साल दर साल महंगी होती चुनावी प्रक्रिया

चुनावों में धन-बल का बढ़ता इस्तेमाल

योगेश कुमार गोयल

            पिछले कुछ वर्षों से देशभर में जितने भी चुनाव हो रहे हैं, कमोवेश सभी में न केवल अपराधिक छवि के उम्मीदवारों की संख्या बढ़ रही है बल्कि चुनावों में धन-बल का बढ़ता इस्तेमाल भी चिंता का सबब बना है। इसी के मद्देनजर गत 13 फरवरी को उच्चतम न्यायालय द्वारा राजनीति में दागियों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताते हुए चुनाव सुधारों को लेकर सख्त निर्देश दिए गए हैं। सर्वोच्च अदालत ने सभी राजनीतिक दलों को अपनी वेबसाइट पर अपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों का विवरण डालने के अलावा यह हिदायत भी दी है कि वे यह भी बताएं कि ऐसे उम्मीदवारों को उन्होंने अपना प्रत्याशी क्यों बनाया, जिनके खिलाफ अपराधिक मामले लंबित हैं। अदालत ने यह आदेश सितम्बर 2018 में पांच जजों की संविधान पीठ के फैसले से संबंधित निर्देशों का पालन नहीं करने के आधार पर भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर दिए हैं। अदालत ने अपने उस फैसले में अपराधिक पृष्ठभूमि के बारे में घोषणा करने के निर्देश दिए थे। सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि चुनाव जीतने की संभावना ही अपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार के चयन का एकमात्र कारण नहीं हो सकता और निर्देशों का अमल नहीं करने वाले राजनीतिक दलों पर अवमानना की कार्यवाही की जा सकती है। दरअसल अदालत और चुनाव आयोग की चिंता यह है कि उनके तमाम प्रयासों के बावजूद अपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार न केवल चुनाव दर चुनाव बड़ी संख्या में मैदान में उतर रहे हैं बल्कि चुनाव जीतकर सरकार में जगह भी बना रहे हैं। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले कुछ चुनावों में संसद में दागी सांसदों की संख्या लगातार बढ़ती गई है। 2004 में जहां संसद में पहुंचे 24 फीसदी सांसद दागी थे, वहीं 2009 में ऐसे सांसदों की संख्या बढ़कर 30 फीसदी, 2014 में 34 और 2019 में 43 फीसदी दर्ज की गई।

            पिछले दिनों हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी अपराधिक छवि के उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने के साथ चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिए इस्तेमाल होने वाली अवैध सामग्री का मामला भी पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ता नजर आया। चुनाव आयोग के मुताबिक पिछले चार विधानसभा चुनावों में गंभीर अपराधिक मामलों में फंसे उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 2008 के विधानसभा चुनाव में चार फीसदी से बढ़कर इस बार के चुनाव में 15 फीसदी हो गई है। यही नहीं, पिछले चुनाव की तुलना में इस बार नकदी, शराब, नशीले पदार्थ तथा कीमती धातुओं की जब्ती में 25 फीसदी से भी अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई। चुनाव में अवैध सामग्री की धरपकड़ संबंधी चुनाव आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2015 के विधानसभा चुनाव में कुल 24279766 रुपये मूल्य की नकदी, अवैध शराब, नशीले पदार्थ तथा कीमती धातुएं जब्त की गई थी जबकि चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार इस बार के चुनाव में 52.87 करोड़ रुपये मूल्य की नकदी, शराब, नशीले पदार्थ व कीमती धातुएं जब्त की गई। इसमें 32.18 करोड़ का सोना, चांदी व अन्य कीमती धातुएं, 10.02 करोड़ नकद, 5.87 करोड़ की ड्रग्स व अन्य नशीले पदार्थ तथा 2.67 करोड़ रुपये की तस्करी की शराब शामिल थी। चुनाव के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिए नकदी, कुकर, साडि़यां इत्यादि बांटने के मामले तो अक्सर सामने आते रहे हैं लेकिन दिल्ली के दंगल में पहली बार लैपटॉप बांटने के प्रयास भी खूब हुए। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार चुनाव के दौरान 2.16 करोड़ रुपये मूल्य के लैपटॉप, साड़ी, कुकर इत्यादि जब्त किए गए।

