जन-जन की दुलारी दिव्यात्मा सुषमा स्वराज

संस्कृति, सभ्यता, सौम्यता व सरस्वती का साक्षात् स्वरूप थी सुषमा

  • योगेश कुमार गोयल

देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेताओं में शुमार रही पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज 67 वर्ष
की आयु में कार्डियाक अटैक के चलते दुनिया छोड़कर चली गई। एकाएक उनके निधन की खबर
पाकर पूरा देश स्तब्ध रह गया। देश-विदेश में मुसीबत में फंसे लोगों की मदद के लिए जानी
जाती रही सुषमा स्वराज ट्विटर पर बेहद सक्रिय थी। उनके विदेश मंत्री रहते दुनियाभर से
भारतीय मूल के जिस भी व्यक्ति ने ट्वीट कर उनसे मदद मांगी, वह उसके ट्वीट का तुरंत
जवाब देते हुए उस पर कार्रवाई कर हरसंभव मदद भी उपलब्ध कराती थी। ट्विटर पर सक्रिय
रहकर वे किस प्रकार दुनिया के किसी भी हिस्से में फंसे भारतीयों की मदद के लिए हर समय
तैयार रहती थी, इसका अनुमान उनके ट्विटर पर दिए गए कई जवाबों से आसानी से लगाया जा
सकता है। ऐसे ही कई जवाबों में उन्होंने लोगों को बार-बार जवाब दिया कि अगर आप मंगल
ग्रह पर भी फंसे होंगे तो भी भारतीय लोग आपकी मदद अवश्य करेंगे। ट्वीट करके उनसे मदद
की गुहार लगाने पर वे न केवल भारतीयों बल्कि दुश्मन देश पाकिस्तान सहित अन्य देशों के
नागरिकों की भी मदद करती रही। यही कारण रहा कि वे ट्विटर पर सर्वाधिक सक्रिय और
लोकप्रिय नेत्री बनी रही। अपने जीवनकाल के अंतिम समय तक उन्होंने कुल 6371 ट्वीट किए,
जिनमें अधिकांश मदद के आम लोगों द्वारा किए गए ट्वीट के जवाब ही थे। उनका अंतिम
ट्वीट था जम्मू कश्मीर मसले पर मोदी सरकार के साहसिक फैसले पर किया गया ट्वीट, जिसमें
उन्होंने लिखा था, ‘‘प्रधानमंत्री जी, आपका हार्दिक अभिनंदन। मैं अपने जीवन में इस दिन को
देखने की प्रतीक्षा कर रही थी।’’ उन्हें ट्विटर पर दुनियाभर में 1.3 करोड़ लोग फॉलो करते थे

