डॉ. छन्दा बैनर्जी

मैं एक फोटो फीचर जर्नलिस्ट हूँ । शहर के सांस्कृतिक गतिविधियों से सम्बन्धित फीचर तैयार करता हूँ । साधारणतया ऐसे कार्यक्रम जहाँ किसी महापुरुष की जन्म शताब्दी समारोह हो या कोई दिवस विशेष पर मनाया जाने वाला वार्षिकी समारोह, सहसा मुझे आकर्षित नहीं कर पाते । चूँकि मीडिया के प्रोफेशन में हूँ तो जाना पड़ता है लेकिन इन सब कार्यक्रमों के बारे में सोचते ही दिमाग में एक बात अनायास ही आने लगती हैं कि, ऐसे अवसरों को साल में विशेषकर उस एक दिन के लिए सिर्फ नियम रक्षा हेतु मनाया जाता हैं और प्रायः एक ही प्रकार की घिसी – पिटी बातें दोहराकर केवल प्रासंगिक कर्तव्यों का पालन करते हुए समारोह का समापन कर दिया जाता हैं जिसे दूसरे दिन के आंचलिक अखबारों में ताजा खबरों के बीच कहीं न कहीं जगह मिल ही जाती है ।
प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी राजधानी के हृदयस्थल में स्थित टाऊनहॉल को आज बड़े उत्साह के साथ सजाया गया है। आज 14 सितम्बर ‘हिन्दी दिवस’ है । फिर वही वर्ष में एक दिन मनाया जाने वाला कार्यक्रम होने के बावजूद आज बात कुछ ख़ास है । दरअसल इस वर्ष ‘हिन्दी दिवस’ पर विशेष आकर्षण है अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातनाम लेखिका अर्पिता जी की मौजूदगी । जी हाँ, हिन्दी दिवस पर आज के इस भव्य समारोह में अर्पिता जी के सम्मान के लिए एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया है और यही वजह है कि मैं इस समारोह में बिन डोर खींचा चला आया । दरअसल मैं अर्पिता जी का बहुत बड़ा फैन भी हूँ । साथ ही एक जर्नलिस्ट होने के नाते आज मेरे अन्दर एक उत्सुकता बनी हुई है कि, मैं अर्पिता जी के साथ एक भेंटवार्ता लेकर एक खूबसूरत सा फीचर तैयार करूँ ।
आज इस कार्यक्रम के लिए टाऊनहॉल के सुसज्जित सभागार में अनेक नामची

 

