लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

Posted On by &filed under विविधा.


विजय कुमार

बसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है।

यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है; पर वसंत पंचमी (माघ शुक्ल 5) भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करती है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती (शारदा) का जन्मदिवस माना जाता है। कैसा दुर्भाग्य है कि मां शारदा की प्राकट्य स्थली शारदा पीठ (जिला मुजफ्फराबाद) आज पाकिस्तान के कब्जे में कराह रही है।

जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजाकर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। कलाकारों का तो कहना ही क्या ? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।

इसके साथ ही यह पर्व हमें अतीत की अनेक प्रेरक घटनाओं की भी याद दिलाता है। सर्वप्रथम तो यह हमें त्रेता युग से जोड़ती है। रावण द्वारा सीता के हरण के बाद श्रीराम उसकी खोज में दक्षिण की ओर बढ़े। इसमें जिन स्थानों पर वे गये, उनमें दंडकारण्य भी था। यहीं वह शबरी नामक भीलनी रहती थी। जब राम उसकी कुटिया में पधारे, तो वह सुध-बुध खो बैठी और चख-चखकर मीठे बेर राम जी को खिलाने लगी। प्रेम में पगे झूठे बेरों वाली इस घटना को रामकथा के सभी गायकों ने अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया।

दंडकारण्य का वह क्षेत्र इन दिनों गुजरात और महाराष्ट्र में फैला है। गुजरात के डांग जिले में वह स्थान है जहां शबरी मां का आश्रम था। वसंत पंचमी के दिन ही रामचंद्र जी वहां आये थे। उस क्षेत्र के वनवासी आज भी एक शिला को पूजते हैं, जिसके बारे में उनकी श्रद्धा है कि श्रीराम आकर यहीं बैठे थे। वहां शबरी माता का मंदिर भी है।

वसंत पंचमी का दिन हमें पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है। उन्होंने विदेशी हमलावर मौहम्मद गौरी को 16 बार पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया; पर जब 17वीं बार वे पराजित हुए, तो गौरी उन्हें अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और उनकी आंखे फोड़ दीं।

इसके बाद की घटना तो जगप्रसिद्ध ही है। गौरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा। पृथ्वीराज के साथी कवि चंद्रबरदाई के परामर्श पर गौरी ने ऊंचे स्थान पर बैठकर तवे पर चोट मारकर संकेत किया। तभी चंद्रबरदाई ने पृथ्वीराज को संदेश दिया।

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण

ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।।

पृथ्वीराज चौहान ने इस बार भूल नहीं की। उन्होंने तवे पर हुई चोट और चंद्रबरदाई के संकेत से अनुमान लगाकर जो बाण मारा, वह गौरी के सीने में जा धंसा। इसके बाद चंद्रबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक दूसरे के पेट में छुरा भौंककर आत्मबलिदान दे दिया। यह घटना भी 1192 ई0 में वंसत पंचमी वाले दिन ही हुई थी।

यह दिन हमें शिवाजी और तानाजी मालसुरे की भी याद दिलाता है। शिवाजी को एक बार मुगलों से हुई सन्धि के कारण अनेक किले छोड़ने पड़े थे, जिनमें ‘कोंडाणा’ भी था। एक बार मां जीजाबाई ने शिवाजी से कहा कि सुबह भगवान सूर्य को अर्घ्य देते समय कोंडाणा पर फहराता हरा झंडा मेरी आंखों को बहुत चुभता है। इसके स्थान पर यथाशीघ्र भगवा झंडा फहराना चाहिए।

मां के आदेश को मानकर शिवाजी ने अपने विश्वस्त सहायक तानाजी मालसुरे को यह काम सौंपा। तानाजी ने अपने भाई सूर्याजी एवं 500 सैनिकों के साथ योजना बनाकर किले पर रात में धावा बोल दिया। इस युद्ध में तानाजी स्वयं मारे गये; पर किला जीत लिया गया। शिवाजी ने यह समाचार सुनकर कहा – गढ़ आया, पर सिंह गया। तब से उस किले का नाम ‘सिंहगढ़’ हो गया। उसी दिन तानाजी के पुत्र रायबा का विवाह था; पर उन्होंने निजी कार्य की अपेक्षा देशकार्य को अधिक महत्व दिया। यह प्रसंग चार फरवरी, 1670 (वसंत पंचमी) का ही है।

वसंत पंचमी का लाहौर निवासी वीर हकीकत से भी गहरा संबंध है। एक दिन जब मुल्ला जी किसी काम से विद्यालय छोड़कर चले गये, तो सब बच्चे खेलने लगे; पर वह पढ़ता रहा। जब अन्य बच्चों ने उसे छेड़ा, तो उसने दुर्गा मां की सौगंध दी। मुस्लिम बालकों ने दुर्गा मां की हंसी उड़ाई। हकीकत ने कहा कि यदि में तुम्हारी बीबी फातिमा के बारे में कुछ कहूं, तो तुम्हें कैसा लगेगा ?