            चुनावी शुचिता एवं पारदर्शिता बनाए रखने के लिहाज से चुनावों में अपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या भी चिंताजनक है। चुनावी विश्लेषण से जुड़ी शोध संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली के चुनाव मैदान में उतरे कुल 672 उम्मीदवारों में से हत्या, अपहरण, बलात्कार, महिलाओं पर अत्याचार जैसे गंभीर अपराधिक मामलों में फंसे प्रत्याशियों की संख्या 104 (15 प्रतिशत) थी जबकि 2015 में ऐसे प्रत्याशियों की संख्या 11 फीसदी, 2013 में 12 फीसदी और 2008 में 4 फीसदी थी। चुनावी मैदान में भाग्य आजमाने उतरे 133 उम्मीदवारों पर अपराधिक मामले चल रहे हैं जबकि पिछले चुनाव में ऐसे उम्मीदवारों की संख्या 114 थी। अगर बात की जाए चुनाव में धनकुबेरों की बढ़ती हिस्सेदारी की तो बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। विधानसभा चुनाव में 672 प्रत्याशियों में से 243 अर्थात् 36 फीसदी प्रत्याशी करोड़पति थे और प्रति उम्मीदवार 4.34 करोड़ रुपये की औसत सम्पत्ति का आकलन किया गया, जो पिछले चुनाव में प्रति उम्मीदवार 3.32 करोड़ रुपये थी। 105 उम्मीदवारों की सम्पत्ति पांच करोड़ से अधिक जबकि 72 उम्मीदवारों की सम्पत्ति दो से पांच करोड़ रुपये के बीच थी। 2020 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के 83 फीसदी, आप के 73 फीसदी तथा भाजपा के 70 फीसदी उम्मीदवार करोड़पति थे जबकि 2015 के चुनाव में कांग्रेस के 84 फीसदी, भाजपा के 72 फीसदी और आप के 63 फीसदी उम्मीदवार करोड़पति थे।

            बहरहाल, देश में चुनाव अब चाहे छोटे स्तर पर हों या फिर विधानसभा व लोकसभा जैसे बड़े स्तर का, प्रत्येक चुनाव में साम, दाम, दंड, भेद हर प्रकार के हथकंडे अपनाते हुए चुनाव जीतने के लिए पैसा पानी की तरह बहाया जाता रहा है। यही वजह है कि हमारे यहां हर चुनाव में बहुत बड़ी धनराशि चुनाव प्रक्रिया पर ही खर्च हो जाती है। हाल ही में दुनिया के 175 देशों के लोकतंत्र की प्रणाली को लेकर जो सूचकांक प्रसारित किया गया है, उसमें लोकतांत्रिक गरिमा के दर्जे में भारत दस पायदान नीचे गिरा है तो इसका सबसे कारण देश के बेहद खर्चीले संसदीय और विधानसभा चुनावों को माना गया है। आंकड़ों पर नजर डालें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में करीब 5 अरब डॉलर अर्थात् 35 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया था जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में यह खर्च 50 हजार करोड़ से ज्यादा हुआ माना जाता है। विधानसभा चुनावों के मामले में खर्चीले चुनाव की बात करें तो कर्नाटक का पिछला विधानसभा चुनाव राजनीतिक दलों द्वारा खर्च किए गए धन के मामले में अब तक का देश में सबसे महंगा विधानसभा चुनाव रहा, जहां 9.5-10.5 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया था, जो कर्नाटक के उससे पहले के चुनावी खर्च से दोगुना था।

