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    पत्रकार और पत्रकारिता का गिरता स्तर

    -अनिल अनूप

    एक दौर था जब पत्रकार ने अपनी लेखनी के जरिए समाजिक हित में बड़े आंदोलनों को जन्म दिया व समाज ने पत्रकार को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना, लेकिन आज स्थितियां लगातार बदल रही हैं। पत्रकारिता पर व्यवसायिकता हावी हो गई है, जिस कारण पत्रकारिता के स्तर में लगातार गिरावट आ रही है। निजी फायदे के लिए सोशल मीडिया पर फेक न्यूज भेजने का चलन बढ़ा है, जिसका सीधा असर समाज पर पड़ रहा है व समाज में पत्रकार की छवि धूमिल हो रही है। एकस्वर में पत्रकारिता के सिद्धातों का पालन करते हुए पत्रकारिता के मूल स्वरूप को बनाये रखने पर जोर दिया। साथ ही समाज की कठिन समस्याओं पर भी अपनी लेखनी के माध्यम से सरकारों को चेताने की बात कही गयी है, ताकि मानव जीवन के लिए कठिन होती जा रही समस्याओं का समय रहते ही निराकरण हो सके।

    किसी भी इमारत या ढांचे को खड़ा करने के लिए चार स्तंभों की आवश्यकता होती है उसी प्रकार लोकतंत्र रूपी इमारत में विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका को लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तम्भ माना जाता है जिनमें चौथे स्तम्भ के रूप में मीडिया को शामिल किया गया है| किसी देश में स्वतंत्र व निष्पक्ष मीडिया उतनी ही आवश्यक व महत्वपूर्ण है जितना लोकतंत्र के अन्य स्तम्भ इस प्रकार पत्रकार समाज का चौथा स्तम्भ होता है जिसपर मीडिया का पूरा का पूरा ढांचा खड़ा होता है जो नीव का कार्य करता है यदि उसी को भ्रष्टाचार व असत्य रूपी घुन लग जाए तो मीडिया रूपी स्तम्भ को गिरने से बचाने व लोकतंत्र रूपी इमारत को गिरने से बचाने में खासी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

    एक समय था जब एक पत्रकार की कलम में वो ताक़त थी कि उसकी कलम से लिखा गया एक-एक शब्द देश की राजधानी में बैठे नेता, राजनेता, व अधिकारियों की कुर्सी को हिला देता था, पत्रकारिता ने हमारे देश की आज़ादी में अहम् भूमिका निभाई, देश जब गुलाम था तब अंग्रेजी हुकूमत के पाँव उखाड़ने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से अनेक समाचार पत्र, पत्रिकाओं का सम्पादन शुरू किया गया| इन्ही समाचार-पत्र पत्रिकाओं ने देश को बाँधने व एकजुट करने में महती भूमिका निभाई थी,अपने शुरुआत के दिनों में पत्रकारिता एक मिशन के रूप में जन्मी थी जिसका उद्देश्य सामाजिक चेतना को और अधिक जागरूक करना था महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, पं० नेहरु, गणेश शंकर विद्यार्थी, आदि महान स्वतंत्रता सेनानियों व महान हस्तियों ने अखबारों को अपनी लड़ाई का एक महत्वपूर्ण हथियार बनाया था दरअसल उनमे एक जूनून था उन्हें कोई डिगा नहीं सकता था,इन्ही के नक़्शे क़दम पर चलने वाले आज भी ऐसे पत्रकार हैं जो पूंजीपति, सरकार, सामाजिक दीवारों व बंधनों को फांद कर अपने उद्देश्यों की पूर्ति अब भी करते हैं उन्होंने अपना जीवन पत्रकारिता को ही समर्पित कर रखा है।