बस फिर क्या था; मुल्ला जी के आते ही उन शरारती छात्रों ने शिकायत कर दी कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है। फिर तो बात बढ़ते हुए बड़े काजी तक जा पहुंची। मुस्लिम शासन में वही निर्णय हुआ, जिसकी अपेक्षा थी। आदेश हो गया कि या तो हकीकत मुसलमान बन जाये, अन्यथा उसे मृत्युदंड दिया जायेगा। हकीकत ने यह स्वीकार नहीं किया। परिणामतः उसे तलवार के घाट उतारने का फरमान जारी हो गया।

कहते हैं उसके भोले मुख को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गयी। हकीकत ने कहा कि जब मैं बच्चा होकर अपना धर्म निभा रहा हूं, तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो ? इस पर जल्लाद ने दिल मजबूत कर तलवार चला दी; पर उस वीर का शीश धरती पर न गिरकर आकाशमार्ग से सीधा स्वर्ग चला गया। यह घटना वसंत पंचमी (4.2.1734) को ही हुई थी। पाकिस्तान यद्यपि मुस्लिम देश है; पर हकीकत के आकाशगामी शीश की याद में वहां वसंत पंचमी पर पतंगें उड़ाई जाती हैं। हकीकत लाहौर का निवासी था। अतः पतंगबाजी का सर्वाधिक जोर लाहौर में रहता है।

वंसत पंचमी हमें गुरु रामसिंह कूका की भी याद दिलाती है। उनका जन्म 1816 ई0 में वंसत पंचमी पर लुधियाना के भैणी ग्राम में हुआ था। कुछ समय वे रणजीत सिंह की सेना में रहे; फिर घर आकर खेतीबाड़ी में लग गये; पर आध्यात्मिक प्रवृत्ति होने के कारण इनके प्रवचन सुनने लोग आने लगे। धीरे-धीरे इनके शिष्यों का एक अलग पंथ ही बन गया, जो ‘कूका पंथ’ कहलाया।

गुरु रामसिंह गोरक्षा, स्वदेशी, नारी उद्धार, अंतरजातीय विवाह, सामूहिक विवाह आदि पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने ही सर्वप्रथम अंग्रेजी शासन का बहिष्कार कर अपनी स्वतन्त्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी थी। प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर भैणी गांव में मेला लगता था। 1872 में मेले में आते समय उनके एक शिष्य को मुसलमानों ने घेर लिया। उन्होंने उसे पीटा और उसके सामने गाय काटकर मंुह में गोमांस ठूंस दिया। यह सुनकर गुरु रामसिंह के शिष्य भड़क गये। उन्होंने मुसलमानों पर हमला बोल दिया; पर दूसरी ओर से अंग्रेज सेना आ गयी। अतः युद्ध का पासा पलट गया।

इस संघर्ष में अनेक कूका वीर शहीद हुए और 68 पकड़ लिये गये। इनमें से 50 को 17 जनवरी, 1872 को मलेरकोटला में तोप के सामने खड़ाकर उड़ा दिया गया। शेष 18 को अगले दिन फांसी दी गयी। दो दिन बाद गुरु रामसिंह को भी पकड़कर बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया। 14 साल तक वहां कठोर अत्याचार सहकर 1885 ई0 में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।

वसंत पंचमी हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्मदिवस (21.2.1899) भी है। निराला जी के मन में निर्धनों के प्रति अपार प्रेम और पीड़ा थी। वे अपने पैसे और वस्त्र खुले मन से उन्हें दे डालते थे। अतः लोग उन्हें ‘महाप्राण’ कहते थे। एक बार नेहरू जी ने उनके लिए शासन की ओर से कुछ सहयोग का प्रबंध किया; पर वह राशि उन्होंने महादेवी वर्मा के माध्यम से भिजवाई। उन्हें भय था कि यदि वह राशि सीधे निराला जी को मिली, तो वे उसे भी निर्धनों में बांट देंगे।

श्रीकृष्ण की भक्ति में अपने राजकुल को ठुकरा देने वाले मीराबाई ने 1570 ई0 में इसी दिन अपनी देह का विसर्जन प्रभु चरणों में किया था। आर्य समाज के माध्यम से हिन्दुत्व और देशप्रेम की अलख जगाने वाले महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्म (12.2.1824) भी इसी दिन हुआ था। 1823 ई0 की वसंत पंचमी पर ग्राम रसूलपुर (गाजियाबाद, उ0प्र0) में जन्मे संत गंगादास ने रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान के बाद उनका शरीर अपनी झोपड़ी में रखकर उसे आग लगा दी। इससे रानी के शरीर को अंग्रेज हाथ नहीं लगा सके।

जहां एक ओर वसंत ऋतु हमारे मन में उल्लास का संचार करती है, वहीं दूसरी ओर यह हमें उन वीरों का भी स्मरण कराती है, जिन्होंने देश और धर्म के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी। आइये, इन्हें नमन करते हुए हम भी वसंत के उत्साह में सम्मिलित हों।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *