समाज

पैदल चलने को मौलिक अधिकार बनाए जाने के निहितार्थ

दुर्गेश्वर राय

सुबह-सुबह अपने नन्हे कदमों को पापा की उंगलियों के सहारे आगे बढ़ाते उस पाँच साल के मासूम ने शायद ही सोचा होगा कि स्कूल का रास्ता किताबों की दुनिया की बजाय सीधे मौत के मुहाने पर जाकर खुलेगा। गाड़ियों की अंधाधुंध रफ्तार ने पैदल चलने वालों से उनका वह रास्ता ही छीन लिया है, जो कभी सभ्य समाज की पहचान हुआ करता था। लेकिन जब एक बेकाबू टैंकर ने उस अबोध की जिंदगी की कहानी को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया, तो देश की सबसे बड़ी अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा। अदालत ने इस दर्दनाक हादसे को आधार पर एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए जिसने पैदल चलने को अब एक सामान्य विवशता से उठाकर मौलिक अधिकार के अंतर्गत गरिमापूर्ण जीवन का अनिवार्य हिस्सा बना दिया है।

यह पूरा मामला एक मासूम की मौत से शुरू हुआ था। कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए स्पष्ट किया कि सुरक्षित और बाधा रहित फुटपाथ का न होने की प्रशासनिक चूक पैडल चलने वाले नागरिकों के वजूद पर हमला है। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुलकर की पीठ ने इस विषय को सीधे देश के सर्वोच्च विधान यानी भारत के संविधान से जोड़कर देखा। अदालत ने व्यवस्था दी कि फुटपाथ पर सुरक्षित चलना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त ‘जीने के अधिकार’ का एक अभिन्न अंग है क्योंकि भयमुक्त और सुरक्षित वातावरण के बिना जीवन की कल्पना ही अधूरी है। इसके साथ ही, इसे अनुच्छेद 19(1)(d) के अंतर्गत देश के भीतर ‘निर्बाध रूप से संचरण करने की स्वतंत्रता’ के मौलिक अधिकार में शामिल माना गया है। कोर्ट का मानना था कि यदि कोई नागरिक सड़क पर चलते समय अपनी जान को लेकर आशंकित है, तो उसकी घूमने-फिरने की आजादी का कोई औचित्य नहीं है।

इस दूरगामी फैसले में न्यायपालिका ने केवल सैद्धांतिक बातें नहीं कीं। सर्वोच्च न्यायलय ने शासन-प्रशासन के हर स्तर को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा करते हुए जवाबदेही तय की है। अदालत ने बहुत कड़े शब्दों में आदेश दिया है कि देश के विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगर पालिकाओं और यहाँ तक कि ग्रामीण अंचलों की ग्राम पंचायतों का यह कानूनी रूप से बाध्यकारी कर्तव्य होगा कि वे सड़कों के किनारे मानक के अनुरूप फुटपाथों का निर्माण करें और उन्हें हर प्रकार के अतिक्रमण से मुक्त रखें। यदि कोई भी निकाय इसमें कोताही बरतता है, तो नागरिकों को यह अधिकार होगा कि वे उनके खिलाफ सीधे उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में रिट याचिका दायर कर सकें। यह कानूनी उपचार मोटर वाहन अधिनियम के तहत मिलने वाले दुर्घटना मुआवज़े के अतिरिक्त होगा, यानी प्रशासन अपनी लापरवाही के लिए अब बच नहीं सकेगा। अदालत ने केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों और विधि आयोग को एक विशेष कानून बनाने तथा पैदल यात्रियों के अधिकारों की सतत निगरानी के लिए एक स्वतंत्र नियामक ढांचा स्थापित करने का भी निर्देश दिया है जो समय-समय पर सड़कों की ऑडिट करेगा।

सामाजिक सरोकारों से जोड़कर देखें तो यह निर्णय हमारे समाज की उस गहरी खाई को पाटने का प्रयास करता है जो ‘कार संस्कृति’ और ‘पैदल संस्कृति’ के बीच पैदा हो गई है। आज हमारे शहर केवल बड़ी बड़ी गाड़ियों की सुविधा को ध्यान में रखकर डिज़ाइन किए जा रहे हैं, जहाँ साइकिल चलाने वाले और पैदल चलने वाले को हाशिए पर धकेल दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा है कि सड़कों पर गाड़ियों का कोई एकाधिकार नहीं हो सकता और पैदल यात्रियों का अधिकार किसी भी मोटर वाहन की सुविधा से हमेशा प्राथमिक और ऊपर रहेगा। यह आदेश एक समतामूलक समाज की स्थापना की दिशा में बड़ा कदम है, जहाँ सड़क का इस्तेमाल करने वाले हर व्यक्ति को बराबरी का सम्मान और सुरक्षा मिलती है।