    वहीँ आज कुछ तथाकथित पत्रकारों ने मीडिया को ग्लैमर की दुनिया और कमाई का साधन बना रखा है अपनी धाक जमाने व गाड़ी पर प्रेस लिखाने के अलावा इन्हें पत्रकारिता या किसी से कुछ लेना देना नहीं होता क्यूंकि सिर्फ प्रेस ही काफी है गाड़ी पर नम्बर की ज़रूरत नहीं, किसी कागज़ की ज़रूरत नहीं, हेलमेट की ज़रूरत नहीं मानो सारे नियम व क़ानून इनके लिए शून्य हो क्यूंकि सभी इनसे डरते जो हैं चाहे नेता हो, अधिकारी हो, कर्मचारी हो, पुलिस हो, अस्पताल हो सभी जगह बस इनकी धाक ही धाक रहती है, इतना ही नहीं अवैध कारोबारियों व अन्य भ्रष्टाचारी अधिकारियों, कर्मचारियों आदि लोगों से धन उगाही कर व हफ्ता वसूल कर अपनी जेबों को भर कर ऐश-ओ-आराम की ज़िन्दगी जीना पसंद करते हैं, खुद भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं, और भ्रष्टाचार को मिटाने का ढिंढोरा समाज के सामने पीटते हैं मानो यही सच्चे पत्रकार हो सभी लोग इनके डर से आतंकित रहते हैं कुछ तथाकथित पत्रकार तो यहाँ तक हद करते हैं कि सच्चे, ईमानदार और अपने कार्य के लिए समर्पित रहने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों को सुकून से उनका काम भी नहीं करने देते ऐसे ही लोग जनता में सच्चे पत्रकारों की छवि को धूमिल कर रहे है।

    आज हद तो यह है कि आपराधिक मानसिकता के व्यक्ति अपने कारोबार को संरक्षण देने के लिए पत्रकारिता में प्रवेश कर रहे हैं जिससे भ्रष्टाचार, अन्याय, अत्याचार को बढ़ावा मिल रहा है और हमारा लोकतंत्र दिन-प्रतिदिन खोखला हो रहा है जो आज नहीं तो कल हमारे लिए घातक सिद्ध होगा। पत्रकारिता समाज का आईना होती है जो समाज की अच्छाई व बुराई को समाज के सामने लाती है अब यदि पत्रकार और बुराई के बीच में सेटिंग हो जाती है तो न अच्छाई समाज के सामने आयेगी और न ही बुराई।

    पत्रकारिता के गिरते स्तर में ज़्यादा ज़िम्मेदारी किसकी?

    पत्रकारिता में थ्योरी तो कई हैं, लेकिन आजकल इस थ्योरी से ही सबकी पहचान हो जाती है। डिग्री में अंतर हो सकता है कि कौन कितने प्रतिशत अजेंडा बनाम सही ख़बर कर रहा है, लेकिन हैं तो लगभग सभी मोटिवेटेड ही। 

    पत्रकारिता जब पढ़ाई जाती है तो एक और टर्म आता है ‘स्लैंट देना’। मतलब ख़बर को किस झुकाव के साथ परोसा जाए। एथिक्स का भी एक पेपर होता है, लेकिन उसका उतना ही मतलब है जितना हमारे स्कूली जीवन में नैतिक शिक्षा का होता है। हर आदमी दूसरों को एथिकल देखना चाहता है, खुद नहीं होता। आज के दौर में एथिक्स, निष्पक्षता और ‘वाचडॉग’ का महत्व मीडिया पर होने वाले सेमिनार और चर्चाओं में ही सिमट कर रहा गया है। 

    अर्थात यह कि ये सब महज़ एकेडेमिक बातें हैं जिनका प्रयोग आप चर्चा में, किसी से वाद-विवाद या मीडिया की वर्तमान स्थिति पर बातें करते हुए करते हैं ताकि सामने वाले को लगे कि आप वाक़ई चिंतित हैं। जैसे कि दुःखी हो लेना कि मीडिया का काम ये है, लेकिन ये नहीं। ये सब फ़ालतू की बातें हैं। फ़ालतू इसलिए कि आपको लगता है डायनासोर होते तो मज़ा आ जाता, जबकि सत्य यह है कि वो नहीं हो सकते। 

