पूर्वी भारत में हरित क्रांति के विस्तार पर ज़ोर

-फ़िरदौस ख़ान

नई दिल्ली. सरकार पूर्वी भारत में हरित क्रांति के विस्तार पर ख़ासा ज़ोर दे रही है. देश के पूर्वी क्षेत्र यानी बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल तक हरित क्रांति का फैलाव करने के लिए केंद्रीय बजट 2010 में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत 400 करोड़ रुपये की अतिरिक्त धनराशि का आबंटन किया गया है.

गौरतलब है कि देश में हरित क्रांति की शुरुआत वर्ष 1966-67 में हुई थी. इसकी शुरुआत दो चरणों में की गई थी, पहला चरण 1966-67 से 1980-81 और दूसरा चरण 1980-81 से 1996-97 रहा. हरित क्रांति से अभिप्राय देश के सिंचित और असिंचित कृषि क्षेत्रों में ज्यादा उपज वाले संकर और बौने बीजों के इस्तेमाल के जरिये तेजी से कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी करना है. हरित क्रांति की विशेषताओं में अधिक उपज देने वाली किस्में, उन्नत बीज, रासायनिक खाद, गहन कृषि जिला कार्यक्रम, लघु सिंचाई, कृषि शिक्षा, पौध संरक्षण, फसल चक्र, भू-संरक्षण और ऋण आदि के लिए किसानों को बैंकों की सुविधाएं मुहैया कराना शामिल है. रबी, खरीफ और जायद की फसलों पर हरित क्रांति का अच्छा असर देखने को मिला. किसानों को थोड़े पैसे ज्यादा खर्च करने के बाद अच्छी आमदनी हासिल होने लगी.

हरित क्रांति के चलते हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडू के खेत सोना उगलने लगे. साठ के दशक में हरियाणा और पंजाब में गेहूं के उत्पादन में 40 से 50 फ़ीसदी तक बढ़ोतरी दर्ज की गई.

इस पहल को कार्यान्वित करने के लिए नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय खरीफ सम्मेलन के दौरान पिछले 18 मार्च को बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल के राज्य कृषि सचिवोंकृषि निदेशकों की शुरुआती बैठक बुलाई गई थी. इस बैठक में यह बात उठाई गई थी कि पूर्वी क्षेत्र में मुख्यत: धान आधारित कृषि प्रणाली मौजूद है. इसलिए धान सहित चना, तिलहन और दलहन आधारित कृषि प्रणाली के तहत उत्पादकता बढ़ाने के प्रयासों पर बल दिया जाना चाहिए. कम उत्पादकता वाले जिलों को ध्यान में रखकर इन राज्यों में फसल विकास कार्यक्रम तथा योजनाएं चलाई जा रही हैं ताकि उनके जरिए फसल बढ़ाई जा सके.

इस बात को ध्यान में रखते हुए बैठक में तय किया गया कि प्रत्येक राज्य एक रणनीतिक योजना तैयार करे, जिसमें प्रौद्योगिकी प्रोत्साहन को प्राथमिकता दी जाए ताकि विकास की अपार क्षमता होने के बावजूद कम कृषि उत्पादकता की रुकावटों को दूर किया जा सके. इस स्वीकृत रणनीतिक योजना के आधार पर राज्य सरकारों ने एक कार्य योजना तैयार की जिसमें उन स्थलों को चिन्हित किया गया है जहां पहलों को कार्यान्वित किया जा सके. राज्य के मुख्य सचिव के नेतृत्व वाली एसएलएससी ने कृषि मंत्रालय और योजना आयोग के प्रतिनिधियों के साथ कार्य योजना पर विचार किया. जो रणनीतियां अपनाईं जा रही हैं आम तौर पर उन्हें पूर्वी क्षेत्र में उत्पादकता और पैदावार बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा.

वर्ष 2010‑11 के लिए विभिन्न राज्यों को 400 करोड़ रुपये आवंटित किये गए, जिसमें बिहार को 63.94 करोड़ रुपये, छत्तीसगढ़ को 67.15, झारखंड को 29.60, उड़ीसा को 79.67, उत्तरप्रदेश को 57.27 और पश्चिम बंगाल को 102.37 करोड़ रुपये दिए गए.

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