            हालांकि चुनाव आयोग द्वारा प्रति उम्मीदवार अधिकतम 70 लाख रुपये खर्च की सीमा निर्धारित की जा चुकी है लेकिन सभी राजनीतिक दल अपनी ब्रांडिंग से लेकर विज्ञापन तक पर जिस प्रकार भारी-भरकम धनराशि खर्च करते हैं, उससे जाहिर है कि इस तरह के नियम सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं और चुनाव आयोग भी इस तथ्य से अपरिचित नहीं है। दरअसल चुनाव आयोग के नियमानुसार लोकसभा चुनाव में कोई प्रत्याशी 70 लाख रुपये तक खर्च कर सकता है लेकिन राजनीतिक दलों के खर्च के लिए कोई सीमा निर्धारित नहीं है। इसी का लाभ उठाकर हर राजनीतिक दल चुनावों के दौरान बढ़-चढ़कर मनमाना खर्च करता है क्योंकि प्रत्याशी के प्रचार के दौरान स्टार प्रचारकों, रैलियों, दूसरे नेताओं के दौरों और अन्य प्रचार सामग्री पर होने वाला खर्च राजनीतिक दल के खर्च में ही जुड़ जाता है, जिसकी कोई सीमा निर्धारित नहीं है। इस तथ्य से भी हर कोई भली-भांति परिचित है कि सभी राजनीतिक दल और उम्मीदवार चुनावी खर्च के लिए पैसा जुटाने और चुनाव में बहाने के तमाम तरह के वैध-अवैध तरीके अपनाते हुए निर्धारित सीमा से कई गुना ज्यादा खर्च करते हैं। कड़वी हकीकत यही है कि तमाम राजनीतिक दलों और उनके प्रत्याशियों को मिलने वाली आर्थिक मदद और दानदाताओं का सही-सही पता लगाना बेहद मुश्किल होता है क्योंकि भारी-भरकम चंदा देने वाले गिने-चुने लोग ही ऐसे होते हैं, जो अपनी पहचान उजागर करने देने के लिए सहमत होते हैं। दरअसल हर चुनाव में काले धन की बहुत बड़ी खेप खपायी जाती है। इसलिए खर्च का वास्तविक आंकड़ा जुटा पाना बेहद कठिन है। यही वजह है कि कई दशकों से हर चुनाव से पहले चुनाव सुधार की बातें तो जोर-शोर से होती रही हैं किन्तु कोई भी राजनीतिक दल इसे लेकर रत्ती भर भी संजीदा नहीं रहा और यही कारण है कि भारत में चुनावी प्रक्रिया साल दर साल अत्यधिक महंगी होती जा रही है।

            अगर 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रमुख पार्टियों के चुनावी खर्च की बात की जाए तो भाजपा ने तमाम राजनीतिक दलों से कहीं ज्यादा कुल 1264 करोड़ रुपये खर्च किए थे और उसका चुनावी खर्च 81 फीसदी बढ़ गया था जबकि कांग्रेस ने भी ज्यादा पीछे नहीं रहते हुए चुनाव के दौरान 820 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे और उसका चुनावी खर्च भी 74 फीसदी बढ़ गया था। आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया था कि 303 सीटें जीतने वाली भाजपा को प्रत्येक जीती हुई सीट करीब 4 करोड़ रुपये में पड़ी थी जबकि सिर्फ 52 सीटें जीतने वाली कांग्रेस की एक सीट की कीमत करीब 15 करोड़ रुपये रही थी। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रत्येक उम्मीदवार के लिए अधिकतम खर्च की सीमा 70 लाख रुपये ही निर्धारित है। 2016 में दुनिया के सबसे विकसित और सम्पन्न देश अमेरिका में हुए राष्ट्रपति तथा कांग्रेस चुनावों में करीब 6.5 अरब अमेरिकी डॉलर अर्थात् 46 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा खर्च होने का अनुमान था और अगर चुनावी खर्च पर नजर रखने वाली अमेरिकी संस्था ‘कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस थिंक-टैंक’ के आंकड़ों पर भरोसा किया जाए तो उसके मुताबिक भारत में 2019 का आम चुनाव दुनिया का सबसे महंगा चुनाव साबित हुआ था। दूसरी ओर, सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमसी) ने भी लोकसभा चुनाव में 50 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया था। सीएमसी के अनुसार 1996 के लोकसभा चुनाव में ढ़ाई हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे और 2009 के चुनाव में यह आंकड़ा दस हजार करोड़ तक पहुंच गया था। संस्था के चेयरमैन एन भास्कर राव ने चुनावी खर्च बढ़ने के लिए प्रमुख रूप से सोशल मीडिया, यातायात, विज्ञापन इत्यादि के खर्चों में हुई बढ़ोतरी को जिम्मेदार माना था।

