लेखक परिचय

संजय स्‍वदेश

संजय स्‍वदेश

बिहार के गोपालगंज में हथुआ के मूल निवासी। किरोड़ीमल कॉलेज से स्नातकोत्तर। केंद्रीय हिंदी संस्थान के दिल्ली केंद्र से पत्रकारिता एवं अनुवाद में डिप्लोमा। अध्ययन काल से ही स्वतंत्र लेखन के साथ कैरियर की शुरूआत। आकाशवाणी के रिसर्च केंद्र में स्वतंत्र कार्य। अमर उजाला में प्रशिक्षु पत्रकार। दिल्ली से प्रकाशित दैनिक महामेधा से नौकरी। सहारा समय, हिन्दुस्तान, नवभारत टाईम्स के साथ कार्यअनुभव। 2006 में दैनिक भास्कर नागपुर से जुड़े। इन दिनों नागपुर से सच भी और साहस के साथ एक आंदोलन, बौद्धिक आजादी का दावा करने वाले सामाचार पत्र दैनिक १८५७ के मुख्य संवाददाता की भूमिका निभाने के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़ाव। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ लेखन कार्य।

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-संजय स्‍वदेश

जाति आधारित जनगणना पर काफी बहस छिड़ी है। बहस के बीच एक प्रबुद्ध मित्र का स्वागतयोग्य विचार आया कि जाति कुशलता पर गौर करना चाहिए। लगा कि जातिय आधारित जनगणना के बहस में निश्चय ही जातिय कौशल की बात छूट रही है। प्रबुद्ध लोगों को जातिय आधारित औद्योगिक व्यवस्था पर ईमानदारी से चिंतन कर इसके पक्ष-विपक्ष में बोलना चाहिए।

कई लोगों का मत है कि जाति आधारित जनगणना से जाति की जड़ और मजबूत हो गी। जहां तक मैं समझता हूं तो जाति आधारित जनगणना से न जाति का प्रसार होगा और न ही खत्म होगी। बस संख्या की सच्चाई का पता चलेगा। किसकी संख्या कितनी है, यह जानने में बुराई ही क्या है? विराधियों का तर्क है कि जातिय राजनीति बढ़ेगी। जरा गौर करें। यदि जाति आधारित जनगणना नहीं भी होती है तो भी अपने-अपने क्षेत्र के जातिय गणना कर चुनाव में नेता अपनी रणनीति बनाते हैं। अभी तक उम्मीदवार इसी तरह की गणित के अनुसार मैदान में उतरते हैं और प्रचार की रणनीति तय करते हैं। तो बात जातिय कुशलता की हो राही थी। जो जाति सदियों से एक ही कर्म को करते आ रही है। तो उसकी पीढ़ी उस कार्य को कुशलता से कर सकती है। यह बात तो ठीक है, लेकिन पहले कर्म के आधार पर जाति को बदली जा सकती थी। महाभारत काल में एक्लव्य कुशल तिरंजादी कर क्षत्रिय नहीं बन सका। जाति आधारित कर्म बदलने को समाजिक मान्यता किसे मिली है? किसी शुद्र को कर्म के अनुसार जाति या वर्ण बदलने का इतिहास बताएं। विष्णु अवतार परशुराम वर्ण बदलते हैं, तो उन्हें मान्यता जरूर मिलती है, पर शुद्र को नहीं। उत्तर रामायण का पात्र शंबुक तेली था, पर साधना के ब्राह्मण कर्म पर श्रीराम चंद्र उसका सिर धड़ से अलग करते हैं। इसे समाज की कथा कर बात को टाली नहीं जा सकती है, क्योंकि हर कहानी अपने समाज और परिवेश से प्रभावित होती है।

वर्तमान समाज में कुलीन वर्ण के युवाओं ने जब भी किसी शुद्र की संस्कारी सुयोग्य कन्या से विवाह किया है, उसे सम्मान नहीं मिला है। अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग को आसानी से कलास मना लिया गया है। लेकिन जरा सोचिये, पिछड़ों का वर्ण क्या है? पिछड़ा वर्ग वैश्य समुदाय में शामिल नहीं है। वह अनुसूचित कहलाना पसंद नहीं करेगा। हालत उसकी त्रिशंकु की तरह हो गई है। पिछड़ों का वर्ण अधर में ल टक गया है। यदि शुद्रों को वर्ण में ही रखा और कर्म के आधार पर जाति बदलने की समाजिक मान्यता में तनिक भी लोच होता तो स्थिति गंभीर नहीं होती। जब इस जनगणना में अनुसूचित जाति और जनजातियों की गणना के लिए कॉलम है तो पिछड़ों का कॉलम रखने में बुराई नहीं दिखती। मेरे विचार से तो इस जनगणना में ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रियों की भी जनगणना कर ली जाती तो अच्छा होता। कम से कम आरक्षण की मलाई खाने वालों को यह तो पता चलता कि गैर-आरक्षित जातियों की तुलना में उनकी संख्या कितनी है। बड़ी संख्या के बाद भी उनकी तरक्की कितनी हुई है?