न साहित्यकारों, कवियों, हिन्दी प्रेमियों की उपस्थिति दर्ज हो चुकी है ।साथ ही अनेक विद्वजनों व गणमान्य श्रोताओं से हॉल खचाखच भरा हुआ है । मुख्य अतिथि महामहिम राज्यपाल महोदय व कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे राज्य के सांस्कृतिक मंत्री पधार चुके है । विशिष्ट अतिथि के रूप में अर्पिता जी अपना आसन ग्रहण चुकीं हैं । साथ ही आमंत्रित राष्ट्रीय स्तर के प्रखर प्रवक्ता आदरणीय अनुपम जोशी जी मंच पर आसीन हैं । कार्यक्रम का दौर आरम्भ होता है । मंचस्थ वक्ताओं ने एक के बाद एक आकर अपने ओजस्वी भाषणों द्वारा अंग्रेजी के आगे हिन्दी भाषा की श्रेष्ठता साबित करते हुए अपने शब्द जालों से श्रोताओं को बाँध रखा है । बीच-बीच में जानें-मानें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के कवि श्री नरेंद्र चौबे जी ने अपनी कविताओं के माध्यम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया । कार्यक्रम को गति प्रदान करते हुए मंच का संचालन कर रहे आकाशवाणी के उद्घोषक अमित साहनी ने अर्पिता जी के सम्मान के लिए महामहिम राज्यपाल महोदय से विनम्रता पूर्वक आग्रह किया । तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अर्पिता जी मंच पर आई और मुख्य अतिथि के हांथों सम्मानित की गईं । श्री साहनी द्वारा अर्पिता जी से हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य पर कुछ कहने के लिए आग्रह किया गया । विशेष आग्रह पर अर्पिता जी मंच के माइक पर आईं, और बड़े ही धीर-स्थिर अन्दाज़ में शालीनता के साथ कहा कि – ” मैं एक अच्छी वक्ता नहीं हूँ, मैं तो सिर्फ लिख सकती हूँ । बहरहाल आज ‘हिन्दी दिवस’ है तो इस उपलक्ष्य पर मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ कि आज हिन्दी की स्थिति बड़ी ही करूण है । जहाँ एक ओर हम हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की बात करते हैं और इसी कड़ी में कहीं हिन्दी दिवस, कहीं हिन्दी सप्ताह, तो कहीं हिन्दी माह मनाते हैं, तो वहीं दुःख के साथ कहना पड़ रहा हैं कि स्वतन्त्र भारत में आज़ादी के लगभग सात दशक बाद आज भी यह महसूस किया जा रहा हैं कि, हिन्दी स्थापित नहीं बल्कि विस्थापित होती जा रही हैं । जबकि भारत में अंग्रेजी दिवस नहीं मनाये जाने के बावजूद अंग्रेजी अपना स्थापत्य दर्ज करा चुकी है ।”
अर्पिता जी के इस सारगर्भित वक्तव्य से एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा कक्ष गूंज उठा । मैं दूर कोने में बैठा कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग करते हुए अर्पिता जी के बारे में सोच रहा था, कि जितना आकर्षक उनका व्यक्तित्व है उतनी ही हृदयस्पर्शी उनकी लेखनी भी होती है । मैंने उनके लगभग सभी उपन्यास पढ़े है , प्रायः सभी उपन्यास पाठकों के दिल को छू लेने वाली है। उनके द्वारा लिखे गये कई उपन्यासों पर फिल्में भी बनी हैं । अभी हाल ही में उनके द्वारा रचित नारी-केन्द्रित एक मार्मिक कथा ‘अस्तित्व भाग-1’ में कुछ इस प्रकार बयां किया गया जैसे जन्मों से गूंगी एक अल्हड़ जवां लड़की चीख – चीख कर कुछ कहना चाह रही हो कि, काश…… मैं भी औरों की तरह अपनी दिल की बातें किसी से कह पाती । इस भीड़ भरी दुनियां में कोई तो होता जो मुझे समझ पाता ……..।
कार्यक्रम के तीन घंटे कैसे बीत गए पता ही नहीं चला , लगता है जैसे समय के पंख लगे हुए हैं । कार्यक्रम समापन के पश्चात् स्वल्पाहार की व्यवस्था थी । देखते ही देखते अर्पिता जी कई पत्रकारों और चाहने वालो के बीच घिर गयीं । थोड़ी देर इन्तजार के बाद मेरा नम्बर आने पर मैं उनके करीब जा बैठा । यकीन मानिये, पाठकों के दिल को छू लेने वाली उनकी कई लेखों को पढ़कर सिर्फ एक बार उनसे मिलने की तमन्ना वर्षों से मेरे दिल में एक अरमान बनकर रह गयीं थी । आज उनसे इतने करीब से मिलने तथा साक्षात्कार लेने का सौभाग्य पाकर मानों ख़ुशी का ठिकाना न था । कार्यक्रम के आरम्भ से मैं अपने ही ख्यालों में अर्पिता जी से पूछे जाने वाले सवालों का जाल बुनता रहा और अब जब उनके करीब आया तो समझ नहीं आ रहा है कि सवालों का सिलसिला कहाँ से शुरू करूँ । ख़ैर शुरू तो करना ही था …

⦁ राज: अर्पिता जी नमस्कार, मैं राजकिशोर, एक जर्नलिस्ट हूँ । आपके उपन्यासों को पढ़कर वर्षों से आपसे मिलने की एक तमन्ना थी, जो आज पूरी हो गई ।
⦁ अर्पिता: ओह शुक्रिया, राजकिशोर जी..
⦁ रा : आप मुझे राज कह सकती हैं । अर्पिता जी मैं आप पर एक फीचर तैयार करना चाहता हूँ । यदि आपकी अनुमति हो तो आपके व आपकी कृतियों के बारे में कुछ जानना चाहता हूँ ।
⦁ अ : जी पुछिए..
⦁ रा : आपके लिखने का सिलसिला कब से प्रारम्भ हुआ, और कैसे?
⦁ अ : राज, मेरे लिखने का सिलसिला कब से शुरू हुआ ये तो ठीक से याद नहीं । हाँ, मैं इसलिए लिखती हूँ क्योंकि मुझे इस धरती पर कुदरत की रची हुई सभी चीज़ों से बेहद लगाव हैं । प्रकृति के हर एक चीज़ को मैं एक विशेष अन्दाज में देखती हूँ और उसे कलम के सहारे कागज़ों पर उतार देती हूँ । ताकि पढ़ने वाले ये जाने कि कुदरत की बनाई हुई प्रत्येक चीज़ की इस दुनिया में कितनी एहमियत हैं ।
⦁ रा : अर्पिता जी आप कहती हैं कि प्रकृति कि सारी चीज़ों से आप बेहद प्यार करती हैं लेकिन दुनिया में प्यार और सुख के साथ – साथ दुःख और दर्द भी तो होता हैं.. उस बारे में आपका क्या कहना हैं ?

दीवार की तरफ एकटक देख रही अर्पिता अचानक अपना मौन तोड़ते हुए कहती हैं कि ..

