लेखक परिचय

सारदा बनर्जी

सारदा बनर्जी

लेखिका कलकत्ता विश्वविद्यालय में शोध-छात्रा हैं।

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rape victimबलात्कार के बढ़ते वारदातों या कहें कि मीडिया-प्रचार के कारण हाइलाइट होकर सामने आते बलात्कार की वारदातों का स्त्री-जीवन पर क्या एफ़ेक्ट हो रहा है? क्या इन खबरों के सामने आने पर स्त्री-सुरक्षा में बढ़ोतरी हो रही है, स्त्री-अस्मिता पर बातें हो रही है या ये खबरें स्त्री-आज़ादी में हस्तक्षेप करने का एक नया औज़ार बन गया है? कायदे से इन वारदातों को लेकर समाज का पॉज़िटिव रुख होना चाहिए यानि स्त्रियों को लेकर सामाजिक सचेतनता में इज़ाफ़ा होना चाहिए। स्त्री-अस्तित्व में आने वाले खतरों से स्त्रियों की सुरक्षा की पूरी गारंटी केंद्र और राज्य सरकार और समाज को लेनी चाहिए। स्त्री-सुरक्षा की मांग होनी चाहिए और स्त्री-अस्मिता के औचित्य पर बहस होनी चाहिए। लेकिन अफ़सोस यह है कि ये वारदातें प्रत्येक स्त्री के लिए कहीं न कहीं एक बुरी खबर लाया हुआ है। यह बुरी खबर यह है कि प्रत्येक घर में स्त्री-आज़ादी पर किस्म-किस्म के हस्तक्षेप हो रहे हैं। परिवारवाले स्त्रियों को ज़्यादातर घर में ही रहने की हिदायतें दे रहे हैं। उनके पहनावे पर भी तरह-तरह की पाबंदियां लगाई जा रही है।

इससे भी ताज्जुब की बात है कि स्त्री होने के नेगेटिव एफ़ेक्टस पर ज़बरदस्त बयानबाज़ी हो रही है और इन पर महान उद्गार आए दिन विभिन्न न्यूज़ चैनेलों में देखने को आते हैं। पॉलिटिकल नेताओं, धर्मगुरुओं, संतो द्वारा दकियानूसी और बेतुके बयानों की झड़ी लगी हुई है। किसी धर्मगुरु की गुरुमंत्र माने तो सरस्वती मंत्र जप करने से स्त्रियां बलात्कार जैसे आपराधिक कृत्यों से बच जाएंगी या दरिंदगी करने वाले बलात्कारियों का भाई कहकर हाथ-पैर पकड़ने पर बलात्कार का खतरा टल जाएगा। पॉलिटिकल नेताओं के वचन सुने तो खाना, पीना, सोना और मैथून व्यक्ति की सामान्य ज़रुरतें हैं, इसलिए बलात्कार कोई अपराध नहीं वरन् स्वाभाविक क्रिया है। किसी नेता की माने तो स्त्रियों के चावमिन खाने या छोटे कपड़े पहनने की वजह से बलात्कार हो रहे हैं या स्त्रियों को पूजापाठ करनी चाहिए जिससे कि नक्षत्र ठीक रहें और इससे बलात्कार नहीं हो सकता। गौर करने पर मिलेगा कि ये सारे गैर-ज़िम्मेदाराना, भड़काऊ और आपराधिक बयान कायदे से बलात्कार के लिए भी स्त्रियों पर ही पलट-वार करता है। बलात्कार जैसे जघन्य वारदात को हल्के रुप में लेता है और स्त्रियों के सम्मान के प्रति अपनी नाफ़िक्री को जगजाहिर करता है। इन बयानों के मद्देनज़र भारतीय ज़ेहन में पैठी घोर पुंसवादी, रुढ़िवादी और स्त्री-विरोधी मानसिकता का स्पष्ट परिचय मिल जाता है। मीडिया को छोड़ भी दिया जाए तो भी घर-घर में आज स्त्री होना एक नेगेटिविटी बन गई है। विभिन्न परिवारों में मौजूद दकियानूसी चितकों को मौका मिल गया है कि वे अपनी पिछड़ी सोच का परिचय वक्तानुसार दे दें और वे बखूबी ऐसा कर रहे हैं। इसका नमूना है स्त्रियों के रहन-सहन, आवाजाही पर पल-पल कसी जा रही पाबंदी।