    आप सच्चाई से बहुत दूर भागते हैं। आपको आदर्श स्थिति चाहिए कि ऐसा ही होना चाहिए क्योंकि हमने कहीं पढ़ा है कि ऐसा होता तो ग़ज़ब होता। जैसे कि हर आदमी को आठ घंटे काम की बराबर सैलरी मिलनी चाहिए। ये बात सुनकर ही विसंगतियों से भरा लगता है। इसके बुनियाद में ही गलती है क्योंकि न तो हर आदमी एक ही काम करता है, न ही एक ही तरह से उसी काम को करता है, न ही हर आदमी एक जैसा होता है। 

    अब किसी मार्क्स, एंगल्स या स्कोडा-लहसुन ने कुछ कह दिया, जो आपको बहुत ज़्यादा सेंसिबल लगा क्योंकि ये होता तो वो होता… ऐसे होता नहीं है। आप जिस दिन चाहें उस दिन बारिश नहीं होती, न ही आप लाख कोशिश कर लें राजनीति में साफ़ लोग पहुँचने लगेंगे या मीडिया सही रिपोर्टिंग करने लगेगी। ये मानव जाति की समस्या है कि वो कल्पनाशील होता है। उसे कहानियाँ गढ़ना आता है, वो सोचने लगता है कि हर आदमी को बैठे-बैठे खाना मिलने लगे तो कितना सही रहेगा! 

    यहाँ पर तर्क गायब हो जाता है। कुछ ऐसा ही आज के मीडिया के मामले में है। हर चीज एक गति से अपने भूतकाल से वर्तमान में आती है और अपना भविष्य बनाती है। इसमें समय, परिस्थितियाँ, समाज आदि उसको प्रभावित करने के मुख्य कारक होते हैं। कोई भी घटना स्वतंत्र नहीं होती। बारिश के होने के लिए वाष्पीकरण होता है, जिसके लिए नदियों को गर्मी मिलनी चाहिए। 

    मीडिया अगर आज अजेंडा सेट करने में लगी है तो मतलब यह है कि परिस्थितियाँ और समय उसी कार्य के अनुकूल है। यहाँ आप आदर्श मत घुसाइए क्योंकि आदर्श तक पहुँचने के लिए जो समय और परिस्थिति चाहिए उसको भी आपको ध्यान में लाना होगा। क्या आपको लगता है कि आप स्वयं आदर्श हैं? अगर आप हैं भी तो क्या समाज का बहुसंख्यक हिस्सा आदर्श है? क्या वो सही आचरण करता है? सही आचरण से तात्पर्य झूठ न बोलने से लेकर, नागरिक होने के तमाम निर्देशों का पालन करना है। 

    क्या आप या हम किसी भी स्तर पर आदर्श हैं? क्या आपके दिल की इच्छा नहीं होती कि मीडिया से ऐसी ख़बरें आनी चाहिए, वैसी नहीं? फिर आप क्यों कोसते हैं कि मीडिया तो बिक गई है! मीडिया की इस स्थिति के लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदारी मीडिया को खुद लेनी चाहिए। वो इसलिए कि जब भी इनके तरीक़ों पर सवाल उठते हैं, ये कहते हैं कि हम स्वयं समझदार हैं, और हम ही अपनी समस्याओं को सुलझाएँगे, इसके लिए बाहरी एंटरफेरेंस नहीं चाहिए। 

    फिर कहिए कि सुधरते क्यों नहीं? इसमें दो बातें हैं। पहली यह कि सुधरना इनके हाथ में नहीं है। इनको एक व्यवसाय चलाना है, जिसके लिए हर सप्ताह इनकी रेटिंग आती है। फिर उसके हिसाब से प्रोग्रामिंग होती है। जबकि मीडिया कोई एंटरटेनमेंट चैनल तो है नहीं कि वो प्रोग्रामिंग करे? उसको तो ख़बरें आती हैं, तो उसको दिखाना है, या फिर चर्चा करानी है। यहाँ जब डेमोग्राफ़िक्स, रेटिंग, लहर, आँधी आदि के हिसाब लगाए जाते हैं तो देखना पड़ता है कि किस बात की रिपोर्टिंग कैसे हो, और किस ख़बर को कैसे दिखाया जाए। 

