लेखक परिचय

विकास कुमार गुप्ता

विकास कुमार गुप्ता

हिन्दी भाषा के सम्मान में गृह मंत्रालय से कार्रवाई करवाकर संस्कृति मंत्रालय के अनेको नौकरशाहों से लिखित खेद पत्र जारी करवाने वाले विकास कुमार गुप्ता जुझारू आरटीआई कार्यकर्ता के रूप में पहचाने जाते है। इलहाबाद विश्वविद्यालय से PGDJMC, MJMC। वर्ष 2004 से स्वतंत्र पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं। सम्प्रति pnews.in का सम्पादन।

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पत्रकार-सर हम ब्यूरो चीफ है। स्त्रैण आवाज में बोलते हुए ”सर हम आपकी पत्रिका से जुड़ना चाहते है।“ मैगजीन देखने के बाद और फिर आवाज को थोड़ा मजबूत करते हुए, ”आपकी मैगजीन में तो विज्ञापन दिख ही नहीं रहा। आप इस पत्रिका और अखबार को देखियें। यह अखबार तो चलता भी नहीं। इशारा करते हुए ”इस विज्ञापन को देखिये, ”यह 5 हजार का है“।
संचालक-अच्छा! ठीक है जुडि़ये। हमें साल में पचास हजार का बिजनेस चाहिये। और पत्रिका के लिये महीने में एक खबर।
एक महीने बाद—
पत्रकार संचालक से – ”सर एसपी चाहते है कि उनकी दो पेज की खबर छपे। उसके लिये पैसा देने को भी तैयार है। मैने पच्चीस हजार बोल दिया है।
संचालक-ठीक है।
पत्रकार-एसपी ने अपने ईमेल से खबर आपको भेज दी है।
संचालक-ओके।
फिर एसपी की छपास खबरिया ईमेल को खोला जाता है। एसपी के सभी थानों में जो-जो घटनायें धरपकड़, जब्ती की हुई हैं, सभी का विवरण बनाकर भेजा गया है। और साथ में है एसपी के अनेकों पोजेबल फोटों।
उपसम्पादक-”यह कोई खबर है। यह तो विज्ञापन है।“
फिर गुफ्तगु के बाद… एमएसवर्ड के दस पन्नों के विवरण देखकर समूचे जन हंसने लगते है। फिर खबर बना दी जाती है। और लग भी जाती है।
उपसम्पादक – ”हद हो गई। छपास जनों के बारे में सुना था लेकिन ऐसा उदाहरण शायद ही देखने को मिले।”
सम्पादक- बेटे अभी तुम नये हो। जैसे सड़कें कच्ची, पक्की, रोड, हाइवे और सुपर हाइवे जैसी होती है। वैसे ही मीडिया है। सड़कों पर तो लेबल लगा हैं। लेकिन मीडिया पर नहीं। तुमने कहीं देखा है कि छोटा, मझला और बड़ा प्रेस लिखा हो। सिर्फ प्रेस ही लिखा रहता है। इस प्रेस कार्ड और कागज तले बहुत बड़े-बड़े कारनामें खेले जाते हैं। मीडिया के क्षेत्र में भी ग्रे एरियाज हंै। एक मीडिया वो है जो मल्टीनेशनल कंपनियों की भांति बजट से लेकर बाजार तक दौड़ लगाती है और हाइवे पर चलती है इसके इतर एक मीडिया वो भी है जो बैलगाड़ी और ट्रैक्टर पर सवार मिलती है। जैसे सरकारी अफसरों की औकात कुछ सालों में ही सैकड़ों गुनी बढ़ी देखी जाती है वैसे ही मुख्यधारा के मीडिया कर्मी चाहे वो कच्ची से लेकर सुपर हाइवे तक के हो, की भी औकात बढ़ी पायी जाती है। इस देश में सच्चाई ये है कि ईमानदारी आप चाहों तो भी नहीं कर सकते। पूछो कैसे? वो ऐसे कि सरकार किसी काम