पर्यावरण लेख

प्रकृति के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी है पर्यावरण संरक्षण

संतोष कुमार तिवारी 

विश्व पर्यावरण दिवस हर वर्ष 5 जून को मनाया जाता है। यह केवल एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता को प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराने का अवसर है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जल संकट और जैव विविधता के क्षरण जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, तब पर्यावरण संरक्षण का विषय पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। दुर्भाग्यवश विकास और उपभोग की अंधी दौड़ में मानव ने प्रकृति का इतना दोहन किया है कि अब उसके दुष्परिणाम सीधे जनजीवन पर दिखाई देने लगे हैं।

वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय संकट लगातार गहराता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति से पहले की तुलना में लगभग 1.1 से 1.3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि यदि तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर नहीं रोका गया तो दुनिया को अभूतपूर्व प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है। वर्ष 2024 और 2025 के दौरान दुनिया के कई हिस्सों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी दर्ज की गई, जिसने जलवायु परिवर्तन के खतरे को और स्पष्ट कर दिया। भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है। देश के अनेक राज्यों में हर वर्ष गर्मी के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं। उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। भीषण गर्मी, अनियमित मानसून और बाढ़-सूखे की घटनाओं ने कृषि व्यवस्था को प्रभावित किया है। भारत की लगभग 60 प्रतिशत कृषि आज भी वर्षा पर निर्भर है, इसलिए मौसम में थोड़े से बदलाव का सीधा असर किसानों और खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है। जल संकट भी एक गंभीर चुनौती बन चुका है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार भारत विश्व की लगभग 18 प्रतिशत आबादी का घर है, लेकिन उसके पास दुनिया के केवल 4 प्रतिशत मीठे जल संसाधन हैं। देश के कई बड़े शहर भूजल संकट का सामना कर रहे हैं। नीति आयोग की एक रिपोर्ट ने पहले ही चेतावनी दी थी कि भारत के अनेक शहरों में भूजल तेजी से समाप्त हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी जल स्रोतों के सूखने और प्रदूषित होने की समस्या बढ़ रही है।

वायु प्रदूषण की स्थिति भी चिंताजनक है। विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में अक्सर भारत के कई शहर शामिल रहते हैं। प्रदूषित हवा के कारण अस्थमा, हृदय रोग और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि वायु प्रदूषण आज सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक बन चुका है। विकास के नाम पर बढ़ते वाहनों, उद्योगों और निर्माण कार्यों ने इस समस्या को और गंभीर बनाया है। वनों की कटाई और जैव विविधता का ह्रास भी पर्यावरणीय संकट को बढ़ा रहा है। पेड़ न केवल कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं बल्कि वर्षा चक्र, भूजल संरक्षण और जैव विविधता को भी बनाए रखते हैं। इसके बावजूद शहरी विस्तार और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण बड़ी संख्या में वन क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पृथ्वी पर अनेक वनस्पति और जीव-जंतु प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। यह केवल प्रकृति का नुकसान नहीं बल्कि मानव जीवन के लिए भी गंभीर खतरा है।प्लास्टिक प्रदूषण एक और बड़ी समस्या बनकर उभरा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार विश्व में हर वर्ष करोड़ों टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, जिसका बड़ा हिस्सा नदियों और समुद्रों में पहुंच जाता है। भारत में भी एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध के बावजूद इसका उपयोग पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो पाया है। प्लास्टिक न केवल पर्यावरण बल्कि पशुओं और मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन रहा है।

हालांकि स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकारों, संस्थाओं और आम नागरिकों द्वारा अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। सौर और पवन ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। स्वच्छ भारत अभियान, नमामि गंगे, जल जीवन मिशन और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण जैसे कार्यक्रम सकारात्मक पहल के उदाहरण हैं। लेकिन केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी, जब तक समाज की सक्रिय भागीदारी नहीं होगी। पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत व्यक्ति से होती है। यदि प्रत्येक नागरिक जल संरक्षण, ऊर्जा बचत, प्लास्टिक के सीमित उपयोग, सार्वजनिक परिवहन के प्रयोग और वृक्षारोपण जैसे छोटे-छोटे कदम उठाए तो उसका बड़ा प्रभाव पड़ सकता है। स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संगठनों को पर्यावरण शिक्षा को जन आंदोलन का रूप देना होगा। उद्योगों को भी अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन करते हुए प्रदूषण नियंत्रण और हरित तकनीकों को अपनाना चाहिए। विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि संतुलन ही मानव विकास का आधार हो सकता है। यदि आज पर्यावरण की रक्षा नहीं की गई तो आने वाली पीढ़ियों को जल, वायु और खाद्य संकट जैसी भयावह परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए यह दिन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि चेतावनी और संकल्प दोनों है। 

 आज आवश्यकता इस बात की है कि पर्यावरण संरक्षण को सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि जन आंदोलन बनाया जाए। क्योंकि पृथ्वी हमारे पूर्वजों की विरासत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों से लिया गया उधार है। इसे सुरक्षित रखना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है। तभी विश्व पर्यावरण दिवस का वास्तविक उद्देश्य सार्थक हो सकेगा और आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ, हरित और सुरक्षित भविष्य मिल सकेगा।

संतोष कुमार तिवारी