    दूसरी बात यह है कि ये बहुत ही आसानी से ये कह देते हैं कि लोग यही देखना चाहते हैं। लोगों की ज़िम्मेदारी नहीं है ‘वाचडॉग’ की, वो मीडिया की है। इसलिए लोगों को निर्धारित करने का हक़ नहीं देना चाहिए कि उसको बकरी द्वारा एलियन का दूध पीते देखना ज़रूरी है, या दो हज़ार के नोट में चिप की, या फिर किसी की हत्या पर कोर्ट के फ़ैसले से पहले अपने फ़ैसले थोपने की। ये निर्धारण करना भी मीडिया को है कि वो समाज को क्या दिखाना चाहता है। 

    बड़े, मूर्धन्य पत्रकार खुद स्वीकारते रहते हैं कि हमारा तो एंटरटेनमेंट वाला काम हो गया है। जबकि ये कहने से पहले उनको नैतिकता के आधार पर नौकरी छोड़ देनी चीहिए। आपसे नैतिकता की आशा की जाती है क्योंकि आप उस जगह पर हैं जहाँ से आप एक स्टैंड ले सकते हैं। आपके हाथ में है कि लोग क्या देखें, लेकिन आप अपने व्यवसाय पर ध्यान देते हैं। 

    समझदार लोग, जो जानते हैं कि किस ख़बर को कैसे दिखाने से क्या होगा, जब एडिटर्स मीटिंग में बोलते हैं कि ‘हाँ, ये वाला एंगल सही रहेगा’, ख़बर की मौत तभी हो जाती है। जब आपके सामने एक चार्ट पड़ा होता है जिसमें पता चलता है कि हिन्दू-मुसलमान वाली ख़बरों को दिखाने से लोग पढ़ते हैं, तो आपको पत्रकारिता में मसीहाई पाने की ख़्वाहिश नहीं करनी चाहिए। आपने उस ख़बर के प्रभाव को पहले ही तय कर दिया कि उसका क्या होगा। जबकि आपका काम सिर्फ ख़बर दिखाना है, उसके विशेषण निकालकर ‘मुस्लिम टेकी की हत्या मुंबई के हिन्दू बहुल इलाके में’ बनाने से आपकी मंशा का पता चलता है। 

    मंशा आजकल बहुत ज़रूरी है क्योंकि उसी से पता चलता है कि मीडिया इंसाफ़ की बात कर रहा है या फिर इसको रेटिंग चाहिए। जहाँ किसी मामले में बच्ची का बलात्कार ‘मुसलमान/हिन्दू बच्ची’ के बलात्कार में बदल जाता है, ख़बर वहीं दम तोड़ देती है। क्योंकि आपने लोगों के सोचने के तरीक़े को नियंत्रण में ले लिया। जब तक ये साबित न हो जाए कि किसी अपराध के लिए किसी के किसी धर्म या जाति से होना उस अपराध के होने का कारण था, तब तक मीडिया को कोई हक़ नहीं है ऐसी हेडलाइन देने का। किसी का पीड़ित होना अगर उसकी जाति के आधार पर है फिर भी हेडलाइन में उसे लिखना ग़ैरज़रूरी है। 

    इस पर थोड़ा और कहा जाए तो मतलब यह है कि लोग हेडलाइन पढ़कर ख़बरों के बारे में मन बना लेते हैं। उनके सोचने का रास्ता तैयार हो चुका होता है। आप उनके घृणा या पूर्वाग्रहों को हवा दे चुके होते हैं। जबकि मीडिया को हर ऐसे मौक़े पर, हर ऐसी ख़बर के कवरेज में, ज़िम्मेदारी दिखाते हुए, हैडलाइन को ऐसे रखना चाहिए कि ये एक अपराध है, जो नहीं होना चाहिए। आगे ख़बर की पूरी डिटेल बताने के बाद, ये बताना चाहिए कि पुलिस इस बात की छानबीन कर रही है कि क्या जाति/धर्म से प्रेरित होकर इस अपराध को अंजाम दिया गया। 

