हिन्दूराष्ट्र भारत व सनातन संस्कृति में उन्नति का सार

~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

हम देखते हैं कि विभिन्न देशों की यात्राओं में जब हमारे राजनेता,राजनयिक जाते हैं,तो उनके स्वागत के लिए विश्वभूमि के बन्धु/भगिनी भारतीय संस्कृति की परम्पराओं, धार्मिक श्लोकों व हिन्दू संस्कृति के विविध प्रतीकों,पध्दतियों,कलाओं के माध्यम से उनका सम्मान करने के लिए अग्रसर रहते हैं। भारत में भले ही छुद्र राजनैतिक स्वार्थों के लिए विभिन्न धड़े सनातन हिन्दू धर्म संस्कृति को उपेक्षा के भाव से देखते हैं,और उसके प्राकट्य को कभी साम्प्रदायिकता से जोड़कर अपमानित करने का प्रयास करते हैं,तो कभी पन्थनिरपेक्षता की दुहाई देकर इसे असहिष्णुता बतलाते हैं।
 हालाँकि ऐसा करने वाले पाश्चात्य देशों की ओर श्रध्दा भाव से झुके रहते हैं,किन्तु जब हम विश्व की दृष्टि का भारत के प्रति अवलोकन देखते हैं तो उनके केन्द्र में – सनातन हिन्दू धर्म व संस्कृति ही रहती है । यह देख और सुनकर हम गर्व से भर जाते हैं कि समूचा विश्व हमारी संस्कृति का सम्मान कर रहा है,लेकिन हम उस संस्कृति का कितना सम्मान करते हैं यह प्रायः भूल जाते हैं। हालाँकि भारत में भी कई वर्ग ऐसे हैं जो विदेशों में भी भारतीय संस्कृति की झंकार से आहत महसूस करते हैं।वे भारत में तो भले ही विषवमन कर लें,किन्तु समूचे विश्व में भारतीय संस्कृति,हिन्दू व हिन्दुत्व के प्रति अगाध श्रद्धा व सम्मान के भाव को तो कभी भी कम नहीं कर सकते हैं। यह श्रध्दा व सम्मान विश्व को  हिन्दू जाति के द्वारा दिए गए महान अवदानों व उसके संस्कारों के कारण स्थापित हुआ है।  वस्तुतः सत्य यही है भारत स्वभावतः और नैसर्गिक तौर पर हिन्दूराष्ट्र है और भारत की  पहचान सनातन हिन्दू धर्म एवं संस्कृति है। जो कि समूचे विश्व को सर्वस्वीकार्य है।
इटली यात्रा में गए प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी के स्वागत में पढ़ा गया शिव ताण्डव स्त्रोत और जय श्रीराम के गगनभेदी नारे यह केवल प्रधानमन्त्री का सम्मान नहीं है,बल्कि समूचा विश्व भारत को जिस कारण से जानता है-जिस संस्कृति के कारण जानता है  यह उसका सम्मान है। सम्पूर्ण विश्व भारत को धर्म-कर्म,ज्ञान, अध्यात्म और उच्च जीवनमूल्यों के साथ -साथ मानवता के अग्रदूत और जीवमात्र के  कल्याण की भावना का सर्जक पोषक एवं रक्षक मानता है।
आप विश्व के किसी हिस्से में जाइए वे आपको आपके वेद,उपनिषदों, धर्म, अध्यात्म, हिन्दुओं के त्याग, बलिदान,सहिष्णुता, विश्वबन्धुत्व ,श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण, श्रीरामचरितमानस, महाभारत व भारतीय संस्कृति के आधार भगवान श्रीराम – कृष्ण,ऋषि-महर्षियों की मेधा,तेजोमय दर्शन  व आधुनिक परिप्रेक्ष्य में स्वामी विवेकानन्द की विचार दृष्टि। विविधता में एकता, संस्कृति व समाज, परम्पराओं की बहुलता के साथ ‘एकत्व’ व सहजता,सरलता,निश्छलता व पावित्र्य भाव से परिपूर्ण आपके स्नेहानुराग से पुष्ट उन अनगिनत श्रेष्ठ उदाहरणों के माध्यम से जानते हैं जिनमें भारतीय संस्कृति प्रकट होती है।
विदेशों में आप किसी भी विद्वान के पास जाइए और उससे पूँछिए कि भारत की संस्कृति व धर्म क्या है? तब आपको एक ही उत्तर मिलेगा – सनातन हिन्दू संस्कृति।  गर्व कीजिए कि ‘हिन्दू ‘ शब्द के जुड़ जाने के साथ ही समूचा विश्व आपको आत्मीयता के साथ  अपना लेता है,और वह आपके प्रति कृतज्ञ भाव से नि:शंक होकर खिंचा चला आता है। क्योंकि वह जानता है कि हिन्दू होने का अर्थ क्या है? विश्व भावना जानती है कि ‘हिन्दू’ श्रेष्ठता का दम्भ नहीं पालते बल्कि सबके साथ आत्मीय होकर ,अपनी महान संस्कृति व विरासत के विविध माध्यमों से संसार की भलाई व मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए ही सतत् प्रयत्नशील रहते हैं।