2 Responses to “एकलव्य कुशल तिरंजादी कर क्षत्रिय नहीं बन सका”

  1. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    bahut achchhe,agar apako itihas pata nahi he to mat boliye.
    1.rekk-ek shudra jisane kshtriyo v brahmano ko upadesh diya.dekhe upanishad{chhondogy upanishd}
    2.satykam jambal-shudra jisako rishi ne braman banaya.{upanishd se hi}
    3.madalasha jisake bachche the ye stykam rishi shudra kanya par pita ka nam kise pta nahi.
    4.dsi putr narad.
    5.dashyu ratnakar jo mahrishi valmiki bana.
    6.pura ka pura pandav v korav vansh jo satvati se utappn huva tha jo ek machhuvaran thi.
    7.ved vyas jinaki mata thi satyvati jinake pita the prashar jo sym ek shudra knya ke putr the.
    8.chandra gupt mory jise chankya ne kshtriy banaya.
    9.kshtriy raja vishvamitr jo brahmrishi vishvamitr bana.
    10.bhagavan vishvkrma jo bhavan nirman v kati ka kam karate the jinhe
    “dev”
    ka drja diya gya jo kis bhi varn se upar he.
    ye to bas kuchh nam he jise mene anayas hi likh diya he ese sekado or mil jayenge jab karm karate karate jat v varn badal gaye,sekdo jati he esi jo apane ko baraman ya kshtriy kahati he par shudra ki categrory me ati kyoki unake purvajo ne braman v kshtriy karm chhod kar veshy vrit apana li v kalantr me shudra ban gaye.
    rahi bat eklvy v shambuk ki to en ligo ne chori se v apramparik tarike se vidhya arjit ki jisaka durpyog bhi ve kar rahe the ya kar sakte the,es karan unhe us vran ka drja nahi diya gya tha.or bhagavan shree ram ka koe bhi krity bilkul galat nahi tha,ye bat to lekhak janata hi hoga.

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  2. डॉ. मधुसूदन

    Dr. madhusudan uvach

    Caste is/was based on 4 legs. (1)Professional Restictions (2) Eating Restrictions (3) Untouchability (4) Marriage Restrictions.
    Take #1. There is no restriction on your profession to day. Many so called “Harijans” are in Army,Politics, Teaching etc. So (1) is on the way out. #2 If you eat in Restaurants, Or in plane, Train etc, then #2 is on the way out, too. #3 You travel by bus, train etc, you sit next to an unknown person,(of a different caste) –so untouchability is gone. #4 Only Marriages are going on, for a very valid reason–Marriage is grafting of a branch of one tree on to an different tree. (e g A branch of a Chameli on babul –graft must be successful)THEY CAN NOT BE CONTROLLED BY ANY ONE. It is basic human right of an individual. You can not dictate your choice on even your son or daughter. It is their choice.If they happen without harming peace, accept them.
    But mind well, in the absence of Castes West does not have ethical stable marriages. 2 out of 3 marriages fail in USA.Society is on disastrous slide.Wait and see. (No stable caste system?–I think so too) More over, ALSO marriages take place due to COMPATIBILITY of two individuals. THEREFORE MARRIAGES BETWEEN COMPATIBLE INDIVIDUALS–(many times caste is reason for compatibility) and that will continue.Compatibility of Vegetarian diet and various types of nonveg diets and fifteen other customs too,are reasons of compatibility. Also in my opinion Castes have given us a stable Society in many ways.—- Please Refer —Caste, Socialism, and culture by Vivekananda. West has castes of money, worst then ours.A person becomes successful in a black ghetto, soon walks out of the group breaking all ties, into a rich neighborhood. I prefer our castes better than these. Discrimination is in minds of the people–Sangh roots it out right there. It has succeeded with in R S S. Read R S S Vision in Action for numerous illuninating examples. Jati Vyavastha may remain, Jatibhed Must go. Hindu Samaj is evolving and learning –To day a bright student like Babasaheb is not treated like Ekalavya—We will evolve. Old standards do not bind us. WE ARE SANATAN and will evolve.

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