के लिये उतना पैसा देती ही नहीं जीतना की खर्च होता है और ईमानदारी की गुंजायश हो? और खर्च करने वालों को कुछ लाभ के साथ हो? सरकार उतना ही देती है कि एक्चुवल वर्क ही न हो पायें। फिर चलता है दो, तीन और चार नम्बर का खेल। जैसे किसी रोड को जिस मानक के अनुसार बनाना है, तो सरकार जब निविदा निकालती है और जब कोटेशन आते है तो उनमें कम से कम कीमत वैसी होती है कि उससे ओरिजीनल वर्क हो ही न पायें। बेरोजगारी और समाजिक प्रतिद्वंद्विता के दौर की वजह से ऐसा होता है। फिर इस बेरोजगारी वाले समाज में चाहे एक नम्बर अथवा चार नम्बर का ही फार्मूला क्यों न अपनाना पड़े लोग मन मारकर काम उठा लेते है। उनकी भी समाजिक थ्योरी है कि भूखे मरने से अच्छा है मंदिर के प्रसाद ही खाओं। रोटी दो है तो खाने वाले हजारों हैं। एक ठेकेदार ने बहुत पहले मेरे सामने एक अधिकारी से बात करते हुए बोला कि साहेब ”हक दो ही लोग मांगते है-एक सगा और दूसरा दुश्मन”। फिर आगे उस ठेकेदार ने बोला या तो आप अपना भाई समझ के मुझसे हिस्सा लेके मेरे हिस्से का भुगतान कर दो अथवा मुझसे दुश्मनी मोल लेके अपने हिस्से मांगों। और तुम विश्वास नहीं करोगे उस अफसर ने 35 प्रतिशत के कमीशन के साथ उसका पेमेन्ट रीलीज कर दिया था।
उसम्पादक- मैगजीन बन चुकी है, एडिट हो चुकी है लेकिन विज्ञापन एक भी नहीं आया अभी तक।
संचालक- पत्रकारों की सूची खंगालते लगते है और फिर दौर शुरु होता है फोन घुमाने का- ”मिश्रा जी, शर्मा जी, तिवारी जी, सिंह जी विज्ञापन का क्या हाल है? मैगजीनवां जाने को है और विज्ञापनवा नदारद है।“ फोन रखते हुए ”ऐसे तो चल चुका मैगजीन। और चल चुकी आपलोगों की पत्रकारिता। फिर दांत पीसते हुए। जबतक दूहों नही दूध ही नहीं निकलता यहां। कितनी बार सोंचा की सीधे से कार्य हो, लेकिन सब ढांक के तीन पात। साले पत्रकार हमकों लाख से लीख करवा के ही छोड़ेगे।“ फिर पांडेय को फोन मिलाकर ”अरे पाण्डेय ये सीमेन्ट वाले साले विज्ञापनवां नहीं दे रहे तो तू खबर क्यो नहीं बना रहा,? लेबर हराशमेन्ट, अवैध खनन से लेकर कोई भी खबर बनवावों सालों के खिलाफ” इनकी औकात को जबतक मीटर से नहीं नापते तब तक कुछ नहीं होने वाला। ”देखों पाण्डेय मुझे विज्ञापन किसी कीमत पर चाहिये। जो चाहे करों। 6 महीनें हो गये लेकिन आपके क्षेत्र से कोई भी बिजनेस नहीं आया।
पाण्डेय- सर, विज्ञापन मिल गया है, पच्चीस हजार का मैने मेल कर दिया है।
संचालक-मिश्रा को फोन मिलाकर- मिश्रा जी वो रियल स्टेट कंपनी के खिलाफ जो किसानों वाला मामला था उसको लेकर एक खबर बनवाओं। साले हरामी की औलाद ऐसे नहीं मानेंगे। और हां एक लाख से नीचे विज्ञापन मत लेना। बहुत खून चूसा है किसानों का इन्होंने। और एक नम्बर से लेकर चार नम्बर की धोखेबाजी भी। देखों मिश्रा हम मानते है येे भी मीडिया की दूकान चला रहे है। और कहेंगे की हम भी मीडिया वाले है। लेकिन यह देश इनके बाप का नहीं है। मीडिया का धंधा खोल लिया तो समूचा गैरकानूनी काम इनके बाप का नहीं हो गया। इनकों बोल देना अगर विज्ञापन नहीं मिला तो खबर छपकर रहेगी। और बकायदे आन्दोलन भी करवायेंगे हम किसानों से मिलकर।