किन्तु ट्विटर पर इतनी सक्रियता के बावजूद उन्होंने स्वयं न कभी किसी को फॉलो किया और
न ही कभी किसी के ट्वीट को लाइक किया।
14 फरवरी 1952 को हरियाणा के अम्बाला छावनी में जन्मी सुषमा स्वराज दिल्ली की
पहली महिला मुख्यमंत्री थी और उनकी गिनती भाजपा के ऐसे प्रखर वक्ताओं में होती थी,
जिन्होंने अपने ओजस्वी वक्तव्यों से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी भारत का दबदबा बनाए रखा।
नेतृत्व क्षमता की दृष्टि से उनकी गिनती भाजपा में दूसरी पीढ़ी के सर्वाधिक दमदार नेताओं में
होती थी। दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री और देश में किसी भी राजनीतिक दल की पहली
महिला प्रवक्ता बनने की उपलब्धि सुषमा के ही नाम दर्ज है। इंदिरा गांधी के बाद वह भारत की
दूसरी ऐसी महिला थी, जिन्होंने विदेश मंत्री का पद संभाला और विदेश मंत्री रहते दुनिया भर में
भारत का सिर गर्व से ऊंचा भी किया। गत वर्ष संयुक्त राष्ट्र महासभा के 73वें सत्र को
सम्बोधित करते हुए अपने 22 मिनट के जोशीले भाषण के जरिये पाक को जमकर लताड़
लगाकर अंतर्राष्ट्रीय मंच के माध्यम से दुनिया के समक्ष उसका कुत्सित चेहरा बेनकाब करने की
बात हो या संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी में इसी साल 1-2 मार्च को इस्लामिक
देशों के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन ‘ओआईसी’ को सम्बोधित करते हुए आतंकवाद के मुद्दे को
पुरजोर तरीके से उठाकर इस्लामिक देशों के इस बड़े मंच के जरिये भी पाकिस्तान को जमकर
खरी-खोटी सुनाते हुए उसे दुनिया से अलग-थलग करने के प्रयासों की बात हो, उन्होंने हर ऐसे
अवसर का बखूबी इस्तेमाल किया और अपने दमदार भाषणों से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत की
धाक जमाई।
1977 में सुषमा पहली बार हरियाणा विधानसभा की सदस्य निर्वाचित हुई और मात्र 25
साल की अल्पायु में ही उसी साल चौ. देवीलाल की जनता पार्टी सरकार में हरियाणा की श्रम एवं
रोजगार मंत्री बनी, इस पद पर वे 1979 तक रही। 27 वर्ष की आयु में 1979 में सुषमा ‘जनता
पार्टी’ की प्रदेशाध्यक्ष बनी। 1980 के दशक में भाजपा का गठन होने पर वह भाजपा में शामिल
हो गई और अम्बाला छावनी से चुनाव जीतकर 1987 से 1990 तक हरियाणा की शिक्षा, खाद्य
एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री रही। केन्द्रीय राजनीति में उनके सफर की शुरूआत 1990 में उस वक्त
हुई, जब वे उस साल पहली बार राज्यसभा के लिए चुनी गई और 1996 तक इसी पद पर रही।
1996 में दक्षिणी दिल्ली संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतकर वह 13 दिन की वाजपेयी सरकार में
सूचना और प्रसारण मंत्री रही। मार्च 1998 में उन्होंने फिर इसी सीट से चुनाव जीता और 12वीं
लोकसभा में वह 19 मार्च से 12 अक्तूबर 1998 तक केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण तथा दूरसंचार
मंत्री रही। अक्तूबर 1998 में केन्द्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर 13 अक्तूबर 1998 को उन्होंने

