गुप्त नवरात्रि में मां संकटा
कुमार कृष्णन
भारत की आध्यात्मिक परंपरा में कुछ नगर केवल भौगोलिक इकाइयाँ नहीं, बल्कि सभ्यता की जीवित चेतना हैं। काशी उन्हीं में सबसे विशिष्ट है। यहां समय केवल बीतता नहीं, बल्कि परंपरा के रूप में सांस लेता है। गंगा के प्रवाह, मंदिरों की घंटियों, वैदिक मंत्रों, लोकगीतों और अनगिनत आस्थाओं के बीच यह नगर आज भी उस सांस्कृतिक निरंतरता का साक्षी है, जिसने भारतीय समाज को हजारों वर्षों तक जोड़कर रखा। यही कारण है कि काशी का अनुभव केवल एक तीर्थयात्रा नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा से संवाद की यात्रा बन जाता है।
इसी काशी में, मणिकर्णिका घाट के निकट स्थित मां संकटा का सिद्धपीठ शक्ति, विश्वास और लोकआस्था का ऐसा केंद्र है, जहां गुप्त नवरात्रि के दिनों में भक्ति अपने सबसे गहन स्वरूप में दिखाई देती है। यह वह समय है जब बाहरी उत्सवों की अपेक्षा भीतर की साधना को अधिक महत्व दिया जाता है। साधक मंत्र-जप, तप और ध्यान के माध्यम से आत्मबल अर्जित करते हैं, जबकि सामान्य श्रद्धालु जीवन के संकटों से मुक्ति और मानसिक शांति की कामना लेकर मां के दरबार में पहुंचते हैं।
गुप्त नवरात्रि का स्वरूप शारदीय और चैत्र नवरात्रि से भिन्न है। यह शक्ति की अंतर्मुखी साधना का पर्व है। भारतीय तांत्रिक और शाक्त परंपरा में इन नौ दिनों को विशेष सिद्धियों, आत्मानुशासन और आध्यात्मिक उन्नयन का काल माना गया है। काशी जैसे प्राचीन धार्मिक नगर में इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि यहां शक्ति और शिव की आराधना एक-दूसरे की पूरक मानी जाती है। बाबा विश्वनाथ के नगर में मां संकटा का सिद्धपीठ इसी आध्यात्मिक संतुलन का सशक्त प्रतीक है।
काशी को ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा गया है—वह भूमि जिसे स्वयं भगवान शिव कभी नहीं छोड़ते। सामान्यतः काशी की चर्चा मोक्ष और मणिकर्णिका से जुड़कर होती है, लेकिन इस नगर की आध्यात्मिक चेतना केवल मृत्यु-दर्शन तक सीमित नहीं है। यहां जीवन की जिजीविषा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। मां संकटा का मंदिर इसी जीवन-दर्शन का प्रतिनिधित्व करता है, जहां श्रद्धालु मृत्यु नहीं, बल्कि जीवन के संघर्षों पर विजय का आशीर्वाद मांगने आते हैं। यह मंदिर बताता है कि भारतीय अध्यात्म केवल परलोक की चिंता नहीं करता, बल्कि वर्तमान जीवन के दुःख, भय, असुरक्षा और संघर्षों को भी उतनी ही गंभीरता से स्वीकार करता है।
मां संकटा से जुड़ी लोककथाएं भारतीय सांस्कृतिक मानस की गहराई को व्यक्त करती हैं। कहा जाता है कि दक्ष यज्ञ के बाद जब भगवान शिव शोक और विरह से व्याकुल हुए, तब उन्होंने मां संकटा की आराधना की। देवी की कृपा से उनका संताप शांत हुआ और आगे चलकर पार्वती के रूप में उन्हें पुनः अपनी अर्धांगिनी प्राप्त हुई। यह कथा केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन का रूपक है, जो बताता है कि विनाश के बाद भी सृजन की संभावना बनी रहती है और हर संकट के भीतर आशा का बीज छिपा होता है।
लोकमान्यता पांडवों को भी इस सिद्धपीठ से जोड़ती है। अज्ञातवास के दौरान उन्होंने यहां तप किया और देवी से धर्म, धैर्य तथा गौसेवा का संदेश प्राप्त किया। इन कथाओं का ऐतिहासिक सत्य चाहे विवाद का विषय हो, लेकिन सांस्कृतिक सत्य निर्विवाद है। लोकस्मृति इतिहास से अधिक लंबे समय तक जीवित रहती है, क्योंकि वह समाज की सामूहिक चेतना में निवास करती है। मां संकटा का मंदिर इसी लोकस्मृति का जीवंत केंद्र है।
गुप्त नवरात्रि के दिनों में मंदिर का वातावरण अद्भुत हो उठता है। प्रातःकाल से ही श्रद्धालुओं की कतारें लग जाती हैं। वैदिक मंत्र, दुर्गासप्तशती का पाठ, दीपों की ज्योति, धूप की सुगंध और देवी स्तुति का सामूहिक स्वर काशी की आध्यात्मिक संस्कृति को सजीव कर देता है। यहां आने वालों में साधक भी हैं, विद्यार्थी भी, व्यापारी भी, गृहिणियां भी और दूर-दराज़ से आए पर्यटक भी। सबकी प्रार्थनाएं अलग हैं, लेकिन विश्वास एक है—मां संकटा संकट हरती हैं।
यही इस सिद्धपीठ की सबसे बड़ी सांस्कृतिक विशेषता है। यहां जाति, भाषा, क्षेत्र और सामाजिक पहचान के भेद अप्रासंगिक हो जाते हैं। भारतीय तीर्थों की यही लोकतांत्रिक प्रकृति उन्हें केवल धार्मिक स्थल नहीं रहने देती, बल्कि सामाजिक समरसता के केंद्र में भी बदल देती है। आस्था यहां व्यक्ति को समुदाय से जोड़ती है और समुदाय संस्कृति से।
मंदिर में नारियल और चुनरी अर्पित करने की परंपरा भी केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं है। भारतीय संस्कृति में चुनरी शक्ति के सम्मान और समर्पण का प्रतीक है, जबकि नारियल पूर्णता, पवित्रता और शुभारंभ का संकेत देता है। इन प्रतीकों का महत्व इसलिए बना रहा क्योंकि उन्होंने पीढ़ियों तक समाज की सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखा।
आज का समय विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी प्रगति का है। सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन तनाव, अकेलापन और मानसिक असुरक्षा भी बढ़ी है। ऐसे समय में मां संकटा जैसे सिद्धपीठ यह याद दिलाते हैं कि मनुष्य केवल तकनीक से नहीं, विश्वास से भी जीवित रहता है। आस्था हर समस्या का वैज्ञानिक समाधान नहीं देती, लेकिन वह संघर्ष करने का नैतिक साहस अवश्य देती है। शायद यही कारण है कि आधुनिक शिक्षित समाज भी ऐसे तीर्थों की ओर आकर्षित होता है।
काशी की सांस्कृतिक संरचना का सबसे बड़ा गुण यही है कि यहां इतिहास, मिथक, दर्शन और लोकविश्वास एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यही भारतीय सभ्यता की शक्ति है। मां संकटा का सिद्धपीठ इस सांस्कृतिक निरंतरता का सजीव उदाहरण है, जहां गुप्त नवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशक्ति, धैर्य और आशा के पुनर्जागरण का पर्व बन जाती है।
शायद इसी कारण काशी की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती, जब तक श्रद्धालु मां संकटा के दरबार में उपस्थित होकर अपनी प्रार्थना अर्पित न कर दे। यहां संकट केवल जीवन की बाहरी परिस्थितियां नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर का भय, मोह, असुरक्षा और निराशा भी है। मां संकटा का संदेश यही है कि विश्वास, धैर्य और करुणा के साथ कोई भी संकट अजेय नहीं रहता। यही इस सिद्धपीठ की सबसे बड़ी महिमा है और यही काशी की शाश्वत सांस्कृतिक चेतना का अमर संदेश।
कुमार कृष्णन