लेखक परिचय

रमेश कुमार दुबे

रमेश कुमार दुबे

लेखक पर्यावरण एवं कृषि विषयों पर कई पत्र-पत्रिकाओं में स्‍वतंत्र लेखन कार्य कर रहे हैं।

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untitled2पाषाण युग से लेकर आज तक मनुष्य निरंतर प्रगति के पथ पर चल रहा है। इस यात्रा में ऊर्जा को हम प्रगति की सीढी क़हें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जैसे-जैसे मनुष्य प्रगति की सीढियां चढता गया वैसे-वैसे उसकी ऊर्जा आवश्यकता बढती गई। ऊर्जा की इस बढती जरूरत को पूरा करने के लिए मनुष्य ने कई-कई रूपों में ऊर्जा को खोजना एवं प्रयोग करना शुरू किया। इस प्रकार पत्थर रकड़कर चिनगारी से आग (ऊर्जा) पैदा करने वाला मानव आज अणुओं की टकराहट से बिजली पैदा करने तक पहुंच गया है। आज रसोई से लेकर खेत खलिहान तक, उद्योग व्यापार से लेकर सड़क यातायात तक सभी जगह ऊर्जा के बिना जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती।

प्रगति के पथ पर चलते हुए मनुष्य ने ऊर्जा का विविध रूप में प्रयोग करके अपने जीवन को सरल तो बनाया लेकिन जाने-अनजाने उसने कई संकटों को भी जन्म दे डाला है। इसी प्रकार का संकट है ऊर्जा का। आज ऊर्जा के असंतुलित और अत्यधिक उपयोग के कारण जहां एक ओर ऊर्जा खत्म होने की आशंका प्रकट हो गई है वहीं दूसरी ओर मानव जीवन, पर्यावरण, भूमिगत जल, हवा, पानी, वन, वर्षा, नदी-नाले सभी के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे है। यह संकट विकसित देशों की अत्यधिक उपभोग वाली आदतों के कारण पैदा हुआ है लेकिन इसका परिणाम पूरा विश्व भुगत रहा है। वनों की कटाई, उद्योगों की चिमनियों से निकलने वाले धुओं, मोटर-गाड़ियों के अत्यधिक प्रचलन आदि के कारण कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा में निरंतर बढती जा रही है। 1880 से पूर्व वायुमंडल में आर्बन डाई आक्साइड की मात्रा 280 पाट्र्स पर मिलियन (पीपीएम) थी जो आज बढक़र 380 पीपीएम हो गई है।

प्रगति के पथ पर चलते हुए मनुष्य ने ऊर्जा का विविध रूप में प्रयोग करके अपने जीवन को सरल तो बनाया लेकिन जाने-अनजाने उसने कई संकटों को भी जन्म दे डाला है। इसी प्रकार का संकट है ऊर्जा का। आज ऊर्जा के असंतुलित और अत्यधिक उपयोग के कारण जहां एक ओर ऊर्जा खत्म होने की आशंका प्रकट हो गई है वहीं दूसरी ओर मानव जीवन, पर्यावरण, भूमिगत जल, हवा, पानी, वन, वर्षा, नदी-नाले सभी के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे है।

आधुनिक युग से पूर्व मनुष्य का जीवन नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर आधारित था लेकिन आज का मनुष्य जीवाश्म स्रोतों (पेट्रोल, डीजल, गैस, कोयला) पर पूरी तरह निर्भर हो चुका है। ऊर्जा के जीवाश्म स्रोत एक बार उपयोग करने के बाद सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं, दूसरे इनका भण्डार सीमित है, तीसरे इनसे बड़े पैमाने पर प्रदूषण उत्पन्न हो ता है। यह चिंता फैल रही है कि ऊर्जा के जीवाश्म स्रोतों के खत्म होने के बाद क्या होगा?

यह सच है कि ऊर्जा के बिना जीवन संभव नहीं है। इसलिए हमें जीवाश्म ईंधन के खत्म होने का इंतजार करने के स्थान पर हमें ऊर्जा के उन स्रोतों को अपनाना होगा जो कभी खत्म नहीं होंगे। इस प्रकार के ऊर्जा स्रोतों में उल्लेखनीय हैं सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, लघु बिजली परियोजना, गोबर गैस आदि। भारत में वर्ष भर पर्याप्त मात्रा में सूर्य की रोशनी रहती है। इस रोशनी का विविध रूप में प्रयोग करना संभव है। घर ऐसे बनाएं जाए जिनसे पर्याप्त रोशनी रहे, इससे बिजली की जरूरत कम पड़ेगी। सोलर कुकर रियायती दर पर दिए जाएं तो लोग खाना पकाने में इसका उपयोग करेंगे। ग्रामीण भारत में ऊर्जा की कमी रहती है। इसके लिए सबसे अच्छा उपाय है गोबर गैस। गोबर गैस से न केवल मुपऊत में खाना पकेगा अपितु रोशनी भी मिलेगी। इससे बिजली बचेगी।

लेखक- रमेश कुमार दुबे
(लेखक पर्यावरण एवं कृषि विषयों पर कई पत्र-पत्रिकाओं में स्‍वतंत्र लेखन कार्य कर रहे हैं)

4 Responses to “ऊर्जा संकट और उसका उपाय”

  1. Saurabh Tiwari

    thank you i was in need of this type of article and i got this here thanks again

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  2. राम नरेश

    अच्‍छे विचार दिए हैं आपने |

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  3. संगीता पुरी

    बहुत अच्‍छे विचार दिए हैं आपने … खासकर ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को गोबर गैस का भरपूर प्रयोग करना चाहिए।

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