लेखक परिचय

वैदिका गुप्ता

वैदिका गुप्ता

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पिता का प्यार

खेल रही थी अपनी गुडिया से मेरी सह्जादी,
बोली पापा घर पे रहना,
आज गुडिया की हैं शादी,
अखबारों की खबरों में,
मै सुबह सुबह खोया था,
पलियामेंट में एक,
मंत्री का बेटा सोया था,
पढ़ते हुए अखबार,
उसने यही बात कही थी,
था रविवार का दिन,
एक सी आजादी थी,
चल दी कुण्डी खोल के,
मैडम सब को बुलाने,
चुन्नू , मुन्नू, तुम भी आना,
मेरे घर खाना खाने,
शाम को घर पे बच्चो का,
अच्छा खासा था मेल,
खाने पीने का भी किया,
खास इंतजाम था,
पास के शर्मा जी की बेटी,
गुड्डे को लायी थी,
सेहरा सजाये था,
संग वरमाला भी लाये थी,
धीरे धीरे गुडिया की गुडिया,
दुल्हन बन के आई थी,
शादी की सब रसमे हो गयी,
विदाई की कठिन बेल आई,
मेरी गुडिया की आँख भर आई,
पल भर को ये देख मेरा
पिता मन भी घबराया,
एक दिन मेरी गुडिया भी,
दुल्हन बन के अपने,
पिया के घर जाएगी,
छोड़ के जाएगी ये आंगन,
पिया का घर मेंहकाएगी,
दौड़ के मैंने सह्जादी को,
अपने गले से लगाया,
बेटी लाख पराया धन हो,
जिगर का टुकड़ा होती हैं,
कीमत वही समझते हैं,
जिनके बेटी होती हैं ।।

बेटिया बचाओ, बेटिया पढाओ !!

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