इन वारदातों का एक दूसरा पहलू यह भी है कि जहां इक्कीसवीं सदी के माता-पिता कहीं न कहीं अपनी बेटी की नौकरी के लिए तत्पर थे, वे भी अब नौकरी की आस छोड़ शादी कराने की मनोदशा में हैं गोया लड़की की शादी हो जाने पर भविष्य में बलात्कार जैसे अपराध टल जाएंगे। सबसे अहम नेगेटिव प्रभाव यह है कि स्त्रियों के दिलो-दिमाग में एक डर का माहौल बनाया जा रहा है। ‘ज़रा सावधान रहना, आजकल जो हो रहा है चारों ओर’ जैसे वाक्य आज चारों ओर स्त्रियों पर फ़ेंके जा रहे हैं। जायज़ है स्त्रियां चिंतित है, डरी हैं। लेकिन स्त्रियों में ये डर का माहौल क्रिएट करना बिल्कुल गलत है क्योंकि डरना तो बलात्कारियों को चाहिए ना कि आत्मसम्मान के साथ जीने वाली स्त्रियों को। इस माहौल के निर्माण में मीडिया अहम भूमिका निभा रही है।

उल्लेखनीय है इन वारदातों के लगातार सामने आने से अब कहीं-कहीं स्त्रियों के जीन्स पहनने और मोबाइल यूज़ करने पर रोक लगाई जा रही है। सोलह साल की उम्र में ही लड़कियों की शादी करवाने के असंवैधानिक मंतव्यों की लाइन लगी है। इस तरह की वाचिक हिंसा से स्त्रियों का मुक्त स्पेस बड़े पैमाने पर खत्म हो रहा है। भारतीय लोकतंत्र द्वारा दी गई समानता के हकों की बराबर हत्या हो रही है। यहां गौरतलब है कि कार्य की बात तो दूर सोच में भी स्त्री-पुरुष समानता की बातों के अभाव के फलस्वरुप ऐसे बयान आ रहे हैं। लिबरल सोच और लिबरल कदम को गायब होने के लिए मजबूर किया जा रहा है और बर्बर सोच अपना स्पेस बना रहा है। यह गंभीर चिंता की बात है।

इसलिए हे भारतीय परंपरागत पुरुष और नारी! कृपया अपनी बर्बर सोच और आदिम मानसिकता को बदलें और आधुनिक स्त्रियों पर रहम करें। अपनी बेसिर-पैर की बयानबाज़ी से स्त्रियों के मुक्त जीने के लोकतांत्रिक अधिकार को नष्ट न करें। साथ ही अपनी बुद्धि का वैज्ञानिक विकास करें और उदार भाव से स्त्री-अस्मिता पर विचार करें। बलात्कार जैसे संगीन अपराधों पर हल्की बयानबाज़ी न करें और अपराधियों के कड़ी सज़ा की मांग करें।

4 Responses to “बलात्कार का स्त्री-जीवन में पड़ता प्रभाव — सारदा बनर्जी”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    संजय जी,अपनी आख़िरी टिप्पणी पर आपके उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हूँ. ऐसे ग़लती से सेक्युलर की जगह सेस्युलर टाइप हो गया है,पर मैं समझता हूँ कि अर्थ समझने में आपको दिक्कत नहीं हुई होगी

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  2. आर. सिंह

    आर.सिंह

    सुश्री शारदा बनर्जी, आपके इस सारगर्भीत लेख का यह अंतिम परिच्च्छेद सब कुछ कह देता है ,पर इस दकियानूसी समाज के दकियानूसी पुरुष वर्ग की विचार धारा बदलने में यह समर्थ होगा,इसमे मुझे संदेह है.
    “इसलिए हे भारतीय परंपरागत पुरुष और नारी! कृपया अपनी बर्बर सोच और आदिम मानसिकता को बदलें और आधुनिक स्त्रियों पर रहम करें। अपनी बेसिर-पैर की बयानबाज़ी से स्त्रियों के मुक्त जीने के लोकतांत्रिक अधिकार को नष्ट न करें। साथ ही अपनी बुद्धि का वैज्ञानिक विकास करें और उदार भाव से स्त्री-अस्मिता पर विचार करें। बलात्कार जैसे संगीन अपराधों पर हल्की बयानबाज़ी न करें और अपराधियों के कड़ी सज़ा की मांग करें।”

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  3. rtyagi

    फिर वही…”पुन्स्वादी” दकियानूसी बातें… अरे जिसे अपने कपडे निकल कर सड़क पर घूमना है घूमे पर दूसरों को इसके लिए प्रेरित न करे…!@!!

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  4. चंद्र प्रकाश दुबे

    मीडिया द्वारा रोज हो रहे बलात्कार की ख़बरों और अंतहीन अतार्किक बहसों ने, नारी का भला करने के बजाय नारियों पर और शिकंजा कसने और उन्हें डराने के सिलसिले को जन्म दे दिया है.
    अब नारी पहले से ज्यादा सिमटी और डरी हुई है.

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