कविता

हर प्रभात कहता

क्षितिज सुनाता रोज़ ही, आशा का संदेश।
हर प्रभात कहता उठो, जीवन परम विशेष॥

सूरज चुपके से रचे, नव उजियारा-गान।
रातों के हर दर्द का, करता है अवसान॥

लहर-लहर सागर कहे, छोड़ो बीता काल।
आगे बढ़ना ही सदा, जीवन की है चाल॥

लाली ओढ़े व्योम ने, लिखा नया अध्याय।
अँधियारे के अश्रु से, जन्मा नव पर्याय॥

रेतों के पदचिह्न भी, देते यही पुकार।
चलते रहने से सदा, मिलता है संसार॥

थका हुआ हर मन यहाँ, पाए फिर विश्वास।
नव किरणों के साथ ही, खिल उठती हर आस॥

कल की हारों का नहीं, रखता सूरज लेख।
हर दिन देता रोशनी, मिटा निराशा-रेख॥

भीतर जितना दीप हो, उतना जग उजियार।
मन का निर्मल आलोक ही, जीवन का आधार॥

‘सौरभ’ हर प्रभात में, ईश्वर का वरदान।
उठो, बढ़ो, मुस्काइए, यह जीवन का गान॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