“प्रत्यक्षदर्शी स्वामी अच्युतानन्द और स्वामी आर्यमुनि

द्वारा ऋषि दयानन्द का वर्णन”
-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

आर्यसमाज के उच्च कोटि के विद्वान और ऋषि दयानन्द के जीवन के मर्मज्ञ डा0 भवानीलाल भारतीय जी ने एक
पुस्तक लिखी है जिसका नाम है ‘‘मैंने ऋषि दयानन्द को देखा”। भारतीय जी ने इस पुस्तक की
रचना दो खण्डों में की है। प्रथम खण्ड में 25 उन के लोगों द्वारा लिखे संस्मरण हैं जिन्होंने साक्षात्
ऋषि का सान्निध्य प्राप्त किया था। इसी प्रकार दूसरे खण्ड में 15 उन लोगों के लिखे अति संक्षिप्त
संस्मरण हैं जो ऋषि दयानन्द के सम्पर्क में आये थे। इसके साथ ही पुस्तक में दो परिशिष्टांे में
कुछ संस्मरण लेखकों का संक्षिप्त दिया गया है। ‘ऋषि दयानन्द के बंगाल में चार मास’ विषय पर
एक लेख भी पुस्तक में परिशिष्ट के रूप में दिया गया है। इसी पुस्तक से सामग्री लेकर हम यहां
स्वामी अच्चुतानन्द और स्वामी आर्यमुनि द्वारा दिये गये अपने संस्मरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
स्वामी अच्युतानन्द सरस्वती जी ने लिखा है ‘‘आर्यसमाज के प्रवर्तक पूज्यपाद श्री 108 श्री
स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज का दर्शन सम्वत् 1927 विक्रमी में मैंने काशी में किया। उस
समय परस्पर जो वार्तालाप हुआ, वह निम्नलिखित है। उस समय श्री स्वामी जी महाराज तख्तपोश
पर किन्तु नग्न (एक भगवा कौपीन धारण किये) बैठे थे। आठ-दस बंगाली युवकों को स्वामी जी महाराज संस्कृत में उपदेश
कर रहे थे। मैंने जब श्री स्वामी जी का दर्शन कर हाथ जोड़ कर प्रणाम किया तो पूर्ण ब्रह्मचर्य के प्रभाव से हृष्ट-पुष्ट और
महाविद्वान् के मुख से ललित संस्कृत भाषा सुन कर मैं दंग रह गया। विचारने लगा कि एक नंगा साधु प्रसन्नवदन इस प्रकार
संस्कृत बोलता हुआ पहले कभी देखा व सुना भी नही। श्री स्वामी जी के बड़े-बड़े विज्ञापन मैंने ऐसे देखे जिनमें लिखा हुआ था,
‘‘ए काशी के पण्डितो, आओ मूर्तिपूजा जो वेदविरुद्ध काम है, इस विषय में मुझ से शास्त्रार्थ कर लो। तुम्हारी धूर्तता से काम
नहीं चलनेगा।” मैंने श्री स्वामी जी महाराज से पूछा कि महाराज मनुष्य का कल्याण कैसे होता है? उन्होंने उत्तर दिया,
परमात्मा के ज्ञान से। प्रश्न-परमात्मा का ज्ञान कैसे प्राप्त होता है? उत्तर-ज्ञानियों के सत्संग से। झूठी पाषाण-पूजा से ज्ञान
कभी प्राप्त नहीं हो सकता। अभी तुम बालक हो। संस्कृत विद्या व्याकरण आदि पढ़ो। तुम उस विद्या द्वारा परमात्मा के
स्वरूप को जान जाओगे।
तब मैं काशी में व्याकरण, न्यायादि पढ़ता रहा। उस समय श्री स्वामी जी महाराज ने काशी में एक संस्कृत-विद्या की
पाठशाला स्थापित की थी जिसमें काशी के महाविद्वान् श्री पं0 शिवकुमार शास्त्री, साधु जवाहरदास जी उदासीन और एक
संन्यासी जिनका नाम अभी स्मरण नहीं है, ये तीनों पढ़ाते थे। पाठशाला का सब खर्च श्री स्वामी जी महाराज दिया करते थे।
उस पाठशाला में मैं भी कई मास तक पढ़ा। पुनः 1936 वि0 के हरिद्वार के कुम्भ में भी स्वामी जी महाराज के दर्शन हुए। मैंने
श्री स्वामी जी से दो बार विवाद (शास्त्रार्थ) भी किया जो कि अत्यन्त प्रसन्नता का हेतु था। कई बार और नगरों में भी मैंने श्री
स्वामी जी के दर्शन किये। श्री स्वामी जी महाराज को मैंने कभी तम्बाकू पीते अथवा पान बीड़ी चबाते नहीं देखा। आर्यवीरो, उस
सच्चे ऋषि के सिद्धान्तों का प्रचार करो और उसी की आज्ञानुसार वेदों के नाद को दुनिया में गुंजा दो। यही महर्षि की इच्छा थी
और इसी में तुम्हारा कल्याण है।” (स्वामी अच्युतानन्द सरस्वती जी का यह लेख ‘आर्यमित्र’ पत्र के दयानन्द जन्म-शताब्दी
विशेषांक में प्रकाशित हुआ था।)
महामहोपाध्याय स्वामी आर्यमुनि जी ने भी अपने संस्मरण लिखे हैं। ऋग्वेदभाष्य की भूमिका में उन्होंने लिखा है-
‘1934 वि0 में पहले पहल मैंने स्वामी जी के दर्शन अमृतसर में किये। फिर 1936 वि0 के हरिद्वार कुम्भ में। बहुत क्या? उनकी

