पर्यावरण लेख

मानसून पर अल नीनो की दस्तक, कहीं बाढ़ कहीं सूखा

जयसिंह रावत

विश्व मौसम संगठन और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार वर्ष 2026 में प्रशांत महासागर में रिकॉर्ड तापीय विसंगति के साथ ऐतिहासिक ‘सुपर अल नीनो’ सक्रिय हो चुका है जो कि भारत के लिए कमजोर मानसून और सूखे की गंभीर चेतावनी है। भारत में मानसून केवल मौसमीय घटना नहीं है। देश की लगभग आधी कृषि आज भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वर्षा पर निर्भर है। करोड़ों किसानों की आय, खाद्यान्न उत्पादन, पेयजल आपूर्ति, जलविद्युत उत्पादन तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था मानसून से प्रभावित होती है। यही कारण है कि अल नीनो की हर आहट नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों और किसानों की चिंता बढ़ा देती है। हालांकि देश ने 2023 के अल नीनो का कुशल प्रबंधन किया था, लेकिन इस बार का संकट मैदानी कृषि से कहीं आगे बढ़कर संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र पर मंडरा रहा है। मैदानों में कम बारिश होने पर भी नलकूपों और सूखा-सहिष्णु बीजों के रूप में कुछ वैकल्पिक व्यवस्थाएं संभव हैं, परंतु उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और पूर्वोत्तर जैसे हिमालयी राज्यों की नाजुक पारिस्थितिकी में इस तापीय असंतुलन को कृत्रिम उपायों से नियंत्रित करना आसान नहीं। यही नहीं मानसून पर्वतीय क्षेत्रों के सदानीरा जल स्रोतों, हिमनदों, जंगलों और संपूर्ण जैव विविधता की जीवनरेखा है, जो अब सीधे खतरे में है।

वैज्ञानिक शोधों के अनुसार हिमालयी क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में दो से तीन गुना तेजी से गर्म हो रहा है। 2026 के इस ‘सुपर अल नीनो’ जनित अतिरिक्त ताप से हिमालयी हिमनदों के पीछे खिसकने की दर तेज हो सकती है तथा शीतकालीन स्नोपैक का घनत्व घटने से गंगा-यमुना जैसी बारहमासी नदियों का प्रवाह प्रभावित हो सकता है। वैसे भी त्वरित हिमनद गलन से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों का खतरनाक विस्तार हो रहा है। चमोली (2021) और सिक्किम की दक्षिण ल्होनाक त्रासदी (2023) की आपदायें इस खतरे के स्पष्ट उदाहरण हैं। अल नीनो के कारण कुल मानसूनी वर्षा भले ही औसतन 90 प्रतिशत तक सीमित रहे, लेकिन जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से स्थानीय स्तर पर बादल फटने और अचानक बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाओं की तीव्रता बढ़ने की चेतावनी विशेषज्ञ दे रहे हैं।

मौसम विज्ञान विभाग ने इस वर्ष मानसून को दीर्घकालिक औसत के केवल 90 प्रतिशत रहने की संभावना जताई है, जो पिछले 11 वर्षों में सबसे कमजोर पूर्वानुमान है। साथ ही मौसम वैज्ञानिकों ने सचेत किया है कि कुल वर्षा कम होने का अर्थ यह नहीं है कि पहाड़ों में आपदाएं नहीं आएंगी। बढ़ते तापमान के कारण वातावरण में जलवाष्प धारण करने की क्षमता बढ़ जाती है। जब अत्यधिक नमी युक्त हवा स्थानीय वायुमंडलीय कारकों या सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ से टकराती है, तो कम समय में एक ही स्थान पर मूसलाधार बारिश या बादल फटने जैसी स्थितियां बन जाती हैं। उत्तराखंड के अनुभव बताते हैं कि कमजोर मानसून के वर्षों में भी अचानक बाढ़, तीव्र भूस्खलन और मलबे के बहाव की घटनाएं बढ़ सकती हैं, जो संवेदनशील पहाड़ी ढलानों और बस्तियों को भारी नुकसान पहुंचाती हैं।