किन्तु दुर्भाग्य देखिए भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सम्मिलित ‘पन्थनिरपेक्षता’ का यहाँ आशय ही उलट कर देखा जाता है। और भारत में ऐसे दूषित मानसिकता वाले विदूषकों की कमीं नहीं है,जो हिन्दू-हिन्दुत्व और सनातन संस्कृति के प्रति घ्रणा रखते हैं। इतना ही नहीं बल्कि वे सनातन हिन्दू धर्म- संस्कृति के प्रतीकों व परम्पराओं को अपमानित करने का कोई भी अवसर नहीं चूकते हैं। अतएव अन्य मतावलम्बियों को यह समझना चाहिए कि पूजा,उपासना पध्दति से धर्म व संस्कृति नहीं बदलती है। वैमनस्य व कलुषता फैलाने के स्थान पर गर्व करिए कि आपको परम् पावनी पुण्यमयी सरस,सलिला  भारत-भूमि का अङ्ग होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।  क्षुद्र स्वार्थों, निकृष्ट राजनीति व सामाजिक ऐक्यता को  छिन्न-भिन्न करने वालों से सतर्क रहिए,उनका निर्मूलन करिए और सर्जनात्मकता के साथ राष्ट्रोत्थान के लिए अग्रसर रहिए।
सम्पूर्ण विश्व के दु:खो ,अशान्ति, हिंसा, उत्पात इत्यादि का वास्तविक हल केवल भारतीय संस्कृति में ही है,क्योंकि यह वही धरा-वही संस्कृति है जो केवल भौतिक ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक और इहलौकिक से लेकर पारलौकिक उन्नति का मार्ग दिखलाती है। सनातन हिन्दू संस्कृति चैतन्य व वात्सल्यमयी है,यह सहज ही सबको आत्मसात कर उसे पोषण प्रदान करती है।  समूचा विश्व भारत की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रहा है और वह लालायित है भारत-भूमि से अविरल नि:सृत होने वाली धर्म व अध्यात्म की सर्वकल्याणकारक अमृत धार का रसपान करने के लिए। हम अपने ‘स्व’ को पहचाने और उसके उत्कृष्ट मानबिन्दुओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति के स्वभाव का पथानुसरण करते हुए ‘विश्वगुरू’ भारत यानि किसी पर साम्राज्य चलाने की इच्छा नहीं अपितु मनुष्यत्व की प्रतिष्ठा के माध्यम से विश्व कल्याण की कामना करना है। 
किन्तु ध्यान यह भी रखना होगा और यह आत्मावलोकन करना होगा कि जिस संस्कृति, जिस धर्म, जिस दर्शन, जिस संसार, जिस विरासत के कारण भारत का विश्वभर में अनन्य स्थान है उसको लेकर हमारी  क्या धारणा है? क्या हम विश्व भर में सनातन धर्म की झंकृति व संकेतों को अभी भी समझ नहीं पा रहे हैं? यदि किसी भी प्रकार का ग्लानिबोध है तो उसको समाप्त करिए और अपनी भारतीय संस्कृति की ओर उन्मुख होकर स्वामी विवेकानन्द के शब्दानुसार ही – कट्टर सनातनी हिन्दू बनिए। यदि भारत अपने मूल को नहीं पहचानेगा तो समूचा विश्व जिस कारण से आपको यह अपार स्नेह दे रहा है क्या वह दीर्घकाल तक संभव होगा? यदि भारत नहीं जगेगा अपनी संस्कृति की ओर उन्मुख नहीं होगा तो कहीं ऐसा न हो कि भारतीय धर्म-दर्शन के लिए हमें पाश्चात्य देशों की ओर ही रुख करना पड़े,हालाँकि ऐसा कभी संभव नहीं होगा। साथ ही साथ महर्षि अरविन्द की भविष्यवाणी यानि इक्कीसवीं सदी भारत की है यह हमें ध्यान रखना है। और यह भविष्यवाणी तभी फलित होगी और सत्य बनकर सभी के समक्ष होगी जब भारत अपने ‘स्व’ को पहचानकर अग्रसर होगा।
 अपने स्वत्व को पहचानिए,गर्वोन्नत होकर अपने मेरूदण्ड को सीधा करिए, सगर्व अपने हिन्दू होने की घोषणा करिए। और महान पुरखों की परम्परा से प्राप्त मेधा व विरासत को सँजोइए,संरक्षण  व सम्वर्द्धन करते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए वह करके जाइए जिसकी हमारे महान पुरखों ने कल्पना की थी। 
भारत का मूल धर्म व अध्यात्म है जिसकी साधना करनी होगी और निरन्तर अथक भारतीय समाज की विकृतियों को दूर करते हुए आगे बढ़ते रहना होगा। अन्तिम में स्वामी विवेकानन्द का यह आह्वान जो अभी तक पूर्ण नहीं हुआ किन्तु जिसको पूर्ण करने का दायित्व वर्तमान पीढ़ी पर है उसके साथ अपनी बातों को यहाँ अल्पविराम देता हूँ- ” क्या तुम जनता की उन्नति कर सकते हो?उनकी स्वाभाविक वृत्ति को बनाए रखकर ,क्या तुम उनका खोया हुआ व्यक्तित्व लौटा सकते हो? क्या समता,स्वतन्त्रता,कार्य- कौशल तथा पौरुष में तुम पाश्चात्यों के गुरु बन सकते हो ? क्या तुम उसी के साथ -साथ स्वाभाविक आध्यात्मिक प्रेरणा तथा अध्यात्म -साधनाओं में एक कट्टर सनातनी हिन्दू हो सकते हो ? यह काम करना है और हम  इसे करेंगे ही। “

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