दिल्ली की मुख्यमंत्री के रूप में नई पारी की शुरूआत की और विधानसभा चुनाव सम्पन्न होने
तक 3 दिसम्बर 1998 तक इस पद पर रही। विधानसभा चुनाव में हौज खास विधानसभा क्षेत्र से
जीतने के बावजूद उन्होंने विधानसभा सीट से त्यागपत्र दे दिया और लोकसभा सदस्यता जारी
रखी।
उनके राजनीतिक कैरियर में वर्ष 1999 में बहुत बड़ा मोड़ उस वक्त आया, जब सितम्बर
1999 में उन्होंने भाजपा आलाकामन के निर्देश पर तत्कालीन कांग्रेसाध्यक्ष तथा यूपीए चेयरपर्सन
सोनिया गांधी के खिलाफ कर्नाटक के बेल्लारी से चुनाव लड़ा। हालांकि सुषमा 56 हजार वोटों से
वह चुनाव हार गई थी किन्तु बेल्लारी में आम लोगों से उन्हीं की भाषा में संवाद करने की
उनकी शैली के कारण उनकी ऐसी छवि बनी कि वे दक्षिण भारतीयों की भी चहेती बन गई थी।
दरअसल उन्होंने स्थानीय मतदाताओं से सहज संवाद के लिए लगातार एक माह तक कन्नड़
सीखी और अपनी सभी चुनावी रैलियों में कन्नड़ में ही धाराप्रवाह भाषण दिए। उनके कन्नड़ में
दिए गए भाषण को सुनकर एक चुनावी रैली में अटल बिहारी वाजपेयी भी उनकी प्रशंसा किए
बगैर नहीं रह सके थे। बेल्लारी लोकसभा क्षेत्र से पराजित होने के बाद भाजपा आलाकमान ने
उन्हें उत्तर प्रदेश कोटे से वर्ष 2000 में राज्यसभा में भेजा, जहां उन्होंने 2006 तक भाजपा का
प्रतिनिधित्व किया। उस दौरान राज्यसभा सदस्य रहते वे वाजपेयी सरकार में 30 सितम्बर 2000
से 29 जनवरी 2003 तक सूचना एवं प्रसारण मंत्री रही। 29 जनवरी 2003 को उन्हें स्वास्थ्य एवं
परिवार कल्याण मंत्रालय तथा संसदीय मामलों के मंत्रालय का प्रभार दिया गया। 2003-04 में
स्वास्थ्य मंत्री रहते उन्होंने छह नए एम्स को हरी झंडी दी थी। 2004 में एनडीए सरकार के सत्ता
से बाहर होने तक वे 22 मई 2004 तक इस पद पर रही। 2006 में वे पुनः राज्यसभा के लिए
चुनी गई तथा 2009 के लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा की 19 सदस्यीय चुनाव प्रचार समिति
की अध्यक्ष रही। 16 मई 2009 से 18 मई 2014 तक 15वीं वह लोकसभा की सदस्य रही। उस
दौरान 3 जून 2009 से 21 दिसम्बर 2009 तक लोकसभा में विपक्ष की उप-नेता तथा 21
दिसम्बर 2009 से 18 मई 2014 तक विपक्ष की नेता के पद आसीन रही। 26 मई 2014 को
गठित हुई 16वीं लोकसभा में सुषमा ने मोदी सरकार में विदेश मंत्री रहते देश-विदेश में भारत का
मान-सम्मान और रूतबा बढ़ाने के लिए हर वो कार्य किया, जिसकी उन्हें जरूरत महसूस हुई।
अम्बाला छावनी के सनातन धर्म कॉलेज से संस्कृत तथा राजनीति विज्ञान में ग्रेजुएशन
तथा पंजाब विश्वविद्यालय चण्डीगढ़ से कानून की डिग्री लेने के बाद 1973 में सुषमा ने हाईकोर्ट
में प्रैक्टिस शुरू की और उसी साल सर्वोच्च न्यायलय में अधिवक्ता के पद पर कार्यरत हुई।
सर्वोच्च न्यायालय में ही उनके सहकर्मी व साथी अधिवक्ता स्वराज कौशल के साथ 13 जुलाई

1975 को उनका विवाह हुआ, जो बाद में 6 वर्ष तक राज्यसभा सांसद रहे तथा मिजोरम के
राज्यपाल भी रहे। स्वराज का नाम अभी तक सबसे कम आयु में राज्यपाल का पद प्राप्त करने
वाले व्यक्ति के रूप में दर्ज है। पढ़ाई पूरी करने के बाद सुषमा ने जयप्रकाश नारायण के
आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और आपातकाल का पुरजोर विरोध करने के बाद सक्रिय
राजनीति से जुड़ गई। उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक कैरियर के दौरान चार राज्यों में कुल 11
चुनाव लड़े।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अनुसार जब भी विचारधारा या भाजपा के हितों की बात आती
थी तो सुषमा किसी प्रकार का समझौता नहीं करती थी, जिसे आगे ले जाने में उनका बहुत बड़ा
योगदान था। जन-जन की हितैषी, असाधारण वक्ता, अद्वितीय राजनेता, अद्भुत दूरदृष्टा और
अतुलनीय व्यक्तित्व की धनी सुषमा स्वराज भारतीय संसद की पहली और एकमात्र ऐसी महिला
सदस्या रही, जिन्हें ‘आउटस्टैडिंग पार्लिमैंटेरियन’ सम्मान मिला। वह सादगी, सरलता, सभ्यता,
संस्कृति, सौम्यता और सरस्वती का साक्षात् स्वरूप थी। वह लोगों की मदद के लिए हर पल
तत्पर रहती थी और सार्वजनिक जीवन में गरिमा, साहस और निष्ठा की ऐसी प्रतिमूर्ति थी,
जिसकी भारतीय राजनीति में और कोई मिसाल नहीं मिलती। भारतीय जन-जन की दुलारी
दिव्यात्मा सुषमा स्वराज को शत्-शत् नमन।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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