            जहां तक दिल्ली विधानसभा चुनाव में हुए चुनावी खर्च की बात है तो आने वाले दिनों में इस खर्च का आंकड़ा भी सामने आ जाएगा लेकिन जिस प्रकार चुनाव में करोड़पति उम्मीदवारों की संख्या में बढ़ोतरी हुई और चुनाव आयोग द्वारा चुनाव के दौरान करीब 53 करोड़ रुपये का अवैध सामान बरामद किया गया, उससे अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में चुनावी खर्च में किस कदर बढ़ोतरी हुई होगी। चुनाव के दौरान आयोजित की जाने वाली रैलियों में प्रत्येक राजनीतिक दल या उम्मीदवार ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाकर शक्ति प्रदर्शन करने के लिए लोगों को रैली का हिस्सा बनने के लिए प्रलोभन की राजनीति का सहारा लेते रहे हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान भी चुनाव अधिकारियों द्वारा विभिन्न प्रत्याशियों और उनके समर्थकों के पास से 4.2 करोड़ डॉलर जब्त किए थे, जिनमें वोट खरीदने के लिए धनराशि भी शामिल थी। यही नहीं, चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली 1.6 करोड़ लीटर शराब तथा 17 हजार किलोग्राम अवैध ड्रग्स भी जब्त की गई थी।

            चुनावी मैदान में करोड़पतियों उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या और एक-एक प्रत्याशी के चुनाव प्रचार पर करोड़ों रुपये खर्च हो जाने के मामलों को देखते हुए स्पष्ट है कि अब वे दिन लद गए, जब बामुश्किल अपने परिवार की रोजी-रोटी का इंतजाम करने वाले लोग भी अपनी ईमानदारी के बूते पर चुनाव जीतकर लोकतंत्र में मिसाल बनते थे। आज तो हालात यह हैं कि किसी ग्राम पंचायत में सरपंच जैसे पद के लिए भी उम्मीदवार एक-एक करोड़ रुपये तक की धनराशि पानी की तरह बहा देते हैं। वहीं नगर निगम चुनावों में 3-5 करोड़ और विधानसभा चुनावों में 15 करोड़ तक का खर्च आम बात हो गई है जबकि राज्यसभा का हिस्सा बनने के लिए 100-200 करोड़ तक खर्च करने की बातें पिछले कुछ समय में अक्सर सुनी ही गई हैं। इतना पैसा बहाकर सत्ता के पायदानों तक पहुंचने वाले लोगों से ईमानदारी के व्यवहार की उम्मीदें बांधना भला कितना तर्कसंगत होगा। चुनावी प्रक्रिया में धन-बल के बढ़ते इस्तेमाल की इससे बड़ी विड़म्बनात्मक तस्वीर और क्या होगी कि जिस देश में 60 फीसदी आबादी प्रतिदिन करीब दो सौ रुपये आमदनी में अपना गुजारा करने को मजबूर है, वहां आम चुनाव में प्रति मतदाता इससे करीब तीन गुना खर्च हो रहा है। देश में करीब 30 करोड़ लोग तो ऐसे हैं, जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती।

            अगर भारत और अमेरिका के चुनावी खर्च के साथ-साथ दोनों देशों की अर्थव्यवस्था का भी तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था भारत के मुकाबले कई गुना बड़ी है। इसलिए भारत की चुनावी प्रक्रिया का अमेरिका जैसे दुनिया के सबसे विकसित देश से भी महंगा हो जाना और साल दर साल बढ़ता चुनावी खर्च देश के हर जिम्मेदार नागरिक के लिए गहन चिंता का विषय होना चाहिए। चुनाव सुधार और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की बातें तो कमोवेश हर राजनीतिक दल द्वारा बढ़-चढ़कर की जाती रही हैं किन्तु कटु सत्य यही है कि व्यवस्था में बदलाव के लिए कोई भी राजनीतिक दल तैयार नहीं है क्योंकि इससे सबके अपने-अपने स्वार्थ जुड़े हैं। चुनावों में हवाला कारोबार के जरिये पैसा आना, कॉरपोरेट फंडिंग इत्यादि कोई नई बात नहीं है। इसलिए राजनीतिक दलों के भरोसे देश में चुनाव सुधार की उम्मीद करना बेमानी है, अब देश की जनता जनार्दन को ही इसके लिए एक बड़े जन-आन्दोलन के लिए तैयार होना होगा, तभी चुनाव सुधार की कल्पना को मूर्त रूप दिया जाना संभव हो सकेगा।

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