हिमालयी क्षेत्र में इसका एक और तात्कालिक प्रभाव पारंपरिक जल सुरक्षा और ग्रामीण जनजीवन पर पड़ता है। जून के शुरुआती पखवाड़े में ही उत्तराखंड में वर्षा सामान्य से काफी कम दर्ज की गई है। पहाड़ों में जीवन का आधार कहे जाने वाले धारे, नौले, गधेरे और झरने पर्याप्त वर्षा न होने के कारण पुनर्भरित नहीं हो पाते। परिणामस्वरूप न केवल गर्मियों में बल्कि आगामी शीतकाल में भी गंभीर पेयजल संकट पैदा होने की आशंका बढ़ जाती है। हिमालयी राज्यों के सैकड़ों गांव पहले ही जलाभाव के कारण पलायन की कगार पर हैं और यह स्थिति और गंभीर हो सकती है। पानी की कमी और बढ़ते तापमान का सीधा संबंध हिमालयी जंगलों में लगने वाली आग से भी है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में कई वर्षों का अनुभव बताता है कि जब भी शुष्क मौसम लंबा खिंचा है, वनाग्नियों ने विकराल रूप धारण कर हजारों हेक्टेयर वन संपदा, वन्यजीवों और पर्वतीय पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है।

इसके अलावा पर्वतीय कृषि और बागवानी भी इसकी सीधी मार झेलती है। मैदानों की तरह पहाड़ों में नहरों का नेटवर्क नहीं है और यहां की 80 प्रतिशत से अधिक खेती वर्षा पर निर्भर है। जून और जुलाई के महत्वपूर्ण महीनों में पर्याप्त बारिश न होने से धान, मक्का, मंडुवा और दलहन जैसी खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित होती है। साथ ही लंबे सूखे के कारण मिट्टी की नमी घटने से मूल्यवान बागवानी उत्पादों की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से सेब की आवश्यक चिलिंग रिक्वायरमेंट पूरी नहीं हो पा रही है, जिससे बागवानों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है। इस स्थिति से निपटने की वर्ष 2023 की प्रबंधकीय सफलता से उम्मीद तो मिलती है, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों को यह समझना होगा कि पहाड़ों के लिए केवल पारंपरिक कृषि आकस्मिक योजनाएं या कम पानी वाली वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देना पर्याप्त नहीं होगा। हिमालय के संदर्भ में आपदा प्रबंधन और विकास की रणनीति को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। सबसे पहली प्राथमिकता उच्च हिमालयी हिमनदीय झीलों की उपग्रह और सेंसर आधारित चौबीसों घंटे निगरानी होनी चाहिए, ताकि किसी भी संभावित विस्फोट की सूचना निचले इलाकों तक समय रहते पहुंच सके।

वर्ष 2026 का अल नीनो भारत के लिए केवल कृषि उत्पादन या जीडीपी को बचाने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह हमारी राष्ट्रीय जल सुरक्षा के उद्गम स्थल, हिमालय की रक्षा की वास्तविक परीक्षा है। वैश्विक तापवृद्धि ने अल नीनो और ला नीना के पारंपरिक चक्र को अधिक अनिश्चित और आक्रामक बना दिया है। प्रश्न यह नहीं है कि अल नीनो का प्रभाव कितना बड़ा होगा, बल्कि यह है कि क्या हमारे नीति निर्माता योजनाएं बनाते समय देश के सबसे नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को केंद्र में रख पाते हैं। आने वाले कुछ महीने न केवल इस वर्ष के मौसम का रुख तय करेंगे, बल्कि हिमालय के जल, जंगल, जमीन और जीवन की सुरक्षा के लिए एक नए और व्यावहारिक रोडमैप की दिशा भी निर्धारित करेंगे।

अल नीनो एक महासागरीय-वायुमंडलीय घटना है जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है और भारत सहित एशिया के अनेक देशों में मानसूनी वर्षा कमजोर पड़ जाती है। इसके विपरीत ला नीना की स्थिति में प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से कम हो जाता है, जिससे भारत में प्रायः मानसून मजबूत होता है और वर्षा सामान्य से अधिक हो सकती है।

इन दोनों घटनाओं को संयुक्त रूप से ‘एल-नीनो दक्षिणी दोलन’ कहा जाता है। यह पृथ्वी की सबसे महत्वपूर्ण जलवायु प्रणालियों में से एक है, जो लगभग दो से सात वर्षों के अंतराल पर सक्रिय होती रहती है और विश्व भर के मौसम को प्रभावित करती है।