⦁ अ : बिना कुछ खोये कोई कैसे जान सकता हैं कि उस चीज़ (जिसे उसने न पाया हो) की कीमत क्या हैं? बिना दुःख झेले कोई सुख का आनन्द भी तो नहीं ले सकता । ठीक वैसे ही बिना दर्द को जाने कोई प्यार की कीमत को क्या जान सकता हैं ?
⦁ रा : अर्पिता जी आप एक लेखिका नहीं होती तो क्या होती?
⦁ अ : राज, इस मुहूर्त में यह कहना बड़ा कठिन हैं ठीक उसी प्रकार जैसे कुम्हार के घूमते हुए चक्के पर मिट्टी के लोंदे को जब वह एक आकार दे देता हैं तब फिर उसके लिए यह कहना बहुत मुश्किल होता हैं कि ये नहीं बनता, तो क्या बनता । ठीक उसी प्रकार मैं एक लेखिका नहीं होती तो ज़रूर कुछ और होती । लेकिन आज जब मैं एक लेखिका हूँ तो अब यह कहना मुश्किल हैं कि मैं लेखिका नहीं होती तो क्या होती ।
⦁ रा : अर्पिता जी, अभी हाल ही में आपकी नई उपन्यास ‘अस्तित्व भाग -1’ आयी, यह एक बेहतरीन उपन्यास हैं ।
⦁ अ : धन्यवाद ।
⦁ रा : आपकी इस नई उपन्यास के बारे में कुछ पूछना चाहता हूँ कि इसमें मुख्य किरदार के रूप में एक लड़की ‘आरती कपूर’ के बारे में आपने लिखा हैं कि आरती एक लेखिका हैं और वह जितनी खूबसूरत हैं उतने ही दर्द भरे लेख लिखती हैं । मुझे तो ‘ख़ूबसूरती और दर्द’ इन दोनों का दूर – दूर तक कोई रिश्ता समझ में नहीं आया । इसके दूसरे भाग (‘अस्तित्व भाग -2’ ) में आरती कपूर का क्या होने वाला है ?

छोटी सी मुस्कराहट के साथ अर्पिता कहती हैं कि…

⦁ अ : ‘अस्तित्व भाग -2’ की कहानी को सीक्रेट ही रहने दें तो बेहतर होगा ।

अर्पिता जी से किये गए सवाल कि – उनके द्वारा रची गई उपन्यास की मुख्य किरदार आरती कपूर, जो कि एक लेखिका रहती हैं, के बारे में अर्पिता जी ने ही लिखा हैं कि आरती जितनी कोमल दिखती हैं उतने ही दर्द भरे लेख लिखती हैं, क्यों ? का जवाब न मिलने पर मानव प्रवृति के अनुसार मेरे अन्दर की जिज्ञासा और बढ़ गई । मैं खुद को रोक नहीं पाया और दोबारा उनसे वही सवाल पूछ बैठा –

