पर्यावरण लेख

धरती का हरा गहना है पर्यावरण 

     साधना होगा प्रकृति, पर्यावरण और विकास  का संतुलन

डॉ घनश्याम बादल 

मानव सभ्यता के इतिहास में वर्तमान जितना सुविधासंपन्न है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी बन गया है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने जीवन को सरल तो बनाया है मगर विकास की अंधी दौड़ ने प्रकृति के संतुलन को गंभीर रूप से बिगाड़ा है।     

   आज पर्यावरण संरक्षण का मसला मानव अस्तित्व का प्रश्न है। प्रत्येक वर्ष 5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस याद दिलाता है कि पृथ्वी केवल हमारी नहीं, आने वाली पीढ़ियों की भी धरोहर है। यदि आज पर्यावरण को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में जीवन अनेक संकटों से घिर सकता है।

पर्यावरण प्रदूषण : कारण

पर्यावरण प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण अनियंत्रित मानवीय गतिविधियां हैं। औद्योगीकरण और शहरीकरण ने आर्थिक प्रगति को गति दी है, लेकिन इसके साथ वायु, जल और भूमि प्रदूषण भी बढ़ा है।

कारखानों से निकलने वाला धुआं, वाहनों से उत्सर्जित गैसें और कोयले तथा पेट्रोलियम जैसे जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग वायु प्रदूषण के मुख्य स्रोत हैं। महानगरों में बढ़ता धुंध का स्तर इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है।

जल प्रदूषण भी एक बड़ी चुनौती है। उद्योगों का रासायनिक अपशिष्ट, सीवेज का अनुपचारित जल और कृषि में उपयोग होने वाले रासायनिक उर्वरक तथा कीटनाशक नदियों, झीलों और भू-जल को दूषित कर रहे हैं। अनेक स्थानों पर पीने योग्य स्वच्छ जल की कम उपलब्धता संकट बनती जा रही है।

वनों की अंधाधुंध कटाई, बढ़ती आबादी और निर्माणकार्यों के लिए लगातार जंगलों को समाप्त किया जा रहा है। इससे जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और अनेक वन्य प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं।

   प्लास्टिक प्रदूषण भी वैश्विक चिंता का विषय है। एक बार उपयोग में आने वाला प्लास्टिक न केवल भूमि और जल स्रोतों को प्रदूषित करता है, बल्कि समुद्री जीवों और पशु-पक्षियों के लिए भी घातक सिद्ध हो रहा है।

 दुष्प्रभाव :

पर्यावरण प्रदूषण का प्रभाव केवल प्रकृति तक सीमित नहीं, बल्कि यहमानव जीवन और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।

वायु प्रदूषण के कारण अस्थमा, फेफड़ों के रोग, हृदय संबंधी बीमारियां और कैंसर जैसी गंभीर समस्याएं बढ़ रही हैं। विश्व भर में लाखों लोगों की समयपूर्व मृत्यु प्रदूषित हवा के कारण होती है।जल प्रदूषण से हैजा, टाइफाइड और अन्य संक्रामक रोगों का खतरा बढ़ रहा है। दूषित जल कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा को भी प्रभावित कर रहा है।

जलवायु परिवर्तन पर्यावरण संकट का सबसे गंभीर परिणाम बना है। वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और मौसम की चरम घटनाएं अधिक बार सामने आ रही हैं। कहीं भीषण गर्मी पड़ रही है तो कहीं बाढ़ और चक्रवात विनाश मचा रहे हैं।

पर्यावरणीय असंतुलन का असर कृषि पर भी स्पष्ट दिखाई देता है। अनियमित वर्षा, सूखा और मिट्टी की उर्वरता में कमी के कारण किसानों की कठिनाइयां बढ़ रही हैं। खाद्य उत्पादन पर इसका सीधा प्रभाव पड़ रहा है।

संरक्षण जरूरी 

एक संतुलित पर्यावरण ही स्वस्थ जीवन का आधार है। स्वच्छ वायु, निर्मल जल, उपजाऊ भूमि और हरित वन मानव जीवन की मूल आवश्यकताएं हैं। यदि पर्यावरण संतुलित रहेगा तो प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग संभव होगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी पर्याप्त संसाधन उपलब्ध रहेंगे।

संतुलित पर्यावरण जैव विविधता को संरक्षित रखता है। विभिन्न वनस्पतियां और जीव-जंतु प्राकृतिक चक्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके संरक्षण से पारिस्थितिक तंत्र मजबूत होता है।

पर्यावरण संरक्षण आर्थिक दृष्टि से भी लाभकारी है। स्वच्छ वातावरण से स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च कम होता है, कृषि उत्पादन बेहतर होता है और पर्यटन जैसी गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है। हरित अर्थव्यवस्था रोजगार के नए अवसर भी सृजित कर सकती है।

 कैसे बचे पर्यावरण?

पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें प्रत्येक नागरिक की भागीदारी आवश्यक है।सबसे पहले वृक्षारोपण को जन आंदोलन का स्वरूप देना होगा। पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और जलवायु संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। केवल पौधे लगाना ही पर्याप्त नहीं, उनकी देखभाल और संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है।

ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों को अपनाना समय की मांग है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए ताकि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम हो सके।

प्लास्टिक के उपयोग को न्यूनतम करना होगा। कपड़े, जूट और अन्य पर्यावरण अनुकूल विकल्पों को अपनाकर इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

जल संरक्षण भी अत्यंत आवश्यक है। वर्षा जल संचयन, जल का विवेकपूर्ण उपयोग और जल स्रोतों की स्वच्छता सुनिश्चित करने से भविष्य के जल संकट को कम किया जा सकता है।

सार्वजनिक परिवहन, साइकिल और पैदल चलने की संस्कृति को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे ईंधन की बचत होगी और वायु प्रदूषण में कमी आएगी।

कचरा प्रबंधन की वैज्ञानिक व्यवस्था विकसित करना भी जरूरी है। कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित कर पुनर्चक्रण की प्रक्रिया को बढ़ावा देना चाहिए।

विकास बनाम पर्यावरण:

हमें समझना होगा कि विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। उद्योगों में पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को अपनाना होगा। निर्माण कार्यों में हरित मानकों का पालन सुनिश्चित करना होगा।

कृषि क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग के स्थान पर जैविक खेती को प्रोत्साहन से भूमि और जल दोनों की गुणवत्ता सुरक्षित रहेगी।

 पर्यावरणीय चेतना का विस्तार उससे ज़्यादा ज़रूरी है। बच्चों और युवाओं में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित की जाए ताकि वे भविष्य में जिम्मेदार नागरिक बन सकें।

सरकारों को कठोर पर्यावरणीय कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए। साथ ही नागरिक समाज, उद्योग जगत और आम जनता के बीच सहयोगात्मक दृष्टिकोण विकसित करना होगा।

   ‌विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है।  यदि प्रकृति का दोहन इसी गति से जारी रहा तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा, शुद्ध जल और सुरक्षित पर्यावरण उपलब्ध कराना कठिन हो जाएगा। आज  विकास को पुनः परिभाषित कर ऐसा विकास करें जो प्रकृति को नष्ट करके नहीं, बल्कि उसके साथ सामंजस्य स्थापित करके आगे बढ़े। जब मानव अपनी गतिविधियों को पर्यावरणीय संतुलन के अनुरूप संचालित करेगा, तभी स्वस्थ समाज, समृद्ध अर्थव्यवस्था और सुरक्षित भविष्य का निर्माण संभव होगा।