अगले दिन मिश्रा जी फोन पर…………….
”सर विज्ञापन तो मिल गया है, लेकिन पचास हजार का है। बोल रहे हंै कि अभी हम घाटे में चल रहे हंै। लेकिन आपलोगों की जबान रखते हुए हम दे रहे हैं। दूसरा कोई होता तो ना देते”।
संचालक-ठीक है! लेकिन तुम्हारें जिले मंे और भी मामले तो चल रहे है उनके पीछे भी लगों नहीं तो हम जिम्मेदारियों को बदलने में देरी नहीं करेंगे। तुम्हारा एरिया कमजोर होने लगा है। तुमसे बेहतर तो तिवारी था जो दो तीन महीने में कम से कम लाख रुपयें का विज्ञापन तो दे ही देता था।
मिश्रा जी- झन्नाते हुए अब तुम्हारी पत्रकारिता करना हमारी मजबूरी नहीं। मैं अब आपलोगों के साथ काम नहीं कर सकता।
संचालक-देखों मिश्रा इतनी गर्मी ठीक नहीं। जब थाने वाले पकड़े के ले गये थे तो तुम्हारी आवाज को क्या हो गया था? जब विधायक ने तुम्हे उठवा लिया था तब क्या हुआ था?
मिश्रा जी-अब मैं किसी कीमत पर कार्य नहीं कर पाउंगा। वैसे भी अब मैंने न्यू मीडिया में जुड़ गया हूं।
संचालक- अपनी बात न बनते देख फोन रखने के बाद। मिश्रा को गाली देते हुए। साला निकल गया गद्दार। किसी वेब पोर्टल को ज्वाइन करके हमको गाली दे रहा है। देख लेंगे हम… इसकों। फिर डायरी खंगालते हुए।
फोन लगाकर ”यादव जी विज्ञापन का क्या हाल है। आपके राज्य के सूचना विभाग में इम्पैनलड् भी है हमारी मैगजीन। फिर भी विज्ञापन नहीं मिल रहे। उधर अरबों के विज्ञापन घोटालें आपके राज्य होने की खबर आये दिन छप रही है। यादव जी ऐसा कबतक चलेगा? बहुत पहले वांशिगटन पोस्ट ने एक सिद्धान्त बनाया था “मीडिया भंडाफोड़ से जीवित रहती हैं“। और अगर आप भंडाफोड़ नहीं करेंगे तो विज्ञापन कहा से आयेगा?
यादव जी- सर मैं आपके यहां अब काम नहीं कर सकता। मैने न्यू मीडिया ज्वाइन कर लिया है। और न्यू मीडिया ही आज का सुपर हाइवे है। आपके यहां जब मैने ज्वाइन किया था तब आपने बताया था खडंजा, रोड और हाइवे। लेकिन हम आपकों बता दें कि आजकल न्यू मीडिया सुपर हाइवे है। आप अपनी खबर वैश्विक पटल पर रख सकते है वो भी सेकेंडों में।
संचालक – बेटा एक बात याद रखना। नया नौ दिन और पुराना सौ दिन। ये जो नया मीडिया आया है उसे कितने लोग पढ़ते हैं ये तुम जानते हो। और रही बात तुम्हारी आवाज की तो जबतक तुम मुख्य धारा तक अपनी बात नहीं पहुुंचाते तुम कुछ नहीं कर पाओगे। तुमने देखा होगा कि गांधीजी जब भारत आये तो उन्होंने चम्पारण से अपने आंदोलन का आगाज़ किया। गांधी जी गुजरात के और आंदोलन चम्पारण से। सोचो। हर देश का समाज होता है। जैसे मीडिया में कच्ची, खडंजा, रोड से लेकर हाइवे तक के लोग है उसी तरह समाज का समाजवाद होता है। तुम चाहे न्यू मीडिया ज्वाइन करों अथवा अन्य पत्र। मुझे कोई ऐतराज नहीं। लेकिन तुम्हे एक आखिरी सुझाव हम दिये रहे है कि ”ये जो न्यू मीडिया है उसका चेहरा खोखला है। और खोखली चीजे बहुत तेज उड़ती है। फिर आगे तुम्हारी मर्जी। पत्रकारिता अथवा आन्दोलन बिना मुख्यधारा से जुड़े नहीं हो सकता। अंग्रेजी के अखबार अब हिन्दी के अखबार निकालने में लगे है। न्यू मीडिया वाले अखबार और प्रिन्ट मीडिया को भी खोलने में लगे है।
यादव जी – सर ऐसी बात नहीं। एक कहावत मुझे याद आ रही हैं। एक बार हवाई जहाज ने राॅकेट से पूछा। हम जहां 12 घंटे तक में पहुंचते है वहां तुम आधे घंटे में ही पहुंच जाते हो राज क्या है? तो राॅकेट ने कहा-जिसके भीतर आग लगती है और आग भी वैसी की जबतक सम्पूर्ण खाक न हो जाये वैसी। अगर ऐसी आग तुम्हें जिस दिन लगेगी। उस दिन तुम इसका अर्थ समझ लोगें।” लेकिन आपके भीतर तो क्या बाहर भी आग नहीं लगती। कितनी बार मैने आपसे कहां कि सदस्यता अभियान चलवाइयें, की रिंग से लेकर अनेकों सामग्रीयों का सहारा लीजिये ताकि किसी तरह हमारा सर्कुलेशन बढ़े। सर्कुलेशन बढ़ेगा तो नाम बढ़ेगा और लोग हमारी पत्रिका का जानने लगेंगे। लेकिन आपलोग 500-1000 पत्रिका छापकर 10-20 काॅपी इधर-उधर कर पत्रकारिता चला रहे हैं। ईधर किसी के पास मैगजीन लेकर जाओं तो कहते हैं कि इसका तो नाम ही नहीं सुना। पिछली बार स्वास्थ्य विभाग के सीएमओं की खबर छापी। अस्पताल के आसपास मैगजीन भी फेकवाई लेकिन उस सीएमओं के उपर रत्ती भर फर्क नहीं पड़ा। अब मैने सोच लिया हैं और फिलहाल न्यू मीडिया और उसके बाद किसी अच्छी मैगजीन से जुड़ जाऊंगा लेकिन आपकी पत्रिका के लिये कार्य नहीं कर पाउंगा।
संचालक-ठीक है तुम्हारी मर्जी। लेकिन तुम्हारे जैसे होनहार बच्चे के लिये मेरा दरवाजा हमेशा खुला है। इस महीने अगर विज्ञापन दिलवा देते तो अच्छा रहता। मुझे कोई ऐतराज नहीं अगर दूसरी मैगजीन और न्यू मीडिया ज्वाईन करों।
यादव जी-ठीक है देखते हैं लेकिन गांरटी नहीं दे सकते।
संचालक दूबे को फोन मिलाकर- अरे दूबे जी विज्ञापन की क्या स्थिति है।
दूबे जी- सर 55 हजार का है। हम आपकों ईमेल कर दिये है। देख लीजियेगा।
संचालक-अच्छा!
दूबे जी- सर एक मामला है। वो ये की हमारे यहां के एक प्राॅपर्टी डीलर को एसपी साहेब परेशान करने में लगे हुए है। अगर आप फोन मार देते तो 20 हजार रुपया वो देने को तैयार है। उनके भांजे के उपर एक केस है। उसे डिस्पोज कराना है।
संचालक-ठीक हो जायेगा।
संचालकर – उपसम्पादक से –  ”मुम्बई की खबर, पुस्तक समीक्षा और तीन कवितायें जो है उसे हटा दो।“ ईमेल चेक करों और ये रही लिस्ट इसके हिसाब से विज्ञापन लगा दों। और हां भाजपा मुम्बई की जो खबर है उसे एडिट करों और उसकों भाजपा के फेवर में कर दो? पैसे आ गये हैं।