    ये ज़िम्मेदारी मीडिया की है। लेकिन आज के दौर में मीडिया बाइनरी में कार्य कर रहा है। उसके लिए हर बात सत्ता के पक्ष या विरोध में होती है। बिजली आने पर एक हिस्सा भारत के अमेरिका बन जाने की हद तक खुश हो जाता है, तो दूसरा हिस्सा पूरी योजना को असफल बनाने की कोशिश करते हुए चार गाँव ऐसे ले आता है जहाँ बिजली नहीं पहुँची। 

    बात आएगी कि सरकार ने इतनी सड़कें बनवाईं, तो रिपोर्टरों को सड़के दिखाने की बजाए वैसी सड़क ढूँढ लाने का काम मिलता है जिसमें गड्ढे हों। कहा जाएगा कि ये योजना आई है इससे इतने ग़रीबों को फ़ायदा हुआ है, तो रिपोर्टर दौड़ते हैं ये खोजने कि इसी इलाके की एक औरत है जिसे सिलिंडर नहीं मिला। किसी को इससे कोई मतलब नहीं कि उस औरत को क्यों नहीं मिला। किसी को इससे कोई मतलब नहीं कि जिस सड़क पर गड्ढे हैं वो अभी हुए, या उसपर काम हुआ ही नहीं। 

    कहने का मतलब यह है कि भारत जैसे बड़े देश में आप जिस भी तरह की ख़बर ढूँढना चाहें आपको मिल जाएगी। आपको जो दिखाना है, वो आपके रिपोर्टर लाकर दिखा देंगे। मोदी ने सौ प्रतिशत गाँव में बिजली नहीं पहुँचाई, सौ गाँव बच गए। किया आपको लगता है कि सरकार की इस उपलब्धि पर चालीस मिनट के शो में तीन मिनट भी सकारात्मक बातें करने का समय नहीं होता?

    क्या आपको लगता है कि किसी योजना की आलोचना का मतलब यही है कि उसकी सारी ख़ामियाँ गिना दी जाएँ और फ़ायदों पर बात ही न की जाए? आपने एक घर बनाया, गृहप्रवेश का भोज किया और लोग गिन-गिनकर ये कहने लगें कि खिड़की का रंग बुरा है, वहाँ चूना पसर गया है, बाथरूम के नल में फ्लो नहीं है। और इन तीन चीज़ों के छिद्रान्वेषण के आधार पर घर को बुरा मान लिया जाए? 

    मैं ये नहीं मानता कि मीडिया का काम सत्ता की आलोचना है। ये एक वाहियात और अपनी एकतरफ़ा रिपोर्टिंग को जस्टिफाय करने वाली बात है। ये एक धूर्त आदमी का बयान है ताकि लोग उसे महान मानें। जब मैंने ही तय कर दिया है कि पीला रंग सबसे खूबसूरत है, और मैं पीले रंग की ही शर्ट पहनता हूँ, तो फिर मुझे गलत कौन कहेगा! 

    मीडिया का काम सत्ता की आलोचना तक ही सीमित नहीं है। मीडिया का एक काम सूचना पहुँचाना है, और एक काम विवेचना है। विवेचना और चर्चा सिर्फ नाकामियाँ और खोट गिनाने के लिए नहीं होती, न ही सिर्फ हर बात को देवत्व के स्तर पर ले जाकर बताने के लिए होती है। जहाँ सत्ता सही कर रही है, जिस अनुपात में कर रही है, उसी अनुपात में आलोचना और विवेचना होनी चाहिए।

    अनिल अनूप
    अनिल अनूपhttps://www.pravakta.com/author/abdullahanup3gmail-com
    लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार व ब्लॉगर हैं।

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