⦁ रा : गुस्ताखी माफ़, अर्पिता जी, कोई लेखक तभी इतने दर्द भरे लेख लिख सकता हैं जब वह अपने किसी ख़ास से जुदा हो जाता हैं । ऐसे नग़मे सिर्फ जुदाई के ग़म में ही लिखे जा सकते हैं ।
दोबारा किये गए इस सवाल ने अर्पिता जी को झकझोर कर रख दिया । ऊपर से स्वाभिमानी दिखने वाली अर्पिता जी की आँखें भर आईं, गला रूंध गया । वातावरण बोझिल सा होने लगा था, मैं अर्पिता जी की आँखों में पढ़ रहा था कि कोई तो बात ज़रूर होगी जिसे वो खुद भी अब तक भूल नहीं पाई और जिसके ग़म में अर्पिता जी के अन्दर का दर्द उनके प्रायः लेखों में दिख पड़ता हैं । तारतम्यता बनाये रखते हुए वातावरण को जरा सामान्य करने के उद्देश्य से मैंने अगला सवाल किया ।
⦁ रा : आपकी उपन्यास ‘अस्तित्व भाग -1′ का अन्त बड़ा ही इंट्रेस्टिंग हैं जिसमें आपने आजकल टी.वी. में चल रहे रियालिटी कार्यक्रम की तरह SMS / E-mail के द्वारा पाठकों से फीडबैक जानना चाहा कि ‘अस्तित्व’ की लेखिका आरती कपूर आज जब एक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की ख्यातनाम लेखिका बन चुकी हैं तब उसकी पिछली ज़िन्दगी अर्थात उसकी बिछड़ी हुई मोहब्बत फिर से उसके सम्मुख आकर खड़ी हो गयी ।अब आरती के सामने दो रास्ते हैं, पहला उसका वर्तमान यानी कि ‘कागज़ और कलम’ का रास्ता जिसे उसने अपनी बाकी ज़िन्दगी का सहारा चुन लिया हैं और दूसरा वह जिसने उसे बीच रास्ते में ही छोड़ दिया था और जिसकी वजह से आरती ने अपना ‘ राइटिंग फील्ड ’ चुना था । आपने आरती कपूर के लिए पाठकों के सामने एक और ऑप्शन लिख छोड़ा हैं कि यदि आरती कपूर ज़िन्दगी के इस मोड़ पर आकर अपनी पुरानी मोहब्बत को चुनती हैं तो हो सकता है कि उनके भीतर की जागी हुई लेखन कला की यह असीम शक्ति फिर से कहीं खो जाये । यानी कि आरती कपूर को दोनों में से कोई एक ही रास्ता चुनना होगा ।अर्पिता जी उपन्यास का अन्त कैसा होना चाहिए यह जानने के लिए आपने अपने पाठकों से प्रतिक्रया जाननी चाही, ये तो काफी आकर्षक है और मैं समझता हूँ कि पाठकों की ओर से SMS / E-mail के द्वारा प्राप्त होने वाले फीड-बैक के आधार पर आपको अपनी नई उपन्यास ‘अस्तित्व भाग -2’ का अन्त भी मिल जायेगा । लेकिन मैं आपसे एक पाठक के तौर पर जानना चाहता हूँ कि , आरती कपूर को दोनों में से कौन सा रास्ता चुनना चाहिए ?
⦁ अ : राज, ये आपने मुझसे बहुत मुश्किल सवाल पूछ लिया । दरअसल जीवन में एक बार बिछड़े हुए को दोबारा मिलना चाहिए या नहीं ये मुझे नहीं मालूम क्योंकि जहां प्यार में दो दिल टूटते हैं वहां रह जाते है सिर्फ प्यार के अवशेष— यादें, जज़्बात ,दर्द और इन जगहों को फिर कभी प्यार नहीं ले पाता । कहीं – कहीं पर बिछड़े हुए दो लोग फिर से मिलते ज़रूर है लेकिन दोबारा मिलने पर ‘वर्तमान के दर्द’ और ‘बीते हुए मोहब्बत’ के बीच कहीं कोई दूरी अवश्य रह जाती है । बहरहाल आपने मुझसे पूछा कि अस्तित्व कहानी की किरदार आरती कपूर को क्या करना चाहिए, कौन सा रास्ता चुनना चाहिए ? मैं तो कहूँगी कि आरती को ‘कागज और कलम’ का रास्ता ही चुनना चाहिए ,क्योंकि इस कहानी में जब आरती को उसके अपनों ने ही ठुकराया था ,उसे गम के सहारे जीने के लिए अकेला छोड़ दिया था तब इसी लेखन ने ही उसे जीने का सहारा दिया था । राज, वास्तव में इन्सान बड़ा स्वार्थी होता है, वो ऊँच- नीच, अमीर – गरीब की होड़ में अपनी ज़िन्दगी और जज़्बात से भी सौदा करने लगता है, कुछ पल के लिए बाहरी रंगीन दुनिया को देखकर वो अपने आपको उन रंगो में रंग लेना चाहता है और एक ढकोसले का लबादा ओढ़कर अपनी वास्तविक ज़िन्दगी से बहुत दूर चला जाता है । लेकिन फिर जब कभी दुबारा लौटकर वह वापस आना चाहता है तब उसकी पिछली ज़िन्दगी कहीं खो चुकी होती है और यदि उसे ढूंढ कर कहीं मिल भी जाती है तो उस पर गहरे काले रंगों की कभी ना मिटने वाली परतें जमा हो चुकी होती हैं ।

⦁ रा : अर्पिता जी जवाब की आशा लिए एक आखिरी सवाल पूछने की इजाजत चाहता हूँ, आपकी कहानी ‘अस्तित्व भाग -1’ के चंद लाइनों में से हैं – जहाँ आपने लिखा है कि इश्क़, प्यार, मोहब्बत का अर्थ अलग-अलग लोगों की नजरों में भिन्न – भिन्न होता है । इस पर आप कुछ कहना चाहेंगी ।
⦁ अ : राज, दरअसल पुरुषों के नज़र में इन शब्दों का अर्थ कुछ और होता है तो नारी के नज़र में कुछ और ।
⦁ रा : मैं कुछ समझा नहीं, वो कैसे?
⦁ अ : राज,कुछ पुरुषों के नजर में प्यार ,मोहब्बत ,इश्क इन शब्दों का अर्थ उनके ज़िन्दगी का एक छोटा सा हिस्सा होता है , जबकि अधिकतर महिलाओं के लिए इन शब्दों का अर्थ उनकी ज़िन्दगी का सारांश होता है…और होता है उनके जीवन का ‘अस्तित्व’ ।

 

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