अपने इस क्रांतिकारी फैसले को मज़बूत आधार देने के लिए सर्वोच्च अदालत ने अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर के कई महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टांतों का सहारा लिया। कोर्ट ने विदेशों में लागू ‘राइट टू वॉक’ के कानूनों और मानवाधिकार संधियों का उल्लेख किया, जहाँ पैदल यात्रियों को सड़क सुरक्षा पिरामिड में सबसे शीर्ष पर रखा जाता है। इसके अलावा, पर्यावरण और जनहित से जुड़े पुराने मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया कि किस तरह अनियोजित शहरीकरण ने नागरिकों से उनके बुनियादी प्राकृतिक और सामाजिक अधिकार छीन लिए हैं। इस निर्णय के लागू होने से देश के कई मौजूदा कानूनों पर व्यापक प्रभाव पड़ना तय है। सबसे बड़ा बदलाव ‘मोटर वाहन अधिनियम’ और शहरी विकास से जुड़े ‘टाउन प्लानिंग एक्ट’ में देखने को मिलेगा, जहाँ अब सड़कों की ड्राइंग और बजट पास करते समय फुटपाथ को एक अनिवार्य शर्त के रूप में शामिल करना ही होगा। साथ ही, अतिक्रमण विरोधी स्थानीय कानूनों को और अधिक कड़ाई से लागू करने की वैधानिक मज़बूरी पैदा हो जाएगी।

इस निर्णय के नैतिक पक्ष को देखें तो इसमें कई गंभीर विमर्श उभरते हैं। यह पूरी तरह से मानवीय गरिमा, संवेदनशीलता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है। एक कल्याणकारी राज्य में राज्य की पहली ज़िम्मेदारी अपने सबसे कमज़ोर नागरिक की रक्षा करना है। जो व्यक्ति गाड़ी नहीं खरीद सकता, क्या उसे सड़क पर सुरक्षित चलने का भी हक नहीं है? इस लिहाज से यह नैतिक रूप से शत-प्रतिशत उचित और न्यायसंगत है क्योंकि यह जीवन की कीमत को भौतिक विकास से ऊपर रखता है। इसके विपरीत, यदि व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखें तो इस आदेश को ज़मीन पर उतारने में कई नैतिक और प्रशासनिक द्वंद्व भी सामने आएंगे। हमारे देश की सड़कों की बनावट और अत्यधिक जनसांख्यिकीय दबाव को देखते हुए रातों-रात हर जगह आदर्श फुटपाथ बना पाना व्यावहारिक रूप से एक बड़ी चुनौती है। फुटपाथों को पूरी तरह खाली कराने के प्रयास में उन गरीब रेहड़ी-पटरी और ठेला लगाने वालों की आजीविका पर संकट आ सकता है जो अपनी दो वक्त की रोटी के लिए इन्हीं सड़कों के किनारे निर्भर हैं। ऐसे में एक वर्ग के चलने के अधिकार को सुरक्षित करने की प्रक्रिया में दूसरे वर्ग के सम्मान से जीने और रोजगार कमाने के अधिकार का हनन न हो, यह एक बहुत बड़ा नैतिक संकट खड़ा करता है।

आज का नागरिक केवल सड़कों पर गाड़ियों से ही नहीं डर रहा, बल्कि वह बढ़ते वायु प्रदूषण, कंक्रीट के फैलते जाल और बच्चों के खुले स्थानों के छिन जाने से भी बेहद चिंतित है। आज हमारे बच्चे पार्कों की कमी और असुरक्षित सड़कों के कारण घरों में कैद होकर रह गए हैं, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला समाज को इस बात के लिए मजबूर करता है कि हम विकास की परिभाषा को दुबारा बदलें। विकास का मतलब केवल चौड़ी हाइड्रो-हाईवे या चमचमाती कारें नहीं हैं, बल्कि विकास का असली पैमाना यह है कि एक बुजुर्ग, एक महिला या एक बच्चा बिना किसी डर के अपने घर से बाहर कदम रख सके और प्रकृति तथा समाज का आनंद ले सके। यह निर्णय प्रशासन को अपनी फाइलों से बाहर निकलकर ज़मीनी हकीकत सुधारने का संदेश देता है, ताकि आने वाले समय में किसी और मासूम को स्कूल जाते समय अपनी जान न गंवानी पड़े और हमारी सड़कें सचमुच इंसानों के चलने के अनुकूल बन सकें।

दुर्गेश्वर राय