सपने-प्रभुदयाल श्रीवास्तव

व्यर्थ रात‌ सूनी आँखों में,

बहुत देर तक सोकर आये|

सुबह सुबह बिस्तर से उठकर

सपने बहुत देर पछताये|

यदि रात पर्वत पर होते,

तारों का आकाश देखते|

निविड़ निशा के स्पंदन को,

दोनों हाथों से समेटते|

यदि किसी नदिया के तट पर,

बनकर रेत पड़े रह जाते|

लहरें आतीं हमसे मिलने,

हम लहरों से हाथ मिलाते|

किंतु व्यर्थ की चिंतायें थीं,

आगे हम कुछ सोच न पाये|

 

हमने जिसको दिन समझा था,

वह तो रात घोर थी काली|

किंतु मिली जब रात हमें तो,

उसके चेहरे पर थी लाली|

अंतर हम कुछ समझ न पाये,

क्या सच था और क्या था झूठा|

हमको तो जब जिसने बोला,

हमने रोपा वहीं अंगूठा|

दिन निकला तो सच को जाना

सच को जान बहुत बौराये|

 

पंख मिले इच्छाओं को तो,

ऊंची ऊंची भरी उड़ाने|

किंतु लक्ष्य की डोर हमेशा

मिला दूसरा कोई ताने|

आवाज़ों ने शोर किया तो,

दबे गले खूनीं पंजों से|

रहीं देखती खड़ीं दिशायें,

कौन बचाये भुजदंडों से|

मजबूरी के लाल किले पर

फिर से झंडा फहरा आयें|

 

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