उपसम्पादक- मिश्रा का दुबारा फोन आया।
संचालक- वो साला मरेगा एक दिन। कुंआ का पानी पीने वाला अगर पानी बोटल प्रयोग करेगा तो वो एक दिन प्यासे मर जायेगा। अरे हम सर्कुलेशन से भी कोई कमाई करते है क्या? कुछेक को छोड़ दे तो सब डमी छाप रहे है। फिर मायुस होते हुए ”एक काम करों कम्प्यूट्र से पुराने पत्रकारों की लिस्ट निकालों हम किसी और को रखते है”। और तीन लोगों आॅथोरटी लेटर भी निकालने हैं उसे निकाल देना।
उसम्पादक-ठीक है। लेकिन न्यू मीडिया पढ़ता ही कौन है? आम आदमी तो नहीं ही पढ़ता। फिर उस खबर का असर कैसे होता होगा?
संचालक-ऐसी बात नहीं, न्यू मीडिया उन लोगों तक तो पहुंच ही जाती है जिनसे असर की अपेक्षा है। खैर जाने दो। इस मिश्रा को मैं देख लूंगा।
संचालक-भाई एक पुरानी कहावत याद रही है ”सांप के बिल में बिना मंत्र के हाथ नहीं डालना चाहिये”। ये जो मिश्रा है ना इसकों जेल जाते-जाते मैंने बचाया था। लेकिन देखा आज कैसे पेश आ रहा था मुझसे। मैनें मिश्रा को सांप और उसके बिल से कैसे निकलना है और पुलिस के रस्सी और सांप के रहस्य का पूर्ण ज्ञान दिया था। लेकिन देखा आज हमें ही इसने डंस दिया। लेकिन समय का तकाजा है। रामधारी सिंह दिनकर ने एक बहुत अच्छी बात बोली है ”क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो, उसको क्या जों दंतहीन विषरहीत विनित सरल हो”। ये जो मिश्रा है न वो भी सरल और विषरहित है। इसे जब दांत वाले लोगों से पाला पड़ेगा तो हमारी शरण जरूर लेगा।
उपसम्पादक-ये एसपीयां साला फिर छपना नहीं चाहेगा क्या? आप फोन मिलाइयें। इसबार भी बचा खुचा छाप ही देते है।
संचालक-मैनंे आॅलरेडी बता दिया है कि अगर एसपी दुबारा छपना चाहें तो हमारी तरफ से ओके है। एक प्राॅब्लम आ रही है। डीएवीपी में पचास हजार दे आये थे हम लेकिन हमें विज्ञापन रिलीज नहीं हुआ। और हमें बताया भी गया था कि पच्चीस प्रतिशत हमारे रेट भी बढ़ा दिये जायेंगे।
उपसम्पादक- सर कुल मिलाकर मैगजीन ओके है। लेकिन कच्ची से खड़ंजे के रास्ते हुए हम रोड पर आने को है। अगर कम से कम डेढ़ लाख का विज्ञापन मंथली आ जायें तो हम रोड पर आ जायेंगे।
संचालक-ठीक।
dummy mediaविकास कुमार गुप्ता

2 Responses to “डमी मीडिया का समाजवाद”

  1. manisha pandey

    जबर्दस्त जबर्दस्त मान गए विकास जी विकास जी जबर्दस्त जबर्दस्त जबरदस्त जितनी तारीफ कि जाये kam hain hain…

    may i take you contact no.

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  2. mukesh

    हकीकत हैं भाई बिलकुल १०१ प्रतिशत खरा सोना …………
    भाई आपकी लेखनी में सरस्वती हैं …………..
    जैसा वर्णन आपने किया हैं वैसे ही होता हैं ……………………………………………………………

    वन्दे मातरम

    Reply

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