2

आकृति को देखने से यह प्रतीत होता था कि यदि कोई ईश्वर के स्थान में मिट्टी के बने देवों की पूजा का भेदन करने वाला और
वैदिक धर्म को स्थिर करने वाला है तो एकमात्र महर्षि दयानन्द सरस्वती ही है। उस समय उनके वेदरूपी वाक्यों को सुनने से
मेरे हृदय में उनकी गुरुता का भाव बैठ गया और उसी दिन से मैंने उनके शिष्य भाव को स्वीकार किया।’
स्वामी आर्यमुनि जी का ऋषि दयानन्द के दर्शन विषयक एक संस्मरण सर्वहितकारी पत्र के 21 नवम्बर, 1977 अंक
मे ंप्रकाशित हुआ था। यह संस्मरण पं0 युधिष्ठिर मीमांसक जी के लेख का भाग था। स्वामी आर्यमुनि जी लिखते हैं ‘‘संम्वत्
1936 विक्रमी में मैं काशी में दर्शन शास्त्र पढ़ता था। उन्हीं दिनों ऋषि दयानन्द काशी पधारे। कई मास काशी रहे। मैं उन दिनों
नवीन वेदान्ती बन चुका था। मुझे ऋषि दयानन्द का नवीन वेदान्त का खण्डन अच्छा नहीं लगा। एक दिन मैंने उनसे नवीन
वेदान्त पर वार्तालाप (शास्त्रार्थ) किया। मुझे अपने पाण्डित्य पर अहंकार था परन्तु मैं उनकी युक्तियों के आगे थोड़ी देर में ही
परास्त हो गया। इस प्रकार मेरा ऋषि दयानन्द के साथ प्रथम मिलन हुआ। शास्त्रार्थ में परास्त हो जाने पर उनकी विद्वता
और आकर्षक व्यक्तित्व के कारण मेरा उनकी ओर झुकाव हो गया। मैं उनसे प्रायः प्रतिदिन मिलता रहा। मुझे उन्होंने विद्वान्
बनने का आशीर्वाद दिया।
एक दिन काशी में एक प्रसिद्ध नैयायिक ने ऋषि दयानन्द से कहा कि जब तुम्हें संस्कृत बोलनी नहीं आती है (उसकी
दृष्टि में स्वामी दयानन्द की सरल संस्कृत, संस्कृत नहीं थी) तो यहां काशी में आकर क्यों बखेड़ा मचाते हो? इस पर ऋषि
दयानन्द ने कहा कि मैं तो वही संस्कृत बोलता हूं जो पतंजलि ने महाभाष्य में लिखी है। यदि वह (पतंजलि की संस्कृत) संस्कृत
नहीं है तो मैं मान लेता हूं कि मुझे संस्कृत नहीं आती है। पर आप बतायें कि आपकी संस्कृत कौन सी है? इस पर उस नैयायिक
पण्डित ने कहा कि मैं तुम से नव्य-न्याय में शास्त्रार्थ करने आया हूं। यदि नव्यन्याय की भाषा में शास्त्रार्थ नहीं कर सकते तो
अपनी पराजय स्वीकार करो। इस पर ऋषि दयानन्द ने तथास्तु कह कर उसे प्रश्न करने को कहा। मैं (आर्यमुनि) उस समय
उनके पास था। मुझे भी विश्वास था कि ऋषि दयानन्द अधिक देर नव्य न्याय की भाषा में शास्त्रार्थ नहीं कर सकेंगे। पर मुझे
यह देख कर आश्चर्य हुआ कि ऋषि दयानन्द ने थोड़े ही समय में नव्य न्याय की भाषा में उसके छक्के छुड़ा दिये। अन्त में ऋषि
दयानन्द ने श्रोताओं से पूछा कि क्या आप लोग हमारा वार्तालाप समझे? उपस्थित जनों के निषेध करने पर ऋषि ने कहा कि
जैसे दो कौवे लड़ते हों तो उनकी भाषा कोई नहीं समझता, ऐसी ही यह नव्य न्याय की भाषा है। यह तो काकभाषा है। मैं तो
लोगों को समझाने के लिये सरल संस्कृत बोलता हूं।’
हम पूर्व लिख चुके हैं कि इस लेख की सामग्री डा0 भवानीलाल भारतीय जी की पुस्तक से ली गई है। ऋषि दयानन्द के
जीवन को सर्वांगपूर्ण में जानने व समझने के लिये पाठकों को इस पुस्तक को अवश्य पढ़ना चाहिये। हम यह भी अनुभव करते
हैं कि सभी मनुष्यों को ऋषि दयानन्द का जीवन अपनी युवावस्था में ही अवश्य पढ़ना चाहिये। इससे उन्हें न केवल ऋषि के
जीवन की घटनाओं की जानकारी मिलेगी अपितु अपने जीवन के सुधार व अपने कर्तव्यों का भी ज्ञान होगा। हो सकता है कि
इसके प्रभाव से उनके जीवन की दशा व दिशा ही बदल जाये जैसी कि सैकड़ों व सहस्रों लोगों की बदली है। इसी के साथ इस लेख
को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121

Leave a Reply

%d bloggers like this: