिला है तो हम गधों को क्यों नहीँ ? हम तो इंसान के सबसे करीब और भरोसेमंद हैं। हमारा संविधान किसी के साथ भेदभाव करने का अधिकार नहीँ देता है। हमने सभी को अंगीकार किया है। मोर को हमने राष्ट्रीय पक्षी बनाया जबकि कमल को राष्ट्रीय फूल। इसके अलावा शेर को हमने राष्ट्रीय पशु भी घोषित कर रखा है। फ़िर गधों के साथ यह अन्याय क्यों। गधों का कहना है कि आम चुनावों में हम गधे भी मुद्दा बन जाते हैं फ़िर हमें चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध क्यों।

    हड़ताल पर गए ‘आलइंडिया गधा असोसिएशन’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने मीडिया को बयान जारी कर कहा कि अगर चुनाव आयोग हमें राष्ट्रीय दल की मान्यता नहीँ देता है तो यह संविधान में वर्णित अधिकारों की अवहेलना होगी। समता- समानता के अधिकारों की मुख़ालफ़त होगी। ज़रूरत पड़ी तो हम देश भर के गधे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए जंतर- मंतर पर प्रदर्शन करेंगे। जब इंसान और उसके जातीय समूह अपने अधिकारों को लेकर दल , संगठन बना सकते हैं तो हम गधे क्यों नहीँ।

    गधों का आंदोलन तेज होने के बाद लोकतांत्रिक अधिकारवादी भी मांग के समर्थन में उतर आए थे। गधों ने कहा कि जब हम अपने अधिकारों और उत्पीड़न की बात मालिक से रखते हैं तो वह हमें पिटता है और बोझ का भार और बढ़ा देता है। गधों ने कहा है कि अभी तक हमें अपनी तागत का अंदाजा ही नहीँ था। अब हम जाग गए हैं। अपना हक इंसानों को नहीँ दे सकते। हमें इंसानों और दूसरे पशु- पक्षियों की तरह राष्ट्र की मुख्यधारा में लाना ही होगा। तभी भीड़ से नारा गूंज उठा। नाम हमारा ताज तुम्हारा, नहीँ चलेगा- नहीँ चलेगा। गधे अब करें पुकार, नहीँ चलेगी इंसानों की सरकार। भीड़ से तभी एक और नारा गूंजा गधहा राज़ जिन्दाबाद- – – जिन्दाबाद। जबकि मैं सोच रहा था देखिए वाकई में लोकतंत्र कितना मजबूत हो चला है।

    प्रभुनाथ शुक्ल
    प्रभुनाथ शुक्ल
    लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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